सुधांशु फिरदौस हिंदी में कइयों के महबूब कवि हैं. गणित के छात्र और अध्यापक हैं,लेकिन जीवन के गणित में कमजोर हैं. दोस्तों पर जान छिड़कते हैं. रात-बिरात भीपुकारों तो चले आते हैं. मीर के भक्त हैं और कालिदास के भी. ‘बादल डाकिए’ शीर्षक सेकविताओं की एक किताब बहुत दिन से तैयार है, लेकिन उसके आने की खबरें हवाओं में हैं,वह नहीं. खैर, सुधांशु साल के दूसरे दिन अपना जन्मदिन मनाते हैं. आज दूसरा ही दिनहै, इसलिए उन्हें शुभकामनाएं देते हुए आज एक कविता रोज़ में पेश है उनकी : एक कविताया नौ शीर्षकहीनताएं...रात भर मोर और कोयल में दुबोला होता रहा मैं उसके बारे में वो मेरे बारे मे दूसरोंसे पूछता रहा * लौट आई है एक तितली फूल पर बैठने से पहले लौट आया है एक पतंगा आगमें जलने से पहले इन दिनों दोनों मिल कर गढ़ रहे हैं प्रेम की नई परिभाषा * मेरीजिंदगी की सारी नेमतें बंद हैं तुम्हारे एक पेंचोखम भरे दस्तखत से जिसकी जालसाजीमैं अब तक न कर सका और तुम खुद ही बंद हो किसी और की तिजोरी में * बादलों के पीछेछिपा है एक धुनिया धुन रहा है अनवरत रुई दूर-दूर तक फैले हैं सूरजमुखी के खेत बीचसे एक साइकिल दूर जाती हुई जाड़े की खिली धूप में उनका मुरझाया हुआ चेहरा लगता हैलंबा खिंचेगा ये इंतजार एकतरफा प्यार * वसंत की पहली बारिश ले जाएगी बची-खुची ठंडदोपहर की धूप में सूखेगा रात का भीगा कंबल * जीवन एक घर है जिसमें बेघर हूं मैंदरख्त किसके ध्यान में पत्ते किसके ये अकेलापन मुझे वहशी किए जा रहा है निगल जानाचाहता हूं पत्तियां, टहनियां पूरा का पूरा दरख्त * खिलते हैं एक ही मौसम मेंगुलमोहर और अमलतास भंवरा किस फूल पर बैठे इस फिक्र में रहता है उदास अकेले खाली छतपर चटाई डाल बियर से भरे हुए जग के साथ पैदा होने से अब तक के सारे दुःख को चांद सेबांट जब मैं थक कर सो जाऊंगा मेरी कविता तुम भी सो जाना * परछाइयां धूप की हमसफरहैं अंधेरा जुगनुओं का यार रात सबकी है... लेकिन चांद सिर्फ उनका जो उसे हसरत सेदेख रहे हैं * दुःख के देवदार पर तुम्हारी यादों की बर्फबारी मैं टूट कर अब गिरा तबगिरा आज की रात आकाश में तारे लिख रहे हैं मेरे लिए कविता ये मीठा-मीठा दर्द हीमेरा सरमाया है