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हज़रात! लाउडस्पीकर की आवाज़ थोड़ी कम हो सकती है क्या?

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हज़रात दो बजकर 40 मिनट हो चुके हैं. जल्दी जल्दी सेहरी खा लीजिए. तभी दूसरे लाउडस्पीकर से आवाज़ आती है. हज़रात दो बजकर 50 मिनट हो चुके हैं. तीसरा लाउडस्पीकर कहता है. नींद से बेदार हो जाइए और सेहरी खा लीजिए. ये सिलसिला तब तक के लिए कायम हो जाता है जब तक सेहरी का टाइम खत्म न हो जाए. जिस तरह से माइक की गूंज होती है उससे तो मुर्दे भी उठकर सेहरी करने लगें.

विरोध इस बात का नहीं है रमजान में क्यों माइक गूंजते हैं. सलाह इस बात की है कि थोड़ा कम क्यों नहीं बजते. मैं तो उस वक़्त हैरान हो जाता हूं जब माइक से आवाज़ आती है. हज़रात! सेहरी का टाइम खत्म होने में सिर्फ दो मिनट बाकी हैं. जल्दी सेहरी खा लीजिए. अब दो मिनट में कौन सेहरी खा लेगा और जो खा लेगा, यक़ीनन वो बड़ी प्रतिभा वाला होगा. उस शख्स को तो इंडियाज़ गॉट टैलेंट में भाग लेना चाहिए!

सवाल है क्या जो सेहरी नहीं खायेगा वो रोज़ा नहीं रख सकता? अौर अगर रोज़ा रख सकता है तो फिर बाकी लोगों को क्यों जगाया जा रहा है? क्यों इतना सेहरी पर जोर दिया जा रहा है? इसी तरह अज़ान के वक़्त होता है. बेशक अज़ान लोगों को मस्जिद बुलाने के लिए होती है. जो कहती है आओ और अल्लाह की इबादत करो, क्योंकि उसके सिवा कोई नहीं. कुछ लोगों के लिए लाउडस्पीकर की आवाज़ परेशानी का सबब बन जाती है. लेकिन ये देखा गया है जहां आस-पास में ही मस्जिदें होती हैं वहां लाउडस्पीकर की आवाज़ एक दूसरे से तेज़ करने की होड़ रहती है. अज़ान मस्जिद के आस-पास रह रहे मुसलमानों को नमाज़ का वक़्त बताने के लिए होती है कि नमाज़ का वक़्त हो गया है, नमाज़ अदा की जाए. उस आवाज़ को मधुर होना चाहिए. कानों को सुकून देनी वाली होना चाहिए. उससे किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जिससे वातावरण या स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचे वो गैर इस्लामी हो जाता है.

पहल करेंगे तो नज़ीर बनेंगे 

अगर लाउडस्पीकर की आवाज़ कम करने की बात होती है तो लोग कहते हैं पहले दूसरे लोगो पर रोक क्यों नहीं लगाते, जो त्योहारों पर इतना शोर मचाते हैं. कुछ जगह पास-पास में ही मस्जिदें होती हैं. वहां तेज़ आवाज़ की क्या ज़रूरत. जब हम पहल करेंगे तो दूसरे के लिए नज़ीर बनेंगे. अगर बहस करेंगे तो दोनों का ही नुकसान होगा. इसलिए किसी को कोई दिक्कत न हो उतनी ही लाउडस्पीकर की आवाज़ रखी जाए. जब हमें दूसरे के लाउडस्पीकर पसंद नहीं आते तो अपने पर भी कंट्रोल करना चाहिए, क्योंकि मुहम्मद साहब (स.) ने इरशाद फ़रमाया है जैसा हम अपने लिए पसंद करते हैं वैसा ही दूसरे के लिए पसंद करें.

सिर्फ सेहरी के लिए ही लाउडस्पीकर का इस्तेमाल क्यों?

तर्क दिया जाता है सेहरी में जगाने के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जाता है. अगर लाउडस्पीकर न बजे तो लोग सोते रह जाते हैं. जब कहीं जाना होता है, चाहे वो नौकरी के लिए या फिर किसी एग्जाम के लिए, तब हम मोबाइल में अलार्म लगा देते हैं. साथ ही घर वालों को बोल देते हैं, टाइम से उठा देना. फिर सेहरी में खाने पीने के लिए लाउडस्पीकर के बजने का ही इंतज़ार क्यों करते हैं. जैसे हम बाकी काम बिना लाउडस्पीकर के जागकर कर लेते हैं तो एक महीने सेहरी के लिए नहीं जाग सकते? अगर सेहरी के लिए नहीं जाग सकते तो फिर बाकी कामों के लिए जब जागना पड़ता है तो उनके लिए भी लाउडस्पीकर क्यों ना होना चाहिए?

लोगों को जमा करने के लिए शुरू हुई अज़ान 

मदीने में जब मस्जिद बनायी गई तो जमात के साथ नमाज़ अदा करने के लिए लोगों को जमा करने की दिक्कत हुई. तब बिलाल इब्ने रबह अल हब्शी को मुहम्मद साहब (स.) ने अज़ान देने को कहा, क्योंकि उनकी आवाज़ बुलंद थी. और इस तरह अज़ान दी जाने लगी. तकनीक के विकास से लाउडस्पीकर से अज़ान दी जाने लगी और आज तेज़ आवाज़ में उसका मक़सद गुम हो रहा है.

सेहरी-इफ्तार में तेज़ लाउडस्पीकर बजाने को लेकर जब हमने बात शुरू की तो फेसबुक पेज पर वरिष्ठ पत्रकार शाहनवाज़ मालिक ने कुछ नई जानकारी शेयर की आप भी पढ़ सकते है. कुछ तस्वीरें भी जों आपकी खिदमत में पेश हैं.

मिस्र में आज भी लाउडस्पीकर नहीं बजते 

सेहरी के वक़्त लोगों की उठाने की एक दिलचस्प रवायत मिस्र और उसके आसपास के देशों में मिलती है. यहां हर गली या मुहल्ले के लिए एक बंदे की तैनाती होती है. वो गली में सूफ़ियाना कलाम या नात गुनगुनाते हुए सभी के घर की कुंडी खटखटाते हैं. उन्हें गली के सभी लोगों का नाम ज़ुबानी याद होता है और गाते हुए ही उनका नाम पुकारते हैं.

Source : Facebook
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ये ज़िम्मेदारी निभाने वाले को अल मेसहरती कहते हैं. उनके हाथ में एक ढोलकी भी हुआ करती है. फिलिस्तीन वग़ैरह में हाथ में ख़ूबसूरत फानूस भी लटकाए जाते हैं. ये रवायत मिस्र में इस्लाम आने के साथ ही शुरू हुई थी. यहां आज भी लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं होता.

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यह आर्टिकल रमज़ान के महीने में लिखा गया था.

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