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एक मुल्क, जहां एक तानाशाह को जिताने के लिए चुनाव की नौटंकी हो रही है

मिस्र में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे हैं. चुनाव से पहले ही दुनिया जानती है कि अब्दुल फताह अल-सीसी फिर से जीत जाएंगे. सबसे महान लोकतंत्र अमेरिका को भी डेमोक्रेसी के नाम पर हो रहे तमाशे से कोई दिक्कत नहीं.

एक शायरी से बिस्मिल्लाह करते हैं. आप जो खबर पढ़ने जा रहे हैं, बिल्कुल उसके मिजाज का है:

मैं ही मुल्ज़िम हूं, मैं ही मुंसिफ़ हूं
कोई सूरत नहीं रिहाई की
– बशीर बद्र

मिस्र में चुनाव हो रहे हैं. 26 मार्च को शुरू होकर 28 मार्च तक चलेंगे. चुनाव में देश का नया राष्ट्रपति चुना जाएगा. हाल-फिलहाल में ये दूसरा चुनाव है, जिसके नतीजे पहले से मालूम हैं. जैसा रूस में हुआ था. चुने जाने से पहले पता था कि पुतिन आएंगे. ऐसा ही मिस्र में है. अब्दुल फताह अल-सीसी का दोबारा चुना जाना तय है. सरप्राइज फैक्टर बस एक चीज में होगा. कि सीसी कितने फीसद वोट से जीतते हैं. पुतिन के मामले में भी तो यही हुआ. हां, वहां एक अंतर था. अमेरिका और ब्रिटेन को पुतिन के इन तौर-तरीकों से शिकायत थी. लेकिन सीसी के हाथों कराए जा रहे चुनावी नाटक पर उनको कोई आपत्ति नहीं. अव्वल तो उनके लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं है.

पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के पोस्टर के साथ उनके समर्थक. अरब स्प्रिंग के बाद मुबारक को सत्ता गंवानी पड़ी थी.
पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के पोस्टर के साथ उनके समर्थक. अरब स्प्रिंग के बाद मुबारक को सत्ता गंवानी पड़ी थी.

पहले विपक्ष को पूरी तरह खत्म किया, फिर चुनाव करवाया
सीसी से पहले मिस्र के राष्ट्रपति थे मोहम्मद मोरसी. चुनाव में जीतकर राष्ट्रपति बने थे. मोरसी सरकार में सीसी रक्षा मंत्री थे. जुलाई 2013 में यहां सेना ने तख्तापलट किया. मोरसी को पकड़कर जेल में डाल दिया गया. सीसी राष्ट्रपति बने. लेकिन फिर इस्तीफा दे दिया. तारीख थी 26 मार्च, 2014. ऐलान किया कि मई में चुनाव करवाए जाएंगे. चुनाव हुए. नतीजे आए और दुनिया को बताया गया कि उन्हें 96.9 फीसद वोट मिले हैं. दुनियाभर में इन चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठे. इन सारे सवालों के बीच सीसी खुद को लोकतांत्रिक तरीके से चुना हुआ बताते रहे. हालांकि उनके तौर-तरीके इस बात की गवाही नहीं देते. 2014 के चुनाव का उदाहरण ले लीजिए. कहा जाता है कि जुलाई 2013 से मई 2014 के बीच पहले उन्होंने अपने विपक्ष को खत्म किया. ऐसे हालात बनाए कि उनका कोई विरोध ही न रहे. पूर्व राष्ट्रपति मोरसी के हजारों समर्थकों की हत्या कराई गई. विपक्ष को पूरी तरह खत्म करने के बाद चुनाव कराने का ऐलान किया गया.

मूसा मुस्तफा सीसी के इतने बड़े समर्थक हैं कि अपने मुख्यालय के बाहर भी सीसी का आदमकद पोस्टर टांगकर रखते हैं.
मूसा मुस्तफा सीसी के इतने बड़े समर्थक हैं कि अपने मुख्यालय के बाहर भी सीसी का आदमकद पोस्टर टांगकर रखते हैं.

विरोध में बस एक उम्मीदवार, वो भी समर्थक
इन चुनावों पर भी ऐसे ही आरोप लग रहे हैं. आरोपों की शुरुआत उन पांच लोगों से करते हैं, जिन्होंने सीसी के खिलाफ चुनाव में खड़े होने की कोशिश की. उनको या तो जेल भेज दिया गया. या फिर उन्हें अपने पैर पीछे करने पड़े. अब सीसी के मुकाबले बस एक प्रत्याशी खड़ा है. मूसा मुस्तफा मूसा. ये तब है जब कि कहने को मिस्र में 100 से ज्यादा पार्टियां हैं. मूसा सीसी के समर्थक हैं. चुनाव के लिए उन्होंने कब नामांकन दाखिल किया? डेडलाइन खत्म होने से बस एक घंटे पहले. जब उन्होंने चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तब उनके फेसबुक पेज के कवर फोटो में सिसि की फोटो लगी थी. उसके ऊपर लिखा था:

मिस्र के राष्ट्रपति पद के लिए हम आपका समर्थन करते हैं.

मिस्र में हो रहे ये राष्ट्रपति चुनाव 26 मार्च से 28 मार्च तक चलेंगे. सीसी की सबसे बड़ी चुनौती लोगों को चुनाव के लिए बाहर लाना है. जीतने की तो कोई टेंशन ही नहीं है उनको.
मिस्र में हो रहे ये राष्ट्रपति चुनाव 26 मार्च से 28 मार्च तक चलेंगे. इससे पहले मई 2014 में चुनाव हुए थे. सीसी की सबसे बड़ी चुनौती लोगों को चुनाव के लिए बाहर लाना है. जीतने की तो कोई टेंशन ही नहीं है उनको.

मूसा खड़े नहीं हुए, उनको खड़ा किया गया!
फिर भी उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. सीसी के तौर-तरीकों के हिसाब से ये कहा जाना चाहिए कि मूसा को चुनाव लड़ने दिया जा रहा है. उन्हें खड़ा करने का एक ही मकसद दिखता है. कि ये दिखाया जा सके कि चुनाव निष्पक्ष हुए. कि जनता के पास एक विकल्प था. फिर भी उन्होंने सीसी को चुना. लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि के पास एक वैधता होती है. ये ही वैधता उसकी ताकत होती है.

मूसा खुलकर स्वीकार करते हैं. कि वो सीसी के समर्थक हैं.
मूसा खुलकर स्वीकार करते हैं. कि वो सीसी के समर्थक हैं.

विपक्ष को खत्म करके कहो हम लोकतंत्र हैं
सीसी मुंह से चाहे जो कहें, सच दुनिया को नजर आ रहा है. पूर्व सेना प्रमुख जनरल सामी अनान ने चुनाव लड़ने की कोशिश की. सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. पूर्व प्रधानमंत्री अहमद शफीक देश छोड़कर भागे हुए थे. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में रह रहे थे. वहीं से उन्होंने ऐलान किया कि चुनाव लड़ेंगे. फिर जब वो कायरो लौटे, तो उन्होंने नाम वापस ले लिया. खालिद अली मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. उन्होंने भी चुनाव लड़ने की कोशिश की थी. लेकिन दबाव में उन्होंने भी नाम वापस ले लिया. मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति अनवर सादत के भतीजे हैं मुहम्मद अनवर सादत. उन्हें धमकियां मिलीं और मजबूरन उनको भी पांव वापस खींचना पड़ा.

मिस्र में हर तरफ बस सीसी ही सीसी हैं. शहर उनके पोस्टरों से भरे हुए हैं. ऐसा नहीं कि सीसी के समर्थक नहीं हैं. लेकिन बस समर्थक हैं, ये समझना भी भूल है. वो जिस तरह सत्ता में आए और पिछले चार सालों का उनका जैसा कार्यकाल रहा है, उसने उनके खिलाफ माहौल तो बनाया है.
मिस्र में हर तरफ बस सीसी ही सीसी हैं. शहर उनके पोस्टरों से भरे हुए हैं. ऐसा नहीं कि सीसी के समर्थक नहीं हैं. लेकिन बस समर्थक हैं, ये समझना भी भूल है. वो जिस तरह सत्ता में आए और पिछले चार सालों का उनका जैसा कार्यकाल रहा है, उसने उनके खिलाफ माहौल तो बनाया है. ये अलग बात है कि डर और दमन का माहौल बनाकर इस विरोध को दबा दिया जाता है.

सब खुलेआम हो रहा है, फिर भी लोकतंत्र का पाखंड
फरवरी 2018 में ह्युमन राइट्स वॉच ने मिस्र में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर चिंता जताई थी. संगठन का कहना था कि पूरी चुनावी प्रक्रिया में झोल है. सब पहले से तय है. निष्पक्ष जैसा कुछ भी नहीं. पूरे देश में आपातकाल जैसी स्थिति है. इतना कुछ सामने आने के बाद भी सीसी का कॉन्फिडेंस (हिपोक्रसी पढ़िएगा) देखिए. वो कहते हैं:

ये मेरी गलती नहीं है (कि मेरे खिलाफ बस एक प्रत्याशी चुनाव लड़ रहा है). खुदा कसम, मैं सच कह रहा हूं. मैं दिल से चाहता हूं कि मेरे खिलाफ और भी विरोधी खड़े हुए होते. तब लोगों के पास ज्यादा विकल्प होते कि वो किसे चुनना चाहते हैं. 

2013 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद सीसी राष्ट्रपति बने. उनसे पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता
2013 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद सीसी राष्ट्रपति बने. उनसे पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मोहम्मद मोरसी मिस्र के राष्ट्रपति थे.

होस्नी मुबारक से ज्यादा तानाशाही रवैया है सीसी का
बतौर राष्ट्रपति सीसी का कार्यकाल कैसा है? लोग उनकी तुलना होस्नी मुबारक से करने लगे हैं. होस्नी मुबारक करीब तीन दशकों तक मिस्र की सत्ता में रहे. तानाशाह थे. अरब स्प्रिंग के बाद लोकतंत्र के पक्ष में जो माहौल बना, उसने होस्नी मुबारक की सत्ती छीन ली. जानकार कहते हैं कि मुबारक का वो दौर सीसी के दौर से बेहतर था. तब थोड़े-बहुत विरोध की इजाजत थी. आलोचना के लिए थोड़ा स्कोप था. क्योंकि होस्नी मुबारक को लगता था कि लोगों को अपना गुबार निकालने का मौका दिया जाना चाहिए. इससे चीजें नियंत्रण में रहती हैं. सीसी ऐसा भी नहीं करते. उनकी सत्ता विपक्ष और विरोध, दोनों को ही नहीं पनपने देती. सीसी सरकार ने हजारों की तादाद में अपने विरोधियों को जेल में ठूंसा हुआ है.

अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ होस्नी मुबारक. सीसी ने अरब स्प्रिंग से शायद इकलौती ये सीख ली है कि जनता को विरोध का रत्तीभर भी अधिकार नहीं देना चाहिए.
अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ होस्नी मुबारक. सीसी ने अरब स्प्रिंग से शायद इकलौती ये सीख ली है कि जनता को विरोध का रत्तीभर भी अधिकार नहीं देना चाहिए. यहीं पर आकर वो होस्नी मुबारक से भी बदतर हो जाते हैं.

मीडिया के साथ भी तानाशाही
इसी तानाशाह रवैये में मीडिया के साथ किया जाने वाला बर्ताव भी शामिल है. सीसी सरकार में मीडिया के लिए कोई स्कोप नहीं है. इस चुनाव की बात कर लीजिए. सरकार ने चुनाव से करीब एक महीने पहले मीडिया के लिए गाइडलाइन्स जारी किए. इसमें किसी भी तरह के चुनावी सर्वे पर रोक लगा दी गई थी. आपने ब्रिटेन की पत्रकार बेल ट्रूव के बारे में पढ़ा होगा. वो टाइम्स ऑफ लंदन की पत्रकार हैं. उन्हें पहले धमकाया गया. फिर गिरफ्तार किया गया. और फिर डिपोर्ट कर दिया गया. क्यों डिपोर्ट किया जा रहा है, इसका कोई कारण तक नहीं बताया गया. उन्हें अपना कोई सामान भी साथ नहीं लाने दिया गया. बेल ने बाद में एक ट्वीट में लिखा:

मैं पिछले सात सालों से मिस्र में रह रही थी. ये मेरा घर है. लेकिन अब मुझे नहीं पता कि मैं फिर कभी यहां आ पाउंगी कि नहीं. मैंने एक इंटरव्यू किया था. इसी इंटरव्यू के बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. मुझे धमकी दी गई. कि अगर में विमान में नहीं बैठी (देश छोड़कर नहीं गई) तो मेरे खिलाफ मिलिटरी ट्रायल होगा. बाकियों की तरह मुझे भी नहीं पता कि मेरे साथ जो हुआ, वो क्यों हुआ.

पत्रकारों के लिए दुनिया के तीन सबसे बुरे देशों में है मिस्र
पत्रकारों को जेल भेजने के मामले में भी मिस्र का रिकॉर्ड बहुत ऊपर है. 20 से ज्यादा पत्रकार जेल में बंद हैं. दुनिया में पत्रकारों के खिलाफ इस तरह की सख्ती करने के मामले में मिस्र दुनिया के टॉप 3 देशों में शामिल है. पहले नंबर पर है तुर्की. दूसरे नंबर पर है चीन. और तीसरा नंबर मिस्र का है.

कायरो की एक इमारत पर लगा सीसी का पोस्टर. लोगों के सामने कोई विकल्प ही नहीं है. वो चुनें, तो चुनें किसको.
कायरो की एक इमारत पर लगा सीसी का पोस्टर. लोगों के सामने कोई विकल्प ही नहीं है. वो चुनें, तो चुनें किसको. कहने को तो मिस्र में 100 के करीब राजनैतिक पार्टियां हैं. लेकिन बस कहने को. विपक्ष के लिए कोई जगह ही नहीं है. इसको लोकतंत्र कहें, तो कैसे कहें?

सरकार की आलोचना, माने देशद्रोह
सीसी कितने तानाशाही हैं, इसे उनके एक फरमान से समझने की कोशिश कीजिए. मार्च के ही महीने में टेलिविजन पर उनका एक बयान जारी हुआ. इसमें वो कह रहे थे कि पुलिस और सेना की आलोचना को देशद्रोह माना जाएगा. यानी अगर आप पुलिस और सेना की मनमानी, उनके क्रूर रवैये पर उंगली उठाते हैं, तो आप देशद्रोही हैं. कुल मिलाकर न तो विपक्ष, विरोध और आलोचना, तीनों के लिए कोई जगह नहीं.

पूरी क्रूरता और हिंसा के साथ विरोधियों को खत्म करते हैं
खबरों के मुताबिक, 2013 में हुए तख्तापलट के बाद से ही मिस्र में मानवाधिकारों के लिए कोई जगह नहीं बची है. हजारों की तादाद में लोग कत्ल किए गए हैं. और कत्ल भी किनका? निहत्थे प्रदर्शनकारियों का. राजनैतिक विरोधियों का. विरोधियों के समर्थकों का. आलोचकों का. सीसी का लोकतंत्र देखिए. यहां विरोधी पार्टियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. आलोचना करने वाले अखबारों और न्यूज चैनलों पर ताला चढ़ा दिया गया है. अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को पूरी क्रूरता के साथ दबा दिया गया है.

मुहम्मद मोरसी को सत्ता से बेखदल किए जाने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े नेताओं के खिलाफ खूब सख्ती दिखाई गई. बड़े स्तर पर हत्याएं हुईं. लोग रातोरात गायब करवा दिए जाते. विरोधियों को जेल में ठूंसकर उनके ऊपर ज्यादतियां की जातीं. फर्श पर मोरसी का पोस्टर पड़ा है. उसके साथ खून की लकीर है. ये खून मोरसी समर्थकों का है. उनके ऊपर पुलिस ने जो बर्बरता दिखाई, उसका सबूत है ये तस्वीर.
मुहम्मद मोरसी को सत्ता से बेखदल किए जाने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े नेताओं के खिलाफ खूब सख्ती दिखाई गई. बड़े स्तर पर हत्याएं हुईं. लोग रातोरात गायब करवा दिए जाते. विरोधियों को जेल में ठूंसकर उनके ऊपर ज्यादतियां की जातीं. फर्श पर मोरसी का पोस्टर पड़ा है. उसके साथ खून की लकीर है. ये खून मोरसी समर्थकों का है. उनके ऊपर पुलिस ने जो बर्बरता दिखाई, उसका सबूत है ये तस्वीर.

और सीसी के सिर पर अमेरिका का हाथ है…
पता है, इन सबके बीच सबसे बड़ी कुटिलता क्या है. ये कि सीसी प्रशासन को अमेरिका का समर्थन हासिल है. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप उनकी तारीफ करते हैं. उनसे पहले बराक ओबामा थे राष्ट्रपति. वो थोड़ा संभलकर चलते थे. कई मौकों पर ओबामा ने मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर सीसी की आलोचना की थी. इस जाहिर विरोध के अलावा अमेरिका और सीसी के बीच सब ठीक ही था. ये भी कह सकते हैं कि आलोचना वगैरह सब दिखावे की बातें हैं. क्योंकि जब मोरसी का तख्तापलट हुआ, तब अमेरिका के सेक्रटरी ऑफ स्टेट थे जॉन कैरी. उन्होंने कहा था:

सीसी तो बस लोकतंत्र वापस ला रहे हैं. डेमोक्रेसी रिस्टोर कर रहे हैं.

डॉनल्ड ट्रंप के साथ मिस्र के राष्ट्रपति सीसी. ट्रंप खुले मन से सीसी की तारीफ करते हैं. सीसी सरकार की ज्यादतियों से अमेरिका को रत्तीभर भी फर्क पड़ता हो, ऐसा लगता तो नहीं.
डॉनल्ड ट्रंप के साथ मिस्र के राष्ट्रपति सीसी. ट्रंप खुले मन से सीसी की तारीफ करते हैं. सीसी सरकार की ज्यादतियों से अमेरिका को रत्तीभर भी फर्क पड़ता हो, ऐसा लगता तो नहीं.

अमेरिका भूल गया कि मोरसी भी चुनकर आए थे
कैरी और ओबामा, दोनों भूल गए कि मोरसी लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर सत्ता में आए थे. अमेरिका दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र कहलाता है. अमेरिकी कानून के मुताबिक, अगर किसी देश में सैन्य तख्तापलट हुआ हो और इसी की बदौलत सरकार बनी हो, तो अमेरिका उसकी कोई मदद नहीं कर सकता. उसे फंड नहीं दे सकता. शायद इसीलिए अमेरिका ने कभी नहीं माना कि मोरसी सरकार के खिलाफ सैन्य तख्तापलट हुआ. वो इसे लोकतंत्र की वापसी का नाम देकर अपना काम चलाते रहे. सीसी के क्रूर तौर-तरीकों का एक नतीजा अमेरिका के फेवर में है. वो है राजनैतिक स्थिरता. इसी में अमेरिका को अपने लिए सहूलियत दिखती है. इसीलिए वो मानवाधिकार उल्लंघन और लोकतंत्र की हत्या पर भी चुप रहता है.

क्रांति से क्या बेहतरी आई?
अरब स्प्रिंग के समय आवाम को उम्मीद थी. कि चीजें बदलेंगी. लेकिन कुछ बेहतर नहीं हुआ. होस्नी मुबारक चले गए. उनके बाद जो आए, वो लोग और सख्त निकले. उन्होंने सोचा कि मुबारक ने लोगों को विरोध करने दिया. इसीलिए विरोध हो पाया. और मुबारक की सत्ता चली गई. अब जो सत्ता में हैं, वो विरोध और आलोचना का रत्तीभर भी मौका नहीं देते. लोकतंत्र बस कहने को ही है. असलियत में तो ये भी तानाशाही ही है. बाकी जिंदगी कैसी है? महंगाई बढ़ गई है. पैसे की कीमत कम हो गई है. आजादी खत्म है. अधिकार खत्म हैं. आलोचना के लिए कोई स्पेस नहीं है. और आतंकवाद लगातार बढ़ रहा है. लोग सोचते होंगे. कि क्या इस सबके लिए क्रांति की थी?

रूस के राष्ट्रपति पुतिन (बाईं तरफ) के साथ मिस्र के राष्ट्रपति सीसी (दाहिनी ओर). मिस्र का संविधान राष्ट्रपति को बस दो कार्यकालों की इजाजत देता है. आशंका तो यही है कि सीसी संशोधन के सहारे ये नियम खत्म कर देंगे.
रूस के राष्ट्रपति पुतिन (बाईं तरफ) के साथ मिस्र के राष्ट्रपति सीसी (दाहिनी ओर). मिस्र का संविधान राष्ट्रपति को बस दो कार्यकालों की इजाजत देता है. आशंका तो यही है कि सीसी संशोधन के सहारे ये नियम खत्म कर देंगे.

तानाशाहों का रवैया कितना एक सा होता है
खबर के शुरुआती हिस्से में रूस और पुतिन का जिक्र आया था. खबर के अंत में भी उनका ही जिक्र करेंगे. रूस के संविधान में नियम है. कि एक आदमी लगातार बस दो बार ही राष्ट्रपति रह सकता है. संविधान में बस इतना लिखा है. पुतिन ने इसकी काट खोजी. दो कार्यकाल पूरा करने के बाद प्रधानमंत्री बन गए. फिर राष्ट्रपति बनकर लौटे. संविधान में संशोधन करके राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल से बढ़ाकर छह साल करवा दिया. मिस्र भी शायद इसी राह पर है. संविधान कहता है कि एक शख्स बस दो बार राष्ट्रपति बन सकता है. सीसी का एक कार्यकाल खत्म हो चुका है. दूसरी बार चुने जाने का मतलब है कि ये सत्ता में उनका आखिरी कार्यकाल होगा. लगता तो नहीं कि वो ऐसा होने देंगे. चुनाव जीतकर वो शायद संशोधन करेंगे. जैसा चीन में हुआ, शायद वैसा ही मिस्र में भी होगा. कोई जब तक चाहे, राष्ट्रपति बना रहेगा. कोई को अब्दुल फताह अल-सीसी पढ़िएगा. और अब्दुल फताह अल-सीसी को तानाशाह पढ़िएगा.


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