सरकार ने दो सरकारी बैंकों-इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया केनिजीकरण की तैयारी कर ली है. इसके लिए सोमवार, 29 नवंबर से शुरू होने जा रहे संसदके शीतकालीन सत्र में एक बिल लाए जाने की संभावना है. हालांकि सरकार ने ये भी साफकर दिया है कि वह बैंकों को पूरी तरह प्राइवेट हाथों में नहीं जाने देगी. कम से कम26% हिस्सेदारी अपने पास रखेगी. लेकिन इसे लेकर बैंक ग्राहकों, कर्मचारियों और यहांतक कि शेयर मार्केट में भी अटकलों का बाजार गर्म रहा. आइए जानते हैं कि बैंकों केनिजीकरण का आपकी जेब या जॉब पर क्या असर पड़ेगा. ग्राहकों पर असर बैंक सरकारी होंया प्राइवेट, वे सभी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की निगरानी और गाइडेंस में ही कामकरते हैं. किसी बैंक के आंशिक या पूरी तरह प्राइवेट हो जाने से आपके जमा पैसे यालॉकर की सेफ्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा. लेकिन प्रशासन और मैनेजमेंट संबंधी आजादीके चलते प्राइवेट बैंक अपनी सेवाओं और सहूलियतों के मोर्चे पर सरकारी बैंकों सेज्यादा चुस्त और आधुनिक दिखेंगे. यह अंतर उनकी ब्याज दरों से लेकर तमाम तरह केचार्जेज में भी दिख सकता है.सांकेतिक तस्वीर (PTI)लोन और ब्याज सरकारी बैंकों के मुकाबले प्राइवेट बैंकों से आपको जल्द लोन मिलजाएगा, लेकिन ब्याज दरों के मामले में उनका रवैया एक समान नहीं रहता. प्राइवेट बैंकमौजूदा ग्राहकों के मुकाबले नए ग्राहकों को ज्यादा तरजीह देते हैं और उन्हें लोन परकम ब्याज दर ऑफर करते हैं. आरबीआई की ओर से होने वाली नीतिगत ब्याज कटौती जिसे हमरेपो रेट के नाम से भी जानते हैं, उसका लाभ आप तक पहुंचाने में प्राइवेट बैंक देरीकरते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2019 से नवंबर 2020 के बीच सरकारीबैंकों ने पुराने लोन पर ब्याज दरों में 0.94% कटौती की, जबकि प्राइवेट बैंकों ने0.54% की ही राहत दी. लेकिन नया लोन लेने वालों के लिए सरकारी बैंकों ने रेट 1.1%तक घटाए, जबकि प्राइवेट बैंकों ने 1.76% तक घटा दिए. इसे इस तरह समझिए कि आपकेमौजूदा होम लोन के ब्याज पर अगर सरकारी बैंकों ने साल में 9400 रुपये की राहत दी तोप्राइवेट बैंकों सिर्फ 5400 रुपये की .ट्रांजैक्शन चार्ज प्राइवेट पूंजी और आधुनिक प्रबंधन के दम पर दी जाने वाली बेहतरसेवाएं अपनी लागत भी वसूलती हैं. प्राइवेट बैंकों के अपने हिडेन चार्जेज भी होतेहैं. मसलन, लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर प्राइवेट बैंको ने मोबाइल के जरिए होने वालीयूपीआई पेमेंट पर महीने में 20 ट्रांजैक्शन की लिमिट के बाद 2.5 से 5 रुपये तकचार्ज करना शुरू कर दिया. प्राइवेट बैंक कस्टमाइज्ड सर्विसेज भी दे सकते हैं, यानीग्राहक की माली हालत और जरूरतों के मुताबिक विशेष सेवाएं. लेकिन यहां भी उसकी कीमतली जाती है. सरकारी स्कीमें सरकार आवास, खेती-किसानी से लेकर वित्तीय जरूरतमंदों केलिए जितनी भी स्कीमें और सब्सिडी मुहैया कराती है, वे ज्यादातर सरकारी बैंकों सेसंचालित होती हैं. निजी बैंकों की इनमें दिलचस्पी नहीं रहती। जहां ये सेवाएं उनकेमार्फत मिलती हैं, वहां ग्राहकों को दिक्कतें पेश आती हैं और कई बार अतिरिक्तचार्जेज भी. अलबत्ता, प्राइवेट बैंक मौजूदा और नए ग्राहकों को बीमा या जमा योजनाओंजैसी अपनी व्यावसायिक स्कीमों से लुभाने की कोशिश करते हैं.(File Photo)बैंक कर्मचारियों पर क्या होगा असर ? सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन को लेकरजिनके माथे पर चिंता की लकीरें सबसे ज्यादा उभर आती हैं, वे इन बैंकों में कामकरने वाले कर्मचारी हैं. देश में करीब 13 लाख बैंक कर्मचारी हैं, जिनमें लगभग 4.2लाख प्राइवेट सेक्टर में हैं. लेकिन दिलचस्प यह है कि प्राइवेट बैंकों में क्लर्कलेवल के पद सरकारी बैंकों के मुकाबले काफी कम हैं और आईटी व एग्जिक्यूटिव कल्चर केचलते इन पदों में भी लगातार गिरावट आ रही है. ऐसे में सवाल यह भी है कि सरकारीक्लर्क कहां खपाए जाएंगे. सरकार जिन दो बैंकों का निजीकरण करने जा रही है, उनकेहजारों कर्मचारी भी नौकरी जाने या असुरक्षित होने को लेकर चिंतित हैं. जानकारों काकहना है कि बैंकों के प्राइवेट होने से बड़े पैमाने पर लोगों के नौकरी गंवाने,अस्थायी होने या कुछ समय बाद कॉन्ट्रैक्ट साइन करने की नौबत आएगी. बैंकिंग सेक्टरमें घटेंगे रोजगार के मौके ? नेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ बैंक वर्कर्स के पूर्व जनरलसेक्रेट्री अश्वनी राणा ने ‘दी लल्लनटॉप ’ को बताया, सबसे बड़ा संकट कर्मचारियों परही आएगा. यह देखना होगा कि क्या सरकार बैंकिंग कानून संशोधन विधेयक 2021 के तहतउनकी रोजीरोटी की सुरक्षा के लिए कोई बंदोबस्त करती है. लेकिन पिछले रिकॉर्ड कोदेखते हुए लगता है कि उनकी नौकरी पर देर-सबेर खतरा बना रहेगा. इसके अलावा निजीबैंकों में आरक्षण नहीं होने से भी इस कटैगरी के मौजूदा कर्मचारियों और आने वाले नएकैंडिडेट्स के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी. बैंकिंग सेक्टर में रोजगार के अवसर घटतेजाएंगे एयर इंडिया के टाटा के हाथों में जाने के दौरान सरकार ने इस बात के वैधानिकप्रावधान किए थे कि कर्मचारियों को कम से कम एक साल तक न निकाला जाए और उसके बादअगर जरूरत हुई तो उन्हें वीआरएस व अन्य नियमों का लाभ देते हुए ही छुट्टी की जाए.अश्वनी राणा मानते हैं कि टाटा जैसी विशाल कंपनी की तुलना इन बैंकों के निवेशकों सेनहीं की जा सकती. इनमें से कई पहले ही हाथ खड़े कर चुके हैं कि वे इतने बड़े स्टाफका पूरा वित्तीय बोझ नहीं उठा सकते. अगर कर्मचारियों को कुछ समय के लिए रख भी लियागया तो सभी वित्तीय सुविधाएं दिला पाना मुमकिन न होगा.सांकेतिक फोटोकितने बैंक हैं निजीकरण की कतार में? देश में फिलहाल 12 सरकारी, 22 प्राइवेट, 11छोटे वित्तीय बैंक और 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं. इनकी 1 लाख 42 हजार शाखाएंहैं, जिनमें 46 विदेशी बैंकों की शाखाएं भी शामिल हैं. 19 जुलाई 1969 को देश के 14प्रमुख बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया गया था और बाद में 6 और बैंक नेशनलाइजहुए. लेकिन 50 साल बाद सरकार रिवर्स गियर में जाती दिख रही है. पिछले बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार दो सरकारी बैंकों, एक बीमा कंपनी और कुछअन्य वित्तीय संस्थानों में विनिवेश के जरिए 1.5 लाख करोड़ रुपये जुटाना चाहती है.उसके कुछ महीने बाद ही नीति आयोग ने इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडियाके नाम का खुलासा कर दिया. इसके अलावा जिन बैंकों का नाम इनके साथ सुर्खियों में थाअब उनका नंबर आ सकता है. निजीकरण की अगली लाइन में बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफइंडिया, यूसीओ, पंजाब एंड सिंध बैंक की संभावना प्रबल बताई जा रही है. सरकार पहलेही सिंडीकेट बैंक का केनरा बैंक में, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, यूनाइटेड बैंक ऑफइंडिया को पंजाब नेशनल बैंक में और इलाहाबाद बैंक, कारपोरेशन बैंक और आंध्रा बैंकको इंडियन बैंक में विलय कर चुकी है.