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नरेंद्र मोदी के अलावा प्रधानमन्त्री पद का एक और दावेदार इस बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहा है

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2019 साल है. 11-12 जनवरी को बीजेपी ने अधिकारिक तौर पर लोकसभा चुनाव के लिए अपनी मोर्चाबंदी शुरू कर दी. दिल्ली के रामलीला मैदान में बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकरिणी की बैठक रखी गई है. राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से एक दिन पहले आलाकमान की तरफ से चौंका देने वाली घोषणा की गई. हाल में हुए विधानसभा चुनाव में जिन तीन राज्यों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा, वहां के भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को केन्द्रीय संगठन में खपा लिया गया है. वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह को केन्द्रीय संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की भूमिका दी गई है. बीजेपी आलाकमान की तरफ से उठाए गए इस कदम पर सियासी कयासबाजी शुरू हो गई है.

मध्य प्रदेश:
चुनाव में हार के बाद सूबे के संगठन में बदलाव होना तय माना जा रहा था. सबसे पहले सूबे के प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को हटाकर केन्द्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई. उस समय यह कहा जा रहा था कि शिवराज के ऐतराज़ के चलते ऐसा हुआ था. इधर शिवराज के खिलाफ एक धड़ा पार्टी के भीतर पहले से मौजूद था. यह धड़ा था कैलाश विजयवर्गीय का. कैलाश विजयवर्गीय राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के करीबी आदमी माने जाते हैं.

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चुनाव को लेकर बीजेपी के भीतर की खींच-तान सतह पर आ गई. शिवराज सिंह चौहान नेता प्रतिपक्ष के पद पर अपना दावा जता रहे थे. उनका दावा ख़ारिज कर दिया गया. आलाकमान का निर्णय था कि सूबे में सवर्ण समुदाय की नाराजगी कम करने के लिए नेता प्रतिपक्ष के पद पर किसी ब्राह्मण नेता को बैठाया जाएगा. ऐसे में तीन नाम दौड़ में चल रहे थे. पहला नरोत्तम मिश्र, दूसरा राजेंद्र शुक्ल. ये दोनों नेता शिवराज के खेमे के थे. तीसरा नाम गोपाल भार्गव का था. भार्गव संघ और आलाकमान के करीबी आदमी माने जाते हैं. केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को नेता प्रतिपक्ष का मामला सुलझाने के लिए दिल्ली से भोपाल भेजा. आखिरकार फैसला गोपाल भार्गव के पक्ष में गया. यह शिवराज सिंह चौहान पर शिकंजा कसने की शुरुआत हो चुकी थी.

पिछले चार साल में मोदी और शिवराज का रिश्ता तनावपूर्ण शांति वाला रहा
पिछले चार साल में मोदी और शिवराज का रिश्ता तनावपूर्ण शांति वाला रहा.

विधानसभा चुनाव में हार के बाद शिवराज सिंह चौहान सूबे में अतिसक्रिय दिखाई दे रहे थे. वो इलाकों में घूम रहे थे. वंदेमातरम ना गाने पर कमलनाथ को घेर रहे थे. उन्होंने लोकसभा चुनाव में बीजेपी की स्थिति मजबूत करने के नाम पर ‘आभार यात्रा’ नाम से एक यात्रा निकालने की घोषणा की. इसमें वो मध्य प्रदेश के सभी 52 जिलों में जाने वाले थे. दरअसल चुनाव हारने के बाद शिवराज सूबे में अपनी स्थिति मजबूत करना चाह रहे थे. आलाकमान उनके इस दांव को समझ गया. शिवराज की ‘आभार यात्रा’ ठंडे बस्ते में चली गई. यह आलाकमान की तरफ से साफ़ संकेत था कि शिवराज को अब मध्य प्रदेश छोड़ना होगा.

शिवराज सिंह चौहान तीन बार सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. नरेंद्र मोदी की तरह वो भी पिछड़ा समुदाय से आते हैं. 2013 से पहले वो नरेंद्र मोदी के विरोधी खेमे में थे. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी वो आडवाणी के ज्यादा करीब रहे. सितंबर 2013 में नरेंद्र मोदी की भोपाल रैली में शिवराज सिंह ने ना सिर्फ आडवाणी को मंच पर जगह दी बल्कि उन्हें मध्य प्रदेश आकर चुनाव लड़ने का न्यौता भी दिया था. आडवाणी खेमे की तरफ से नरेंद्र मोदी के खिलाफ शिवराज सिंह को तर्क की तरह इस्तेमाल किया गया था. उस समय तक नरेंद्र मोदी गुजरात विधानसभा में लगातार तीन जीत को अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क बता रहे थे. शिवराज सिंह चौहान दो दफा लगातार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे. आडवाणी चाहते थे कि अगर उम्र की वजह से प्रधानमंत्री पद पर उनकी उम्मीदवारी ख़ारिज होती है तो उनके खेमे के शिवराज सिंह को उम्मीदवार बना दिया जाए. यह बात नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दिमाग में अब भी है. अगर वो लोकसभा चुनाव में थोड़ा भी कमजोर पड़ते हैं तो शिवराज सिंह चौहान मोदी विरोधी खेमे की स्वाभाविक पसंद होंगे. ऐसे में अमित शाह शिवराज सिंह को उनके मजबूत किले से बाहर धकेलना चाहते थे.

कैलाश विजयवर्गीय शिवराज के विरोधी खेमे के हैं और अमित शाह के करीबी भी,
कैलाश विजयवर्गीय शिवराज के विरोधी खेमे के हैं और अमित शाह के करीबी भी.

शिवराज सिंह को मध्य प्रदेश से बाहर धकेलने की कोशिश 2014 में भी हुई थी. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी की तरफ से शिवराज को केंद्र में कृषि मंत्री बनने का ऑफर दिया गया था. उस समय सूबे के बीजेपी एमएलए शिवराज के पक्ष में थे. ऐसे में उन्होंने विनम्रता से यह ऑफर ठुकरा दिया था. इस विधानसभा चुनाव में हार के बाद शिवराज का बख्तर उतर चुका है. अमित शाह और नरेंद्र मोदी जो 2014 में ना कर पाए, उसे 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अंजाम दिया जा रहा है.

राजस्थान:

राजस्थान का मामला बीजेपी के लिए सबसे पेचीदा पहेली बना हुआ था. वसुंधरा राजे के साथ बगावत का लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है. 2009 में उन्होंने बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को घुटनों पर ला दिया था. उस समय उन्होंने लंबा चले टकराव के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफ़ा दिया था. लेकिन बीजेपी आलाकमान की तरफ से 2011 से 2013 के बीच कोई नया नेता प्रतिपक्ष नियुक्त नहीं कर पाया था. पिछले साल अप्रैल में वसुंधरा राजे ने अमित शाह के साथ राजनाथ काण्ड दोहरा दिया था. अप्रैल में राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी का इस्तीफ़ा लिया गया था. नए अध्यक्ष की नियुक्ति में लगभग दो महीने का समय लग गया. और यह सब हुआ वसुंधरा राजे की जिद्द के चलते. टिकट वितरण को लेकर भी वसुंधरा राजे अड़ी रहीं. इन दोनों मौकों पर अमित शाह को कदम पीछे खींचने पड़े. विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद अमित शाह वसुंधरा राजे पर सीधा वार करने से बच रहे हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि बीजेपी के कुल 73 में से 40 से ज्यादा विधायक राजे के खेमे से आते हैं.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया
वसुंधरा राजे के साथ बगावत का लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है

वसुंधरा राजे पिछले सप्ताह दिल्ली में थीं. यहां राजे की मुलाकात अमित शाह, नितिन गड़करी और अरुण जेटली जैसे नेताओं से हुई. अमित शाह की तरफ से राजे को प्रस्ताव दिया जा रहा था कि वो सूबे की सियासत छोड़कर केंद्र में आ जाएं. वसुंधरा राजे इसके लिए तैयार नहीं थी. आलाकमान चाहता था कि वो अपनी पारंपरिक सीट झालावाड़ से सांसदी का चुनाव लड़े. वसुंधरा के बेटे दुष्यंत पिछले दो बार से यहां से लोकसभा सांसद हैं. वसुंधरा के लिए यह व्यक्तिगत नुक्सान हैं. इसके बदले में आलाकमान का कहना था कि दुष्यंत को उनकी खाली की हुई विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़वा दिया जाएगा. वसुंधरा इसके लिए तैयार नहीं थीं. सूत्रों के अनुसार उन्होंने आलाकमान के सामने दो साफ़ शर्त रख दीं. पहली ये कि लोकसभा चुनाव तक राजस्थान में बीजेपी का नया प्रदेशाध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा. दूसरा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का चुनाव उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं होगी. हालांकि इसके बावजूद वसुंधरा ने लोकसभा चुनाव लड़ने से साफ़ मना कर दिया था. आलाकमान की तरफ से उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा उनकी मर्जी के खिलाफ की गई है. इस वजह से अब भी यह आशंका बनी हुई है कि वसुंधरा किसी भी समय बगावत कर सकती हैं.

छतीसगढ़:

हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा करारी हार का सामना बीजेपी को छत्तीसगढ़ में करना पड़ा था. छत्तीसगढ़ में बीजेपी को 90 में से महज 15 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. रमन सिंह पिछले 15 साल से सत्ता में थे. अब तक बीजेपी के भीतर उनके विरोधी छितरे हुए और चुप्पी साधे हुए थे. विधानसभा चुनाव में हार के तुरंत बाद छत्तीसगढ़ में रमन विरोधी खेमे ने आकार लेना शुरू कर दिया. इस खेमे का नेतृत्व कर रहे हैं बृजमोहन अग्रवाल. इसके अलावा सरोज पाण्डेय, प्रेम प्रकाश पाण्डेय, अमर अग्रवाल जैसे नेता रमन के खिलाफ एकजुट हो गए हैं.

छत्तीसगढ़ में दोनों खेमें का टकराव पिछले दिनों दो मौकों पर सतह पर आ चुका है. पहला मौक़ा था नेता प्रतिपक्ष के चुनाव का. रमन सिंह खुद के लिए नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी चाहते थे. जब आलाकमान की तरफ से उनकी नाम ख़ारिज हो गई तो उन्होंने अपने आदमी को यह पद दिए जाने पर जोर लगा दिया. आखिरकार रमन सिंह खेमे के धर्मलाल कौशिक को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी दे दी गई. नए विधायक दल में रमनसिंह के खिलाफ माहौल यह है कि धर्मलाल कौशिक और अजय चंद्राकर के अलावा बीजेपी में नए विधायक दल में एक भी विधायक रमन सिंह के पक्ष में नहीं है.

सत्ता से बाहर होते ही पार्टी के भीतर रमन सिंह के विरोधी उन पर झपट पड़े हैं.
सत्ता से बाहर होते ही पार्टी के भीतर रमन सिंह के विरोधी उन पर झपट पड़े हैं.

बीजेपी की टकराव दूसरी बार सतह पर आई अनुपूरक बजट पर राज्यपाल के भाषण के दौरान. परंपरा के अनुसार राज्यपाल का अभिभाषण सरकार का विजन डॉक्यूमेंट होता है. विपक्ष इस अभिभाषण पर अपनी राय देता है. इस बार विपक्ष में बैठी बीजेपी की तरफ से महज दो नेताओं ने इस अभिभाषण पर अपनी राय रखी. पहले पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह और दूसरे नेता प्रतिपक्ष धर्मलाल कौशिक. अंदरखाने खबर आई कि बीजेपी के बाकी विधायकों ने रमन सिंह का विरोध करने के लिए राज्यपाल के अभिभाषण पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया. वो आलाकमान को संदेश देना चाह रहे थे कि उन्हें अब रमन सिंह नेतृत्व स्वीकार नहीं है.

मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आलाकमान ने ना सिर्फ सूबे से दिल्ली बुलाया है बल्कि लोकसभा चुनाव लड़ने के निर्देश भी दिए हैं. बहुत संभावना है कि शिवराज सिंह विदिशा सीट से चुनाव लड़ेंगे. वहीं रमन सिंह की राजनांदगांव सीट से चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है. फिलहाल रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह यहां से सांसद हैं. ऐसा ही कयास वसुंधरा राजे के बारे में भी लगाया जा रहा है. उन्हें आने वाले लोकसभा चुनाव में झालावाड़ सीट से चुनाव लड़ते देखा जा सकता है. वो यहां से पांच लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं. अब तक यह तीनों नेता अपने-अपने सूबे में विधायक हैं. यही वो फटा है जिसके जरिए ये तीनों नेता अपने-अपने सूबे की सियासत में टांग अड़ाए हुए हैं. अमित शाह तीनों को लोकसभा चुनाव लड़वाकर सूबे में इनके हस्तक्षेप को सिमित करने की कोशिश में लगे हुए हैं.

इधर शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे यह जानते हैं कि अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी कमजोर होती है तो यह उनकी स्थिति मजबूत करेगा. यह बात पार्टी आलाकमान को भी पता है. राजनीति गणित का ऐकिक नियम नहीं है. तीनों सूबों का सियासी मौसम भीतरघात के लिए आदर्श है. ऐसे में इन तीनों नेताओं को दिल्ली बुलाया जाना सोचा-समझा राजनीतिक फैसला है. शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे फिलहाल बैकफुट हैं. वो लोकसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं.


कैसे वसुंधरा राजे ने राजस्थान बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं को ठिकाने लगाया

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