उत्तर प्रदेश-बिहार में उत्सव का माहौल है. दिवाली के छह दिनों बाद आने वालेत्योहार डाला छठ की रौनक दिखाई देने लगी है. कोविड के दो प्रभावी दौर के बाद यहवैक्सीनेशन के बाद वाली छठ है. लोक आस्था के इस त्योहार में दिवाली से अधिकसामूहिकता और गंवई रौनक दिखती है. इलाके के तालाब, क्षेत्र की छोटी नदियां और बड़ेशहरों के किनारे की गंगा, जमुना वगैरह के घाट व्रती महिलाओं और छठ के गीतों सेगुलज़ार रहेंगे. वैसे भी गीत संगीत का यह यूट्यूबिया दौर है. हिट-सुपरहिट कीपरिभाषा व्यू हैं. भोजपुरी के गीतों का हाल तो किसी से छुपा नहीं है. लेकिन इस सबके बीच भी छठ के इर्द-गिर्द भोजपुरी में कुछ नए गीत-संगीत रचे गए हैं. हम उनमें सेही एक की बात करने वाले हैं. बीते पांच नवंबर को यूट्यूब पर एक गीत लांच हुआ. चैनलका नाम है 'मिसरी’ और गीत के बोल हैं, "हे छठी मईया 2.0". खास ये है कि रूढियों कोतोड़ता हुआ यह गीत ट्रांसजेंडर्स को छठ मनाने की और समाज में उनकी सहभागिता कीपैरवी कर रहा है. गीत के बोल हैं, "हमनी के पीर(वा) के बूझी हो, सभका तरे हम तोहकेपूजी हो........करी लें तोहसे गुहार, हमरो के दे द न प्यार" यानी हमारी पीड़ा कौनसमझेगा, हम जो कि सबको लगभग किनारे करके आपकी पूजा कर रहे हैं."हे छठी मईया 2.0" का स्क्रीनग्रैबयह गीत बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है. पारंपरिक छठ के विधि-विधान जैसे शॉट्स सेशुरू हुआ यह गीत अपने तीसवें सेकेंड में देखने वालों को आश्चर्य से भर देता है.सुंदर से संगीत के साथ शुरू हुए इस गीत में तीस सेकेंड पर हथेली 'चमकाकर' तालीबजाते हाथों के शॉट्स ने काफी कुछ साफ कर दिया है. ट्रांसजेंडर्स का छठ मनानाहालांकि पारंपरिक तौर पर कहीं उल्लेख में नहीं है. लेकिन बदलते दौर के इस गीत कोलेकर प्रोफेसर्स और अकादमिक जगत के लोग भी आश्वस्त हैं. हमने काशी हिंदूविश्वविद्यालय में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के पूर्व समन्वयक और प्रोफेसर सदानंद शाहीसे इस गीत पर बात की. उन्होंने कहा, "हालांकि छठ बहुत प्रयोगधर्मी त्योहार नहीं हैलेकिन इस तरह के ज़रूरी प्रयोग को आत्मसात भी किया है. छठ में स्त्री पुरुष दोनोंका योगदान है. स्त्री बहंगी तैयार करती है, तो उस बहंगी को घाट पर पुरुष पहुंचाताहै. ऐसे में इस समाज में ट्रांसजेंडर्स भी तो हैं. जब छठ में सब अपने हिस्से कापुण्य कमा रहे हैं, तो ट्रांसजेंडर्स तो अपने अधिकार की बात भी नहीं कर रहे. वो तोएक्सेप्ट करने की गुहार लगा रहे हैं." हमने इस छठ गीत के बोल पर ध्यान दिया. गीतआगे बढ़ता है तो पंक्ति आती है, "कवने अवगुनवा बानी हम अलगाइल, मानुष शरीरवा पवनीतबहूं भुलाइल, दुनिया के भीड़ करे हमरे संगे खेला, अइसन का खेल भइल जो भइली अकेला"यानी किस अवगुण के चलते हमें (ट्रांसजेंडर्स) अलग कर दिया गया है और मनुष्य शरीरपाने के बाद भी दुनिया में भीड़ हमारे साथ खेल कर रही है. इसके आगे की पंक्ति है,काहें के इ भेद बाटे?"चाहें धिया माने, चाहें बूझा पूत हो, काहें के इ भेद बाटे, नइखी अछूत हो. किसिमकिसिम के जइसे रंग लउके इहवां,एक रंग हमहुं बोला जाइं कहवां." यानी चाहें बेटीमानिए या बेटा लेकिन हमारे साथ भेदभाव न करिए. जैसे किस्म-किस्म के यहां फूल हैं,एक फूल हम भी हैं, जो यहां न रहें तो आखिर कहां जाएं?लिंगभेद की बातचीत को आधार बना कर लिखी गई यह पंक्ति इस पूरे गीत का मूल है. बेटोंका त्योहार कहा जाने वाला छठ बहुत सुंदर ढंग से इस बात को ख़ारिज कर चुका है. गीतोंके बोल और बदलते समाज में अब शायद ही कोई मिले जो इसे सिर्फ बेटों का त्योहार कहे.बाकी यह रूढ़िगत बदलाव समय लेते हैं. इसके बाद भी अब बेटा-बेटी के भेद को मिटा चुकाछठ, ट्रांसजेंडर्स को क्यों नहीं शरीक कर रहा है. इस सवाल के साथ यूट्यूब पर आया यहगीत फिलहाल चर्चा में है. हमने इस गीत की मुख्य किरदार कनकेश्वरी नंद गिरी से बातकी. कनकेश्वरी, किन्नर अखाड़ा की महामंडलेश्वर हैं और गोरखपुर में रहती हैं.उन्होंने बताया कि वह 1998 से गोरखपुर में हैं और बीते 12 वर्षों से छठ कर रही हैं.हमसे बातचीत में कहा कि प्रशासन और स्थानीयों के सहयोग से ही यह संभव हुआ है. लोगतो उनकी छठ की पूजा को झुंड बना कर देखने आते हैं. उन्होंने हमसे कहा, " हम छठ मइयाकी पूजा करते हैं. इस साल कोसी भी भरेंगे. पांच साल पूरा हुआ है. हम तो संतान केलिए नही रखते हैं. हम व्रत करते हैं अपने जजमानों के लिए और आम लोगों को लिए. जैसेलोग अपने संतान और सुहाग के लिए रहते हैं, तो मेरे संतान और सुहाग मेरे जजमान और आमलोग हैं. मैं उन सबके लिए छठ करती हूं." इस गीत का हिस्सा बनने को लेकर उन्होंनेकहा,"हमसे किसी के माध्यम से आदर्श मिलने आये थे. हम शूटिंग वगैरह में नहीं रहते हैंलेकिन छठी माई का गीत था, तो हमने कहा की ज़रूर करेंगे."कनकेश्वरी नंद गिरीहमने गीत बनाने वाले यूट्यूब चैनल मिसरी के संस्थापक आदर्श से बात की. आदर्श अवधविश्वविद्यालय से संगीत की पढ़ाई कर रहे हैं. अक्टूबर 2019 से यूट्यूब पर कंटेंटबना रहे आदर्श बताते हैं, "हमने इस गाने को तीन दिन में शूट किया. 1.5 लाख का बजटथा जिसमें क्राउड फंडिंग से लगभग 48 हज़ार रुपये जुट पाए थे. बाकी हमने टीम केसाथियों की मदद से इसे पूरा किया है. इस गाने में हमने थोड़ा आगे आकर सोचने कीकोशिश की है. हमारे तरफ बच्चों का जब जन्म होता है, तो ट्रांसजेंडर्स को बुलायाजाता है. नेग दिया जाता है. गीत-संगीत होता है. लेकिन उनको बाकी जगहों पर सम्मान तोदूर स्थान भी नहीं दिया जाता है. हमने कोशिश की है कि उनकी बातचीत भी लोगों के बीचआए." हालांकि छठ के गीतों में प्रयोग को लेकर भाषाविदों और भोजपुरी साहित्य आदि परकाम कर रहे लोगों के विभिन्न मत हैं. काफी हद तक बात जायज भी है. दरअसल छठ के गीतमें शब्द और आयाम दोनों बहुत सीमित हैं. घाट, दउरा, बहंगी, व्रत, घाट, सूर्य,अर्घ्य इत्यादि जैसे कुल 100-125 शब्दों के इर्द-गिर्द ही छठ के गीत हैं. ऐसे मेंइनको लेकर नए प्रयोग नहीं किये गए, इसके पीछे भी ज़रूरी कारण रहे. हमने इस विषय परभोजपुरी गीतों और साहित्य पर लंबे समय से काम कर रहे पत्रकार निराला विदेसिया सेबात की. उन्होंने कहा, "छठ के गीतों का रेंज बहुत लिमिटेड है. इन गीतों में धन यासंपदा या बदलाव की कामना नहीं की गई है बल्कि निर्दोष भाव से पति और संतान की लंबीउम्र, सलामती आदि की इच्छा प्रकट की गई है"छट पूजा का दृश्य.छठ के गीतों में हो रहे नए प्रयोगों पर निराला विदेसिया ने कहा, "देखिए, आपको आजादीकी लड़ाई में योगदान देने वाले बिरहा या कजरी अथवा अन्य विधा में गीत मिल जाएंगेलेकिन छठ के गीतों के साथ बहुत प्रयोग नहीं किए गए. इसका सीधा कारण था कि यहत्योहार शास्त्र, ब्राह्मणवाद और बाज़ार के हस्तक्षेप से बाहर का था. पुराने लोगोंने इसको ऐसे ही छोड़ देना ज्यादा ज़रूरी समझा. यह बाज़ार जुड़ा भी तो हाट औरस्थानीयता को तरजीह दी गई. बिना किसी जातिगत भेदभाव के साथ यह त्योहार मनता रहा है,इतना काफी है. छठ के गीतों की रेंज ही छोटी है. ऐसे में नए प्रयोग मूल भाव के साथन्याय कर पा रहे हैं कि नहीं ये देखना ज़रूरी है. आदर्श की टीम का यह गीत काफी हदतक इसमें सफल है. उनका काम बहुत प्रभावशाली है." फिलहाल यह गीत चर्चा में है. इसेबहुत सुंंदर ढंग से फिल्माया भी गया है. वीडियो की क्वालिटी उल्लेखनीय है. मिसरीनाम के यूट्यूब चैनल पर इस गाने को आप यहां क्लिककरके देख सकते हैं.