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सरकार गिराने के लिए आसमान से हुई AK-47 की बारिश!

दिसंबर 1995 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में आसमान से हथियार गिराए गए जिनको लेकर कई सवालों जवाब मिलना बाकी है.

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purulia  weapons drop
1995 के बाद से देश में कई बार सरकार बदली, पर किसी ने मामले के पुरुलिया खुलासे के लिए बहुत गंभीरता नहीं दिखाई (सांकेतिक तस्वीर: इंडिया टुडे)
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कमल
25 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 25 नवंबर 2022, 11:05 AM IST)
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1995 का साल. कराची से होता हुआ 'एन्तोनोव-26' नाम का एक रूसी प्लेन भारतीय सीमा में इंटर होता है. और भारतीय एयर ट्रैफिक कंट्रोल को भनक तक नहीं लगती. प्लेन कराची से होता हुआ बनारस में लैंड करता है. और फिर पश्चिम बंगाल के ऊपर उड़ान भरता हुआ थाईलैंड की ओर निकल जाता है. ये प्लेन भारतीय सीमा में क्यों आया था, इसका खुलासा अगली सुबह हुआ. 

कैलेंडर में तारीख थी- 18 दिसंबर. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया कस्बे में लोग सुबह-सुबह अपने खेतों में काम के लिए जा रहे थे (Purulia Arms Drop). तभी उन्हें खेतों में कुछ बक्से दिखाई दिए. जब इन बक्सों को खोला गया तो सामने नजारा हैरतअंगेज़ करने वाला था. बक्सों में 300 AK-47 और AK 56 राइफलें रखी हुई थीं. साथ में 15 हजार राउंड गोलियां, आधा दर्जन रॉकेट लांचर, हथगोले, पिस्तौलें और लाइट विजन गॉगल समेत लगभग इतने हथियार थे कि एक छोटी मोटी जंग शुरू की जा सके. 

अफरातफरी के माहौल में लोगों के हाथ जो लगा, वो उसे अपने घर ले गए. मामला जल्द ही राज्य सरकार और फिर केंद्र सरकार के पास पहुंचा. तुरंत के स्पेशल टीम पुरुलिया के लिए रवाना हुई, और लोगों के घरों से हथियार बरामद किए गए. अब तक अधिकारियों को ये समझ आ चुका था कि हथियार प्लेन से गिराए गए हैं. लेकिन किसने गिराए, क्यों? और किसके लिए? इन सवालों का जवाब अभी बाकी था. 

किसको पहुंचाए गए हथियार?

इसके 3 रोज़ बाद यानी 21 दिसंबर को ये प्लेन दुबारा भारतीय सीमा से गुजरा. लेकिन इस बार इसे मुम्बई में रोक लिया गया. ये वही प्लेन था जिसने पुरुलिया में हथियार गिराए थे. प्लेन में से 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 5 लातविया देश के नागरिक थे. वहीं 1 शख्स ब्रिटिश था, जिसका नाम था पीटर ब्लीच. ब्लीच हथियारों का सौदा किया करता था. उसी ने प्लेन ख़रीदा था और हथियार भी उसी ने मुहैया कराए थे.

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ज़ब्त किया गया 'एन्तोनोव-26' प्लेन (तस्वीर: इंडिया टुडे)

पीटर ब्लीच सहित उसके पांच साथियों को इस मामले में उम्रकैद की सजा हुई. बाद में पता चला कि ब्लीच दरअसल ब्रिटिश खुफिया एजेंसी MI5 का एजेंट था. इसी के चलते साल 2004 में उसे राष्ट्रपति के द्वारा माफी भी मिल गयी. लातवियाई नागरिकों को भी रूस की पहल पर छोड़ दिया गया. लेकिन केस अभी क्लोज़ नहीं हुआ था. इस खेल का मुख्य खिलाड़ी अभी भी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर था. 

दरअसल मुम्बई में जब प्लेन लैंड हुआ, उसमें 6 नहीं 7 लोग थे. और 7 वां आदमी डेनमार्क का नागरिक था. उसका नाम था किम डेवी. डेवी ही इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड था. डेवी मुम्बई हवाई अड्डे से फरार होकर वापिस डेनमार्क चला गया था. डेवी के प्रत्यर्पण की कई कोशिशें हुई लेकिन डेवी हाथ न आया. आगे चलकर उसने कुछ खुलासे किए, जिसने इस घटना को बिलकुल नया रंग दे दिया. डेवी का कहना था कि ये पूरी घटना भारत सरकार के इशारे पर हुई थी. और इसका मकसद बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार को गिराना था. हालांकि डेवी की बात पर सबको भरोसा नहीं हुआ. संभव था कि वो खुद को बचाने के लिए वो ये सब किस्से बना रहा हो. लेकिन इस घटना से जुड़े कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब आज तक नहीं मिल पाया है. 

किम डेवी और पीटर ब्लीच भारत में किसे हथियार पहुंचा रहे थे?
जिस दिन प्लेन भारत में इंटर हुआ, उस रोज़ सारे राडार क्यों बंद थे?
किम डेवी मुम्बई हवाई अड्डे से कैसे फरार हो गया?
इस केस का भारतीय सुरक्षा एजेंसी RAW और ब्रिटिश इंटेलिजेंस MI5 से क्या लेना देना था? 

MI5 को हथियारों के बारे में पता था!

साल 1995 के शुरुआती महीनों में ब्रिटिश इंटेलिजेंस, MI5 के पास एक फोन कॉल आया. उन्हें पता चला कि हथियारों का एक जखीरा भारत जाने वाला है. फोन करने वाले शख्स का नाम था पीटर ब्लीच. ब्लीच ने कई साल तक ब्रिटिश इंटेलिजेंस में काम किया था और बाद में वो हथियारों का व्यापार करने लगा था. उसने MI5 को बताया कि एक किम डेवी नाम का डेनिश नागरिक, उससे हथियार खरीदना चाहता था. ब्लीच और डेवी की मुलाक़ात बुल्गेरिया में हुई थी. यूं तो ब्लीच ने कई देशों की सरकार को हथियार बेचे थे. लेकिन इस बार उसे पता चला कि एक आतंकी संगठन हथियार खरीदना चाहता है. उसने तुरंत MI 5 को इसकी जानकारी दी. MI5 ने उससे कहा कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दो. 

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मास्टरमाइंड नील्स होक उर्फ किम डेवी और पीटर ब्लीच (तस्वीर: zeenews) 

डेवी को लगा शायद MI5 इस ऑपरेशन के बारे में और जानकारी इकठ्ठा करना चाहता है. इसलिए उसने डेवी से एक और मुलाक़ात की. और उसे हथियारों का कंसाइनमेंट दिखायाा. डेवी हथियार खरीदने को तैयार हो गया. साथ में लेकिन उसने एक शर्त भी रखी. शर्त ये कि पीटर ब्लीच को उसके साथ डिलवरी देने जाना होगा. ब्लीच को पता कि MI5 उसे ट्रैक कर रही है. इसलिए उसने साथ जाने में हामी भर दी. हालांकि उसे ये उम्मीद नहीं थी कि डिलवरी हो पाएगी. उसे लगा था भारतीय सुरक्षा एजेंसियों तक ये खबर पहुंच चुकी होगी, जैसे ही प्लेन भारत की सीमा में इंटर होगा, प्लेन और हथियारों को कब्ज़े में ले लिया जाएगा. और वो MI5 की मदद से आसानी से रिहा हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 

जिस रोज़ प्लेन कराची से बनारस के लिए प्लेन भरा, ठीक उसी वक्त इत्तेफाक से राडार ने काम करना बंद कर दिया. वाराणसी में ब्लीच को एक और बार उम्मीद जगी कि यहां भारतीय एजेंसियां प्लेन पकड़ लेंगी. लेकिन प्लेन वहां से भी आसानी से बिना किसी पूछताछ के टेक ऑफ कर गया. अब ब्लीच की हालत पतली हो चुकी थी. उसके चेहरे से हवाइयां उड़ रही थीं. क्योंकि उसे लग रहा था कि ये उसकी आख़िरी उड़ान है, जल्द ही एक रॉकेट आएगा और प्लेन के परखच्चे उड़ा देगा. 

बंगाल में हथियार गिराए गए 

ब्लीच के सामने बैठ डेवी कोम इसकी कोई भनक नहीं थी. इसलिए वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था. प्लेन ने पश्चिम बंगाल के ऊपर से उड़ान भरी और हथियार गिरा दिए. न कोई रॉकेट आया ना ही कोई पुलिस. गलती सिर्फ इतनी हुई कि रात के अंधेरे में पायलट से चूक हो गई और हथियार जहां गिराए जाने थे, उससे कहीं दूर गिरा दिए गए. इसलिए गांव वालों के हाथ लग गए. और यहीं से सारा बखेड़ा खड़ा हुआ. अब सवाल ये कि हथियार थे किसके लिए?

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डेनमार्क सरकार अप्रैल 2010 में किम डेवी भारत को सौंपने के लिए राजी हो गई थी (तस्वीर: ariseasia.blogspot.com)

डेवी ने ब्लीच को बताया था कि पश्चिम बंगाल में आंनद मार्ग नाम का एक धार्मिक संगठन है. जिसकी ब्रांच दुनियाभर में हैं. सालों से आंनद मार्गियों और बंगाल कम्युनिस्ट पार्टी के बीच छत्तीस का आंकड़ा था. कई बार झड़पें भी हुई थीं, जिसके चलते आनंद मार्ग के कई सदस्य मारे गए थे.  इस संगठन का नाम भी कई बार हिंसा की कई घटनाओं में आया था. किम डेवी इस संगठन से जुड़ा हुआ था. और चाहता था कि वो लोग कम्युनिस्टों से अपनी रक्षा कर पाएं. उसने ब्लीच को बताया कि उनसे चीन से स्मगल किया बहुत सा सोना भारत में बेचा था, और इससे बहुत सारा पैसा कमाया था. इसी पैसे से वो आनंद मार्गियों की मदद करना चाहता था. डेवी के अनुसार हथियार आनंद मार्ग की बिल्डिंग के पास गिराए जाने थे. लेकिन गलती से कहीं और गिरा दिए गए. 

इस मामले में ब्लीच और क्रू के चार सदस्यों पर भारत के खिलाफ जंग छेड़ने का इल्जाम लगा. और उन्हें जेल में डाल दिया गयाा. हालांकि आगे चलकर उन्हें राष्ट्रपति से रिहाई मिल गई और वो अपने देश लौट गए. डेवी, जो मुम्बई से फरार हो गया था, उसके प्रत्यर्पण की कोशिशें हुईं. लेकिन एक डेनिश कोर्ट ने उसके प्रत्यर्पण पर रोक लगा दी. साल 2011 में एक और बार डेवी को भारत लाने की कोशिश की गई. तब उसने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि अगर उसे भारत भेजा गया तो वो ज्यादा दिन जिन्दा नहीं बच पाएगा.

केंद्र सरकार के इशारे पर सब हुआ था?  

डेवी ने दावा किया कि इस पूरे प्लान में भारत सरकार मिली हुई थी. और बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार को गिराने के लिए ये षड्यंत्र रचा गया था. डेवी के अनुसार सरकार चाहती थी कि हथियार आनंदमार्गियों के हाथ लगें, और वो कम्युनिस्टों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दे. डेवी ने यहां तक दावा किया कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी R&AW को इस प्लान की पहले से भनक थी.
हालांकि CBI ने डेवी के सभी दावों को खारिज कर दिया. लेकिन कराची से प्लेन का आराम से भारतीय सीमा में घुस आना, उस रात राडार का खराब होना, ये सब बातें इस ओर इशारा कर रहीं थी कि मामला उतना सीधा था नहीं जितना दिखता था. आनंद मार्ग की तरफ से भी इस दावे को खारिज किया गया कि हथियार उनके लिए गिराए गए थे. पीटर ब्लीच ने पुलिस हिरासत में रहते हुए ये भी दावा किया कि जितने हथियार बरामद हुए, उससे कहीं ज्यादा गिराए गए थे. उन हथियारों को कौन लेकर गया, इसका भी CBI के पास कोई जवाब नहीं था. 

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आनंद मार्ग की स्थापना 1955 में प्रभात रंजन सरकार ने की थी (तस्वीर:इंडिया टुडे)

इस मामले में केंद्र सरकार पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा था. MI5 ने दावा किया था कि उन्होंने हथियारों की जानकारी पहले ही भारत सरकार को दे दी थी. फिर सरकार ने वक्त रहते कोई कदम क्यों नहीं उठाया, इस सवाल का सरकार के पास कोई जवाब नहीं था. ये पूरा मामला भारत और बंगाल के इर्दगिर्द समझा जा रहा था. साल 2011 में इस मामले में कुछ नए नाम जुड़े. CBI ने अदालत में कुछ दस्तावेज़ पेश किए. क्या था इन दस्तावेज़ों में?

बांग्लादेश से जुड़े तार 

ये दस्तावेज़ इंटरनेशनल आर्म्स डील से जुड़े कुछ सर्टिफिकेट थे. जो 25 नवम्बर 1995 को रिलीज किए गए थे. जिनमें लिखा था कि ये हथियार बुल्गेरिया से खरीदे जा रहे हैं और इनका इस्तेमाल बांग्लादेश की सेना करेगी. इन पर बांग्लादेश के एक सांसद मेजर जनरल मुहम्मद अली भुइयां के दस्तखत थे. भुइयां तब खालिद जिया की सरकार में आर्म्ड फोर्सेस के चीफ ऑफ स्टाफ हुआ करते थे. पुरुलिया में मिले बक्सों में भी बांग्लादेश के एक कैंटोनमेंट का नाम लिखा था. बांग्लादेश सरकार ने इन सभी दावों से किनारा करते हुए कहा कि दस्तावेज़ों पर फ़र्ज़ी दस्तखत किए हुए थे. 

इसके अलावा हथियारों को लेकर कुछ और दावे भी किए गए. कुछ पूर्व रक्षा विशेषज्ञों द्वारा आशंका जताई गई कि हथियार म्यांमार में काचिन विद्रोहियों तक पहुंचाएं जाने थे. वहीं कुछ न कहा की शायद ये लिट्टे विद्रोहियों के लिए थे. असलियत क्या थी, इसका कभी पता नहीं चल पाया. इस कहानी की असलियत कोई बता सकता है, तो वो शायद किम डेवी है. किम डेवी के प्रत्यर्पण के प्रयास साल 2022 में भी जारी हैं. और संभव है कि जल्द ही उसे भारत लाया जाए.

वीडियो देखें- एक खोज के लिए लड़ पड़े दो अंग्रेज़

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