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वो राष्ट्रपति जिनकी लव मैरिज में देश का कानून आड़े आ रहा था, नेहरू ने स्पेशल परमिशन दिलवाई

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बात 1948 की है. नए आजाद हुए देश में अभी संविधान का निर्माण भी नहीं हुआ था. हालांकि नेहरू देश के प्रधानमंत्री तो बन गए थे लेकिन चुनाव अब भी होना बाकी था. इस बीच एक नौजवान लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स से पढ़ाई करके वापिस वतन लौट रहा था. उसके हाथ में नेहरू के नाम अपने प्रोफेसर का लिखा हुआ सिफारिशी खत था.

अटल बिहारी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए के आर नारायणन
अटल बिहारी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए के आर नारायणन

नौजवान जब भारत पहुंचा तो उसने प्रधानमंत्री के दफ्तर के चक्कर काटने शुरू किए लेकिन पंडित नेहरू से उसकी मुलकात नहीं हो पाई. एक दिन नेहरू के निजी सचिव एम. ओ. मथाई ने उसको सलाह दी कि नेहरू से उसकी मुलाकात कब होगी यह तयशुदा तौर पर नहीं कहा जा सकता. वो ऐसा क्यों नहीं करता कि यह खत उनको दे दे. वो इसे प्रधानमंत्री तक पहुंचा देंगे. नौजवान इस बात के लिए राजी नहीं हुआ. उसे पता था कि यह खत उसके विदेश में मेहनत से की गई पढ़ाई का सबसे बड़ा हासिल है. इस खत को खो देने का मतलब है कि एक बेहतरीन करियर की चाबी खो देना.

अंत में थक हारकर वो नेहरू के आधिकारिक सचिव सेकेट्री एवी पाई के पास पहुंच गया. यह तरकीब काम कर गई. उसे जल्द ही प्रधानमंत्री दफ्तर में नेहरू से मिलने बुलाया गया. नौजवान का नाम था कोचेरिल रमन नारायण.

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जिस प्रोफेसर का खत उनकी जेब में रखा गया था उनका नाम था हेराल्ड लास्की. इंग्लैण्ड के मशहूर पॉलिटिकल साइंटिस्ट. नेहरू और नारायणन की मुलाकात में क्या हुआ इससे पहले थोड़ा प्रो. लास्की और नारायणन के रिश्ते बारे में मजेदार किस्सा उन्हीं की जबानी सुन लीजिए-

मैं लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स में अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने गया था. मेरी गणित बहुत अच्छी नहीं थी. मुझे समझ में आ गया कि ये मेरे सब्जेक्ट नहीं है. इस बीच प्रो. हेराल्ड लास्की की क्लास में जाने लगा. प्रो. लास्की की क्लास पब्लिक मीटिंग की तरह होती थी. कोई भी उनकी क्लास ले सकता था. बीच सत्र में मैंने उनसे कहा कि मैं पॉलिटिकल साइंस पढ़ना चाहता हूं. उन्होंने मुझे सलाह दी कि तुम पहले प्रो. रॉबिन्स से इजाजत लेकर आओ. फिर उन्होंने कहा कि क्या मैं दो साल की पढ़ाई एक साल में कर पाऊंगा. मैंने उन्हें बताया कि मैं लंबे समय से उनके लेक्चर ले रहा हूं. इस वजह से मुझे दिक्कत नहीं होगी. तब उन्होंने मुझे एक लेख लिखने के लिए कहा. मेरे लेक उन्हें पसंद आया और उन्होंने मुझे अपने विभाग में जगह दे दी.

बाएं से दाएं -नारायणन, उषा, सोनिया, नटवर, शीला
बाएं से दाएं -नारायणन, उषा, सोनिया, नटवर, शीला

जब भी मैं प्रो. लास्की के पास जब भी कोई लेख लिखकर ले जाता तो वो मुझे नया टॉपिक दे देते. ऐसी ही एक कवायद में उन्होंने मुझे ब्रिटिश समाज की सहनशीलता पर लेख लिखने को कहा. मैंने इस विषय पर खूब पढ़ाई करके लेख लिखा. यह लेख प्रो. लास्की को यह लेख बहुत पसंद आया. इस तरह मैं उनका प्रिय छात्र बन गया.

अब वापिस नेहरू और नारायणन की मुलाकात पर लौटते हैं. जब नारायणन नेहरू के दफ्तर में पहुंचे तो नेहरू अपनी सीट से उठ खड़े हुए. उन्होंने नारायणन को गले से लगा लिया. नेहरू से मिलने से पहले 28 साल के नारायणन एक किस्म झिझक महसूस कर रहे थे. नेहरू के इस बर्ताव से वो झिझक जाती रही. नारायणन ने प्रो. लास्की का खत उनकी तरफ बढ़ा दिया. दो पैराग्राफ वाले इस खत को बड़े ध्यान से पढ़ने के बाद नेहरू नारायणन की तरफ मुखतिब हुए. नारायणन याद करते हैं-

परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ एक मुख्तसर सी मुलाकात
परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ एक मुख्तसर सी मुलाकात

उन्होंने मुझसे कई सारे सवाल किए. वो मेरे राजनीतिक रुझान के बारे में जानने की कोशिश कर रहे थे. मैंने उन्हें बताया कि मैं लंदन में रहने के दौरान स्टूडेंट कॉन्फ्रेंस में जाया करता था. उन्होंने मुझसे पुछा किस स्टूडेंट कॉन्फ्रेंस में? मैंने उन्हें जवाब दिया कि वहां मेरा संबंध सोशल डेमोक्रेट्स से रहा है. मुझे लगता है कि उन्हें मेरा जवाब पसंद आया.

नारायणन नेहरू के दफ्तर से विदेश सेवा में अपनी नियुक्ति लेकर निकले. उनको विदेश सेवा की पहली नियुक्ति रंगून में मिली. लेकिन नारायणन की नजर में इस मुलाकात उनकी जिंदगी बदलने वाली मुलाकात नहीं थी. उनकी जिंदगी बदल देने वाली घड़ी आई 1976 में. लेकिन पहले एक एक डिप्लोमेट के विदेश में प्यार में पड़ जाने का किस्सा सुन लीजिए.

नारायणन की एक अपनी ही फैन फ़ॉलोइंग थी.
नारायणन की एक अपनी ही फैन फ़ॉलोइंग थी.

साल था 1951. दिल्ली की ‘Delhi School of Social Work’ से मास्टर्स की डिग्री कर चुकी एक लड़की बर्मा के भारतीय दूतावास पहुंची. लड़की की जिज्ञासा थी कि लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रो. लास्की से पढ़ कर नौजवान भारतीय डिप्लोमेट से समकालीन राजनीति के बारे में समझ कायम की जाए. दोनों लोग मिले और राजनीति से बात निजी पसंद और नापसंदगी पर पहुंच गई. धीरे-धीरे ये मुलाकातें बढ़ती गईं और प्यार हो गया. एक राजनयिक के तौर पर नारायणन जानते थे कि देश का कानून उनको विदेशी महिला से शादी करने की इजाजत नहीं देता है. उन्होंने इस मामले में पंडित नेहरू से दरख्वास्त की. नेहरू ने मान गए. इस तरह नेहरू की विशेष अनुमति से दोनों शादी कर ली. लड़की ने अपने लिए नया नाम चुना, ‘उषा नारायणन.’

उषा नारायणन के साथ कोच्चेरील रामन नारायणन
उषा नारायणन के साथ कोच्चेरील रामन नारायणन

पंचशील का सिद्धांत देने वाले नेहरू 1962 में चीन की तरफ से हुए अचानक आक्रमण की वजह से बुरी तरह टूट गए थे. यह भारत की हार तो थी ही, विदेशी मामलों के तुर्रम खान कहे जाने वाले नेहरू की भी हार थी. इस हार ने उन्हें तोड़ कर रख दिया. भारत ने चीन के साथ सभी तरह के राजनयिक संबंध खत्म कर दिए. आखिरकार सन 1976 में नेहरू की बेटी इंदिरा ने इस हमसाया मुल्क के साथ राजनयिक संबंध फिर से बहाल करने की तरफ पहल-कदमी की. इस वक़्त इंदिरा को एक कुशल राजनयिक की जरूरत थी. उन्होंने दांव लगाया के आर नारायणन पर. नारायणन जो उस समय विदेश मंत्रालय में सचिव के पद पर काम कर रहे थे. वो दो साल चीन में भारतीय राजदूत रहे.

एक राष्ट्रपति की हैसियत से नारायणन सौरभ गांगुली को पुरस्कृत करते हुए
एक राष्ट्रपति की हैसियत से नारायणन सौरभ गांगुली को पुरस्कृत करते हुए

1978 में वो भारत लौटे तो उन्हें वो काम सौंपा गया जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था. उन्हें 3 जनवरी 1979 जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया. नारायणन हमेशा से टीचर बनना चाहते थे. 1954 में जब वो राजनयिक का करियर छोड़ कर शिक्षक के बतौर भारत लौटना चाहते थे तो उनके इस फैसले से नेहरू बहुत खुश नहीं थे. नारायणन इस बाबत नेहरू से हुई मुलाकात का दिलचस्प ब्यौरा पेश करते हैं-

जब मैं प्रधानमंत्री आवास, तीन मूर्ति हाउस पहुंचा तो वहां नेहरू के मुलाकातियों में मेरे और मेरी पत्नी के अलावा कोई और नहीं था. हमें लाउन्ज में ले जाया गया. दो मिनट बाद वहां प्रधानमंत्री नेहरू की आमद हुई. दिक्कत यह थी कि बातचीत की शुरुआत कहां से हो?

सीतराम केसरी
राष्ट्रपति सीतराम केसरी संग 

तभी मैंने एक अजीब सा डिबिया नेहरू की टेबल पड़ी देखी. मैंने उन्हें पूछा कि यह क्या है? उनका जवाब था कि तुर्की की सिगरेट है. वहां के राष्ट्रपति ने मेरे लिए भेजी है. इसके बाद बातचीत का जो दौर शुरू हुआ वो करीब डेढ़ घंटे तक चलता रहा. नेहरू मुझसे जापान और बर्मा के बारे में सवाल पर सवाल कर रहे थे. इस बीच उन्होंने उस मसाले पर एक भी शब्द नहीं कहा जिसके सिलसिले में उनसे मिलने पहुंचा था. उन्होंने टेबल पर से ‘नेशनल ज्योग्राफिकल मैग्जीन’ उठाई और उसके एक पन्ने को खोल कर मेरी बीवी की तरफ बढ़ाते हुए कहा,’इसमें बर्मा पपर अच्छा लेख छपा है. तुम भी इसे पढ़ो.’

नारायणन और पी वी नरसिम्हा राव
नारायणन और पी वी नरसिम्हा राव

जब मेरी बीवी लेख पढने में मशगूल हो गई तो वो मुझे कोने में लेकर गए. उन्होंने मुझसे पूछा कि आखिर मैंने क्या फैसला किया? मैंने उनको बताया कि मैंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. हालांकि अगर उनकी सलाह मेरे निर्णय से मेल ना खाती हो तो मैं इसे बदल भी सकता हूं. मैंने देखा कि नेहरू ने मुझसे नजरें हटा लीं. वो दूर किसी अदृश्य चीज पर नजरे जमा कर खड़े हो गए. मुझे समझ में आ गया कि उन्हें मेरी बात पसंद नहीं आई. बिना एक शब्द बोले वो मेरी बीवी के पास लौटे और उनसे बात करने लगे. इसके बाद हम उनके घर से लौट आए.

इस तरह नेहरू की मर्जी के खिलाफ उन्होंने ‘Delhi School of Economics’ में पढ़ाना शुरू कर दिया. हालांकि यह ज्यादा दिन चल नहीं पाया और वो विदेश सेवाओं में फिर से लौट गए. जब वो रिटायर होकर लौटे तो उन्हें अपने पसंदीदा पेशे में रहने का मौका दिया गया. लेकिन वो ज्यदा दिन तक इस काम को नहीं कर पाए. 1980 में उन्हें इस पद को छोड़ना पड़ा.

बी सी खंडूरी, के आर नारायणन, उमा भारती, अरुण जेटली, अटल बिहारी
बी सी खंडूरी, के आर नारायणन, उमा भारती, अरुण जेटली, अटल बिहारी

ये 1980 का ही साल का साल था. एक राजनेता था जोकि मॉस्को से हाल ही में राजदूत के तौर पर अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा करके लौटा था. उसकी फ्रेंचकट दाढ़ी करीने से कटी हुई थी. उसने बड़े ही तमीजदार तरीके से कपड़े पहने हुए थे. एक अनौपचारिक मीटिंग में वो एक दूसरे राजदूत से मिला. राजदूत जिसे रिटायर्मेंट के बाद फिर से विदेश सेवा में बुला लिया गया. इस बार उसके जिम्मे एक खास मिशन था. भारत और अमेरिका के रिश्तों को बेहतर करना. मॉस्को से लौटे फ्रेंचकट दाढ़ी वाले राजनेता ने घुंघराले बाल वाले मझले कद के राजदूत को मुस्कुराते हुए एक बात कही-

कहीं अमेरिका में इतना बेहतर काम मत कर देना कि मॉस्को में हमारे लोगों को दिक्कत पेश आए.

वो दौर था शीतयुद्ध का. लेकिन सत्रह साल बाद सोवियत रूस अतीत के तहखाने में धकेला जा चुका था. इस मुलाकात के दोनों किरदार नया इतिहास रच रहे थे. 21 अप्रैल 1997 को फ्रेंचकट दाढ़ी वाले राजनेता इंद्र कुमार गुजराल देश के पहले निर्दलीय प्रधानमंत्री बने. इसके दो महीने बाद 25 जुलाई 1997 को केआर नारायणन देश के पहले दलित राष्ट्रपति बने. पचास साल बाद ही सही एक बूढ़े आदमी की इच्छा आखिरकार पूरी हो रही थी.

अमृत्य सेन और नारायणन
अमृत्य सेन और नारायणन

2 जून 1947, महात्मा गांधी रोज होने वाली प्रार्थना सभा में भाग ले रहे थे. मुल्क आजादी के कगार पर खड़ा था. गांधी भी अपने चरखे पर नए मुल्क के लिए सपने कात रहे थे. प्रार्थना सभा खत्म होने के बाद उन्होंने बड़ी हसरत के साथ कहा-

वो समय तेजी से करीब आ रहा है, जब भारत अपना पहला राष्ट्रपति नियुक्त करेगा. अगर चक्ररैय्या जिंदा होते तो मैं उन्ही का नाम आगे करता. मेरी दिली ख्वाहिश है एक बहादुर, निस्वार्थ ह्रदय की कोई हरिजन महिला हमारी पहली राष्ट्रपति बने. यह केवल सपना भर नहीं है.

गांधी का सपना उस समय अधूरा रह गया था. पचास साल बाद जब पूरा हुआ तो आधा ही. नारायणन दलित तो थे लेकिन पुरुष.

16 अप्रैल 2000 को केआर नारायणन पहले भारतीय राष्ट्रपति के तौर पर फ़्रांस दौरे पर गए. उसी दिन वहां के जाने-माने अखबार ले फिगारो में नारायणन पर तीन लेख छपे. इसमें से एक का शीर्षक था ” एलसी पैलेस में एक अछूत.” दूसरे लेख में नारायणन के अब तक के करियर की पड़ताल की गई थी. इस लेख की शुरुआत कुछ इस तरह थी-

यह एलसी के प्रोटोकॉल के नजरिए से एक दुर्लभ घटना है. जैक शिराक आज एक अछूत से हाथ मिलाएंगे.

पूर्व राष्ट्रपति लोकतंत्र पर अपनी आस्था जताते हुए.
पूर्व राष्ट्रपति लोकतंत्र पर अपनी आस्था जताते हुए.

उसी दिन दोपहर को प्रतिष्ठित अखबार ला मोंडे ने भी एक पूरा पेज नारायणन के अछूत होने की बात को उभारने पर खर्च कर दिया. भारतीय दूतावास और वहां मौजूद भारतीय पत्रकारों के एतराज के बाद ला फिगारो ने इस खबर के सिलसिले में माफ़ी मांग ली. लेकिन क्या सिर्फ फ्रेंच मीडिया को दोष देना ठीक है?

इस दौरे से लौटने के दौरान नारायणन ने भारतीय पत्रकारों के सामने इस मसले पर अपनी बात खुल कर रखी. कुलदीप नैय्यर दर्ज करते हैं-

क्या सिर्फ फ्रेंच मीडिया के सिर पर सारा इल्जाम डाल देना ठीक है. असल में भारतीय मीडिया इसके लिए दोषी है. फ़्रांस से लौटने के दौरान उन्होंने पत्रकारों के सामने इस मसले पर अपना रुख जाहिर करते हुए कहा, ‘पिछले तीन साल से मुझे भरतीय प्रेस के इसी किस्म के रवैय्ये से दो-चार होना पड़ा है.

राष्ट्रपति

जब वो ये शब्द बोल रहे थे, उनकी आवाज में दर्द साफ़ महसूस किया जा सकता था. इसके बाद उनसे एक पत्रकार ने सवाल किया कि ला फिगारो का मामला कब तक शांत हो जाएगा ? इस पर उनका जवाब था –

यह सब भारतीय मीडिया पर निर्भर करता है. आप लोग सांप के चले जाने के बाद लाठी कब तक पीटते रहेंगे.

मुझे याद है कि किस तरह से 1997 में उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भारतीय मीडिया ने अनगिनत बार इस चीज को दोहराया कि एक दलित राष्ट्रपति भवन पहुंच गया है. ला फिगारो उसकी तुलना में कुछ नहीं था.

नारायणन ने जीवन में जो भी हासिल किया अपनी मेहनत से किया. वो 15 किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल पहुंचने वाले छात्रों में से थे. अक्सर उन्हें फीस ना जमा कर पाने के कारण फटकार लगाईं जाती. यह बहुत कड़वा सच है कि बेहद प्रतिभाशाली होने के बावजूद वो हमेशा से अपने दलित होने के तमगे को ढोते रहे. यहां तक की राष्ट्रपति चुनाव में उनके विरोध में उतरे पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषण यह कहने से बाज नहीं आए कि नारायणन को सिर्फ दलित होने की वजह से राष्ट्रपति बनाया जा रहा है. एक इंटरव्यू में नारायणन कहते हैं –

यह मुझे परेशान करता है कि लोग मुझे पहला दलित राष्ट्रपति कहते हैं. जिन लोगों ने राष्ट्रपति चुनाव में मेरा समर्थन किया, उनके दिमाग में मेरे दलित होने का पहलु बहुत हावी नहीं था. ना ही मैंने अपने दलित होने के नाम पर कभी किसी से समर्थन नहीं मांगा. जब चुनाव के दौरान यह बात उछाली गई तो इसने मुझे काफी आहत किया.

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ओट्टपालम से मौलाना आजाद रोड

1980 में अमेरिका में भारतीय राजदूत के तौर पर गए नारायणन 1984 में देश लौटे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की कमान राजीव गांधी के हाथ में आ चुकी थी. उन्ही के कहने पर वो केरल की ओट्टपालम की सुरक्षित सीट से चुनाव लड़े और जीत गए. इसके बाद दो और बार इसी सीट से चुनाव जीतते रहे. राजीव गांधी मंत्रिमंडल में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया. 1991 में फिर से कांग्रेस की सरकार बनी. इस बार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया. इसके पीछे उनके सूबे में कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान थी. उस समय केरल में कांग्रेस के दो धड़े थे. के. करुणाकरन का धड़ा और एके अंटोनी का धड़ा. इस पूर्व राजनयिक ने संतुलन साधने की अपनी क्षमता का इस्तमाल यहां भी किया. वो किसी एक धड़े में नहीं रहे. समय के साथ लगातार पाला बदलते रहे. जब 1991 में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया तो करुणाकरन ने उन्हें वजह बताते हुए कहा कि आपके वामपंथी रुझान के चलते आपको मंत्री नहीं बनाया गया. इस पर नारायणन का जवाब था –

मैंने तो तो कम्युनिस्ट कैंडिडेट एके बालन और लेनिन राजेंद्रन को चुनाव मे हराया है.

दसवें राष्ट्रपति एक दौरान के भाजपा के दो दिग्गजों के साथ
दसवें राष्ट्रपति एक दौरान के भाजपा के दो दिग्गजों के साथ

1992 में राष्ट्रपति चुनाव एक मामले में बहुत दिलचस्प थे. इस समय शंकर दयाल शर्मा के नाम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी. विपक्ष उप राष्ट्रपति पद के लिए मोल-भाव में जुटा हुआ था. उस वक़्त के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव जानते थे कि बिना विपक्ष के सहयोग के वो अपना राष्ट्रपति नहीं चुन पाएंगे.

इधर सोवियत रूस के टूटने के बाद क्यूबा संकट में था. हरकिशन सिंह सुरजीत ने भारत से क्यूबा की सहायता के लिए 10 हजार टन गेंहू और नहाने के साबुन ‘कैरेबियन प्रिंसेस’ नाम के जहाज पर लाद कर, खुद क्यूबा रवाना हो गए. जाने से पहले वो उपराष्ट्रपति पद के लिए नारायणन का नाम सुझा गए थे. इधर वीपी सिंह और राम विलास पासवान भी किसी दलित को उपराष्ट्रपति बनाने की बात पर अड़ गए. हालांकि केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरन ने इस प्रसताव का विरोध किया पर यह विरोध कुछ ख़ास कारगर साबित नहीं हुआ. 1984 में सियासत में उतरे इस राजनयिक का 1992 में नया ठिकाना बना, 6 मौलाना आजाद रोड.

[क्रमशः…]


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