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हीरो की हिंसा और शोषण को सहने वाली बेवकूफ नायिकाएं

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जबसे ‘कबीर सिंह’ (Kabir Singh) रिलीज हुई है, विवादों में है. ‘अर्जुन रेड्डी’ की इस रीमेक को खूब लताड़ा गया है. और सही लताड़ा गया है. फिल्म में कई सीन ऐसे हैं जो औरतों के प्रति हिंसा को बढ़ावा देते हैं. यहां तक एक सीन में तो अटेम्प्टेड रेप तक को बढ़ावा दिया गया है.

पर फिल्म की कमाई बताती है कि हम फिल्म को एन्जॉय कर रहे हैं. वजह है हमारी सोच जो पुरुष को दुनिया के केंद्र में रखती है. इस सोच के दोषी हम सब हैं. मैं, आप और हमारे सबसे बड़े कलाकार. ये सोच है जो कहती है कि अगर कुछ पुरुष के साथ सही हुआ है तो वो सही है.

PP KA COLUMN

कबीर खान से लेकर कबीर सिंह तक- इन सभी फिल्मों के केंद्र में पुरुष है. उसकी ख़ुशी में देखने वालों की ख़ुशी है. उसकी हर में देखने वालों की हार है. उसे न्याय मिले, उसके जीवन में सब ठीक हो जाए. उसे अपना प्यार मिल जाए.

जब फिल्म शुरू होती है, तबसे हम बिना खुद से सवाल किए पुरुष की टीम में आ जाते हैं. इन किरदारों को लिखा ही ऐसे जाता है कि आप पहले मिनट से ही हीरो की टीम में हों. हीरो के जीवन के छोटे-छोटे दुख आपको लगातार दिखाए जाएंगे, जिससे आपकी सिम्पथी कभी कम न हो. वो हीरो चाहे ‘बाज़ीगर’ का हत्यारा या ‘धूम’ का चोर हो, हम न्याय के नहीं, क्रिमिनल के पाले में खड़े होते हैं.

फिल्म धूम-3 में आमिर खान एक चोर हैं. यानी एंटी-हीरो. देखने वाले को पता है कि चोरी नैतिक रूप से गलत काम है पर उसे आमिर के किरदार से सिंपथी होती है.
फिल्म धूम-3 में आमिर खान एक चोर हैं. यानी एंटी-हीरो. देखने वाले को पता है कि चोरी नैतिक रूप से गलत काम है पर उसे आमिर के किरदार से सिंपथी होती है.

पुरुष एक्टर, यानी हीरो का किरदार एस्टेबलिश करने में पूरी फिल्म निकल जाती है. हमें ऐसा लगता है जैसे नायिका पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. इसलिए आज हम बात करेंगे नायिकाओं पर. दुपट्टा ठीक करतीं, सर झुकाकर चलतीं, अपनी सोच का इस्तेमाल न करने वाली ऐसी नायिकाओं की जिन्हें हम बड़ी ही सहजता से बेवकूफ की केटेगरी में रख सकते हैं.

बेवकूफ़ नायिकाएं

कबीर सिंह, प्रीती को जब चाहे चूम सकता है. क्रोध में हो तो थप्पड़ मार सकता है. उसे पूरे कॉलेज में ‘मेरी बंदी’ डिक्लेयर कर सकता है. बावजूद इसके कबीर सिंह दुनिया को रोमैंटिक लग सकता है क्योंकि प्रीति पलटकर उससे कुछ कहती नहीं. नहीं कहती, तो स्टैण्डर्ड मेल बॉलीवुड आईक्यू के मुताबिक़ वो इन सबसे से सहमत है.

लड़की के चुप होने का मतलब नहीं है कि फिल्म में उसके किरदार पर मेहनत नहीं गई. प्रीति के किरदार पर ध्यान दीजिए. कितने डिग्री पर सर उठाना है, कैसे देखना है, आंखों में कितनी मासूमियत दिखनी है, मुस्कुराना है तो कितना और जब रोना है तो कितना रोना है. किस तरह चुप रहना है, कि उसकी चुप्पी फिल्म देखने वालों को क्रोध न लगे, बल्कि प्रेम लगे. गले लगना है तो इस तरह कि उसके चेहरे पर दुनिया की सबसे महफूज़ जगह होने का भाव हो.

नायिका को कितना मासूम दिखाना है, ये तय करने में खासी मेहनत लगती होगी.
नायिका को कितना मासूम दिखाना है, ये तय करने में खासी मेहनत लगती होगी.

प्रीति पहली बेवकूफ नायिका नहीं है. हालांकि कई बेवकूफ नायिकाएं हुई हैं पर प्रीति को देखकर सहज तौर पर ‘तेरे नाम’ की निर्जरा याद आती है. निर्जरा की ज़बान फंस जाती है, आंखें डर से भर उठती हैं, हथेलियां कांप सी उठती हैं राधे को देखकर. हाय, इन बड़ी-बड़ी आंखों की मासूमिय!

गेम ऑफ़ थ्रोंस में सरसी, सांसा स्टार्क को अक्सर ‘लिटिल डव’ बुलाया करती थी. क्योंकि सांसा बच्ची सी थी, उसे मालूम नहीं था कि ये दुनिया, खासकर सिंहासन की लड़ाई कितनी खूनी हो सकती है. ऐसे ही नन्हे परिंदों सी मुलायम, मासूम बड़ी आंखों व आली नायिकाओं गढ़ी जाती हैं. क्योंकि अगर ये नायिकाएं मासूम नहीं होंगी तो हमारा नायक बचाएगा किसे?

'गेम ऑफ़ थ्रोंस' में सरसी को मासूम आंखों से देखती सान्सा. कढ़ाई-बुनाई में व्यस्त रहने वाली सान्सा का काम केवल शादी के सपने देखना था, जबकि उसे एहसास था कि उसका होने वाला पति बेवकूफ़ और हिंसक है.
‘गेम ऑफ़ थ्रोंस’ में सरसी को मासूम आंखों से देखती सान्सा. कढ़ाई-बुनाई में व्यस्त रहने वाली सान्सा का काम केवल शादी के सपने देखना था, जबकि उसे एहसास था कि उसका होने वाला पति बेवकूफ़ और हिंसक है.

वृद्धों, दिव्यांगों, महिलाओं को सीट दें…

पब्लिक ट्रांसपोर्ट में कई बार ऐसा पढ़ने में आता है. पब्लिक ट्रासंपोर्ट में ट्रेवल कर रहे लोगों का जब वर्गीकरण होता है तो महिलाओं को या तो वृद्धों और दिव्यांगों के साथ रखा जाता है, या बच्चों के साथ. वृद्ध, दिव्यांग और बच्चों, तीनों के साथ मसला ये है कि उन्हें सहारे की जरूरत पड़ सकती है. महिलाएं स्वस्थ हों, वयस्क हों, फिर भी उन्हें कमज़ोर ही मानकर चला जाता है. मानकर चला जाता है कि वृद्ध, दिव्यांग और बच्चों की तरह उसे भी गार्जियन की जरूरत है.

ये तरीका बेस्ट है. क्योंकि इससे पुरुष के हाथ में पूरी अथॉरिटी रहती है. महिलाओं को भी यकीन है कि हम बेहद कमजोर हैं. यही महिलाएं घर का काम करते, फसल काटते, चक्की पीसते और कुंएं से पानी खींचते हुए कमज़ोर नहीं पड़तीं. पर घर से बाहर निकलने पर उन्हें लगातार एहसास दिलाया जाता है कि वे कमज़ोर हैं.

महिलाएं घर का काम करते, फसल काटते, चक्की पीसते और कुंएं से पानी खींचते हुए कमज़ोर नहीं पड़तीं. पर घर से बाहर निकलने पर उन्हें लगातार एहसास दिलाया जाता है कि वे कमज़ोर हैं.
महिलाएं घर का काम करते, फसल काटते, चक्की पीसते और कुंएं से पानी खींचते हुए कमज़ोर नहीं पड़तीं. पर घर से बाहर निकलने पर उन्हें लगातार एहसास दिलाया जाता है कि वे कमज़ोर हैं.

नन्ही चिड़ियों सी हमारी नायिकाएं घर के काम करती हैं, कॉलेज में पढ़ने जाती हैं, अच्छी स्टूडेंट्स हैं. मगर उनकी खुद की कोई पहचान नहीं है. क्योंकि उन्हें कॉलेज में एक नायक मिल गया है. नायक इनके जीवन में आकर इनके पिता को रिप्लेस कर देते हैं. पिता के बाद अब इनके स्वघोषित प्रेमी इनके लिए फैसले लेते है.

इसलिए ये नायिकाएं कभी वयस्क नहीं हो पातीं. शारीरिक और मानसिक तौर पर बालिग होने के बावजूद ये अपने अधिकारों को लेकर बालिग नहीं होतीं. और नाबालिगों की तरह ट्रीट होते हुए इनकी भूमिका भी माइनर हो जाती है. इनका ओपिनियन क्या है, ये सोचतीं क्या हैं, उससे नायक को फर्क नहीं पड़ता. अंग्रेजी में इसे इन्फेंटेलाइजेशन कहते हैं. यानी एक काबिल वयस्क को एक शिशु के स्तर तक कम कर देना. इतना, कि उसके होने का अर्थ उसके प्रेमी के होने से ही हो. वरना न हो.

नायिकाओं की परवरिश

बेहद अब्यूजिव नायकों की नायिकाएं कभी सपने नहीं देखतीं. प्रीति और निर्जरा, दोनों बड़े ही संस्कारी बैकग्राउंड से आती हैं. इनके माता-पिता बड़े ही सिंपल लोग होते हैं.

बेहद अब्यूजिव नायकों की नायिकाएं कभी सपने नहीं देखतीं.
बेहद अब्यूजिव नायकों की नायिकाएं कभी सपने नहीं देखतीं.

इन लड़कियों ने डरने के सिवा कभी कोई काम नहीं किया. कभी किसी से ऊंची ज़बान में बात नहीं की. हमेशा लड़कियों के दोस्ती की, लड़कों से नहीं. इनका दुपट्टा हमेशा ड्यूटी पर तैनात रहा. ये कभी दूसरी नायिकाओं की तरह तौलिये में नहीं नाचीं. इनका फ्रेंड सर्कल कभी बड़ा नहीं रहा. ये कभी घूमने-फिरने नहीं निकलीं. जो भी किया, या पिता की आज्ञा से, या नायक के साथ.

हमारे समाज में ये सबसे बढ़िया और किफायती तरीका है लड़कियों को बड़ा करने का. हमारी तो क्या, जाने कितनी पीढ़ियों की लड़कियों को इसी तरह बड़ा किया गया है. कि पिता के बाद वो किसी पति की हो जाएं.

बेबस नायिकाएं

आधुनिक राजनीतिक विज्ञान की नींव रखने वाले लोगों में से एक थॉमस हॉब्स (1588-1679) ने कहा था ‘स्केंतिया पोतेंतिया एस्त’ (Scientia Potentia Est). जिसको अंग्रेजी में कहा गया नॉलेज इज पावर. यानी ज्ञान, ताकत है.

राधे और कबीर, दोनों क्रमशः निर्जरा और प्रीति के सीनियर हैं. दोनों से अपेक्षित है कि वो नायकों से डरें. क्योंकि न सिर्फ वे सीनियर हैं, बल्कि दोनों को एंगर इशूज हैं. अगर लड़का सीनियर न होता, तो लड़की के पास हमेशा विरोध करने का स्कोप होता. लेकिन डर को प्यार में बदलने वाले इस नैरेटिव में, जिसमें लड़की को धीरे-धीरे लड़के का कथित स्वर्ण ह्रदय दिखता है, में ऐसा मुमकिन नहीं है.

डर को प्यार में बदलने वाले नैरेटिव में, जिसमें लड़की को धीरे-धीरे लड़के का कथित स्वर्ण ह्रदय दिखता है, में लड़की के पास विरोध करने का स्कोप नहीं होता. ('अर्जुन रेड्डी' फिल्म का सीन)
डर को प्यार में बदलने वाले नैरेटिव में, जिसमें लड़की को धीरे-धीरे लड़के का कथित स्वर्ण ह्रदय दिखता है, में लड़की के पास विरोध करने का स्कोप नहीं होता. (‘अर्जुन रेड्डी’ फिल्म का सीन)

राधे के केस में गुंडई और कबीर के केस में अपने सब्जेक्ट का ज्ञान, सीनियर होना और पुरुष होना. ये सब मिलकर लड़की पर अथॉरिटी बनाने का काम करते हैं.

अक्सर सुनने में आता है कि डॉक्टर, टीचर, बॉस या धर्मगरु ने महिला का यौन शोषण किया. जब पुरुष के पास ज्ञान का एडवांटेज होता है, उसके लिए लड़की का शोषण करना आसान हो जाता है. लड़की को लगता है कि जो भी हो रहा है, उससे उसका कुछ भला तो होगा ही. इसलिए शुरुआत में वो उसे बर्दाश्त भी करती है.

सीनियर राधे (सलमान खान) को जूनियर का सलाम बजाती निर्जरा (भूमिका चावला (फिल्म: तेरे नाम)
सीनियर राधे (सलमान खान) को जूनियर का सलाम बजाती निर्जरा (भूमिका चावला (फिल्म: तेरे नाम)

थॉमस हॉब्स की ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट थियरी’ के मुताबिक़ राजा और प्रजा में एक अनकहा कॉन्ट्रैक्ट यानी इकरार होता है. प्रजा अपने अधिकारों और आज़ादी का कुछ हिस्सा राजा के हवाले करती है. बदले में उसे राजा से प्रोटेक्शन मिलता है. फ़िल्मी प्रेम में कुछ ऐसा ही दिखता है. नायिकाएं अपनी आजादी कुर्बान करती हैं. और स्क्रिप्ट उसे जस्टिफाई करते हुए हीरो से या तो हिरोइन की जान बचवा देती है. या हिरोइन को ‘छेड़’ रहे गुंडे पिटवा देती है. ऐसे में हिरोइन इतना कृतज्ञ महसूस करती है कि मजबूरन प्रेम करने लगती है.

फिल्म 'हाइवे' में आलिया भट्ट के किरदार वीरा को अपने किडनैपर से प्रेम हो जाता है. पावर के सामने औरत का खुद को पूरी तरह सरेंडर कर देना और शोषण को अपने नसीब की तरह अपनाकर उसमें प्रेम ढूंढ लेना, प्रेम का सबसे पुराना नैरेटिव है.
फिल्म ‘हाइवे’ में आलिया भट्ट के किरदार वीरा को अपने किडनैपर से प्रेम हो जाता है. पावर के सामने औरत का खुद को पूरी तरह सरेंडर कर देना और शोषण को अपने नसीब की तरह अपनाकर उसमें प्रेम ढूंढ लेना, प्रेम का सबसे पुराना नैरेटिव है.

फिल्म ‘हाइवे’ में आलिया भट्ट के किरदार वीरा को अपने किडनैपर से प्रेम हो जाता है. पावर के सामने औरत का खुद को पूरी तरह सरेंडर कर देना और शोषण को अपने नसीब की तरह अपनाकर उसमें प्रेम ढूंढ लेना, प्रेम का सबसे पुराना नैरेटिव है. और कभी पुराना नहीं होता. क्योंकि ये पुरुष को सूट करता है.

पूरक नायिकाएं

ये नायिकाएं, नायकों के लिए बहुत जरूरी हैं. क्योंकि ये नायक के ठीक उलट होती हैं. जैसे आग और पानी. चूंकि फिल्म का काम पुरुष के लिंग की परिक्रमा करना है, नायिका का भी यही काम है.

प्रेमचंद की कहानियों में पढ़ते थे, लड़के की शादी कर दो, सुधर जाएगा. औरत के कन्धों पर एक अनकहा बोझ है, पुरुष को संवारने और सुधारने का. जिसे अक्सर ‘मैटरनल इंस्टिंक्ट’ और ‘केयरिंग नेचर’ जैसे मिथकों से जोड़ा जाता है. इसी क्रम में उसे जस्टिफाई भी कर दिया जाता है.

औरत के कन्धों पर एक अनकहा बोझ है, पुरुष को संवारने और सुधारने का. जिसे अक्सर 'मैटरनल इंस्टिंक्ट' और 'केयरिंग नेचर' जैसे मिथकों से जोड़ा जाता है. इसी क्रम में उसे जस्टिफाई भी कर दिया जाता है. (फिल्म: कबीर सिंह)
औरत के कन्धों पर एक अनकहा बोझ है, पुरुष को संवारने और सुधारने का. जिसे अक्सर ‘मैटरनल इंस्टिंक्ट’ और ‘केयरिंग नेचर’ जैसे मिथकों से जोड़ा जाता है. इसी क्रम में उसे जस्टिफाई भी कर दिया जाता है. (फिल्म: कबीर सिंह)

नायकों से उलट प्रकृति वाली इन नायिकाओं से अपेक्षित है कि वो नायक की अंदर बसे क्रोध और नफरत को अपने प्रेम से ख़त्म कर दें. ऐसा संदेश दिया जाता ही कि नायक में प्रेम तो बहुत है, पर उसे समझने और बाहर लाने वाली सिर्फ एक नायिका ही है.

इस बड़े, नेक काम में अगर नायिका को एकाध थप्पड़ पड़ भी गया तो बुरा क्या है?

ये नायिकाएं रोज़ गढ़ी जाती हैं

सिर्फ फिल्मों नहीं, रियल लाइफ में भी. घरेलू हिंसा झेल रही औरत भी तलाक के लिए अप्लाई करने के पहले सौ बार सोचती है. कि मेरा पति मेरे बिना कैसे रहेगा. उस बेचारे को तो किचन से पानी लेना और खुद अपनी थाली लगाना तक नहीं आता.

प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 में पास हुआ था. पास होने के 10 साल के अंदर इसके अंतर्गत 1 लाख से भी अधिक केस दर्ज हो चुके थे. डाटा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का है. और ये वो केस थे जो दर्ज हुए. जो नहीं हुए, उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है.
प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 में पास हुआ था. पास होने के 10 साल के अंदर इसके अंतर्गत 1 लाख से भी अधिक केस दर्ज हो चुके थे. डाटा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का है. और ये वो केस थे जो दर्ज हुए. जो नहीं हुए, उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है.

प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 में पास हुआ था. पास होने के 10 साल के अंदर इसके अंतर्गत 1 लाख से भी अधिक केस दर्ज हो चुके थे. डाटा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का है. और ये वो केस थे जो दर्ज हुए. जो नहीं हुए, उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है.

एंगर इशूज और फिजिकल अब्यूज को ‘क्यूट’, ‘प्रोटेक्टिव’ और ‘प्यार’ जैसे शब्दों की आड़ में झेलने वाली प्रीति और निर्जरा फ़िल्मी नहीं हैं. असल हैं. हमारे बीच हैं. और जब हम प्रीति को थप्पड़ जड़ते कबीर को देखकर तालियां बजाते हैं तो हम खुद को शर्मसार करते हैं. रियल लाइफ में पिट रही, डॉमिनेट हो रही लड़कियां और पिटें, हमारे सहेलियां, बेटियां, बहनें पिटें, इसके लिए ताज़ा ज़मीन तैयार करते हैं.

नायिकाओं की किस्मत लिखने वाले

ये शॉकिंग नहीं है कि इन लड़कियों को पुरुष लिख रहे हैं. पुरुष के पास कुछ भी न हो, पर अपने सबसे बुरे दिन भी उसके पास पुरुष होने का प्रिविलेज होता है. अगर हम जोया अख्तर, गौरी शिंदे, अलंकृता श्रीवास्तव, रीमा कागती या जूही चतुर्वेदी जैसी राइटर या डायरेक्टर की फ़िल्में देखें तो नायिकाओं के चित्रण में एक साफ़ अंतर पाएंगे. ‘पिकू’, ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरका’, ‘डियर ज़िन्दगी’, ‘इंग्लिश विन्ग्लिश’, ‘लक बाय चांस’ या ‘दिल धड़कने दो’ इसके सबसे उम्दा उदाहरण हैं.

बाएं से: गौरी शिंदे, जोया अख्तर और रीमा कागती
बाएं से: गौरी शिंदे, जोया अख्तर और रीमा कागती

पर हम नायिकाओं को थरथराते हुए देखते हैं. हीरो को हिंसा करते देखते हैं. और फिर भी हम चाहते हैं कि नायिका, नायक की हो जाए. क्योंकि हमने हीरो के सिवा किसी और के पॉइंट ऑफ़ व्यू से कभी सोचा ही नहीं.

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