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डांगरी फेक एनकाउंटर: सेना के लोगों ने जीभ काटी, आंखें निकालीं, घुटने तोड़े!

असम का तिनसुकिया. साल 1994. फरवरी महीना. 17 से 19 के बीच की तारीख. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के पांच लोग सेना के हाथों मारे गए. ये फेक एनकाउंटर था. इस मामले में अब सेना के सात लोगों को उम्रकैद की सजा देने की सिफारिश हुई है. इस सिफारिश पर आखिरी फैसला कोलकाता स्थित ईस्टर्न कमांड या फिर नई दिल्ली स्थित आर्मी हेडक्वॉर्टर्स को लेना है. जिन्हें सजा मिली है, उनके नाम हैं- पूर्व मेजर जनरल ए के लाल, दो कर्नल- थॉमस मैथ्यू और आर एस सिबिरेन, दो कैप्टन- दिलीप सिंह, जगदेव सिंह और दो नायक- अलबिंदर सिंह और शिवेंद्र सिंह.

ये है असम का तिनसुकिया जिला. यहीं पर हुआ था ये फेक एनकाउंटर.
ये है असम का तिनसुकिया जिला. यहीं पर हुआ था ये फेक एनकाउंटर.

ये केस क्या था?
इस केस का जिक्र ‘डांगरी एनकाउंटर’ के नाम से होता है. हुआ ये कि रामेश्वर सिंह नाम के एक शख्स की हत्या हो गई. रामेश्वर असम फ्रंटियर टी लिमिटेड के जनरल मैनेजर थे. इस हत्या का इल्जाम लगा यूनाइडेट लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) पर. उस समय तिनसुकिया के ढोला में 18 पंजाब रेजिमेंट तैनात थी. रामेश्वर सिंह की हत्या के बाद इन लोगों ने धर-पकड़ शुरू की. रेजिमेंट के लोगों ने तिनसुकिया के तलाप इलाके (जहां की ये घटना है) से नौ लड़कों को उनके घरों से उठाया. ये तारीख थी 17 फरवरी, 1994. ये सभी AASU से जुड़े हुए थे.

अमित शाह के बाईं तरफ हैं जगदीश भुयान. एनकाउंटर के समय वो असम गण परिषद के नेता थे. AASU के उपाध्यक्ष भी थे. वो भुयान ही थे, जो सबसे पहले ये मामला लेकर गुवाहाटी हाई कोर्ट पहुंचे थे (फोटो: ट्विटर)
अमित शाह के बाईं तरफ हैं जगदीश भुयान. एनकाउंटर के समय वो असम गण परिषद के नेता थे. AASU के उपाध्यक्ष भी थे. वो भुयान ही थे, जो सबसे पहले ये मामला लेकर गुवाहाटी हाई कोर्ट पहुंचे थे (फोटो: ट्विटर)

मामला सामने कैसे आया?
जगदीश भुयान. ये अभी असम में बीजेपी के नेता हैं. मगर 1994 में वो असम गण परिषद के विधायक थे. AASU के उपाध्यक्ष भी थे. अध्यक्ष थे सर्वानंद सोनोवाल, जो कि फिलहाल असम के मुख्यमंत्री हैं. नौ लड़कों के लापता होने की बात भुयान को मालूम चली. उन्होंने तिनसुकिया जिला प्रशासन को खबर पहुंचाई. 21 फरवरी तक राज्यपाल, चीफ सेक्रटरी और असम के पुलिस प्रमुख सबको पता चल चुका था कि सेना के लोगों ने कुछ लड़कों को उठाया और वो लापता हैं. स्थानीय पुलिस ने तफ्तीश की. पता लगा कि उन लड़कों को 15 पंजाब रेजिमेंट के ढोला कैंप में रखा गया है. 22 फरवरी को भुयान ने असम हाई कोर्ट में याचिका डाली. कहा कि उन लड़कों की जान को खतरा हो सकता है. असम के चीफ जस्टिस एस एन फुकान और जस्टिस एक के पटनायक ने सेना को निर्देश दिया कि वो सभी पकड़े गए युवाओं को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करे. सेना ने उसी दिन माथेश्वर मोरान, गुनिन हजारिका, प्रकाश शर्मा और मनोरंजन दास नाम के चार युवाओं को रिहा कर दिया. मगर पांच लड़के फिर भी लापता थे.

ये हैं असम के CM सर्वानंद सोनोवाल. घटना के समय ये AASU के अध्यक्ष थे. AASU छात्र संगठन है. इसने असम में आकर बस गए बांग्लादेशी घुसपैठियों और शरणार्थियों के खिलाफ बहुत बड़ी मुहिम चलाई. असम गण परिषद (AGP) AASU की ही राजनैतिक पार्टी है 
ये हैं असम के CM सर्वानंद सोनोवाल. घटना के समय ये AASU के अध्यक्ष थे. AASU छात्र संगठन है. इसने असम में आकर बस गए बांग्लादेशी घुसपैठियों और शरणार्थियों के खिलाफ बहुत बड़ी मुहिम चलाई. असम गण परिषद (AGP) AASU की ही राजनैतिक पार्टी है

नाव पर बिठाकर ले गए और गोली मार दी!
कहते हैं कि सेना के लोगों ने उन पांचों को दो नावों में बिठाया. डांगरी नदी पार की. वहां से डिब्रू-साइखोवा नैशनल पार्क ले गए. यहां ले जाकर उन पांचों को गोली मार दी. जो मारे गए, उनके नाम थे- प्रबीण सोनोवाल, प्रदीप दत्ता, देवाजित बिस्वास, अखिल सोनोवाल और भावेन मोरान. प्रबीण AASU का नेता था. वो दो मल्लाह (मोका मुर्रा और रतन मोरान) जिन्होंने नाव चलाई थी, वो भी लापता हो गए.

इतना टॉर्चर किया था कि रिहा कैसे करते!
23 फरवरी को भुयान ने हाई कोर्ट में फिर से एक याचिका डाली. उनका कहना था कि सेना के लोगों ने अदालत के आदेश को अनदेखा करके पांच लड़कों को मार डाला. गुवाहाटी हाई कोर्ट में भुयान ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया. लगे रहे. उनकी ही कोशिशों का नतीजा था कि ये केस CBI को सौंपा गया. एजेंसी ने सात अधिकारियों और जवानों को आरोपी बनाया. तिनसुकिया पुलिस भी काम में जुट गई. मारे गए पांचों लड़कों की लाश का पोस्टमॉर्टम कराया गया. पुलिस ने कहा कि गोली मारने से पहले उन्हें काफी टॉर्चर किया गया था. जीभ काटी गई, आंखें निकाली गईं, घुटने तोड़ दिए गए, बिजली का झटका दिया गया. लोगों का कहना था कि उन पांचों को इतना टॉर्चर किया गया था कि अगर उन्हें रिहा करके मैजिस्ट्रेट के आगे पेश किया जाता, तो रेजिमेंट के लोगों की पोल खुल जाती. इसीलिए उन्हें मार डाला गया. जांच आगे बढ़ी. मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपियों का कोर्ट मार्शल हो और वहीं उन्हें सजा दी जाए. सेना भी यही चाहती थी. 16 जुलाई, 2018 को कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू हुई. 27 जुलाई को कोर्ट मार्शल पूरा हुआ. सजा का ऐलान 14 अक्टूबर को किया गया है.

उल्फा की क्या हिस्ट्री है?
7 अप्रैल, 1979. इसी दिन बना था उल्फा. इनका मकसद था असम की आजादी. शुरुआती दौर में इसे लोकल लोगों का काफी सपोर्ट मिला. मगर फिर ये समर्थन घटता गया. उल्फा के तौर-तरीकों में लोगों को किडनैप करना, हत्या, वसूली सब कुछ था. इन्हें पाकिस्तान से भी सपोर्ट मिलता था. इसकी हिंसक गतिविधियों की वजह से 1990 में इस पर बैन लगा दिया गया. इस पर काबू पाने के लिए 90 के दशक में असम ने खूब कोशिश की. इन कोशिशों में सब कुछ लीगल नहीं था. राज्य की तरफ से भी उल्फा के लोगों को खूब निशाना बनाया गया. कई सारे उल्फा लीडर्स ने हथियार डाल दिए. जिन लोगों ने सरेंडर किया, उनके लिए एक नया टर्म चल निकला- सल्फा. माने सरेंडर्ड यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (SULFA).

ये अगस्त 1998 की तस्वीर है. एक दमकल कर्मचारी आग बुझाने में लगा है. ULFA के लोगों ने इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन के पेट्रोलियम कंटेनर डिपो में रखे स्टोरेज टैंक्स में आग लगा दी थी. सात टैंक जलकर राख हो गए. उल्फा के हाथों होने वाले हमले बहुत आम थे उन दिनों (फोटो: रॉयटर्स)
ये अगस्त 1998 की तस्वीर है. एक दमकल कर्मचारी आग बुझाने में लगा है. ULFA के लोगों ने इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन के पेट्रोलियम कंटेनर डिपो में रखे स्टोरेज टैंक्स में आग लगा दी थी. सात टैंक जलकर राख हो गए. उल्फा के हाथों होने वाले हमले बहुत आम थे उन दिनों (फोटो: रॉयटर्स)

उल्फा के ही लोगों को उल्फा के खिलाफ खड़ा किया गया
जैसे छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम थे, कश्मीर में इखवान थे, वैसे ही असम में ये SULFA थे. राज्य और सेना की शह पर ये भी उल्फा से लड़ते थे. बदले में सरकार इनका पुनर्वास करती. पुनर्वास के नाम पर इन्हें शराब की दुकान का ठेका और इस तरह की कमाई वाली चीजें दी जाती थीं. इसको पुनर्वास से ज्यादा इनाम भी कह सकते हैं. उन्हें निजी सुरक्षा के नाम पर हथियारों का इस्तेमाल करने की छूट थी. कई बार उन्हें सरकारी सुरक्षा भी मिलती थी. सरकार असल में इन्हें उल्फा के खिलाफ इस्तेमाल करती थी. ऐसा नहीं कि बस उल्फा के ही लोग टारगेट किए जाते हों. उनके परिवारवालों को भी निशाना बनाया जाता था.

ये जुलाई 1998 की फोटो है. असम के ठाकुरबानी में ULFA के कुछ चरमपंथी सरेंडर कर रहे हैं. ये सरेंडर करने वाले SULFA कहलाते थे. सरकार इन सल्फाओं को उल्फा के खिलाफ चल रही लड़ाई में इस्तेमाल करती थी (फोटो: रॉयटर्स)
ये जुलाई 1998 की फोटो है. असम के ठाकुरबानी में ULFA के कुछ चरमपंथी सरेंडर कर रहे हैं. ये सरेंडर करने वाले SULFA कहलाते थे. सरकार इन सल्फाओं को उल्फा के खिलाफ चल रही लड़ाई में इस्तेमाल करती थी (फोटो: रॉयटर्स)

उस दौर में असम के अंदर बहुत डरावनी चीजें हो रही थीं
उस दौर में असम के अंदर खूब सारी सीक्रेट हत्याएं हुईं. नकाबपोश लोग रात-रात को लोगों के घरों में घुस जाते. फिर अगल-बगल के लोगों को गोलियों की आवाज सुनाई देती. अगले दिन गांव के बाहर, नदी किनारे या किसी जंगल-झाड़ में इंसानी शरीर के टुकड़े मिलते. कुछ लोगों को ये भी लगता कि ये शायद मानव बलि का मामला है. इसी का एक मशहूर वाकया है. 22 जून, 1999 का. हुदुमपुर में एक फोटोजर्नलिस्ट को नदी में फंसा शरीर का कटा हिस्सा दिखा. किसी मर्द का शरीर था. पानी के अंदर होने की वजह से वो फूल गया था. पत्रकार ने उसे बाहर निकाला. तस्वीरें खींची और अखबार में छाप दीं. ऐसा नहीं था कि बस उल्फा और सल्फा के लोग एक-दूसरे को मार रहे थे. कई बेगुनाह भी मारे जा रहे थे. वो दौर असम के सबसे खराब दौर में से एक था.

ए के लाल पर एक लड़की ने भी इल्जाम लगाया था
सितंबर 2007 की बात है. एक महिला अधिकारी ने ए के लाल पर बदतमीजी का आरोप लगाया. कहा कि योग सिखाने के बहाने ए के लाल उसके साथ बदतमीजी कर रहे थे. ए के लाल का कोर्ट मार्शल हुआ. दिसंबर 2010 में उसे सर्विस से डिसमिस कर दिया गया. हालांकि आर्म्ड फोर्सेज़ ट्राइब्यूनल ने बाद में उसे रिटायरमेंट से जुड़ी सुविधाएं दे दी थीं.


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