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गुजरात का वो मुख्यमंत्री जिसने इस पद पर पहुंचने के लिए एक ज्योतिषी की मदद ली थी

मुख्यमंत्री के तौर पर चिमनभाई पटेल अपने दूसरे कार्यकाल में अपनी छवि सुधारने में लगे हुए थे. उस समय तक ‘गुजरात मॉडल’ सियासत की शब्दवाली में नहीं जुड़ा था. चिमनभाई ‘नए गुजरात’ का सपना बेच रहे थे. सरदार सरोवर बांध उनके एजेंडे में पहले नंबर पर था. सरकार के काम-काज में वो कॉर्पोरेट तरीकों को अपना रहे थे. यह वही दौर था जब भारत ने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपने बाजार विदेशी निवेश के लिए खोले थे. सूबे के विधानसभा चुनाव होने में अभी करीब सवा साल का वक़्त था. चिमनभाई चुनाव की रणनीति पर काम करना शुरू कर चुके थे.

नौ फरवरी 1994, प्रारब्ध ने चिमनभाई के लिए अलग योजना बना रखी थी. सुबह आए कार्डियक अरेस्ट की वजह से महज़ तीन घंटे में सारी बाजी पलट गई और उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. इसके दो दिन बाद उनकी याद में शोक सभा बुलाई गई. कांग्रेस के कई कद्दावर नेताओं की मौजूदगी में उनकी बीवी उर्मिलाबेन पटेल अपने पति के सपनों को पूरा करने की बात कहते हुए पाई गईं. चिमनभाई जनता दल के चुनाव चिन्ह पर चुनाव जीते थे. शुरुआत में उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन करके सरकार चलाई. वीपी सिंह की सरकार गिराने के साथ ही बीजेपी और जनता दल का गठबंधन टूट गया. ऐसे में वो 70 में से जनता दल के 65 एमएलए विधायकों को लेकर अलग हो गए. कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार चलाने लगे. बाद में उन्होंने अपनी पार्टी जनता दल (गुजरात) का विलय कांग्रेस में कर दिया.

उर्मिलाबेन पटेल: अपने पति की राजनीतिक विरासत की प्रमुख दावेदार थीं.
उर्मिलाबेन पटेल: अपने पति की राजनीतिक विरासत की प्रमुख दावेदार थीं.

हालांकि चिमनभाई की पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया था लेकिन यह विलय सतही था. न स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने चिमनभाई का नेतृत्व स्वीकार किया था और न ही चिमनभाई के समर्थक 65 विधायक कभी कांग्रेस के प्रति पूरी तरह से वफादार हो पाए. ऐसे में चिमनभाई की मौत के बाद केंद्र का कांग्रेस नेतृत्व चुप्पी साधकर बैठ गया. वो चिमनभाई के धड़े में चल रहे सत्ता संघर्ष के नतीजे का इंतज़ार कर रहे थे.

उर्मिलाबेन उस समय कांग्रेस के कोटे से राज्यसभा की सांसद थीं. एक महीने बाद सूबे में नए सिरे से राज्यसभा के चुनाव होने जा रहे थे. कांग्रेस अपने कोटे की तीन सीटों पर खतरा नहीं चाहती थी. उर्मिलाबेन सरदार सरोवर बांध परियोजना के समर्थन में आंदोलन कर चुकी थीं. इसमें कुछ हद तक वो कामयाब भी रहीं थी. उनके दामन पर चिमनभाई पटेल जैसे दाग नहीं थे. वो चिमनभाई की विधवा थीं. साल भर बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव में वो लोगों की सहानुभूति भी हासिल कर सकती थीं. ऐसे में वो मजबूत उम्मीदवार बनकर उभर रही थीं.

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चिमनभाई पटेल के धड़े में उर्मिलाबेन के बरबक्स एक और चेहरा थे, ‘छबीलदास मेहता’. मेहता चिमनभाई के दाहिने हाथ कहे जाते थे. उनकी सरकार में वित्तमंत्री थे और कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ भी ले चुके थे. दिल्ली में नए मुख्यमंत्री के लिए गोलबंदी अपने जोरों पर थी. चिमनभाई के ख़ास जयंत मल्होत्रा उर्मिलाबेन पटेल का नाम आगे बढ़ा रहे थे. ऐसे में समाजवादी बैकग्राउंड से आए छबीलदास को याद आई अपने पुराने दोस्त चंद्रशेखर की. चंद्रशेखर उस समय सत्ता से बाहर थे लेकिन उनके पास तुरुप का एक पत्ता था. इस पत्ते का नाम था, ‘चंद्रास्वामी’. चंद्रास्वामी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव आंख मूंद कर भरोसा करते थे. छबीलदास चाहते थे कि चंद्रशेखर उनके लिए तुरुप चाल चलें. चंद्रशेखर ने दोस्ती निभाई या नहीं इसके बारे में तयशुदा तरीके से कुछ कहा नहीं जा सकता. बाद की दो घटनाओं से इसका अंदाजा भर लगाया जा सकता है. पहली कि छबीलदास गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे. दूसरी कि उर्मिलाबेन गुजरात से एक बार फिर राज्यसभा में पहुंचीं और केंद्र में ऊर्जा मंत्रालय में उन्हें राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई.

जिंदगी में एक से ज्यादा बार पाले बदले

भावनगर जिले में जमीन जहां समंदर से मिलती है वहां एक क़स्बा है, महुवा. चार नवंबर 1925 के रोज छबीलदास मेहता इसी कस्बे में पैदा हुए. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उनकी उम्र थी 17 साल. उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई छोड़ी और इस आंदोलन में कूद गए. जेल से निकले और फिर से पढ़ाई शुरू की.

1952 में देश आजाद होने के पांच साल बाद पहला चुनाव होने जा रहा था. जय प्रकाश नारायण और जेबी कृपलानी ने पंडित नेहरू के खिलाफ बगावत करके नई पार्टी बनाई ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’. छबीलदास आजादी के आंदोलन के दौरान ही समाजवादियों के प्रभाव में आ चुके थे. उन्होंने यह नई पार्टी ज्वाइन कर ली. 1956 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी से अलग गुजराती भाषा वाले नए राज्य की स्थापना की मांग होने लगी. इसे नाम दिया गया, ‘महागुजरात आंदोलन’. छबीलदास इस आंदोलन का हिस्सा बन गए. 1960 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी से अलग नए गुजरात राज्य का गठन हुआ. 1962 में पहले विधानसभा की घोषणा हुई. छबीलदास सोशलिस्ट पार्टी छोड़कर फिर से कांग्रेस की सरपरस्ती में आ गए और महुवा से विधायक बने. मंत्री बनने का पहला मौका आया 1973 में. चिमनभाई पटेल ने उन्हें अपने पहले कार्यकाल के दौरान मंत्रिमंडल में जगह दी और PWD मंत्रालय सौंपा.

छबीलदास: संयोगवश मुख्यमंत्री बने
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1974 में नव निर्माण आंदोलन के चलते चिमन भाई पटेल को इस्तीफ़ा देना पड़ा. इसके बाद वो कांग्रेस से अलग हो गए और ‘किसान मजदूर लोकपक्ष’ नाम से नई पार्टी बनाई. छबीलदास मेहता कांग्रेस में बने रहे. 1980 के विधानसभा चुनाव में उनका टिकट काट लिया गया. इसके बाद वो कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में चले गए. वहां चिमनभाई पहले से मौजूद थे. 1985 का विधानसभा चुनाव उन्होंने लड़ा जनता पार्टी की टिकट पर. करीबी मुकाबले में कांग्रेस के वजुभाई जानी से 1187 वोट से चुनाव हार गए. 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल की टिकट पर फिर से महुवा सीट से नामांकन दाखिल किया और पिछली हार का बदला लेने में कामयाब रहे. इस चुनाव में उन्होंने विजुभाई के 10570 वोट के मुकाबले 40445 वोट हासिल किए. चिमनभाई के साथ करीबी काम आई. नए मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री बनाए गए. जनता दल (गुजरात) के कांग्रेस में विलय के साथ फिर से कांग्रेस में लौट आए.

1995 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और छबीलदास को संगठन में किनारे लगाया जाना शुरू हो गया था. 1998 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद तो लगभग अप्रासंगिक हो गए. 2001 में कांग्रेस छोड़कर शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थामा. 2002 का चुनाव लड़ा और फिर से हार गए. इसके बाद सियासत से किनारा कर लिया. 2008 की 29 नवंबर को 83 साल की उम्र में अहमदाबाद में आखिरी सांस ली.


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