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इस बच्ची ने 'क्राइम पैट्रोल' सीरियल देखकर जो किया, वो कोई सोच भी नहीं सकता

टीवी पर एक क्राइम शो आ रहा था. बच्चे उसके एक सीन की नकल करने लगे. नकल-नकल में एक बच्ची की जान चली गई. बच्ची के मां-बाप को पड़ोसी पर शक था. अगर ठीक ने तफ्तीश न हुई होती, तो शायद वो ही बेगुनाह फंस जाता. जबकि असल बात कुछ और थी.

ये खबर चेतावनी है. उनके लिए है, जो अपनी जान छुड़ाने के लिए बच्चों को टीवी के हवाले छोड़ देते हैं.

उत्तर प्रदेश का हापुड़ जिला. यहां एक मुहल्ला है. नबी करीम. 27 मार्च, 2018 की रात एक बच्ची की लाश मिली. उसका नाम सिमरन था. तीसरे दर्जे में पढ़ती थी. कुल जमा 10 साल की थी. पहले शक गया पड़ोसी अबरार पर. बच्ची के मां-बाप रो रोकर लगातार उसपर ही उंगली उठा रहे थे. बच्ची की लाश को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया. इससे पहले कि रिपोर्ट आती, सच पता चल गया. टीवी सीरियल के चक्कर में जान गई थी उसकी.

क्राइम पैट्रोल की नकल करने में जान चली गई
अड़ोस-पड़ोस में रहने वाले कुछ बच्चों ने राज खोला. हुआ ये था कि सारे बच्चे मिलकर टीवी देख रहे थे. टीवी पर क्राइम पैट्रोल आ रहा था. नाम से जाहिर है, ये एक क्राइम शो है. हर बार एक केस लेकर आते हैं. बताते हैं कि ऐसे अपराध हुआ. ऐसे पुलिस ने क्रिमिनल्स को पकड़ा. तो उस दिन क्राइम पैट्रोल में किसी ने खुदकुशी की. कोई खास ट्रिक लगाकर. बच्चों ने देखा. उनको नया खेल मिल गया. सारे बच्चे फांसी-फांसी का खेल खेलने लगे. इसी खेल में सिमरन ने गले में दुपट्टा बांधा और कमरे में लगे हुक से लटक गई. नाटक सच हो गया. उसका गला चोक हो गया. ये देखकर बाकी बच्चे घबरा गए. उन्होंने सिमरन के गले से बंधा दुपट्टा कैंची से काटा. और वहां से भाग गए. सिमरन मर चुकी थी.

गलती क्राइम पट्रोल की नहीं है. उसका तो अपना एक फॉर्मेट है, अपना एक दर्शक वर्ग है. छोटा बच्चा उसे न देखे, इसका ख्याल तो उस बच्चे के आसपास के बड़ों को रखना होगा.
गलती क्राइम पैट्रोल की नहीं है. उसका तो अपना एक फॉर्मेट है, अपना एक दर्शक वर्ग है. छोटा बच्चा उसे न देखे, इसका ख्याल तो उस बच्चे के आसपास के बड़ों को रखना होगा.

शाबाशी पुलिस की है जो बेगुनाह को बचा लिया
बाद में घरवालों ने सिमरन की लाश देखी. उन्होंने पुलिस के सामने पड़ोसी अबरार पर इल्जाम लगाया. पुलिस ने अबरार को हिरासत में ले लिया. सिमरन के साथ के बच्चों को सच मालूम था. लेकिन वो इतने डरे हुए थे कि चुप रहे. शाबाशी पुलिस को मिलनी चाहिए. उनकी सही तफ्तीश से अबरार रिहा हो सका.

टीवी पर नाम की ही चीजें बच्चों के देखने लायक आती हैं
मां-बाप को लगता है कि बच्चे टीवी देखेंगे, तो शरारत नहीं करेंगे. उधम नहीं मचाएंगे. उनको महसूस ही नहीं होता कि टीवी बस कोई चीज नहीं है. एक पूरी दुनिया है. जाने क्या-क्या आता है. दोष क्राइम पैट्रोल का नहीं है. ऐसे प्रोग्राम्स के एक अलग दर्शक हैं. ये बच्चों के लिए थोड़े न होता है. कंटेंट पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए. बच्चे क्या देख सकते हैं और उन्हें क्या देखना चाहिए, इसका फैसला खुद बच्चे तो कर नहीं सकते. किसी वयस्क को, किसी समझदार को तो इसपर नजर रखनी होगी. हमेशा नजर न भी रख सकें, तो टेक्नॉलजी की मदद ले सकते हैं. पैरेंटल कंट्रोल फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं. उन चैनल्स को लॉक कर सकते हैं, जो बच्चों के मुफीद नहीं. मुझे याद है. मैं छोटी थी, तब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे देखी थी. उसमें आखिरी के सीन्स में शाहरुख पिटता है. मैं रोने लगी थी. मुझे तब लगता था कि फिल्मों में या टीवी में जो होता है, सच होता है. समझ भी तो उम्र के हिसाब से होती है.


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