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धार्मिक जुलूस की अनुमति की प्रक्रिया जान लो, जहांगीरपुरी हिंसा की वजह समझ आ जाएगी

पिछले दिनों देश के कई शहरों में धार्मिक जुलूस के दौरान हिंसा की घटनाएं सामने आईं. पहले 10 अप्रैल को रामनवमी के दिन कई राज्यों में इस तरह की रिपोर्ट्स दर्ज की गईं. इसके बाद हनुमान जयंती के मौके पर भी बवाल हुआ. दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में भी 16 अप्रैल को धार्मिक रैली निकली थी, जिसमें हिंसा भड़की. पुलिस ने इस मामले में 20 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया है. घटना की जांच जारी है. लेकिन अब धार्मिक जुलूस में हो रही हिंसा को लेकर यूपी सरकार सतर्क हो गई है. उसने सोमवार, 18 अप्रैल को धार्मिक रैलियों को लेकर कई आदेश जारी किए हैं.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस अधिकारियों के साथ कानून-व्यवस्था को लेकर बैठक की थी. इसके बाद सीएम ने आदेश दिया कि राज्य में कोई शोभा यात्रा या धार्मिक जुलूस बिना अनुमति के नहीं निकाले जाएंगे. उन्होंने कहा कि अनुमति से पहले आयोजक से शांति कायम रखने के लिए हलफनामा लिया जाए. साथ ही अनुमति सिर्फ उन्हीं धार्मिक जुलूसों को दी जाए जो पारंपरिक हो. आदेश में कहा गया है कि नए आयोजनों को अनावश्यक अनुमति न दी जाए.

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि धार्मिक कार्यक्रम और पूजा-पाठ तय जगहों पर ही हों. उन्होंने अधिकारियों से कहा,

“ये सुनिश्चित करें कि सड़क और ट्रैफिक को बाधित कर कोई धार्मिक आयोजन ना हो. आने वाले दिनों में कई महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व-त्योहार हैं. ईद का त्योहार और अक्षय तृतीया एक ही दिन हो सकते हैं. ऐसे में मौजूदा हालात को देखते हुए पुलिस को अतिरिक्त संवेदनशील रहना होगा. माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले अराजक तत्वों के साथ पूरी कठोरता की जाए.”

 

देश के कई राज्यों में हुई हिंसा और तनावपूर्ण माहौल के बीच योगी सरकार का ये आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है. क्योंकि दिल्ली के जहांगीरपुरी में जिस रैली के दौरान हिंसा हुई, उसे लेकर दिल्ली पुलिस का दावा है कि उस जुलूस की अनुमति नहीं ली गई थी. इस रैली के आयोजकों के खिलाफ केस दर्ज किए गए हैं. इस बीच सवाल ये भी सामने आया है कि इस तरह के धार्मिक जुलूसों की अनुमति किस आधार पर दी जाती है.

कैसे मिलती है अनुमति?

किसी भी धार्मिक जुलूस से पहले स्थानीय थाने में इसकी लिखित अनुमति मांगनी होती है. आयोजक को उस जुलूस के बारे में पूरी जानकारी देनी होती है. रैली जहां से शुरू होगी और जिस प्वाइंट पर खत्म होगी, रैली किन रास्तों से गुजरेगी यानी रूट, ये पूरी जानकारी प्रशासन को देनी होती है. इसके अलावा जुलूस में शामिल होने वाले लोगों और गाड़ियों की संख्या भी बतानी पड़ती है. आयोजकों के आवेदन को जांचने-परखने के बाद ही डिप्टी कमिश्नर या जिलाधिकारी ये तय करते हैं कि जुलूस की अनुमति दी जाए या नहीं.

Jahangirpuri Violence
दिल्ली हिंसा के आरोपियों को रोहिणी कोर्ट ले जाती दिल्ली पुलिस (फोटो: एएनआई)

पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने दी लल्लनटॉप को बताया कि इस तरह के धार्मिक जुलूसों की अनुमति के लिए पुलिस अपनी तरफ से कुछ शर्तें भी लगाती हैं. उन्होंने कहा,

“परमिशन देने पर कई बार शर्तें लगाई जाती हैं कि आप कुछ हथियार नहीं ले जा सकते या कोई खास काम नहीं कर सकते हैं. आयोजकों के साथ प्रशासन की मीटिंग होती है. अगर स्थिति संवेदनशील होती है प्रशासन अनुमति नहीं भी दे सकता है. ये सारा कुछ स्थानीय पुलिस पर निर्भर करता है.”

जहां तक जुलूस निकालने के समय और लोगों की संख्या का सवाल है, तो ये भी पूरी तरह पुलिस के विवेक पर है. ये स्थानीय पुलिस पर ही है कि वो आयोजक की मांग पर अपना मूल्यांकन किस तरीके से करती है और कैसे प्रतिबंध लगाती है. आयोजकों को जुलूस या शोभा यात्रा के दौरान प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को मानना होता है.

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने हमें बताया कि हर त्योहार से पहले पुलिस विभाग की ये जिम्मेदारी होती है कि वो राज्य और देश के इंटेलीजेंस की समीक्षा करे. धार्मिक जुलूस के नियमों को लेकर उन्होंने बताया,

“आयोजकों को थाने में आधार कार्ड और अपनी तस्वीर जमा करनी पड़ती है. लेकिन हथियार लहराने की अनुमति नहीं होती है. सरदारों (सिख) को चाकू या कृपाण लेकर चलने की अनुमति है, वो भी 12 इंच से कम हो. जो लाउडस्पीकर आप लगाएंगे, उसकी आवाज 50 डेसीबल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. किसी तरह के भड़काऊ भाषण और नारेबाजी नहीं लगा सकते हैं. पुलिस को पूरे जुलूस की वीडियोग्राफी करनी होती है.”

Jahangirpuri Violence
जहांगीरपुरी में हिंसा के बाद तैनात पुलिस (फोटो- पीटीआई)

‘दिल्ली में हिंसा के लिए पुलिस भी जिम्मेदार’

पूर्व डीजीपी ने ये भी कहा कि धार्मिक जुलूस के लिए पूरे रूट में महिला और पुरुष पुलिसकर्मी वर्दी के साथ और सादे कपड़े में भी तैनात किए जाने का नियम है. ऐसे जुलूसों में दूरबीन वगैरह से भी निगरानी करनी होती है. उन्होंने कहा,

“दिल्ली में जो हुआ, उसमें पुलिस की भी गलती है. जब इजाजत ही नहीं दी गई थी, तो जुलूस कैसे निकल गया? इसके लिए जिन्होंने जुलूस निकाला और जिन्होंने निकलने दिया, दोनों पर कार्रवाई होगी. अगर कोई धार्मिक जुलूस है तो वो अपने धार्मिक स्थान के आसपास ही क्यों नहीं निकले? अभी जो हो रहा है उसे कहते हैं बेमौके की शहनाई. अगर कहीं पर कोई सहरी और इफ्तार कर रहा है और आप वहां रामलीला का जुलूस लेकर जाते हैं तो ये साफ है कि आपकी नियत में खोट है.”

वहीं यशोवर्धन आजाद ने दिल्ली हिंसा को लेकर कहा कि पिछले 40 साल से ऐसा होता आ रहा है. उन्होंने कहा,

“कोई धार्मिक जुलूस मस्जिद के सामने जाता है. तेज आवाज होती है. फिर पथराव होता है. जब अनुमति नहीं मिलने के बावजूद यात्रा निकलती है तो ऐसे संवेदनशील इलाके में पुलिस की छोटी टुकड़ी आप क्यों भेजते हैं.”

पूर्व आईपीएस ने साफ कहा कि पुलिस इस हिंसा को कंट्रोल करने में असफल रही. उसे पहले से कार्रवाई करनी चाहिए थी. बता दें कि 16 अप्रैल को हुई हिंसा में 9 लोग घायल हुए थे, जिनमें से 8 पीड़ित तो खुद पुलिसकर्मी बताए गए हैं. बवाल के दौरान जमकर तोड़फोड़ की गई और कुछ गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया था. घटना की जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच कर रही है. मामले में पुलिस ने अब तक 25 लोगों को गिरफ्तार किया है.


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