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क्या है BIMSTEC जिसके जरिये मोदी चीन का असर कम कर सकते हैं?

मोदी जी विदेश चले गए हैं. फिर से. इस बार नेपाल. ताकि बिम्सटेक (BIMSTEC) की बैठक में हिस्सा ले सकें. बिम्सटेक को खींचकर लंबा करो तो बनता है ‘बे ऑफ बेंगॉल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्निकल ऐंड इकॉनमिक कोऑपरेशन’. कुछ नहीं समझ आया न? हम समझाएंगे. आसान भाषा में. ये भी कि ये बिम्सटेक क्या बला है और ये भी कि इसमें ऐसा क्या है कि मोदी जी इसकी बैठक के लिए पूरे दो दिन निकालकर नेपाल गए हैं.

बिम्सटेक है क्या?

एक लाइन का जवाब – बिम्सटेक क्षेत्रीय सहयोग के लिए बना एक संगठन है.

अब आप पूछेंगे कि क्षेत्रीय सहयोग क्या होता है?

इसे समझने के लिए शादी का मंडप दिमाग में लाइए. आपने ऐसी शादियां देखी होंगी या उनका ज़िक्र सुना होगा बुज़ुर्गों से, जिनमें कितनी ही बड़ी बारात आ जाए, खाने के इंतज़ाम के लिए कभी केटरर्स नहीं बुलाए जाते थे. मामी, चाची, ताई चौकी-बेलन लेकर शादी वाले घर पहुंच जाती थीं. वो खाना बनाती थीं और मुहल्ले के लड़के परोस देते थे. माने एक ऐसा काम जो किसी एक परिवार के बस का न हो, उसे मुहल्ले वाले मिलकर बिना किसी बाहरी मदद के निपटा लेते थे.

जुलाई 2004 में पहला बिम्सटेक सम्मेलन हुआ जिसमें सभी सदस्य देशों के शीर्ष नेता शामिल हुए.
जुलाई 2004 में पहला बिम्सटेक सम्मेलन हुआ जिसमें सभी सदस्य देशों के शीर्ष नेता शामिल हुए.

अब किसी देश की ग्रोथ भी शादी जैसा ही मामला होता है. हर देश दुनिया में आगे बढ़ना चाहता है. लेकिन ये काम अकेले करना मुश्किल होता है. वो इसलिए कि इसके लिए ढेर सारा पैसा और संसाधन चाहिए. फिर बेहद कुशल ह्यूमन रिसोर्स भी चाहिए. जैसे इंजिनियर, साइंटिस्ट वगैरह. तो एक एजेंडा बनाकर कुछ देश साथ आ जाते हैं और एक संगठन बनाकर उसे एक नाम दे देते हैं. ऐसा ही एक संगठन है बिम्सटेक. जो कि 6 जून, 1997 को पैदा हुआ.

इसके नाम में ‘बे ऑफ बेंगॉल’ का ज़िक्र है. तो बंगाल की खाड़ी हो गया मुहल्ला. और इस मुहल्ले के देश- हिंदुस्तान, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड और नेपाल हो गए बिम्सटेक में शामिल परिवार. बिम्सटेक का दफ्तर ढाका में है और बारी-बारी से सारे मेंबर देश बिम्सटेक के अध्यक्ष बनते हैं. फिलहाल अध्यक्ष है नेपाल. जहां हो रही बैठक में मोदी जी जा रहे हैं.

नेपाल के बाद अध्यक्ष बनने की बारी आएगी श्रीलंका की. मामला अल्फाबेटिकल ऑडर में चल रहा है. ए-बी-सी-डी के हिसाब से जिसका नाम पहले आता है, वो पहले अध्यक्ष बनता है.

क्या-क्या काम करता है बिमस्टेक?

बिम्सटेक का मैप.
बिम्सटेक का मैप.

बिम्सटेक में साझेदारी के 14 सेक्टर हैं. ये हैं – ट्रांसपोर्ट और कम्यूनिकेशन, पर्यटन, आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय अपराध, पर्यावरण और आपदा राहत, ऊर्जा, स्वास्थ्य, खेती, व्यापार और निवेश, टेक्नॉलजी, मछली पालन, गरीबी हटाना, लोगों में आपसी संबंध, जलवायु परिवर्तन और सांस्कृति साझेदारी माने कल्चरल एक्सचेंज.

इन सारी चीज़ों से जुड़ी चीज़ों पर बिम्सटेक देश बैठकें करते रहते हैं. फिलहाल बैठकें ही ज़्यादा हुई हैं. काम कम हुआ है.

 

 

क्यों ज़रूरी है बिम्सटेक?

भारत जो ग्रोथ चाहता है, उसके लिए ज़रूरी है व्यापार. व्यापार दुनियाभर में हो सकता है, लेकिन सुभीता रहती है जब आपके पड़ोसियों के साथ आपका तगड़ा लेनदेन हो. पश्चिम में भारत के पास ऑप्शन की कमी है. पाकिस्तान के साथ व्यापार में दिक्कतें हैं और हमारे लोग और सामान पाकिस्तान के रास्ते आगे नहीं जा सकते. हमारी जो सीमा अफगानिस्तान से लगती है, उस इलाके पर भी पाकिस्तान का कब्ज़ा है. चीन से लगी सीमा पर व्यापार होता है, मगर चीन से तो हमारा मुकाबला ही है. वो साथी नहीं है. लेकिन पूरब में ऐसी कोई दिक्कत नहीं है. जितने देशों से हमारी सीमा लगती है, सभी से दोस्ती है. लेकिन हमने इस तरफ ध्यान बड़ी देर से दिया. नरसिम्हा राव के ज़माने से ‘लुक ईस्ट’ की बात होने लगी, लेकिन ज़मीन पर ज़्यादा कुछ हुआ नहीं. 1997 में बिम्सटेक के आने के बाद भी मामला ठंडा ही रहा.

इस नक्शे पर आपको भारत की जो सीमा अफगानिस्तान से लगती नज़र आती है, वो हिस्सा पाकिस्तान के कब्ज़े में है.
इस नक्शे पर आपको भारत की जो सीमा अफगानिस्तान से लगती नज़र आती है, वो हिस्सा पाकिस्तान के कब्ज़े में है.

1985 में बने सार्क (साउथ एशियन असोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन; SAARC) से भारत को बहुत उम्मीदें थीं. लगा कि ये भी यूरोपियन यूनियन की तरह होगा. लोग, व्यापार और पैसा बिना रोक-टोक एक देश से दूसरे देश जा सकेंगे. सड़कें, रेल पटरियां बिछेंगी. लेकिन ऐसी सारी कोशिशों का पाकिस्तान हमेशा खुलकर विरोध करता रहा है. 2016 में सार्क समिट हुआ, तो भारत सहित कई देशों ने इसमें भाग लेने से ही मना कर दिया. समिट सस्पेंड हो गया. ये एक तरह से सार्क के ताबूत में कील थी. आखिरी न सही, लेकिन बेहद परेशान करने वाली. भारत के विदेश सचिव रहे एस जयंशकर ने 2016 में कह भी दिया था पाकिस्तान के अड़ियल रवैये के चलते दक्षिण एशिया और पड़ोस के देश बिम्सटेक की तरफ मुड़ रह रहे हैं. ये पाकिस्तान को चेतावनी थी और बाकी देशों को इशारा.

इसीलिए भारत ने इधर कुछ सालों में ‘सार्क विदाउट पाकिस्तान’ की बात करना शुरू किया है. फिर मोदी जी के आने के बाद लुक ईस्ट के अगले चरण ‘ऐक्ट ईस्ट’ की बात हो रही है. जिसमें भारत के पूरब के पड़ोसियों के साथ ज़मीनी स्तर पर तालमेल बढ़ना है. बिम्सटेक सफल हुआ, तो भारत के पूर्वोत्तर में भी रौनक हो जाएगी. इसी बहाने हम इलाके में चीन के कद को टक्कर दे पाएंगे, जो ‘वन बेल्ट वन रोड’ (जिसके तहत ‘चाइना-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर’ भी आता है) प्रॉजेक्ट को पूरा करने में तेज़ी से जुटा हुआ है. इसीलिए बिम्सटेक हमारे लिए बहुत ज़रूरी है.

चीन का वन बेल्ट वन रोड प्लान. कनेक्टिविटी चीन के लिए रसूख को बढ़ाने का तरीका भी है. (फोटोःरॉयटर्स)
चीन का वन बेल्ट वन रोड प्लान. कनेक्टिविटी चीन के लिए रसूख को बढ़ाने का तरीका भी है. (फोटोःरॉयटर्स)

इस बार भारत का अजेंडा क्या है बिम्सटेक में?

कनेक्टिविटी बिम्सटेक के सबसे बड़े अजेंडा में से एक है. रोड कनेक्टिविटी, पानी के जहाज़ वाली कनेक्टिविटी और आईटी कनेक्टिविटी. इस लिहाज़ से ‘बिम्सटेक कोस्टल शिपिंग अग्रीमेंट’ और ‘बिम्सटेक मोटर विहिकल अग्रीमेंट’ खास हैं. शिपिंग अग्रीमेंट से होगा ये कि सदस्य देशों को ज़्यादा बड़े जहाज़ों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. वो छोटे (माने सस्ते) जहाज़ पर सामान लादकर तट के पास-पास चल सकेंगे. अभी ऐसा नहीं होता. समंदर में भी सीमाएं होती हैं. आप दूसरे देश की सीमा में नाव नहीं खे सकते. मोटर विहिकल अग्रीमेंट, शिपिंग अग्रीमेंट से भी ज़रूरी है. अभी सामान एक देश से दूसरे देश सड़क के रास्ते ले जाने में बहुत दिक्कत है. एक देश का ट्रक सामान लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमा तक जाता है. फिर वहां से सामान दूसरे देश के ट्रक में लादा जाता है और तब जाकर आगे का सफर शुरू होता है. इसमें बहुत वक्त ज़ाया होता है. मोटर विहिकल अग्रीमेंट हो जाने के बाद ट्रक सामान सहित सीमा पार कर पाएंगे. लोग भी अपनी कार लेकर दूसरे देश जा पाएंगे.

सो भारत की कोशिश रहेगी कि इन दोनों मुद्दों पर बात आगे बढ़े. भारत बिम्सटेक के बहाने बांग्लादेश और थाइलैंड से अलग से भी मिलेगा. इस उम्मीद में कि जब तक बिम्सटेक का मोटर विहिकल अग्रीमेंट नहीं हो जाता, इन देशों से भारत का वन-ऑन-वन अग्रीमेंट हो जाए. और भी मुद्दों पर बैठकें होंगी.

मोदी एक्ट ईस्ट की बात करते हैं. इसी के तहत उन्होंने 2016 में गोवा में सभी बिम्सटेक देशों का न्योता दिया था. इसी साल भारत ने सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था.
मोदी ऐक्ट ईस्ट की बात करते हैं. इसी के तहत उन्होंने 2016 में गोवा में सभी बिम्सटेक देशों का न्योता दिया था. इसी साल भारत ने सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था.

एक और चीज़ है जो दूर की कौड़ी है, लेकिन भारत उसके लिए ज़ोर लगाता रहता है और इस बार भी लगाएगा. ये है ‘बिम्सटेक फ्री ट्रेड एरिया’. माने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए नियम इतने आसान बना देना कि देश और विदेश में कारोबार करने का फर्क लगभग खत्म हो जाए. वैसा ही, जैसा यूरोप में यूरोपियन यूनियन के आने के बाद हुआ.

क्या-क्या दिक्कत है बिम्सटेक में भारत के सामने?

हिंदुस्तान ने क्षेत्रीय सहयोग के मामले में जहां हाथ मारा है, निराशा हाथ लगी है. अब तक बांग्लादेश, भूटान, इंडिया ऐंड नेपाल (BBIN) इनीशिएटिव ही एकमात्र ऐसी पहल रही है जिसका कोई बड़ा असर ज़मीनी स्तर पर भी देखने को मिला. BBIN के तहत 2015 में मोटर विहिकल अग्रीमेंट (MVA)हुआ था.

बिम्सटेक के सफल होने का सबसे ज़्यादा फायदा होगा भारत और थाइलैंड को. लेकिन दिक्कत ये है कि चीन का प्रदर्शन व्यापार के मामले में इतना उम्दा रहा है कि बिम्सटेक के सदस्य देश आपस में व्यापार करने की जगह चीन के साथ जाने में सहूलियत महसूस करते हैं. फिर बिम्सटेक वाले ही बिम्सटेक को लेकर गंभीर नहीं रहे हैं. बिम्सटेक के देशों का आपस में व्यापार उनके कुल व्यापार का सिर्फ 5 फीसद है. फिर संगठन के 20 साल के इतिहास में अब तक सिर्फ तीन समिट हुए हैं (चौथा चल रहा है). इस वजह से बातें तो खूब हुई हैं, मगर अमल के मामले में ये फिसड्डी रहा है.

बिम्सटेक से भारत को फायदा हो, इसके लिए पूर्वोत्तर में तगड़ा रोड और रेल नेटवर्क चाहिए. इस मामले में भारत अभी बहुत पीछे है. फोटोःरॉयटर्स
बिम्सटेक से भारत को फायदा हो, इसके लिए पूर्वोत्तर में तगड़ा रोड और रेल नेटवर्क चाहिए. इस मामले में भारत अभी बहुत पीछे है. फोटोःरॉयटर्स

दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में भारत सबसे बड़ा देश है. लेकिन उसका रौला कभी उतना नहीं रहा. जब तक चीन चुप बैठा था, तब तक कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन अब चीन पूरी दुनिया पर पकड़ बनाना चाहता है. तो वो अपने पड़ोस (माने हमारे पड़ोस) को काबू में करने का हर संभव प्रयास कर रहा है. तो भारत को अपनी साख बनाए रखने और बचाने के लिए बिम्सटेक जैसी कोशिशों को सफल बनाना होगा. भारत ने ऐसा करने के मौके लगातार खोए हैं. बिम्सटेक में गलतियां दोहराने से बचना होगा.

रही बात बिम्सटेक के बाकी देशों की, तो बिम्सटेक यूरोपियन यूनियन शायद न बन पाए (और इसीलिए इसके फायदे कम लगें). लेकिन वो आसियान का छोटा भाई बन सकता है. आसियान ने जो कुछ हासिल किया है, उसका आधा भी बिम्सटेक कर पाया, तो उसे जीत कहा जाएगा.


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