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ढाई मिनट में पचास से ज्यादा गालियां देने वाले विधायक को सपा ने फिर दिया टिकट

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शुक्रवार को समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की चार महत्त्वपूर्ण लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. ये सीटें गाज़ियाबाद, गोंडा, बाराबंकी (सुरक्षित), कैराना और संभल की हैं.

पार्टी ने गाज़ियाबाद से सुरेन्द्र कुमार उर्फ़ मुन्नी शर्मा, गोंडा से विनोद कुमार उर्फ़ पंडित सिंह, बाराबंकी (सुरक्षित) से राम सागर रावत, कैराना से तबस्सुम हसन और संभल लोकसभा से शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट दिया है. इस टिकट बंटवारे के साथ यह भी तय माना जा रहा है कि यूपी में बीते लोकसभा उपचुनावों की तरह ही महागठबंधन को पूरी तरह से भुनाने की कोशिश की जा रही है.

संभल की सीट
इन चार सीटों में अभी तक की सबसे रोचक सीट संभल लोकसभा की सीट मानी जा रही है, जहां से उम्रदराज़ नेता शफीकुर्रहमान बर्क को समाजवादी पार्टी ने अपने टिकट पर उतारा है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का संभल इलाका एक लम्बे समय से मुस्लिमों के बर्क समुदाय का इलाका माना जाता रहा है. संभल की विधानसभा सीट पर शफीकुर्रहमान बर्क 1974, 1977, 1985 और 1989 में विधायक चुने गए थे. 1990-91 तक वह उत्तर प्रदेश कैबिनेट में मंत्री भी थे. उसके बाद बर्क 1996, 1999, 2004 और 2009 में संभल लोकसभा सीट से सांसद चुने गये. 2014 के लोकसभा चुनावों में बर्क भाजपा के सत्यपाल सिंह से महज़ पांच हज़ार वोटों से हार गए थे.

बसपा से लम्बे समय तक ताल्लुक रखने वाले बर्क को सपा ने टिकट देकर 2017 की गलती दोहराने से बचने की कोशिश की है. 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की मुस्लिमबहुल इलाकों में जीत की वजह यह थी कि इन इलाकों में मुस्लिम वोट सपा और बसपा के बीच बंट गए, जिससे भाजपा को फायदा हुआ था.

बर्क के नाम की घोषणा होते ही सोशल मीडिया पर यह चर्चा शुरू हो गयी कि इस सीट पर मुलायम सिंह यादव ने अपनी बहू अपर्णा यादव के नाम के लिए रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव से बातचीत की थी, लेकिन अखिलेश यादव ने इस मांग को दरकिनार करते हुए बर्क को टिकट देने का ऐलान किया.

हालांकि सपा से जुड़े सूत्र इस बात का खंडन करते हैं. पार्टी से जुड़े एक नेता हमसे बताते हैं –

“अपर्णा यादव खुद इस सीट से चुनाव लड़ना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें फीड कीं. बहुत पहले से तय था कि अगर सपा और बसपा का गठबंधन होता है तो यह सीट बर्क को दी जानी है.”

बहुत पहले ही संभल के बर्कों ने यह ऐलान कर दिया था कि अगर मुलायम सिंह यादव के परिवार से कोई भी उम्मीदवार खड़ा होता है तो सभी बर्क एक साथ भाजपा के समर्थन में चले जाएंगे. संभव है कि अखिलेश यादव इस समीकरण को समझ गए होंगे, तभी उम्रदराज-कद्दावर नेता शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट देने का फैसला उन्होंने लिया है.

बर्क की उम्मीदवारी पर राजनीतिक विश्लेषक सवाल खड़े करते हैं कि सेकुलर राजनीति का दंभ भरने वाली सपा और बसपा जैसी पार्टियां भी बर्क के बहकावे में आ गयी हैं. यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान बर्क ने ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तिहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अपने पोते जियाउर्रहमान बर्क के समर्थन में रैली करते हुए कहा था –

“मेरी कौम के लोगो, आप इतने मजबूत हो जाएं कि कोई आपकी ओर आंख उठाकर न देखे. मैं अपनी कौम की वफादारी करता आया हूं. मुसलमानों का मकसद जुल्म के खिलाफ लड़ना है.”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद बताते हैं –

“बेशक संभल एक ज़रूरी सीट है. लेकिन यहां ये भी देखना होगा कि इतने लम्बे समय तक सांसद-विधायक रहे बर्क ने वहां क्या काम किया? सपा ने किस आधार पर उन्हें टिकट दिया? क्या बर्क के पास कोई उत्तराधिकारी है जो रचनात्मक रूप से काम करे?”

साल 2015 में संभल का इलाका सुर्ख़ियों में आया था, जब साल के दिसंबर महीने में यहां के दीपासराय मोहल्ले के मोहम्मद आसिफ को आतंकी संगठन अल-कायदा का भारतीय उपमहाद्वीप का प्रमुख बताकर गिरफ्तार किया गया था. इस गिरफ्तारी के बहुत दिनों बाद तक संभल में कर्फ्यू और सन्नाटे का माहौल था. शफीकुर्रहमान बर्क ने उस समय नरेंद्र मोदी पर मुस्लिमों को टार्गेट करने का खुलेआम आरोप लगाया था.

कैराना
संभल के बाद इस सूची की सबसे रोचक सीट कैराना की है. साल 2016 में यहां के सांसद हुकुम सिंह ने यह कहकर हल्ला मचाया था कि कैराना से मुस्लिमों के आतंक के चलते हिन्दुओं का पलायन हो रहा है. मीडिया की पड़ताल में यह सच साबित नहीं हुआ, लेकिन इसका असर कुछ ही महीनों बाद हुए विधानसभा चुनाव पर ज़रूर पड़ा.

हुकुम सिंह बीमार हुए और उनकी मृत्यु हुई. इसके बाद पिछले साल इस सीट पर फिर से लोकसभा उपचुनाव हुए. राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर तबस्सुम हसन ने इस सीट पर हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को 44 हज़ार वोटों से हराया. इस सीट पर यह जीत दर्ज करने लिए भी सपा-बसपा को जाटों के बीच मशहूर आरएलडी से समझौता करना पड़ा था. इस समझौते की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में जाटों और मुस्लिमों के बीच की खाई थोड़ी पाटी जा सकी.

इसके पहले 2009 में भी तबस्सुम हसन ने बसपा के टिकट पर इस सीट पर जीत दर्ज की थी. सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड की सदस्य रहने के साथ-साथ तबस्सुम उत्तर प्रदेश की कई कमेटियों में सदस्य रह चुकी हैं.

बाराबंकी-गोंडा
इसके अलावा बाराबंकी की सुरक्षित सीट से रामसागर रावत को उतारकर अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह यादव के समकालीन नेता पर भरोसा किया है. बसपा के कार्यकाल में मुख्यमंत्री मायावती का पुतला फूंककर रावत ने खासी सुर्खियां बंटोरी थीं. बाद में दबिश दिए जाने पर उन्हें अपने समर्थकों के साथ आत्मसमर्पण करना पड़ा था. रावत ने 1989 व 1991 में जनता दल के टिकट पर बाराबंकी की लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की थी. इसके बाद वह 1996 और 1999 में सपा के टिकट पर सांसद चुने गए.

इस लिस्ट में गोंडा के प्रत्याशी विजय कुमार उर्फ़ पंडित सिंह का नाम सबसे कुख्यात है. पंडित सिंह विधायक रहे हैं और उन पर खुलेआम दबंगई के आरोप लगते रहे हैं. 2015 में एक लड़के को फोन पर ढाई मिनट में पचास बार से भी ज्यादा गालियां दी थीं और जान से मारने की धमकी भी दी थी. इसके अलावा पंडित सिंह गोंडा के जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्साधिकारी को भी “अंजाम भुगतने” की धमकियां दे चुके हैं.

सपा और बसपा ने गठबंधन के बाद प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 37-37 सीटें एक दूसरे के साथ बांट ली थीं. सपा की सूची जारी होने के साथ ही यह साफ़ नज़र आ रहा है कि सीटों के बंटवारे से नुकसान न झेलने को राजी दोनों ही पार्टियों के नेता एक-दूसरी पार्टी में आवाजाही करेंगे.

लल्लनटॉप वीडियो : क्या सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच यूपी में गठबंधन अब नहीं होगा?

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