"सती कोई 'प्रथा' नहीं है. यह कभी थी भी नहीं और ना कभी होगी. यह व्यक्तिगत निर्णयका मामला है. हमारी संस्कृति में हम मातृभूमि, धर्म और नारी की पूजा करते हैं. हमइसमें से किस भी चीज के लिए जान देने को तैयार हैं."यह बयान था पूर्व केंद्रीय ऊर्जा मंत्री और राजस्थान के कद्दावर राजपूत नेता कल्याणसिंह कालवी का. 15 अगस्त 1987. देश स्वतंत्रता की 40वीं वर्षगांठ मना रहा था. इसकेएक महीने बाद 4 सितंबर 1987 के रोज राजस्थान में आजादी मिलने के बाद 28वीं औरत थीजिसे सती बताकर जिंदा जला दिया गया. नाम रूप कंवर. जगह सीकर का छोटा सा गांव,देवराला. अपने पति माल सिंह की मौत के बाद 18 साल की रूप कंवर को पति के शव के साथजिंदा जला दिया गया. रूप कंवर से 70 साल पहले भी इसी गांव की एक महिला सती हुई थी.रूप कंवर अपने पति माल सिंह के साथदेवराला सती कांड काफी समय तक राष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में रहा था. उस दौरमें राजस्थान में राजपूतों के दो बड़े नेता हुआ करते थे, भैरों सिंह शेखावत औरकल्याण सिंह कालवी. भैरों सिंह शेखावत ने इस प्रथा को गलत बताते हुए इससे पल्ला झाड़लिया था. रूप कंवर के मरने के 12 दिन बाद देवराला में उनके नाम पर 'चूनड़ी महोत्सव'होना था. कोर्ट ने इस महोत्सव पर रोक लगा दी थी. कोर्ट की रोक के बावजूद लाखों कीतादाद में राजपूत देवराला में जुटने लगे. इधर मीडिया पूरे मामले पर हमलावर हुआ जारहा था. ऐसे में कोई भी कद्दावर राजपूत नेता इस आंदोलन को लीड करने के लिए आगे नहींआ रहा था. आखिरकार जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष कल्याण सिंह कालवी सती प्रथा के पक्षमें खड़े हुए. उनके इस कदम ने उन्हें राजपूत समाज के बीच और अधिक लोकप्रिय बना दिया.इसके तीन साल बाद चंद्रशेखर के नेतृत्व में देश में 'सामाजिक न्याय' की सरकार चलरही थी और देवराला सती कांड के पक्ष में खड़े होने वाले कल्याण सिंह कालवी उनकेमंत्रिमंडल में ऊर्जा मंत्री थे. यह सियासी उलटबासी कैसे संभव हो पाई? इसका जवाबदेते हुए वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं-"चंद्रशेखर सामाजिक न्याय की कसमें खाते हुए जानते थे कि उनकी एक पहचान राजपूत नेताके तौर पर भी है. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी राजपूतों के खिलाफ बोलनेका साहस नहीं दिखाया. कल्याण सिंह कालवी चंद्रशेखर के काफी करीबी माने जाते थे. जबचंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने कल्याण सिंह को भी दिल्ली को बुला लिया गया."बहरहाल मंत्री बनने के एक साल बाद कल्याण सिंह कालवी का देहांत हो गया. कल्याण सिंहकालवी के समय राजेंद्र राठौड़, प्रताप सिंह खाचरियावास जैसे कई युवा राजपूत नेताउनकी बिग्रेड में हुआ करते थे. उनके जाने के बाद ये नेता उनकी विरासत के साथअलग-अलग राजनीतिक दलों में चले गए. पीछे रह गए उनके बेटे लोकेंद्र सिंह कालवी. ऐसाकहा जाता है कि कल्याण सिंह कालवी कभी भी अपने बेटे को सियासत में नहीं लाना चाहतेथे. कल्याण सिंह कालवी की सियासत ग्राम पंचायत से शुरू हुई थी. वो लंबे समय तकनिर्विरोध अपने गांव के सरपंच रहे थे. जब कल्याण सिंह सूबे की सियासत में चले गए उससमय नौजवान लोकेंद्र ने उनसे ग्राम पंचायत के चुनाव लड़ने की बात कही थी. ऐसा कहाजाता है कि उस समय कल्याण सिंह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया.कल्याण सिंह कालवीइधर कल्याण सिंह जा चुके थे और उधर जनता दल कई टुकड़ों में टूट गई थी. ऐसी स्थितियोंमें लोकेंद्र सिंह कालवी बीजेपी में चले गए. इसी बीच आए 1998 के लोकसभा चुनाव.बीजेपी ने लोकेंद्र सिंह कालवी को बाड़मेर सीट से लोकसभा का टिकट दिया. 1989 मेंउनके पिता भी इसी सीट से चुनाव जीतकर आए थे.कालवी बाड़मेर सीट पर बाहरी उम्मीदवार थे. जोगाराम राजपुरोहित इस सीट पर बीजेपी काटिकट मांग रहे थे. राजपुरोहित ने कालवी को खुद का टिकट कटने की वजह माना. वो पूरेप्रचार में कालवी के साथ रहे और अपनी बिरादरी के वोटों को कांग्रेस की तरफ धकेलतेरहे. राजपूतों के अलावा रावणा राजपूतों को भी बीजेपी का परंपरागत वोट माना जाता है.एक प्रेम विवाह ने इन दोनों बिरादरियों को आमने-सामने खड़ा कर दिया.लोकेंद्र सिंह कालवीविवाद की जड़ में थे चेतना देवड़ा और नरपत सिंह. दोनों का चयन राजस्थान पुलिस सबइंस्पेक्टर के लिए होता है. चेतना रावणा राजपूत परिवार से आती थीं और नरपत राजपूतपरिवार से. जयपुर में ट्रेनिंग के दौरान दोनों में प्यार हो गया और दोनों ने आर्यसमाज के मंदिर में जाकर शादी कर ली. इस मामले ने देखते ही देखते सियासी रंग पकड़लिया. चुनाव पास ही में था. इस घटना की वजह से राजपूत समाज और रावणा राजपूतों मेंटकराव की स्थिति पैदा हो गई. इसका सीधा नुकसान लोकेंद्र कालवी को हुआ. वो कांग्रेसके कर्नल सोनाराम चौधरी को मिले 4,46,107 वोटों के मुकाबले 3,60,567 वोट ही हासिलकर पाए और चुनाव हार गए.1998 के चुनाव के बाद बनी वाजपेयी सरकार ने 13 महीनों में अपना बहुमत खो दिया. एकबार फिर से लोकसभा के चुनाव होने जा रहे थे. लोकेंद्र सिंह फिर से टिकट चाहते थेलेकिन बाड़मेर से आने वाले बीजेपी के कद्दावर नेता जसवंत सिंह ने इस बार लग्गी लगादी. दरअसल जसवंत सिंह यहां से अपने बेटे मानवेंद्र को चुनाव लड़ाना चाहते थे. ऐसेमें उन्होंने कालवी के बाहरी होने का मामला उठाया और उनका टिकट काट लिया गया. यहांसे कालवी और बीजेपी के बीच दूरियां बढ़ने की शुरुआत हुई.राजपूतों का नेता1999 में लंबे प्रदर्शन के बाद अशोक गहलोत सरकार ने राजस्थान में जाटों को ओबीसीमें आरक्षण दे दिया. इसके बाद सूबे में नए सिरे से आरक्षण की मांग शुरू हुई. इसकेकुछ ही साल बाद राजपूत, ब्राह्मण और दूसरी अगड़ी जातियों ने आर्थिक आधार पर आरक्षणकी मांग शुरू कर दी. लोकेंद्र सिंह कालवी इस आंदोलन से जुड़ गए और इसके नेता बनकरउभरे.देवी सिंह भाटी2003 में सूबे में विधानसभा चुनाव होने थे. लोकेंद्र सिंह कालवी और कोलायत सेबीजेपी विधायक देवी सिंह भाटी राजपूतों के लिए आरक्षण की मांग पर अड़े हुए थे. वोइसके लिए कई बार जयपुर में प्रदर्शन भी कर चुके थे. देवी सिंह भाटी कोलायत सेलगातार पांच बार चुनाव जीत चुके थे. यह आंकड़ा उन्हें बगावत के लिए जरूरी साहस देरहा था. जब उन्होंने देखा कि उनकी पार्टी राजपूत आरक्षण को लेकर गंभीर नहीं है,उन्होंने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.सितंबर 2003 में देवी सिंह भाटी को पार्टी को निष्कासित कर दिया गया. लोकेंद्रकालवी नए सिरे से अपने लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में लगे हुए थे.दोनों ने मिलकर नई पार्टी बनाई 'राजस्थान सामाजिक न्याय मंच'. सामाजिक न्याय मंचजाट आरक्षण आंदोलन का काउंटर नैरेटिव था. इनका कहना था कि अगड़ी जातियों में कईपरिवार आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए हैं. ऐसे में वो लोग विकास की दौड़ में पीछे छूट जारहे हैं. इनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए. दूसरा जाट जैसी मजबूत जाति केपिछड़ा वर्ग में आ जाने से ओबीसी की दूसरी 200 से अधिक जातियों के आगे बढ़ने कीसंभावना सिकुड़ गई हैं. ऐसे में इस पर पुनर्विचार होना चाहिए.2003 के विधानसभा चुनाव में सामाजिक न्याय मंच ने खुद को राजनीतिक दल के तौर पररजिस्टर करवाया और 65 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए. इनमें से सिर्फ देवी सिंहभाटी ऐसे उम्मीदवार थे जो विधानसभा पहुंच पाए. 65 में से 60 प्रत्याशियों की जमानतजब्त हो गई. लोकेंद्र सिंह कालवी के लिए ये नतीजे निराश करने वाले थे.बीजेपी सत्ता में थी और लोकेंद्र कालवी के विजेता कैंप में संभावना बहुत कम थीं.ऐसे में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामने का फैसला किया. इस सिलसिले में वो देवीसिंह भाटी के साथ सोनिया गांधी से मिलने दिल्ली भी आए. दोनों नेता अपने लिए लोकसभाका टिकट चाहते थे. देवी सिंह की नजर बीकानेर सीट पर थी. बीकानेर सीट कांग्रेस केकद्दावर जाट नेता रामेश्वर डूडी के खाते में थी. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व उनकाटिकट काटने में असहज हो रहा था. देवी सिंह भाटी कोई और सीट अपने लिए नहीं चाहते थेऐसे में यह समझौता वार्ता अधूरी रह गई. राजस्थान आने के बाद देवी सिंह भाटी फिर सेबीजेपी में लौट गए और लोकेन्द्र कालवी ने कांग्रेस की राह चुनी.श्री राजपूत करणी सेनाकांग्रेस में लोकेंद्र सिंह कालवी का निबाह नहीं हो रहा था. कांग्रेस संगठन के भीतरभी उन्हें किनारे लगाया जाने लगा. ऐसे में उन्होंने अपना नया संगठन खड़ा करने काफैसला किया. सितंबर 2006 में उन्होंने अजीत सिंह मामडोली के साथ मिलकर 'श्री राजपूतकरणी सभा' की स्थापना की.पद्मावत के खिलाफ प्रदर्शन करते करणी सेना के लोग2008 के विधानसभा चुनाव के वक़्त करणी सेना और कांग्रेस के बीच दो शर्तों पर समझौताहुआ. पहला कांग्रेस अगर सत्ता में आती है तो राजपूतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कीजाएगी. कांग्रेस 40 के करीब टिकट राजपूत समाज के लोगों को देगी. इस समझौते के बादअजीत सिंह मामडोली को भी टिकट मिलने की उम्मीद थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मामडोली नेइसके लिए कालवी को जिम्मेदार ठहराया. इस तरह करणी सेना में पहली फूट पड़ी. लोकेंद्रसिंह कालवी करणी सेना से अलग हो गए और मामडोली ने 'श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेनासमिति' नाम से अपना अलग संगठन बनाया.2010 में कालवी फिर से कांग्रेस में चले गए और नए सिरे से करणी सेना को खड़ा करनाशुरू किया. इस बार उन्होंने सुखदेव सिंह गोगामेड़ी के हाथ में करणी सेना की कमान दी.2015 में अंदरूनी खींचतान के बाद गोगामेड़ी को करणी सेना से बाहर का रास्ता दिखादिया गया. गोगामेड़ी ने कालवी से अलग होकर नया संगठन खड़ा किया 'श्री राष्ट्रीयराजपूत करणी सेना'.सुखदेव सिंह गोगामेड़ीइस तरह आज राजस्थान में करणी सेना के तीन धड़े हैं. तीनों अपने को असली करणी सेनाबता रहे हैं. तीनों अपने-अपने स्तर पर पद्मावत का विरोध करने में लगे हुए हैं.लेकिन फिल्मों का विरोध करने का चस्का करणी सेना को लगा कैसे?एक कहानी के कई क्षेपक होते हैंआप जब आमेर का किला घूम चुके होते हैं तो विदा लेने से पहले गाइड आपको एक दिलचस्पकिस्सा सुनाता है. वो आपको बताता है कि दरअसल अकबर की शादी कभी राजा भारमल की बेटीजोधा से हुई ही नहीं. दरअसल भारमल ने अपनी एक दासी की बेटी को जोधा बताकर उसकी शादीअकबर के साथ कर दी थी.जोधा और अकबर के बारे में राजस्थान में कई सारे मिथक हैं. 2008 में आशुतोष गोवारिकरने जोधा और अकबर की प्रेम कहानी पर इसी नाम से एक फिल्म बनाई. सूबे में विधानसभाचुनाव थे. करणी सेना ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए इस फिल्मके खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया. यह पहली मर्तबा था जब करणी सेना ने किसी फिल्म काविरोध किया था. यह पहली मर्तबा था कि यह संगठन राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बना.इसके बाद करणी सेना को फिल्मों का विरोध करने का चस्का लग गया.फिल्म जोधा अकबर का पोस्टर2013 में जी मीडिया ने जोधा अकबर की कहानी पर टेलीविजन सीरियल बनाया. एकता कपूर काबालाजी टेली फिल्म इस सीरियल का निर्माता था. करणी सेना इस सीरियल का विरोध करतेहुए दिखाई दी. 2018 में पद्मावत ने इस संगठन को ऐतिहासिक फुटेज दी. संयोग की बात हैकि इस साल के अंत में मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं.लोकेंद्र सिंह कालवी समृद्ध राजनीतिक विरासत के वारिस थे. उनके बारे में कहा जाताहै कि वो अपने राजनीतिक स्टैंड को लेकर बहुत हद तक अड़ियल हैं. यही वजह है कि वोकिसी भी मुख्यधारा की पार्टी के साथ लंबे समय तक चल नहीं पाए. दूसरा उनकीमहत्वाकांक्षा सूबे के सबसे बड़े राजपूत नेता बनने की है. सूबे की दोनों बड़ीपार्टियों के पास अपनी-अपनी राजपूत लॉबी है. कालवी राजपूत युवाओं के बीच बहुतलोकप्रिय हैं लेकिन मतदान के दिन यह लोकप्रियता उतनी असरदार साबित नहीं हुई है.--------------------------------------------------------------------------------यह भी पढ़ें 'पद्मावती' दीपिका ने राजपूतों को जलाने वाला काम कर दिया हैपद्मावती का हश्र देख चुकने के बावज़ूद पीरियड फ़िल्म बनाने पर तुले हैं आशुतोषपुलिस के डंडे खाकर राजपूतों ने लिखकर दिया- अब विरोध नहीं करेंगे