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पहले ये आदमी बना था मायावती का उत्तराधिकारी, अब दो नए नाम सामने आए हैं

5 नवंबर, 2014 को मायावती ने राज्यसभा के लिए अपने दो कैंडिडेट्स का नाम घोषित किया था. राजाराम और वीर सिंह. आजमगढ़ के रहने वाले राजाराम को तब मायावती के राजनीतिक वारिस के तौर पर देखा गया. माना गया कि वही आगे चलकर माया की गद्दी संभालेंगे. पोस्ट ग्रेजुएट राजाराम 2008 के बाद दूसरी बार राज्यसभा सांसद बनने से पहले पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे. उन्हें एमपी, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान का पार्टी प्रभारी भी बनाया. लेकिन धीरे-धीरे उनकी पूछ और दावा धुंधलाता गया. अब हमारे सामने एक नया नाम है. माया के भाई आनंद कुमार का. आनंद के साथ ही मायावती के भतीजे आकाश का नाम पार्टी आगे बढ़ा रही है.

मायावती पहली बार मंच से अपने भाई आनंद और भतीजे आकाश को आम लोगों के बीच लाई हैं.
मायावती पहली बार मंच से अपने भाई आनंद और भतीजे आकाश को आम लोगों के बीच लाई हैं.

लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव में भी करारी हार का सामना करने वाली मायावती ने 18 सितंबर को मेरठ में एक रैली की. इस रैली में सबकी निगाहें दो ही शख्स पर टिकी हुई थीं. एक थे मायावती के भाई आनंद कुमार और दूसरे थे मायावती के भतीजे आकाश. 18 सितंबर का दिन पहला ऐसा मौका था, जब दोनों को सार्वजनिक तौर पर मंच पर सामने लाया गया और लोगों से उनका परिचय करवाया गया. बताया जा रहा है कि इससे पहले भी आनंद और आकाश को लखनऊ और दिल्ली में पार्टी मीटिंग्स में देखा गया है.

बीएसपी नेता राजाराम
बीएसपी नेता राजाराम

मायावती 1977 में कांशीराम के कहने पर राजनीति में आई थीं. 1995 में यूपी की मुख्यमंत्री बनीं और 15 दिसंबर, 2001 को कांशीराम ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था. अब अंबेडकर जयंती के मौके पर बाबा साहब को श्रद्धांजलि देते हुए मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को बीएसपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का एलान किया है. यह इशारा है कि शायद माया अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुन चुकी हैं. उन्होंने कहा,

‘मैंने अपने भाई आनंद कुमार को इस शर्त पर बीएसपी में लेने का फैसला किया है कि वह कभी MLC, विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनेगा. इसी वजह से मैं आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना रही हूं.’

यूपी के हालिया विधानसभा चुनाव में महज 19 सीटें जीतने वाली बीएसपी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. वोट प्रतिशत के मामले में भले वह सूबे की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही हो, लेकिन बीजेपी को मिले प्रचंड बहुमत के बाद मायावती के सामने पार्टी को फिर से जिलाने की चुनौती है. ऐसे में बहन की पार्टी से हमेशा दूर-दूर रहे आनंद की नई भूमिका चौंकाने वाली है.

कौन हैं आनंद कुमार

anand-kumar

आनंद अपनी बहन माया से छोटे हैं. एक समय वह नोएडा में क्लर्क हुआ करते थे. मायावती जब यूपी की पॉलिटिक्स में चमकीं, तो आनंद की किस्मत भी खुल गई. वह लगातार हाथ-पैर मारते रहे और खूब पैसे बनाए. माया के दाहिने हाथ कहे जाने वाले सतीश मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा ने भी दिल खोलकर आनंद का साथ दिया. आनंद के बड़े बेटे आकाश भी उनके साथ मंच पर दिखने लगे हैं. आकाश लंदन की एक यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट में पोस्टग्रेजुएट हैं और पार्टी में नई जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं.

नेताओं, उनके रिश्तेदारों और बिल्डर्स के साथ आनंद का पुराना मेल-जोल है. ऐसे ही दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने कंपनियां खोलीं. माया जब सूबे की मुख्यमंत्री थीं, तब इनकी कंपनियां कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रही थीं. 2013 में इंडियन एक्सप्रेस ने इनके साम्राज्य पर बड़ी रिपोर्ट छापी थी. इन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाते समय माया ने यह भी कहा,

‘मुझे और मेरे रिश्तेदारों को परेशान किया जा रहा है, लेकिन लोकतंत्र में जिंदा रहना जरूरी है.’

2007 के बाद से आनंद

2007 में माया के सीएम बनने के बाद आनंद ने 49 कंपनियां खोलीं. फिर रियल एस्टेट के धुरंधरों जेपी, यूनिटेक और DLF के साथ 2012 तक 760 करोड़ का बिजनेस किया. रवायत के मुताबिक इनमें से ज्यादातर कंपनियां शेयर के नाम पर पैसे बटोरने के लिए बनाई गई थीं, जो फर्जी थीं. इन्हें अडवांस पेमेंट और इन्वेस्टमेंट के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

होटल लाइब्रेरी क्लब प्राइवेट लिमिटेड

2007 से पहले भी आनंद की एक कंपनी थी, जिसका नाम होटल लाइब्रेरी क्लब प्राइवेट लिमिटेड था. इसका हेडक्वॉर्टर मसूरी में था. मसूरी में इसका खुद का एक होटल ‘शिल्टन’ भी था. आनंद इस कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हुआ करते थे. वह खुद को 1.2 करोड़ सालाना की सैलरी देते थे. कंपनी के डायरेक्टर दीपक बंसल थे. ये कंपनी खुद में एक नदी थी, जिससे कई धाराएं निकली हुई थीं.

मार्च 2012 तक इस कंपनी का बैंक बैलेंस 320 करोड़ रुपए था. इसकी तीन और फर्म थीं, जिनमें से एक का नाम रेवोल्यूशनरी रिएल्टर्स था. नाम के मुताबिक इस कंपनी ने क्रांति करते हुए 2011-12 में 60 करोड़ रुपए कमाए और इस क्रांति का जरिया था सट्टेबाजी. रेवोल्यूशनरी रिएल्टर्स से निकली एक ब्रांच थी तमन्ना डेवलपर्स. मार्च 2012 तक इसका डेवलपमेंट 160 करोड़ रुपए का हो चुका था. होटल लाइब्रेरी के पास 31 मार्च 2008 तक सिर्फ 43 करोड़ रुपए थे.

कर्नाउस्टी मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड भी तो है

एक कार्यक्रम में बहन माया के साथ आनंद
एक कार्यक्रम में बहन माया के साथ आनंद

2007-08 में आनंद के बिजनेस पार्टनर उनकी ही एक और फर्म से जुड़े, जो दूसरे बिजनेस में थी. इस ग्रुप का नाम है कर्नाउस्टी मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड (Carnoustie Management Pvt Ltd). इसका रजिस्ट्रेश दिल्ली के जनकपुरी में सितंबर 2006 में हुआ था. CPML रियल एस्टेट के अलावा स्पोर्ट मैनेजमेंट, सिक्यॉरिटी और हॉस्पिटैलिटी के बिजनेस में भी है. मार्च 2012 तक इसका बिजनेस 620 करोड़ रुपए हो चुका था. 2007 के बाद से इसकी ब्रांच बढ़कर 14 हो गई थीं.

2010 से 2012 के बीच DLF ने 6 करोड़ और यूनिटेक ने 335 करोड़ रुपए आनंद की CPML में लगाए. तब इन दोनों कंपनियों ने कहा था कि ये सामान्य ट्रांजैक्शन हैं. CMPL ने दीपक बंसल के ग्रुप SDS की रियल एस्टेट फर्म SDS Developers को भी खरीदा था. बाद में आनंद ने दीपक को होटल लाइब्रेरी क्लब और अपनी एक फर्म DKB इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड का डायरेक्टर बनाया.

दीपक बंसल के SDS ग्रुप की एक फर्म ने इसी दौरान नोएडा और ग्रेटर नोएडा में 2,500 अपार्टमेंट बनवाए थे. आनंद और कई दूसरे रियल स्टेट के लोगों ने CMPL में इन्वेस्ट किया. बंसल इस इन्वेस्टमेंट में लिंक का काम कर रहे थे. CMPL और आनंद के बीच एक और लिंक हैं शुभेंदु तिवारी. शुरुआत में यह आनंद की ही फर्म रेवोल्यूशनरी रिएल्टर्स और शिवानंद रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर थे.

CMPL की 2011-12 की रिपोर्ट आनंद से जुड़े प्रशांत कुमार ने तैयार की थी. इस रिपोर्ट में UK की एक फर्म Ibonshourne Limited को भी CMPL की असोसिएट फर्म बताया गया. Ibonshourne का रजिस्ट्रेशन लंदन में है. इसके बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में एक हैं समीर गौर. समीर ने जेपी इन्फ्राटेक लिमिटेड के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर रहते हुए यमुना एक्सप्रेस-वे बनवाया है. इसके अलावा उनके नाम हाई-वे के कई प्रोजेक्ट दर्ज हैं.

राजनीति और पार्टी से रही है दूरी

मायावती ने आनंद को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष जरूर बनाया है, लेकिन 18 सितंबर से पहले वह राजनीति से हमेशा दूर-दूर ही रहे हैं. न तो बीएसपी ने कभी उन्हें अपने मंच पर बुलाया और न ही आनंद ने पार्टी, बहन या राजनीति को लेकर कभी कोई बयान दिया. इंटरनेट पर इनकी तस्वीरें भी बेहद कम हैं, क्योंकि इनकी सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी कम ही रहती है. भाई को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाना माया की किस राजनीति का हिस्सा है, यह जानना रोचक होगा.

सतीश मिश्रा के बेटे कपिल से आनंद का कनेक्शन

मायावती के साथ सतीश मिश्रा
मायावती के साथ सतीश मिश्रा

आनंद की एक और कंपनी है दिया रिएल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड. इसमें सतीश चंद्र मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा आनंद के पार्टनर थे. 2012 तक दिया रिएल्टर्स की लगभग 79 करोड़ की संपत्ति थी. इसके अलावा सतीश मिश्रा के बेटे की दो फर्म संकल्प अडवाइजरी सर्विसेज और यमुनोत्री इंफ्रास्ट्रक्चर में भी आनंद की फर्म का पैसा लगा हुआ है. कपिल मिश्रा की संकल्प फर्म दिल्ली के बंगाली मार्केट में है. इसके सामने ही एक होटल है. Check Inn. इसके मालिक भी मिश्रा ही हैं.

आनंद की एक और फर्म

आनंद की एक और फर्म है एक्सपीरियंस प्रॉजेक्ट. इसने आनंद की ही फर्म दिया रियल्टर्स में 1.5 करोड़ रुपए लगा रखे हैं. इसके अलावा उनकी दूसरी फर्म विंडसर कंप्यूटर्स प्राइवेट लिमिटेड ने भी दिया रियल्टर्स के 8,62,500 शेयर खरीद रखे हैं.

कंपनियों, फर्मों और कमाई के ये आंकड़े सामने आने के बाद मायावती ने कहा था कि उनके भाई का इस सबसे कोई लेना-देना नहीं है और सारे आरोप गलत हैं. वहीं सतीश मिश्रा ने बयान दिया था कि कानूनी तौर पर उनके बेटे को बिजनेस करने का पूरा अधिकार है. आनंद की कंपनी CMPL की तरफ से सफाई दी गई कि बीएसपी सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की.

इन सबके अलावा खुद की बनाई दूसरी कंपनियों में आनंद कुमार का कितना शेयर है, ये एक ‘बड़ा झोल’ है, जो अब तक सामने नहीं आया है.

ED की निगाह में चढ़े रहे हैं आनंद

anand

पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी के फैसले के बाद जब बीएसपी के खाते में अचानक 104 करोड़ रुपए जमा हुए, तो ED (प्रवर्तन निदेशालय) हरकत में आ गया. ED ने जब कागजों और खातों की पड़ताल की, तो पता चला कि यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के जिस खाते में 1.43 करोड़ रुपए जमा हुए हैं, वह माया के भाई आनंद का है. बाकी 102 करोड़ बीएसपी के अकाउंट में हजार और पांच सौ के पुराने नोटों के जरिए जमा कराए गए थे.

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने भेजा था नोटिस

बेनामी संपत्ति के मामले में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने आनंद कुमार और उनसे जुड़े कई बिल्डर्स को नोटिस भेजा था. आनंद का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद पेचीदा रहा है. जमीनों के मामले में यह बेहद घाघ हैं. इसी के चलते अप्रैल 2015 में वित्त मंत्रालय ने इनका गला पकड़ा था. तब Financial Investigation Unit (FIU) ने इनके उल्टे-सीधे ट्रांजैक्शंस की एक रिपोर्ट तैयार की थी और वित्त मंत्रालय ने ED को 2,176 करोड़ रुपए के इस ट्रांजैक्शन की जांच का आदेश दिया था.


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