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गुजरात सरकार इस वजह से सुप्रीम कोर्ट में बार-बार डांट खा रही है

गुजरात सरकार को पुलिस अफसरों की विवादित नियुक्ति के मामले में एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है. गुजरत सरकार ने पुलिस के दो विवादित अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद सेवा पर वापस बुला लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस नियुक्ति पर राज्य सरकार से सफाई मांगी थी. इसके बाद आज दोनों अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामा दाखिल कर अपने पद से इस्तीफ़ा देने की बात कही है.

इन अफसरों का विवाद से पुराना नाता है

इस्तीफ़ा देने वाले पहले अफसर हैं एनके अमीन. सोहराबुद्दीन और इशरत जहां फर्जी एनकाउंटर के मामले में उनका नाम CBI चार्जशीट में दर्ज है. वो इन केसों में आठ साल न्यायिक हिरासत में रह कर आए हैं. उन्हें सोहराबुद्दीन केस में हाल ही में रिहा किया गया था, इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के मामले में वो फिलहाल विचाराधीन आरोपी हैं और जमानत पर बाहर हैं. अमीन अगस्त 2016 में रिटायर हो गए थे. इसके बाद राज्य सरकार ने उन्हें एक साल का एक्सटेंशन दे दिया था.

भारतीय पुलिस सेवा में आने से पहले अमीन डॉक्टर हुआ करते थे. उन्हें 2007 में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ के मामले में गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद वो लगातार आठ साल जेल में रहे. उन पर सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसरबी की लाश ठिकाने लगाने में मदद करने के आरोप लगे थे. CBI की चार्जशीट के हिसाब से अमीन उन पुलिस अफसरों में से थे, जिन्होंने इशरत जहां और उसके तीन साथियों पर गोलियां चलाई थीं.एक दिन पहले तक वो गुजरात के महिसागर जिले में पुलिस अधीक्षक के तौर पर काम कर रहे थे.

तरुण बारोट: हाथ में रिवाल्वर
तरुण बारोट: हाथ में रिवाल्वर

जेल में रहते हुए रिटायर हो गए थे बारोट

इस्तीफ़ा देने वाले दूसरे अफसर तरुण बारोट हैं. तरुण बारोट के नाम के आगे किसी दौर में ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ लिखा होता था. उन पर इशरत जहां और सादिक जमाल फर्जी मुठभेड़ में शामिल होने के आरोप हैं. बारोट इशरत जहां केस में तीन साल जेल में रहे. इस दौरान 2014 में उनकी उम्र 60 साल से ऊपर हो गई और जेल में रहने के दौरान ही वो रिटायर हो गए. इशरत जहां केस में जमानत पर रिहा होने के बाद उन्हें एक साल के करार पर सेवा पर बुला लिया गया. इस्तीफ़ा देने से पहले वो वड़ोदरा में पश्चिमी रेलवे में पुलिस उप-अधीक्षक के तौर काम कर रहे थे. सोहराबुद्दीन केस में ही अमित शाह पर भी आरोप लगे थे, जिनकी वजह से उन्हें जेल में रहना पड़ा था. उस समय शाह सूबे के गृहमंत्री हुआ करते थे.

गुजरात सरकार ने 1 सितंबर 2016 को एक नोटिफिकेशन निकालकर पुलिस प्रशासन में बड़े फेरबदल किए थे. इसमें ऐसे कई रिटायर अफसरों को सेवा पर बुलाया गया था, जो इशरत जहां और सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में आरोपी रहे थे. ये अफसर थे एनके अमीन, तरुण बारोट और बीआर चौबे. इन नियुक्तियों पर गुजरात सरकार सवालों के घेरे में आ गई थी.

पीपी पाण्डेय के केस से नहीं लिया सबक

गुजरात पुलिस के महानिदेशक पीपी पाण्डेय जनवरी 2016 में सेवानिवृत्त हो गए थे. सरकार ने उन्हें तीन महीने का एक्सटेंशन दिया गया था. गुजरात सरकार के इस फैसले को गुजरात के पूर्व डीजीपी जूलियो फ्रांसिस रिबेरियो ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया था. सुप्रीम कोर्ट के जवाब तलब करने के बाद पीपी पाण्डेय को 3 अप्रैल को अपना पद छोड़ना पड़ा था. उन पर सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ के मामले में लगे थे.

इशरत जहां का परिवार
इशरत जहां का परिवार

हाईकोर्ट का फैसला पलटा

इन दोनों अफसरों की नियुक्ति के खिलाफ याचिका लगाई थी इन्हीं के सहकर्मी रह चुके पूर्व IPS राहुल शर्मा ने. 2002 के दंगों के वक़्त शर्मा भावनगर के एसपी हुआ करते थे. उस समय उन्होंने दंगों को सख्ती से कुचला था. भावनगर के एक मदरसे से 400 के करीब छात्रों को दंगाइयों की भीड़ से बचाकर निकालने के कारनामे के चलते वो पहली बार चर्चा में आए थे. IIT कानपुर से बीटेक कर चुके शर्मा ने 2013 में अपनी पत्नी के निधन के बाद पुलिस सेवा से इस्तीफ़ा दे दिया था. इसके बाद उन्होंने वकालत की और फिलहाल गुजरात हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं. गुजरात में उन्हें दंगा प्रभावितों को न्याय दिलाने के मामले में एक क्रूसेडर के तौर पर देखा जाता है.

राहुल शर्मा ने इन दोनों अफसरों की नियुक्ति को लेकर गुजरात हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी. हाईकोर्ट ने शर्मा की याचिका को खरिज कर दिया था. शर्मा इस मामले को शीर्ष न्यायलय में ले आए. 16 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए पीपी पाण्डेय के केस का हवाला देते हुए दोनों अफसरों को पद छोड़ने के लिए कहा था.


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