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हिंदी आउट, संस्कृत इन, अब आपके नजदीकी सिनेमाघर में!

इंडिया में बनने वाली चौथी संस्कृत फिल्म होगी ये.

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फोटो - thelallantop
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प्रतीक्षा पीपी
21 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 21 नवंबर 2016, 09:28 AM IST)
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कैमरा घूमता है. केरल के नम्बूदरी ब्राह्मण परिवार में संस्कृत के श्लोक गूंज रहे हैं. एक औरत पुराने, घिसे पिटे कर्मकांडों से लड़ती है जिसे 71 साल के वैदिक ज्ञाता और परिवार के मुखिया रामविक्रम नम्बूथरी ने लागू कर रखा है. फिल्म सन 1930 में बेस्ड है. ऊंची जाति वाले इसके किरदार लगातार संस्कृत बोल रहे हैं. फिल्म का नाम है इष्टि, मतलब 'खुद की खोज'. इसका प्रोडक्शन और डायरेक्शन डॉक्टर जी. प्रभा ने किया है. ये फिल्म संस्कृत में है और कई बड़े फिल्म फेस्टिवल में इसकी स्क्रीनिंग हो चुकी है. और इसकी तारीफ़ भी हो रही है.
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इसे अभी जल्द ही इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया, गोवा में दिखाया गया. इष्टि आपको पुराने भारत की तरफ ले जाती है, जब परिवार के मुखिया के शब्द ही आखिरी होते थे. पुराने नियम घर के सभी सदस्यों पर लागू होते थे. फिल्म में भारत के जड़ में घुसी पितृसत्ता को दिखाया गया है. फिल्म बीसवीं शताब्दी में औरतों की पढ़ाई-लिखाई की बात करती है. नंबूथरी औरतों के बारे में बात करती है.
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जैसे हरियाणा में आज लड़कियों की संख्या बहुत कम है, वैसी ही स्थिति 1930 में केरल में थी.

कहानी क्या है?

श्रीदेवी (न्यूकमर अथिरा पटेल ने ये रोल किया है) नम्बूथरी की तीसरी पत्नी है. पढ़ी लिखी है. अपने पति के विचारों का विरोध करती है. रीजनिंग का इस्तेमाल करती है. अपने परिवार वालों और सौतेले बेटे को पितृसत्ता के खिलाफ खड़े होने को कहती है. श्रीदेवी पढ़ाई-लिखाई की बात करती है. सौतेले बेटे रमन को पढ़ने-लिखने को कहती है. श्रीदेवी और रमन के बीच अफेयर होने की अफवाह उनके समुदाय में जोर पकड़ लेती है.
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लेकिन संस्कृत क्यों?

18वीं शताब्दी में संस्कृत काफी बोली जाती थी. लेकिन ऊंची जाति और वर्गों के लोगों के बीच तक ही सीमित थी. सबको इसे बोलने का अधिकार नहीं था. इसी वजह से ये भाषा सीमित हो गई. इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि तमाम भाषाओं में देश में फिल्में बनती हैं लेकिन संस्कृत में आज तक सिर्फ चार फिल्में ही बनीं हैं. 'इष्टि' इस तरह की चौथी फिल्म है, लेकिन किसी सामाजिक मुद्दे पर बनने वाली अपनी किस्म की पहली संस्कृत फिल्म है. ये कहना मूर्खता होगी कि इस फिल्म से संस्कृत लोकप्रिय होगी लेकिन कुछ हद तक इससे ये परसेप्शन टूटेगा कि संस्कृत सिर्फ हिन्दू संतों और पुजारियों की भाषा है.
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इससे पहले संस्कृत में फिल्म 'प्रियनामनासम' बनी थी. इसे विनोद मंकार ने बनाया था. ये 17वीं शताब्दी के कवि उन्नई पर आधारित थी. जी. प्रभा का कहना है कि फिल्म में डायलॉग्स की बजाय ज्यादा जोर विजुअल्स और कर्मकांडों पर है. लोगों को समझने के लिए इंग्लिश में सबटाइटल भी दिए गए हैं. इसके अलावा उन्होंने कहा:
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प्रभा के लिए दूसरा सबसे बड़ा चैलेन्ज था ऐसे एक्टर्स खोजना जो संस्कृत बोल सकें. नम्बूथरी के रोल के लिए प्रसिद्द एक्टर नेदुमुदी वेणु को चुना गया. प्रभा ने कहा कि उन्होंने वेणु को इसलिए चुना क्योंकि उन्होंने इससे पहले कुछ संस्कृत नाटक किए थे. उन्होंने 17 दिनों में एक फिल्म की शूटिंग ख़त्म की थी. संस्कृत को हिन्दुओं की भाषा माने जाने पर डॉक्टर प्रभा को ऐतराज है. उन्होंने अलग-अलग धार्मिक बैकग्राउंड के छात्रों को पढ़ाया है. वो कहते हैं कि उनके पास बहुत से ईसाई लड़के आए थे जिन्होंने संस्कृत इसलिए सीखी ताकि हिन्दू धर्मग्रंथों की पढ़ाई कर सकें. किसी भी भाषा को किसी एक धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता.
ये स्टोरी दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे निशांत ने ट्रांसलेट की है. सबसे पहले ये डेली मेल में छपी थी.   

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