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इस मशहूर फिल्म डायरेक्टर ने कहा, 'हां मैं ट्रांसजेंडर हूं'

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याद है एक फिल्म आई थी. बेस्ड थी मशीनों और इंसानों की लड़ाई पर. मशीनें, जो पावर और दिमाग के लेवल पर भी इंसानों से आगे चली जाती हैं. फिर पूरी दुनिया पर वो कब्ज़ा कर लेती हैं. लेकिन एक छोटा सा हिस्सा धरती के कोने में कहीं अंदर बचा रह जाता है. वहां रहता था एक सैनिक मॉर्फियस. वो इस दुनिया से उठा कर ले गया नियो को. ट्रिनिटी की मदद ली थी इस काम के लिए. फिर नियो भाईसाहब की ट्रेनिंग होती है. लड़ने बचने की हर विद्या उनके दिमाग में कंप्यूटर से डाल दी जाती है. बन जाता है सुपर पावर. और फिर मशीनें एक दिन इंसानों पर भी हमला कर देती हैं. नियो उनका सामना करता है. मशीने लड़ाई बंद कर लौट जाती हैं. लेकिन उसकी कुर्बानी लेकर. अपनी जान देकर दुनिया को बचा लेता है. जैसा कि हर हॉलीवुड फिल्म में होता है.

कुछ कुछ याद आया? नहीं आया तो बता दें, मैट्रिक्स फिल्म की कहानी है. तीन पार्ट्स में आ चुकी है. रिलीज होती है तो हल्ला मच जाता है दुनिया भर में. लेकिन खबर ये नहीं कि इसका चौथा पार्ट आ रहा है. खबर मैट्रिक्स फिल्म के डायरेक्टर के बारे में है.

फिल्म के डायरेक्टर थे वाचोव्स्की ब्रदर्स. लॉरेंस और एंड्रू वाचोव्स्की. फिर 2012 में लॉरेंस ने अपना लिंग परिवर्तन करवा लिया और औरत बन गए. लोगों ने उन्हें वाचोव्स्की ब्रदर्स की जगह द वाचोव्स्कीज बुलाना शुरू किया.

बीते दिनों उनको भाई एंड्रू वाचोव्स्की ने भी अपना लिंग परिवर्तन करवा लिया. और वाचोव्स्की ब्रदर्स से वाचोव्स्की सिस्टर्स बन गए. लॉरेंस और एंड्रू अब लेना और लिली वाचोव्स्की कहलाते हैं. है न कमाल की बात!

lana and lilly
लिली (पहले एंड्रू, बाएं) और लेना वाचोवस्की

बीते दिनों हमने सिमरन का इंटरव्यू किया था. जो एक हिजड़ा हैं. सलीम किदवई से बात की, जो गे एक्टिविस्ट हैं. कुछ गे दोस्तों ने अपनी कहानियां हमसे शेयर की. सबमे एक ही चीज कॉमन मिली. ‘कमिंग आउट’ यानी पब्लिक में अपनी पहचान को स्वीकार करना सबसे कठिन काम होता है.’ ये कमिंग आउट का प्रोसेस था जो ‘अलीगढ़’ फिल्म में प्रोफेसर सिरास की जान ले लेता है. बीते दिनों लिली (पहले एंड्रू) के घर ‘डेली मेल’ अखबार से एक पत्रकार पहुंचा. उनके जीवन की जांच-पड़ताल करने. क्योंकि मैट्रिक्स जैसी मशहूर फिल्म का डायरेक्टर अपना सेक्स बदल ले, ये किसी भी अखबार के लिए मसालेदार खबर हो सकती है. लेकिन लिली ने डेली मेल के लिए लिखा एक करारा जवाब. ऐसा जवाब जिससे सिर्फ मीडिया को ही नहीं, हम सबको सीख लेनी चाहिए. पढ़िए, और समझिए, लिली का स्टेटमेंट:

‘सेक्स चेंज शॉकर: वाचोव्स्की भाई अब बने वाचोव्स्की बहनें’. ये वो हेडलाइन है जिसका मैं पिछले एक साल से इंतजार कर रही हूं. डरते हुए या फ्रस्ट्रेट होकर. एक-दो बार खबर बाहर आते-आते रह गई. ईमेल आते थे रिपोर्टर्स के. कि अपने सेक्स चेंज के बारे में मुझे क्या कहना है. मेरी मर्जी के बिना अगर छप जाती तो मैंने भी एक बयान तैयार रखा था. ऐसा कड़वा बयान जो बना था पेशाब, सिरके और पेट्रोल से.

lily wachowski

बयान में बहुत कुछ था. ट्रांसजेंडर्स की हालत पर. जो टॉर्चर वो झेलते हैं. उनका सुसाइड और मर्डर रेट. और हां. एक व्यंग्यात्मक उपसंहार भी लिखा था. कि किस तरह हमारे पिता ने अपने अंडकोश में इंजेक्शन से टिड्डे का खून मिला लिया था ये प्रार्थना करते हुए कि उन्हें सुपरवुमन लडकियां पैदा हों.

पर ऐसा हुआ नहीं. अखबारों और मैगजीनों ने ऐसा कुछ छापा नहीं. मैं भी ऑपटिमिस्ट हूं. मैंने सोचा लोगों की सोच में प्रोग्रेस हुई है. खैर.

पिछली रात में डिनर पर बाहर जाने के लिए तैयार हो रही थी. तभी दरवाजे की बेल बजी. दरवाजा खोला तो पोर्च में ऐसा आदमी खड़ा था जिसे मैं जानती नहीं थी.
This might be a little awkward (ये थोड़ा अजीब लग सकता है),” उसने अंग्रेजी एक्सेंट में कहा.

मैंने एक गहरी सांस भरी.

कभी-कभी ऑपटिमिस्ट होना कठिन होता है.

उसने बताया वो ‘डेली मेल’ का पत्रकार है. जो UK की सबसे बड़ी समाचार सेवा है. कोई छोटा-मोटा टेबलाइड नहीं है. और मुझे उसके साथ अगले दिन बैठना होगा. अपनी प्रेरक कहानी बतानी होगी. फोटो खिंचवानी होगी. नेशनल इन्क्वायरर जैसे किसी टेबलाइड से बचना होगा.

मैं और मेरी बहन लेना हमेशा प्रेस को अवॉइड करते आए हैं. अपनी कला के बारे में बात करना बहुत पकाऊ लगता है. और खुद के बारे में बात करना एक शर्मिंदगी भरा प्रोसेस लगता है. मुझे पता था कभी न कभी दुनिया को मेरा सच पता चलेगा. ट्रांसजेंडर होकर छिपना मुश्किल है. सबको पता चल ही जाता है. मुझे बस समय चाहिए था. थोड़ा समय, खुद को संभालने के लिए. कम्फ़र्टेबल होने के लिए.

पर शायद यहां मुझे अपने फैसले खुद लेने का हक नहीं है.

जब उस पत्रकार ने अपना कार्ड दिया, मैं दरवाजा बंद कर के सोचने लगी कि डेली मेल का नाम कहां सुना था. हां, ये वही ‘समाचार’ सेवा थी जिसने ट्रांसजेंडर टीचर लूसी मिडोस पर खबर की थी. इन्होंने एक समय लिखा था कि न ही सिर्फ लूसी एक गलत शरीर में कैद हैं, वो गलत काम कर रही हैं. मुझे लूसी की कहानी याद रह गई. इसलिए नहीं कि वो भी ट्रांसजेंडर थी. बल्कि इसलिए कि खबर छपने के 3 महीनों बाद उसने सुसाइड कर ली थी.

और आज एक बार फिर वो दरवाजे पर खड़े हैं. जैसे कह रहे हों, ये देखो एक और. चलो इसे बाहर निकालो. ताकि हम इसे देख सकें.

ट्रांसजेंडर होना आसा नहीं है. हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो स्त्री और पुरुष के अलावा किसी पहचान को नहीं मानती है. पूरी दुनिया आपकी दुशमन बन बैठती है.

andrew wachowski

मैं कुछ लकी ट्रांस लोगों में से एक हूं. जिसके पास परिवार का सपोर्ट है. ऑपरेशन, इलाज और थेरेपी करवाने के लिए पैसे हैं. लेकिन जिनके पास ये लक्ज़री नहीं होती, उनके लिए जीना बहुत कठिन हो जाता है. कई ट्रांसजेंडर मर जाते हैं. 2015 में ट्रांसजेंडर मर्डर रेट सबसे ज्यादा था. पीड़ितों में कई ट्रांसजेंडर ‘कलर्ड’ थे. यानी वाइट रेस के नहीं थे. ये तो सिर्फ वो डाटा है जिसे रिकॉर्ड कर पाया गया है. मर्डर तो बस औरतों और मर्दों के रिकॉर्ड होते हैं. ट्रांसजेंडर की मौत मौत ही कहां होती है?

हालांकि उस दौर से हम काफी आगे निकल आए हैं. जब ‘साइलेंस ऑफ़ द लैंब्स’ जैसी ट्रांस्फोबिक फिल्में बन रही थीं. लेकिन मीडिया में अब भी हमें ऐसे दिखाते हैं जैसे हम राक्षस हों. जैसे हम शिकारी हों. बाथरूम भी यूज नहीं करने देते. ये जो ‘बाथरूम बिल’ आते हैं, उन नियमों के साथ जो बच्चों को बाथरूम में हैरेसमेंट से बचाने के लिए बानाए जाते हैं, ये ट्रांस लोगों को बाथरूम से से बहार भी रखते हैं. ये हमें उन बाथरूमों को यूज करने पर मजबूर करते हैं जहां हमारी जान को खतरा होता है. जहां हमें पीटा जा सकता है. हमारा खून किया जा सकता है.

तो हां, मैं ‘ट्रांसजेंडर’ हूं.

और हां, मैंने ‘ट्रांजीशन’ किया है.

मेरे दोस्तों और घर वालों को मेरे बारे में पता है. मैं जहां काम करती हूं उन्हें पता है. सब मेरे फैसलों से खुश हैं. अपनी बहन का शुक्रिया करती हूं, जो ये पहले कर चुकी हैं. अपनी पत्नी, परिवार और दोस्तों के सपोर्ट के बिना ये मुमकिन नहीं था.

Matrix

लेकिन ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द से मुझे तकलीफ है. या इस शब्द से जो लोग समझते हैं, उससे तकलीफ है. लोग शब्दों में छिपे नाजुक अर्थों को नहीं समझते. ट्रांसजेंडर होने की परिभाषा इतनी ही रह जाती है कि वो औरत या मर्द नहीं है. ‘ट्रांजीशन’ से जो लोग समझते हैं कि ये एक आइडेंटिटी छोड़कर दूसरी आइडेंटिटी अपनाने तक का सफ़र है. और वहीं ख़त्म हो जाता है. पर ऐसा नहीं है. ये एक प्रोसेस है जो ख़त्म नहीं होता. मैं पूरी जिंदगी ट्रांजीशन महसूस करूंगी. औरत और मर्द के बीच जो बड़ा सा फर्क है, उसमें तैरती रहूंगी.

जेंडर और क्वियर थ्योरी समझने की कोशिश करती हूं तो दिमाग भन्ना जाता है. बहुत मुशकिल है इसे समझना. खुद को समझना. एक दोस्त ने एक कोट दिया था. उसे देखती रहती हूं. उसमें लिखा है: “क्वियर होना ‘यहां’ और ‘इस समय’ को त्याग कर दूसरी दुनिया में छिपी संभावनाओं पर भरोसा करना है.”

मैं ऑपटिमिस्ट बनी रहूंगी. दूसरी दुनिया में छिपी संभावनाओं पर भरोसा रखूंगी. चाहे मुझे सिसीफस की तरह स्ट्रगल क्यों न करना पड़े. वो सिसीफस जिसे श्राप था कि वो बार-बार एक बड़े गोल पत्थर को धकेल कर एक पहाड़ की चोटी तक ले जाएगा. जहां से पत्थर फिर गिर पड़ेगा. लेकिन वो फिर से उसे चढ़ाने में जुट जाएगा.

-लिली वाचोव्स्की

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Film director Andrew now Lilly Wachowski comes out as transgender woman

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