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बीकानेर रेप केस: दलित छात्रा से दुष्कर्म के दोषी टीचर, कॉलेज प्रिंसिपल और वार्डन को क्या सजा मिली है?

चर्चित बीकानेर रेप-हत्याकांड मामले में अदालत का फैसला आ गया है. मार्च 2016 में हुई इस घटना के तीनों आरोपियों को बीकानेर की पॉक्सो कोर्ट ने बीती 1 अक्टूबर को दोषी क़रार दिया था. तब जज देवेंद्र सिंह नागर ने सजा पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. मंगलवार 12 अक्टूबर को उन्होंने दोषियों को सजा सुनाई. आजतक/इंडिया टुडे के मुताबिक, कॉलेज के फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्कर विजेंद्र सिंह को आजीवन कारावास की सजा दी गई है. वहीं, कॉलेज के प्रिंसिपल और छात्रावास वार्डन को 6-6 साल की सज़ा हुई है.

इस घटना की पीड़िता नाबालिग थी और दलित समाज से थी. अदालत ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 366, 376 (बलात्कार) और 305 (नाबालिग या मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाना) के अलावा पॉक्सो एक्ट और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति संरक्षण अधिनियम के तहत भी सज़ा सुनाई है.

क्या था मामला?

घटना 5 साल पहले की है. तारीख थी 29 मार्च 2016. उस दिन राजस्थान के बीकानेर जिले के एक कॉलेज में नाबालिग दलित छात्रा का शव मिला था. नोखा के जैन आदर्श टीचर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के वाटर टैंक में पीड़िता की बॉडी तैरती मिली थी.

छात्रा के माता-पिता द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में कहा गया था कि उसने मौत से एक दिन पहले यानी 28 मार्च 2016 को फोन पर बताया था कि उसके साथ एक शिक्षक ने बलात्कार किया था. ये शिक्षक था पीटीआई विजेंद्र सिंह. बाद में उस पर छात्रा की हत्या का भी आरोप लगा.

वहीं, कॉलेज प्रशासन पर आरोप लगा कि उसने पीड़िता से माफ़ीनामा लिखवाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की थी. उसने ये दिखाने की कोशिश की छात्रा और विजेंद्र सिंह के बीच सहमति से संबंध बने थे. हालांकि छात्रा का शव मिलने के बाद पीटीआई और कॉलेज छात्रावास की वार्डन को पुलिस ने कस्टडी में ले लिया था. अब अदालत ने इन दोनों के साथ स्कूल के प्रिंसिपल को भी सजा सुनाई है.

बीते सालों में इस केस पर बहुत राजनीति भी हुई है. इस घटना के समय राजस्थान में बीजेपी की सरकार थी. वसुंधरा राजे सीएम थीं. तब विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने बीजेपी को खूब घेरा था. राहुल गांधी पीड़िता के घरवालों से मिलने भी गए थे. अब राजस्थान में उनकी पार्टी की सरकार है. इसी साल अप्रैल में राज्य सरकार ने एक रेवेन्यू विलेज का नाम इस घटना की दलित पीड़िता के नाम पर रखा.

उधर, पीड़िता के परिवार का बुरा समय जारी रहा. पीड़िता अपने गांव की अनुसूचित जाति की पहली लड़की थी जिसने उच्च शिक्षा पाने की कोशिश की. लेकिन उसकी मौत हो गई. बाद में उसके पिता ने अपनी छोटी बेटी को भी स्कूल जाने से रोक दिया. 5 साल बाद उन्हें अदालत से न्याय मिला है.

ये भी पढ़ें – SHAME पर एक निबंध


वो काला कानून, जिसमें पुलिस जाति के हिसाब से किसी को गिरफ्तार कर सकती थी –

 

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