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क्या आपको हाइड्रोजन बम और एटम बम में अंतर मालूम है?

और अगर ये अंतर डॉनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन को पता हो, तो वो पहले कौन सा बम दागेंगे.

एक बार की बात है…

मैं नुक्कड़ पे खड़ा दोस्तों के साथ चाय पी रहा था. हमारे देश में ‘चाय’ पर कुछ न कुछ ‘चर्चा’ छिड़ ही जाती है. इस बार चर्चा छिड़ गयी बम की. और छोटे-मोटे बम की नहीं, न्यूक्लीअर बम की. क्योंकि जॉन अब्राहम की पिच्चर परमाणु में इसी बम की कहानी दिखाई है. कि कैसे भारत ने तमाम दिक्कतों के बावजूद अपना देसी न्यूक्लीअर बम बना लिया. खैर, चाय पर लौटते हैं. तो हमारे चाय वाले ग्रुप में एक स्ट्रांग जीके वाले दोस्त हैं – ज्ञानी जी. ये उनका नाम नहीं, उपाधि है. क्योंकि उनका दावा है कि उन्हें परमाणु से लेकर परमाणु बम तक – हर चीज़ की जानकारी है. जॉन अब्राहम का नाम सुनकर ज्ञानी जी ने एक बार के लिए अपनी आंखें मूंद लीं. फिर ऐसे खोली जैसे आंखें नहीं, ज्ञान चक्षु खोल रहे हों. सब लड़के हाथ बांध के शिष्य मुद्रा में खड़े हो गए. सब ध्यान से सुनने की एक्टिंग कर ही रहे थे कि एक क्यूरियस लौंडा बीच में बोल दिया –

बावा, ये न्यूक्लीअर बम और एटम बम एक ही होता है का? और जो हाइड्रोजन बम का कहात है?

ज्ञानी जी सन्नाने रह गए. जबलपुर का आदमी सन्नाना तब रह जाता है जब उससे ऐसा कुछ पूछ लिया जाता है उसके पास जवाब नहीं होता. आदमी फिर बेइज़्ज़त महसूस करता है. और ज्ञानी जी जबलपुर से ही थे. वो दिन है और आज का दिन है. किसी ने उन्हें दोबारा ज्ञानी जी नहीं कहा.

परमाणु बम बहुत विवादित रहे हैं. इन्हीं के चलते ईरान और अमेरिका की दोस्ती होते-होते रह गई. (फोटोः रॉटयर्स)
परमाणु बम बहुत विवादित रहे हैं. इन्हीं के चलते ईरान और अमेरिका की दोस्ती होते-होते रह गई. (फोटोः रॉटयर्स)

अगर आप अपने ग्रुप के ज्ञानी जी बने रहना चाहते हैं या नकली ज्ञानी जी को धर दबोचना चाहते हैं तो परमाणु बमों के बारे में कुछ ज़रूरी बातें जान लीजिए-

‘न्यूक्लियर’ नहीं ‘जॉइन्ट’ परिवार में रहता है परमाणु बम

परमाणु बम के नाम में ‘न्यूक्लियर’ आता है लेकिन वो बमों की एक फैमिली का नाम है. जैसे दिवाली वाले बमों में ताजमहल-छाप, सुतली, लक्ष्मी, टिकली इत्यादि होते हैं, वैसे ही परमाणु बमों में एटम बम, कोबाल्ट बम और हाइड्रोजन बम वगैरह आते हैं. इसलिए इन शब्दों को एक-दूसरे के साथ कंफ्यूज न करें. ये मौसिया भाई हैं लेकिन हैं बिलकुल अलग-अलग. ये समझे हो तो आगे बढ़ो, नहीं तो पिछली लाइन दोबारा से पढ़ो.

‘जॉइन्ट’ में ‘जायन्ट’ कौन है?

अब आप पूछेंगे, ऊपर बताए नामों में से कौन सा वाला ज्यादा धमाका करता है? तो छोटा जवाब है, हाइड्रोजन बम. ज्ञानी जी बनना है तो बड़ा वाला जवाब भी सुन लो –
सामान्यतः न्यूक्लीअर बमों के अंदर धमाका करने वाला मटेरियल दो भाइयों से मिलकर बनता हैं – यूरेनियम और प्लूटोनियम. एटम बम में ये दोनों भाई अलग तरीके से फटते हैं और हाइड्रोजन बम में अलग. एटम बम में इन्हें उतना गुस्सा नहीं दिलाया जाता कि ये फटने में जी जान लगा दें. लेकिन ये गुस्सा यूरेनियम और प्लूटोनियम को तोड़ने के लिए काफी होता है.

नागासाकी पर गिराया गया अमरीकी परमाणु बम 'फैट मैन' एक एटम बम था (National Archives and Records Administration.)
नागासाकी पर गिराया गया अमरीकी परमाणु बम ‘फैट मैन’ एक एटम बम था (National Archives and Records Administration.)

अब सयाने लोग ये बता गए हैं कि मैटर माने पदार्थ जब टूटता है तो ऊर्जा निकलती है. यूरेनियम और प्लूटोनियम के टूटने से भी ढेर सारी ऊर्जा निकलती है. और यहीं से आता है एटम बम का ताप. टूटने को विज्ञान फिज़न कहता है. इसलिए एटम बम फिज़न बम कहलाते हैं.

हाइड्रोजन बम में यूरेनियम और प्लूटोनियम को बहूहूहूत सारा प्रेशर दिया जाता है. इत्ता कि इनका गुस्सा सातवें आसमान पर चला जाता है. ये गुस्सा सातवें आसमान तक पहुंचाने का तरीका वही होता है जो दीवाली के डबल साउंड फटाके का होता है. माने इसमें दो बम साथ में गुंथे हुए होते हैं – एक होता है सादा वाला एटम बम और उसके ठीक बाजू में होता है एक और बम जिसमें हाइड्रोजन रखा होता है.

अब आप पूछेंगे कि भैया हाइड्रोजन में ऑक्सीजन मिला दो तो पानी बनता है. तो बम में ये कांड कैसे कर देता है? तो जानिए कि जैसे गेहूं पीसकर आटा, मैदा और रवा तीनों निकलते हैं, वैसे ही पदार्थ के भी एक से ज़्यादा प्रकार होते हैं जिन्हें आइसोटोप कहते हैं. हाइड्रोजन के कुछ खास आइसोटोप बम में डाले जाते हैं. इसीलिए बम का एक नाम हाइड्रोजन बम भी पड़ गया. वरना सयाने लोगों ने तो बम का नाम थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस रखा था.

इस बात का डर है कि उत्तर कोरिया भी एक हाइड्रोजन बम बनाने के करीब है. (फोटोः रॉयटर्स)
इस बात का डर है कि उत्तर कोरिया भी एक हाइड्रोजन बम बनाने के करीब है. (फोटोः रॉयटर्स)

जब हाइड्रोजन बम चलाया जाता है, तब पहले फटता है एटम बम. वैसे ही, जैसे हमने ऊपर बताया. इससे पैदा हुई गर्मी और ऊर्जा हाइड्रोजन पर इतना दबाव डाल देती है कि उसके अणु आपस में जुड़ने लगते हैं और बन जाती है हीलियम. माने एक नया पदार्थ. इस चक्कर में वज़न के हिसाब से जितना हाइड्रोजन होता है, उतनी हीलियम बन नहीं पाती. तो बचा पदार्थ गया कहां. सयाने लोग कहते हैं कि पदार्थ कभी गायब नहीं होता, वो ऊर्जा में बदल जाता है. तो ढेर सारी ऊर्जा गर्मी बनकर निकलती है. बहूहूहूहूहूत ज़ोर का धमाका होता है. ये धमका हाइड्रोजन-हाइड्रोजन जुड़ने से होता है, इसीलिए इसे फ्यूज़न बम भी कहता हैं. जुड़ने को विज्ञान की भाषा में फ्यूज़न कहते हैं.

बम की ताकत मालूम कैसे पड़ती है?

जैसे हर मां को अपना बच्चा सुंदर लगता है हर देश को अपना बम ताकतवर लगता है. अब आप पूछेंगे कि ये तय कैसे होता है कि किस देश का बम बाप है और किस देश का बेटा? हमारे बताए से आप समझ गए होंगे कि कोई आदमी तो बम के पास खड़े होकर देख नहीं सकता कि कौनसा वाला कितनी तेज़ी से फट रहा है. लेकिन ज़्यादातर लोगों ने किसी न किसी रूप में TNT का धमाका देखा है. अरे वही जिसमें जिसमें खदान फोड़ने के लिए एक टोपी वाला मज़दूर साइकिल वाला हैंडपंप दबाता है. और खूब ज़ोर से धमाका होता है. वही TNT ब्लास्ट है. कोई न्यूक्लियर बम कितना धमाकेदार था इसे ऐसे नापते हैं कि कितने टन TNT फोड़ने पर ऐसा धमाका होगा. इसी को कहते हैं ‘TNT इक्विवेलेंट’. ये समझे हो तो आगे बढ़ो, नहीं तो पिछली लाइन दोबारा से पढ़ो.

हिरोशिमा और नागासाकी में फटे परमाणु बम (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
हिरोशिमा और नागासाकी में फटे परमाणु बम (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका ने जापान पर दो एटम बम गिराए. हिरोशिमा पर गिरा बम छोटा वाला था – 15 किलो-टन TNT. माने जब वो फटा, तब 15 हज़ार टन TNT फटने के बराबर धमाका हुआ था. अपने यहां एक मालगाड़ी पूरी तरह TNT से लाद दी जाए, तो उसमें 5 हज़ार टन TNT आएगा. तो ये बम 3 मालगाड़ी भरकर TNT फटने जितना ताकतवर था. खुद नागासाकी पर जो मोटा वाला बम गिराया गया था, वो 21 किलो-टन TNT के बराबर था.

पहले कौन आया? कौन कब-कब आया?

पहले एटम बम आया, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान. बहुत सारे देशों में होड़ लगी थी, लेकिन बना पहले अमेरिका का. युद्ध ख़त्म होने में बाद अमेरिका ने 1952 में रूस के मज़े लेने के लिए हाइड्रोजन बम का पहला सफल परीक्षण कर डाला. इस परीक्षण में जो हाइड्रोजन बम फटा वो 10,000 किलो-टन TNT के बराबर था. फिर रूस को तो जानते ही हो, दिल पे ले लिया. 1961 में रूस ने ‘ज़ार बोम्बा’ नाम के हाइड्रोजन बम का सफल परीक्षण किया. ज़ार बॉम्बा 50000 किलो-टन TNT के बराबर फटा. ज़ार बॉम्बा अब तक का सबसे ताकतवर परमाणु बम है, जिसे टेस्ट किया गया है. माने वो, जिसका दुनिया को पता है.

परमाणु हमले के बाद नेस्तनाबूत हुआ हिरोशिमा (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)
परमाणु हमले के बाद नेस्तनाबूत हुआ हिरोशिमा (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)

क्या सचमुच पूरी धरती तबाह हो सकती है?
पूरी सफाई तो मोदी जी भी नहीं कर पाए. फिर एक अकेला बम क्या कर लेगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि दुनिया में इतने न्यूक्लियर बम बना लिए गए हैं कि अगर सब चला दिए जाएं तो दुनिया सच में तबाह हो जाएगी. न भी हुई तो बम का असर इतना घातक होगा कि जीवन बचने की संभावना बहुत कम हो जाएगी. कैसे, उसके लिए हम नागासाकी का उदाहरण लेते हैं, जिसपर अमेरिका ने ‘फैटमैन’ नाम का न्यूक्लियर बम गिराया था.

एटम बस धमाके से ही नुकसान नहीं करते. वो फटने के बाद बहुत सारी गर्मी पैदा करते हैं जो पूरे के पूरे शहरों को जलाकर खाक कर सकती है. जहां फैटमैन फटा, लगभग डेढ़ किलोमीटर का इलाका एकदम राख हो गया था, कुछ नहीं बचा. विस्फोट के केंद्र से डेढ़ से दो किलोमीटर के बीच का इलाका भारी तबाही वाला था. ऐसी तबाही, जिससे रिकवर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था. दो से तीन किलोमीटर दूर का इलाका मध्यम तबाही वाला था. और तीन से पांच किलोमीटर वाला इलाका कम तबाही वाला था.

हिरोशिमा पर बम का असर दिखाता नक्शा. अंदर के गोले में सब बरबाद हो गया था. बाहर इतना नुकसान हुआ कि सुधार नहीं हो सकता था.
नागासाकी पर बम का असर दिखाता नक्शा. अंदर के गोले में सब बरबाद हो गया था. बाहर इतना नुकसान हुआ कि सुधार नहीं हो सकता था.

पांच किलोमीटर से बाहर के इलाके में धमाके वाली तबाही नहीं मची, लेकिन रेडिएशन उसे ले डूबा. रेडिएशन से कई बीमारियां फैलती हैं और असर सैकड़ों सालों तक रहता है. इतने सालों बाद हिरोशिमा और नागासाकी में आज की पीढ़ियां भी रेडिएशन के प्रकोप में पल रही हैं. और विस्फोट के केंद्र से थोड़ा दूर और आ जाएं तो अमेरिका आ जाता है, जिसने बम फेंका था. और ये उस बम का हाल है जो आज के न्यूक्लियर बमों के सामने कहीं नहीं ठहरता.

डूम्सडे डिवाइसः कोबाल्ट बम

ऐसा नहीं है कि परमाणु बम के परिणामों को देखकर उन्हें और खतरनाक बनाने की कोशिशें नहीं हुई हैं. आग, गर्मी, भूकंप और रेडिएशन से भी पेट नहीं भरा तो कोबाल्ट बम बनाने की बात हुई. ये एक ऐसा हाइड्रोजन बम होगा जिसमें कोबाल्ट भी साथ रखा होगा. ये फटेगा तो एक औसत हाइड्रोजन बस से कहीं ज़्यादा तबाही होगी क्योंकि धमाके के बाद कोबाल्ट के कण बहुत दूर तक फैल जाएंगे (आधी या पूरी धरती तक भी) और इनसे निकलने वाले रेडिएशन से बड़ी संख्या में लोगों को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो जाएंगी.

परमाणु बम से निकली गर्मी दूर खड़े लोगों को भी इस तरह झुलसा देती है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

परमाणु बम से निकली गर्मी दूर खड़े लोगों को भी इस तरह झुलसा देती है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

ऐसा कहा जाता है कि अमरीका कोबाल्ट बम बनाने की सोच चुका है और रूस ने इसे बनाने की कोशिश की है. पक्का कोई नहीं बताता. यही बम डूम्सडे डिवाइस हो सकता है. माने ऐसा बम जिससे दुनिया ही खत्म हो जाए.

अपने पास कितना धमाकेदार मटेरियल है?

भारत ने लेटेस्ट 1998 में अपने न्यूक्लियर बम टेस्ट किए थे. तब पोखरण में 5 सफल परीक्षण किए गए थे. उससे जो धमाका हुआ था, वो लगभग 45-60 किलो-टन TNT के बराबर था. माना जाता है कि भारत के पास 115 के करीब न्यूक्लियर बम हैं. पाकिस्तान के पास 125 के लगभग न्यूक्लियर बम बताए जाते हैं. जहां गिरता है पूरा साफ़ कर देता है? सुना है न्यूक्लीअर बम से पूरी पृथ्वी को कईयों बार तबाह किया जा सकता है?

अब आप बमों के ज्ञानी जी बन चुके हैं. पूरा हिसाब लगा के नुक्कड़ पे जाओ, दोस्तों को ले जाओ और खूब ज्ञान बांटो.

1998 में भारत ने जिन पांच परमाणु बमों का परीक्षण किया था, उनमें से एक - शक्ति.
1998 में भारत ने जिन पांच परमाणु बमों का परीक्षण किया था, उनमें से एक – शक्ति.

IIT गुआहाटी से हमारे यहां इंटर्नशिप करने आए आयुष के बारे में तीन चीज़ें अच्छी हैं: एक – वो IIT से हैं, दूसरी – वो दफ्तर में किसी को प्यासा नहीं मरने देते, और तीसरी – वो किस्से कायदे के सुनाते हैं. प्रस्तुत लेख उनकी तीसरी खूबी का एक छोटू सा नमूना है. 


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