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सरकार की खरीदी हुई गायों को गो-गुंडों ने जलाने की कोशिश की!

भीड़तंत्र का एक और चेहरा राजस्थान के बाड़मेर में 11 जून को सामने आया, जहां करीब 50 गो-गुंडों ने ब्रीडिंग के लिए गायें ले जा रहे तमिलनाडु सरकार के अधिकारियों पर हमला कर दिया. तमिलनाडु के पशुपालन विभाग के अधिकारी पांच ट्रकों में गायों को भरकर नेशनल हाइवे 15 से जा रहे थे, तभी गोरक्षा के नाम पर करीब 50 लोगों ने उन्हें घेरकर हमला कर दिया.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तमिलनाडु के अधिकारी जैसलमेर से गायें खरीदकर आ रहे थे और उनका मकसद ब्रीडिंग कराना था. रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रकों के ड्राइवरों के पास NOC, सभी जरूरी कागज और ऊपरी अधिकारियों की इजाजत थी. लेकिन गुंडों को इससे क्या मतलब! उस झुंड ने अधिकारियों को पीटा और उनके ट्रकों में आग लगा दी, जिसे बाद में बुझा दिया गया. पुलिस के पहुंचने के बाद अधिकारी, ड्राइवर और क्लीनर्स बच सके. हमले से बचाने के बाद उन्हें थाने ले जाया गया और गायों को स्थानीय गोशाला.

बाड़मेर में जिन ट्रकों पर हमला हुआ, उनमें से एक की तस्वीर
बाड़मेर में जिन ट्रकों पर हमला हुआ, उनमें से एक की तस्वीर

हमला करने वालों में आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया है. मामले को गंभीरता से न लेने की वजह से सात पुलिसकर्मियों पर ऐक्शन लेते हुए उन्हें पुलिस लाइन भेज दिया गया. इनमें से एक इंस्पेक्टर है. गोरक्षा के नाम पर हमले के अधिकांश मामलों में हमलावर भगवा झंडों और गमछों के साथ दिखते हैं. उनका नैतिक समर्थन बीजेपी या इसके दूसरे संगठनों की तरफ झुका होता है. लेकिन इस बार जो हुआ है, उसे अंग्रेजी में ‘कर्मा इज अ बिच’ कहते हैं.

तमिलनाडु के अधिकारी गायों को ब्रीडिंग के लिए ले जा रहे थे. गायों की ब्रीडिंग ने मोदी सरकार की ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ लॉन्च होने के बाद जोर पकड़ा है, जिसके लिए बीजेपी सरकार ने 500 करोड़ का बजट जारी किया था. ये देसी गायों को पालने और उनकी ब्रीडिंग कराने के लिए है. केंद्र की इस योजना के बाद हरियाणा की मनोहरलाल खट्टर सरकार ने भी गायों की ब्रीडिंग कराने पर सरकारी फायदे देने की बात कही थी.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन का एक पोस्टर
राष्ट्रीय गोकुल मिशन का एक पोस्टर

सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, बेहद उग्र समर्थकों के बूते दंभ भरने वाली सरकार पर अब यही समर्थक भारी पड़ रहे हैं. भीड़ का इकट्ठा होकर, उन्मादी होकर किसी पर भी हमला कर देना हमारे लिए नया नहीं रह गया. पिछले कुछ सालों में ये घटनाएं इतनी बढ़ी हैं कि उंगलियों पर गिनाने लायक तो नहीं बची हैं. फिर चाहे वो गाय का मामला हो, किसी को कुछ समझाने-बताने का मसला हो या प्रदर्शन करते-करते अचानक हिंसक होना हो. गोरक्षा के नाम पर झुंड में किसी को शिकार बनाना आसान हो जाता है.

बीते अप्रैल राजस्थान के अलवर में गो-रक्षकों ने तस्करी के संदेह में कुछ लोगों पर इतनी बेरहमी से हमला किया कि उनमें से एक पहलू खान की मौत हो गई. पिछले साल जुलाई में गुजरात के उना में मरी हुई गाय की खाल निकालने वाले दलितों को बेरहमी से पीटा गया था. उससे पहले दादरी में हुए अखलाक हत्याकांड के बारे में सभी जानते हैं, जिसमें बीफ खाने के शक में भीड़ ने आधी रात को एक परिवार पर हमला कर दिया और अधेड़ अखलाक को पीट-पीटकर मार डाला.

ये घटनाएं गोरक्षा का हवाला देने वाले गोगुंडों की नीयत बताती हैं. इन घटनाओं को देखकर समझ ही नहीं आता कि आखिर क्या है, जो इंसान को हैवानों के झुंड में तब्दील कर देता है.

ऊना में दलितों को पीटे जाने की एक तस्वीर

हमें जरा भी अंदाजा नहीं है कि हम कितनी तेजी से मानसिक तौर पर बीमार होते जा रहे हैं. बस कुछ देखते-सुनते ही उस पर टूट पड़ना चाहते हैं.


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