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दिमाग का वो लोचा क्या है जो इंसान को बिना सहारे रस्सी पर चलाता है, पहाड़ चढ़वा देता है?

कई रिसर्च बताती हैं कि लोग कुछ न करने के बजाय दिमागी तौर पर मुश्किल काम करना पसंद करते हैं. अलग-अलग स्टडीज के सहारे हमने इसी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की है.

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dopamine rush
पहाड़ों में लटकने वाले ऐसे टेंट को Portaledge कहते हैं. (Image: X/mammouthesse)
8 जुलाई 2024 (Updated: 16 जुलाई 2024, 14:17 IST)
Updated: 16 जुलाई 2024 14:17 IST
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ग्रीक दंत कथाओं में एक राजा का जिक्र आता है, सिसिफस (Sisyphus). उन्हें एक अनोखी सजा मिली थी. एक पत्थर को पहाड़ के शिखर तक पहुंचाने की सजा. सिसिफस जैसे ही पत्थर लेकर चोटी तक जाते, पत्थर फिर से वापस नीचे आ जाता. क्योंकि सिसिफस को ये सजा अनंत काल के लिए मिली थी. जाहिर सी बात है, राजा को इस काम में कोई मजा तो नहीं मिलता होगा. लेकिन कुछ लोगों को मुश्किल काम करने में खूब मजा मिलता है. वो भी बिना किसी सजा के. चाहे ऊंची पहाड़ी चढ़ना हो या फिर 26 मील यानी करीब 42 किलोमीटर का मैराथन दौड़ना हो. इन कामों से भले कुछ हासिल न हो, फिर भी लोग करते हैं. लेकिन ऐसा क्यों है?

कुछ साल पहले Netflix के चीफ एग्जेक्टिव, रीड हेस्टिंग ने दिलचस्प बात कही थी. कहा था कि Netflix का सबसे बड़ा कॉम्पिटिशन इंसानों की नींद से है. उनके कहने का मतलब था कि लोग जितनी देर इस प्लेटफॉर्म पर शो देखेंगे, कंपनी को फायदा होगा. क्योंकि कई लोग एक सीरीज खत्म करने के लिए रात भर जग जाते हैं. 

फोन पर वीडियो और रील देखने वाले दीवानों की तो कोई कमी ही नहीं है. बार-बार सोशल मीडिया चलाने का मन भी बहुतों का करता है. लत सी लग जाती है. लेकिन चाहे बिस्तर पर पड़े फोन चलाना हो या फिर खड़ी पहाड़ी चढ़ना. इन सब के पीछे है एक हार्मोन, जिसका नाम है डोपामाइन (Dopamine). दरअसल, डोपामाइन दिमाग में निकलने वाला एक केमिकल है. ये हमारे दिमाग के ‘रिवार्ड सिस्टम’ का हिस्सा है. कहें तो सेक्स, शॉपिंग या फिर कुछ अच्छा खाकर, जो आनंद का अनुभव होता है, वो इसी की वजह से होता है. इसे ‘डोपामाइन रश’ कहते हैं. यानी कुछ इनाम मिलने वाली फीलिंग, ये हमें देता है.

mount climbing
खड़ी पहाड़ी में टेंट लगाकर रुका कपल (Image: X)

लोगों को फोन चलाने में तो मजा आता ही है. इसमें सुविधा है, आराम है. वहीं, दूसरी तरफ कुछ लोग जानबूझकर मुश्किल काम करना भी चुनते हैं.

इसे एक फेमस फर्नीचर कंपनी के उदाहरण से समझते हैं. Ikea, जो स्वीडन की एक कंपनी है. इसके सामान के साथ एक खास बात है. इनका फर्नीचर खरीदकर लोग खुद से घर में बनाते हैं. माने लोगों को नट-बोल्ट और लकड़ी दी जाती है. ना कि बना-बनाया फर्नीचर. लोग मर्जी से इसे खरीदते हैं. बजाय बने बनाए फर्नीचर के, मुश्किल उठा के उसे खुद से घर पर बनाते भी हैं. जर्नल ऑफ कंज्यूमर साइकोलॉजी में इस बारे में एक रिसर्च भी छपी. इसे Ikea इफेक्ट कहा गया. इसमें बताया गया कि मेहनत से की गई किसी चीज की कीमत लोग ज्यादा आंकते हैं.

माने एक तरफ हमें आराम वाली चीजों में मजा आता है. तो वहीं हम मेहनत करके की गई चीजों में भी खूब लुत्फ लेते हैं. टोरेंटो यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजिस्ट माइकल इनलिच इसे ‘एफर्ट पैराडॉक्स’ कहते हैं. माने कोई ऐसी बात जो कॉमन सेंस के हिसाब से तो ठीक लगती है, लेकिन उसका ठीक उल्टा भी सही होता है. बकौल, इनलिच ये दोनों चीजें एक साथ देखने मिलती हैं. हम आलस और आराम पसंद हैं. लेकिन हमें मेहनत करना भी पसंद है. और ये पसंद पहाड़ चढ़ने तक ही सीमित नहीं है.

लोग तो मुश्किल पहेलियां हल करने में भी मजा लेते हैं. घंटों लगे रहते हैं, भले हल का कोई अता-पता न हो. यानी लोग कोशिश करने में भी मजे का अनुभव करते ही हैं. थोड़ा काव्य की तरफ जाएं, तो कह सकते हैं कि सफर खूबसूरत है, मंजिल से भी. यही डोपामाइन हमें लगे रहने और किसी चीज में डूब जाने को प्रेरित करता है.

अब आपसे एक सवाल. आपके सामने दो आसान से विकल्प रखे जाते हैं. आप एक गुलाब जामुन अभी ले सकते हैं. या फिर दो गुलाब जामुन थोड़े समय बाद. क्या चुनेंगे आप? एक बार ऐसा ही एक प्रयोग अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में किया गया. जो ‘स्टैनफोर्ड मार्शमैलो एक्सपेरिमेंट’ नाम से जाना जाता है. ये प्रयोग साइकोलॉजिस्ट वाल्टर मिशेल ने साल 1970 में किया था. इसमें बच्चों के सामने दो विकल्प रखे गए. वहां गुलाब जामुन के बजाय अमेरिकी मिठाई, मार्शमैलो थी. बच्चों से पूछा गया कि एक अभी या दो बाद में?

प्रयोग में देखा गया कि कुछ बच्चे झट से मिठाई खा गए, लेकिन कुछ ने इंतजार किया. ताकि उन्हें दो मिठाई मिल सके. ये प्रयोग जिस चीज को समझने के लिए किया जा रहा था, उसे विज्ञान की भाषा में ‘डिलेड ग्रैटिफिकेशन’ कहते हैं. यानी सुख मिलेगा लेकिन अभी नहीं.

डिलेड ग्रैटिफिकेशन’ पर हुई रिसर्च में हमें इस बारे में पता चलता है. इंतजार के बाद कोई बड़ा इनाम मिलने पर डोपामाइन का लेवल धीरे-धीरे बढ़ता है. जिससे धैर्य रखने और लगे रहने का भाव पैदा होता है. साथ ही आनंद का अनुभव भी होता है. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. डोपामाइन के लिए कोई काम बार-बार करते रहने के बुरे असर भी हो सकते हैं. मसलन फोन की लत लग जाना, पॉर्न एडिक्शन वगैरह.

इस तरह की आदतों पर एमोरी यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजिस्ट और लेखक केनेथ कार्टर कहते हैं,

“लोग बर्फ में जमे झरने पर चढ़ते हैं. जिसका कोई तुक नहीं है. जबकि हाइवे में दौड़कर भी थकान और प्रयास का मजा लिया जा सकता है. ये सब एक चैलेंज की तरह लिया जाता है. ज्यादा खतरे खोजने वालों को ऐसी रिस्की जगहों में ज्यादा डोपामाइन लेवल मिलता है. साथ ही स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टीसोल भी कम रहता है."

कुछ काम बोरियत से बचने के लिए भी किए जाते हैं. चाहे बदले में दर्द ही मिले. मसलन, प्रयोगों में देखा गया है कि लोग बोरियत से बचने के लिए पैसे भी उड़ा सकते हैं. कुछ तो खुद को बिजली का झटका तक देते हैं, ताकि बोरियत से बच सके.

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वहीं, जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, लोग कुछ न करने के बजाय दिमागी तौर पर मुश्किल काम करना पसंद करते हैं. आपने भी देखा होगा, जब फोन की बैटरी खत्म हो और कुछ करने को न हो, तो लोग अखबार में मुश्किल पहेलियां ही खेलने लगते हैं. यानी बोरियत से बचने के लिए मुश्किल काम भी कर लेंगे. 

इन सभी उदाहरणों से समझा जा सकता है कि बदलते हार्मोंस और सुख का अनुभव लोगों को मुश्किल कामों में भी मिल सकता है. लेकिन एक बात ध्यान में रखने वाली है कि इंसानों का व्यवहार बस दो-चार कारणों से नहीं समझा जा सकता है. हां, ये कुछ वजहें हो सकती हैं. खैर, आप बताइए मुश्किल काम करने के बाद मजा आता है या नहीं?

वीडियो: सेहत: खुशी बढ़ाने वाले डोपामाइन को दिमाग में कैसे बढ़ाएं

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