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क्या राजस्थान में बीजेपी से छिटक रहे हैं राजपूत?

साल 1962. देश का तीसरा लोकसभा चुनाव सिर पर था. राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया निराश थे. उन्होंने सियासी चौसर पर कुछ समय पहले ही एक पासा फेंका था जोकि उल्टा पड़ा था. कुछ ही समय पहले वो खुद जयपुर की भूतपूर्व महारानी गायत्री देवी के पास यह प्रस्ताव लेकर गए थे कि वो जयपुर सीट से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ जाएं. गायत्री देवी ने ना सिर्फ उनका प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया बल्कि स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर जयपुर से मैदान में उतर गईं. यह कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं थी.

महारानी गायत्री देवी.
महारानी गायत्री देवी.

दरअसल गायत्री देवी के पास सुखाड़िया के प्रस्ताव को ख़ारिज करने के वाजिब कारण भी थे. जयपुर राजघराने के ‘यूनियन ऑफ़ इंडिया’ में शामिल होते वक्त महाराजा मान सिंह की तरफ से एक शर्त रखी गई थी कि वो ताउम्र सूबे के ‘राज प्रमुख’ पद पर बने रहेंगे. यह ओहदा राज्यपाल जैसा था. 1956 में स्टेट रओर्गनिज़शन एक्ट के लागू होने के बाद राज प्रमुख के पद को खत्म कर दिया गया. महाराज मान सिंह की जगह गुरुमुख निहाल सिंह को राजस्थान का पहला राज्यपाल बनाया गया. इस तरह आजादी के करीब एक दशक बाद रजवाड़ों की सत्ता में भागीदारी पूरी तरह हाशिए पर चली गई. गायत्री देवी 1962 का लोकसभा कांग्रेस के खिलाफ लड़ी और 1,57,692 वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रहीं. यह 1962 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत थी.

कांग्रेस कभी विकल्प नहीं रही

आजादी के पहले अगर अजमेर को छोड़ दिया जाए तो लगभग पूरा राजस्थान अलग-अलग रजवाड़ों में बंटा हुआ था. आजदी के आंदोलन के दौरान यहां कांग्रेस के झंडे तले ‘प्रजा मंडल’ आंदोलन चला करते थे. प्रजा मंडल से निकले यही नेता आजादी के बाद सूबे में कांग्रेस के प्रतिनिधि बने. 1951 में पहले चुनाव के दौरान सूबे में कांग्रेस के कद्दावर नेता जयनारायण व्यास ने 12 सामंतों को कांग्रेस में लाने की कोशिश की थी. गोकुल भाई भट्ट, टीकाराम पालीवाल जैसे कई नेताओं ने उनका जबरदस्त विरोध किया. इन नेताओं का तर्क था कि जिन रजवाड़ों के खिलाफ प्रजा मंडल ने दशकों तक आंदोलन करता आया था, उनको अपने संगठन में जगह देना ठीक नहीं है. इस तरह पहले ही चुनाव में कांग्रेस ने राजपूतों से जो दूरी बनाई वो आज भी जस की तस बाकी है.

जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह.
जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह.

1951 में जोधपुर के महराजा हनवंत सिंह ने चुनाव लड़ा और एक लाख के बड़े अंतर से चुनाव जीते थे लेकिन वो निर्दलीय मैदान में थे. आजादी के डेढ़ दशक तक राजपूताना के राजपूतों के पास कोई ऐसा राजनीतिक विकल्प नहीं था जो उनको प्रतिनिधित्व दे सके. 1962 में गायत्री देवी का स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लड़ना इस लिहाज से काफी मानीखेज था. उनकी जीत ने राजस्थान में राजपूतों को नया सियासी ठिकाना मिल गया. 1962 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में स्वतंत्र पार्टी ने 176 में से 36 सीटों पर कामयाबी हासिल की. इस समय तक राजस्थान के तमाम बड़े रजवाड़े स्वतंत्र पार्टी के पक्ष में आ चुके थे. 1967 के चुनाव में स्वतंत्र पार्टी और ज्यादा उभर कर आई. 184 सीटों वाली विधानसभा में 48 के साथ वो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. इस चुनाव में सभी बड़े रजवाड़े और सामंत स्वतंत्र पार्टी के पक्ष में लामबंद थे. टूट चुके सामंत लोकशाही में अपनी भूमिका तलाश रहे थे.

बीजेपी वाया जनसंघ

1971 का साल देश के रजवाड़ों के लिए निर्णायक साल था. इंदिरा जबरदस्त बहुमत के साथ सत्ता में आई थीं. उन्होंने संविधान में 26वां संशोधन करके अनुच्छेद 291 और 362 को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया. इसका माने यह हुआ कि आजादी के समय रजवाड़ों को ‘प्रिवी पर्स’ के नाम पर जो भत्ते देने का प्रावधान संविधान में तय हुआ था उसे खत्म कर दिया गया. इंदिरा के इस कदम ने रजवाड़ों की कमर तोड़ दी. 1972 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव थे. बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी बतौर राजनेता मिथक में तब्दील हो चुकी थीं. कांग्रेस की जबरदस्त लहर के सामने स्वतंत्र पार्टी की चमक बोदी लगने लगी. 1967 के विधानसभा चुनाव में मिलीं 48 सीटों के मुकाबले 1972 में यह आंकड़ा महज 12 पर आ गया.

इस चुनाव में भारतीय जनसंघ को भी सीटों के लिहाज से नुकसान उठाना पड़ा. 1967 में उसे 22 सीटें मिली थीं, 1972 के चुनाव में वो सिर्फ 8 सीटों पर कामयाबी हासिल कर सकी. मार्के की बात यह थी कि इस दौरान जनसंघ का वोट प्रतिशत नहीं घटा था. 1967 में यह 11.69 था और 1972 के चुनाव में यह आंकड़ा 12.20 का रहा था. इस दौर में भैरोसिंह शेखावत जनसंघ का चेहरा बनकर उभरे थे. 1972 के विधानसभा चुनाव में गांधीनगर सीट से चुनाव हारने के बावजूद राजपूत समाज में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी.

भैरों सिंह शेखावत.
भैरों सिंह शेखावत.

1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ और कांग्रेस (ओ) के विलय से जनता पार्टी बनी. 1977 में आपातकाल विरोधी लहर में जनता पार्टी को 184 में 152 सीटों का ऐतिहासिक जनमत मिला. भैरोसिंह शेखावत सूबे के पहले राजपूत मुख्यमंत्री बने. आजादी के 30 साल बाद शेखावत के मार्फत राजपूत समाज की सत्ता में वापसी हुई. 1980 में जनता पार्टी के टूटने के बाद जनता पार्टी के जनसंघ धड़े ने ‘भारतीय जनता पार्टी’ की नींव रखी. भैरोसिंह शेखावत इस पार्टी के संस्थापक सदस्य थे. सूबे की राजपूत बिरादरी उनके पीछे-पीछे इस नई पार्टी में आ गई. भैरो सिंह शेखावत को राजस्थान में प्यार से ‘बाबोसा’ कहा जाता है. बाबोसा हरियाणवी के ‘ताऊ’ का बिलकुल सटीक तर्जमा है. 1989 में कल्याण सिंह कालवी के नेतृत्व वाली जनता दल ने बीजेपी के राजपूत वोट बैंक में कुछ सेंध जरूर डाली लेकिन यह बहुत थोड़े समय तक रहा.

क्या बीजेपी से छिटक रहे हैं राजपूत?

2003 में जब वसुंधरा राजे को केंद्र की तरफ से सूबे में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर भेजा गया. कहा जाता है कि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने यह कदम भैरोसिंह शेखावत के इशारे पर उठाया था. वसुंधरा राजे अपने चुनावी भाषण में खुद को राजपूतों की बेटी और जाटों की बहु कह कर वोट मांग रही थीं. भैरो सिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बन चुके थे. बाड़मेर से आने वाले जसवंत सिंह केंद्र की सियासत में उलझे हुए थे. ऐसे में सूबे राजपूत वसुंधरा राजे के पक्ष में लामबंद हो गए.आखिरकार पिछले 15 साल से राजपूत वोट को वसुंधरा राजे का सबसे ठोस जनाधार माना जाता है.

वसुंधरा राजे.
वसुंधरा राजे.

स्थितियां बदलनी शुरू हुई जून 2017 से. 24 जून को राजस्थान के कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की चूरू के मालासर में पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई. आनंदपाल की छवि राजपूत युवाओं के बड़े हिस्से में रॉबिनहुड किस्म की हुआ करती थी. आनंदपाल के एनकाउंटर बाद राजपूत समाज का एक हिस्सा एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग को लेकर आंदोलन पर उतर आया. आनंदपाल के परिजनों ने लाश का दाह संस्कार करने से इंकार कर दिया।

20 दिन तक यह आंदोलन चलता रहा. आनंदपाल के गांव सांवराद में राजपूत समाज के प्रदर्शन के खिलाफ पुलिस काफी सख्ती से पेश आई. आनंदपाल की मौत के करीब 20 दिन बाद उनके परिजनों की इच्छा के खिलाफ पुलिस ने आनंदपाल के शव का दाह संस्कार किया. पुलिस की सख्ती के अलावा राजपूत समाज में इस बात को लेकर काफी गुस्सा था कि सूबे की वो सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है, जिसके लिए उन्होंने वोट किया था. 1962 के बाद एक बार फिर से राजपूत बिरादरी एक बार फिर से खुद को सियासी तौर पर यतीम महसूस कर थी.

दूसरी घटना घटी जोधपुर के सामराऊ में. जनवरी 2018 में यहां शराब माफिया के आपसी झगड़े में जाट समाज से आने वाले हनुमान साई की हत्या कर दी गई. इस घटना ने जातिगत रंग ले लिया और सामराऊ गांव में राजपूत समाज के घरों में आग लगा दी गई. केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जोधपुर के सांसद हैं. इस घटना ने राजपूत समाज की बीजेपी के प्रति नाराजगी को और अधिक बढ़ा दिया. इस सब के बीच पद्मावती फिल्म ने राजपूतों के ध्रुवीकरण को और मजबूत किया.

दाता की इज्जत का सवाल है

2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी की बीजेपी की शानदार जीत के अलावा किन और चीजों के लिए याद रखा जाएगा? पहला कांग्रेस को इतिहास में सबसे कमजोर हालत में पटकने के लिए और दूसरा बीजेपी के ‘ओल्ड गार्डस’ को ठिकाने लगाए जाने के लिए. किसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के खास सिपहसालार रहे जसवंत सिंह सबसे पहले इस चीज का शिकार बने. 2014 में बीजेपी ने उन्हें बाड़मेर सीट से टिकट से इंकार कर दिया.

जसवंत सिंह बाड़मेर के रहने वाले जरूर थे लेकिन वो यहां से कभी भी चुनाव नहीं लड़े थे. 2004 में उनके बेटे मानवेंद्र सिंह जरूर बीजेपी की टिकट पर यहां से चुनाव जीते थे लेकिन यह परंपरागत तौर पर कभी भी जसवंत सिंह परिवार की सीट नहीं रही. 2014 में जसवंत सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर से मैदान में उतर गए. इस चुनाव में उनका चुनाव चिन्ह था, टॉर्च. लेकिन मोदी दौर में जसवंत सिंह और उनकी टॉर्च दोनों अपनी चमक खोने लगे थे. वो बीजेपी के कर्नल सोनाराम के खिलाफ 87, 461 वोट से चुनाव हार गए.

जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह 2013 में बीजेपी की टिकट पर शिव विधानसभा से चुनाव जीते थे. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बागी तेवरों के चलते पार्टी ने मानवेंद्र को निलंबित कर दिया था. यह निलंबन एक साल भी नहीं टिका. उन्हें फिर से बीजेपी में ले लिया गया. पिछले चार साल से मानवेंद्र सिंह अपने कोमा में पड़े पिता की तबियत और उनकी सियासी विरासत को संवारने की जद्दोजदह कर रहे थे.

मानवेंद्र 2015 में भले ही फिर से बीजेपी में आ गए थे लेकिन यह उस समय ही तय हो चुका था कि उनकी पार्टी के प्रति वफ़ादारी लम्बे समय तक टिकने वाली नहीं है. आखिरकार तमाम कयासों को सही ठहराते हुए विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले मानवेंद्र ने बगावत का बिगुल फूंक दिया.

जसवंत सिंह.
जसवंत सिंह.

राजस्थान के मारवाड़ में घर के बुजुर्ग को ‘दाता’ कहा जाता है. बाड़मेर और जैसलमेर के इलाके में आजकल यह शब्द जसवंत सिंह के लिए बरता जा रहा है. चार साल बीजेपी में बने रहने के बाद मानवेंद्र दाता की इज्जत बचाने के नाम पर वसुंधरा के खिलाफ खड़े हो गए. 22 सितंबर 2018 को मानवेंद्र बाड़मेर के पचपदरा में ‘स्वाभिमान सभा’ कर रहे थे. उनके सामने बैठी तकरीबन पचास हजार से ज्यादा की भीड़ महीने भर चले संपर्क अभियान का नतीजा थी. उन्होंने बड़े शांत स्वर में कहना शुरू किया-

“काफी समय से लोग मुझसे कह रहे हैं कि आप खुलकर क्यों नहीं बोलते? जो बात है उसे लोगों के सामने खुली करो. आज समय आ गया है कुछ बातें करने का.”

जैसे ही उन्होंने यह कहा, सामने बैठी भीड़ ने जयकारे लगाने शुरू कर दिए. सामने बैठी भीड़ के हाथ में बीजेपी के भगवा-हरे झंडे की बजाए पंचरंगी झंडा था. यह झंडा आजादी से पहले जोधपुर के राठौड़ राजाओं का प्रतीक हुआ करता था. आजादी के बाद यह सूबे में राजपूत अस्मिता का हिस्सा बन गया. मानवेंद्र सिंह ने 2014 अपने पिता का टिकट कटने का जिक्र करते हुए कहा-

“उस समय दिन के 12 बजे मुझे नरेंद्र मोदी जी का फोन आया. उन्होंने मुझसे कहा कि मानवेंद्र जी आपका और मेरा पुराना संबंध रहा है. बाड़मेर के टिकट को लेकर जो कुछ है वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. इसमें मेरा कुछ लेना-देना नहीं है. यह षड्यंत्र दिल्ली और जयपुर में बैठे हुए दो लोगों की वजह से हुआ है. यह नरेंद्र भाई के शब्द थे. आप समझ गए होंगे कि ये दो लोग कौन थे. मुझे ज्यादा नाम लेने की जरुरत नहीं है.”

मानवेंद्र सिंह ने इसके बाद एक सेकेंड का पोज़ लिया. इस दौरान भीड़ से ‘वसुंधरा-वसुंधरा’ की आवाजें आनी शुरू हो गईं. जो बात वो सार्वजनिक मंच पर नहीं कह सकते थे, उन्होंने बड़ी सफाई से जनता से कहलवा दी. यह राजे के खिलाफ खुली बगावत थी. उस समय यह कयास लगाए जा रहे थे कि मानवेंद्र जल्द ही कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं. 17 अक्टूबर को उन्होंने एक बार फिर से राजनीतिक कयासबाजी को सही साबित कर दिया.

जसोल ऐतिहासिक गांव है. इस गांव ने जोधपुर दरबार, कच्छावा हॉर्सेज और फिर भारतीय सेना को बेहतरीन कमांडर दिए हैं. मारवाड़ राजपूतों और जाटों के बीच चल रही सियासी वर्चस्व की लड़ाई का मैदान रहा है. सूबे के 23 में से 14 राजपूत विधायक इसी इलाके से आते हैं. जसवंत सिंह भले ही सूबे की सियासत में ज्यादा सक्रिय ना रहे हों लेकिन यहां के राजपूतों में उनकी अच्छी लोकप्रियता रही है.मानवेंद्र सिंह के कांग्रेस में आने से बीजेपी के राजपूत वोट बैंक में सेंध लगना तय है.

पिछले दो साल से सूबे के राजपूत बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. इसमें से ज्यादातर समय करणी सेना के तमाम धड़े सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे लेकिन आज की तारीख में करणी सेना चुनावी संगठन नहीं है. ऐसे में बहुत संभावना है कि मानवेंद्र सिंह राजपूतों के गुस्सों को कांग्रेस के पक्ष में भुनाने में कामयाब हो पाएं.

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