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वीरेंद्र कुमार सखलेचा : मध्यप्रदेश का पहला मुख्यमंत्री जो संघ की राह पर चला

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चुनावी मौसम में दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आया है पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री. आज बात मध्यप्रदेश के उस मुख्यमंत्री की, जो सही मायने में संघ की परिपाटी पर चला लेकिन जिसके चलते संघ को ही शर्मिंदगी उठानी पड़ी. नाम था – वीरेंद्र कुमार सखलेचा.

वीरेंद्र कुमार सखलेचा:क्या हुआ जब एमपी के सीएम का प्लेन काठमांडू एयरपोर्ट पर उतरा?

29 जून, 1978 की तारीख. मध्य प्रदेश सरकार का एक प्लेन काठमांडू एयरपोर्ट पर उतरा. किसी राज्य सरकार के विमान का विदेशी एयरपोर्ट पर लैंड होना आम बात नहीं थी. क्योंकि नियमों के मुताबिक, राज्य सरकार के विमान भारत की सीमा के बाहर नहीं ले जाए जा सकते. गैर-सरकारी कामों के लिए तो कतई नहीं. खैर, तो उस प्लेन में सवार था एक मुख्यमंत्री. मुख्यमंत्री, जिसने अपने संपर्क भिड़ाकर सिक्यॉरिटी चेक से बचने की खास परमिशन ली थी. नतीजा ये कि न तो भारत के और न ही नेपाल के सीमा शुल्क विभाग ने उस प्लेन और उसमें बैठे लोगों की जांच की.

वीरेंद्र सखलेचा जब प्लेन से काठमांडू पहुंचे, तो उनके हाथ में दो अटैचियां थीं. इन अटैचियों पर खूब विवाद हुआ था.
वीरेंद्र सखलेचा जब प्लेन से काठमांडू पहुंचे, तो उनके हाथ में दो अटैचियां थीं. इन अटैचियों पर खूब विवाद हुआ था.

कहते हैं मुख्यमंत्री साहब जब एयरपोर्ट उतरे, तो उनके हाथ में थीं दो अटैचियां. उनमें क्या था, कोई नहीं जानता. बातें चलीं कि उनमें रुपया था जो नेपाल के किसी बैंक में जमा किया गया. फिर किसी ने कहा कि सोना था. मज़ाक भी चला कि सोना नहीं, काला सोना था. काला सोना क्यों? क्योंकि ये सीएम साहब आते थे मंदसौर से. ये कहानी है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा की.

अंक 1 – अध्यक्ष महोदय, मैं ये कहना चाहता हूं…

मध्यप्रदेश के जिस मंदसौर में अफीम माने काले सोने की खेती होती है, वहीं की जावद तहसील में 1930 के साल में सखलेचा का जन्म हुआ. जैन परिवार था और पिता कपड़ों का अच्छा-खासा कारोबार चलाने के बाद आर्य समाज की स्थानीय शाखा के अध्यक्ष भी थे. आर्य समाज का ही असर था कि वीरेंद्र कुमार कच्ची उम्र में ही संघ के करीब आ गए. 1945 के साल में शामिल भी हो गए.

सखलेचा कम उम्र में ही संघ में शामिल हो गए थे.
सखलेचा कम उम्र में ही संघ में शामिल हो गए थे.

कॉलेज की पढ़ाई के लिए मां-बाप ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी भेजा. मंदसौर छूटा, लेकिन संघ नहीं. यूनिवर्सिटी के आसपास संघ की जो शाखाएं लगतीं, उनमें नियमित जाते. यूनिवर्सिटी में एक दिन वीरेंद्र का झगड़ा हो गया. उन्होंने एक स्टूडेंट को चाकू मार दिया. जख्म गहरा था. उस छात्र की जान चली गई. केस चला. वीरेंद्र के वकीलों ने हाई कोर्ट में साबित कर दिया कि उन्होंने आत्मरक्षा में छुरा चलाया. कोर्ट ने तर्क मानकर वीरेंद्र को बरी कर दिया. वीरेंद्र ने फिर कानून की पढ़ाई की. प्रैक्टिस भी करने लगे. लेकिन नेतागिरी का चस्का था, तो सखलेचा ने संघ से जनसंघ की दूरी बड़ी रफ्तार से तय की. वकालत छोड़कर राजनीति में आ गए.

कुशाभाऊ ठाकरे जब संघ के लिए लोग तलाश रहे थे, उनकी नज़र सखलेचा पर पड़ी और वो उन्हें पहले संघ और फिर सियासत में लेकर आ गए.
कुशाभाऊ ठाकरे जब संघ के लिए लोग तलाश रहे थे, उनकी नज़र सखलेचा पर पड़ी और वो उन्हें पहले संघ और फिर सियासत में लेकर आ गए.

इन्हीं दिनों कुशाभाऊ ठाकरे पैदल घूम-घूमकर जनसंघ की पौध रोंप रहे थे. फोकस था मध्यभारत पर, जहां संघ ने अपने शुरूआती दिनों में काम शुरू कर दिया था. जल्द ही सखलेचा पर कुशाभाऊ ठाकरे की नज़र पड़ गई. सखलेचा एकदम वैसे थे, जैसे लोग कुशाभाऊ जनसंघ खड़ा करने के लिए ढूंढ रहे थे. तेज़तर्रार और संगठन की विचारधारा के प्रति समर्पित. तो 1957 के विधानसभा चुनाव में सखलेचा जनसंघ के टिकट पर विधानसभा पहुंच गए. मुख्यमंत्री पद की ओर सखलेचा का ये पहला कदम था.

लेकिन सत्ता अभी जनसंघ और सखलेचा से बहुत दूर थी. जनसंघ का पहला काम था जहां और जितना हो सके, मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकारों को घेरना. और इसका मंच था मध्यप्रदेश विधानसभा. 1962 के चुनाव हुए तो जनसंघ ने 288 सीटों वाली विधानसभा में 41 विधायक पहुंचा दिए. कुशाभाऊ के इशारे पर सखलेचा को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. अब सखलेचा का काम था कुशाभाऊ के भरोसे को सही साबित करना. और ये मौका उन्हें मिला चार साल बाद.

सखलेचा कुशाभाऊ के संपर्क में आए और फिर बहुत तेजी से सियासत की सीढ़ियां तय कीं.
सखलेचा कुशाभाऊ के संपर्क में आए और फिर बहुत तेजी से सियासत की सीढ़ियां तय कीं.

16 मार्च, 1966 की बात है. जनसंघ के विधायक मिश्र सरकार के खिलाफ सदन में बोल रहे थे. अचानक बहस काबू से बाहर चली गई. जनसंघ के एक विधायक यशवंतराव मेघावाले ने छीनाझपटी और तोड़फोड़ की. इसी कोलाहल में धमतरी से जनसंघ के एक दूसरे विधायक पंढरीराव दत्त ने अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे सदन के उपाध्यक्ष नर्बदाप्रसाद श्रीवास्तव पर जूता उछाल दिया. पूरा सदन सन्न. डीपी मिश्र ये मौका नहीं चूके. उन्होंने प्रस्ताव लाकर मेघावाले और दत्त की सदस्यता समाप्त करवा दी.

दो विधायकों की छुट्टी के बाद जनसंघ के विधायकों में डर बैठ गया. विधानसभा अध्यक्ष जैसे ही नज़र टेढ़ी करके कहते,

‘आप बैठें. मैं कह रहा हूं आप बैठें.’

विधायक बनने के बाद सखलेचा जब सदन में पहुंचे तो वो इकलौते थे, जो सीएम डीपी मिश्र के सवालों का जवाब मज़बूती से देते थे.
विधायक बनने के बाद सखलेचा जब सदन में पहुंचे तो वो इकलौते थे, जो सीएम डीपी मिश्र के सवालों का जवाब मज़बूती से देते थे.

जनसंघ के विधायक तुरंत बैठ जाते. ऐसे में सखलेचा ही थे, जो जनसंघ की लाज बचाते थे. वो खूब बोलते. खूब सवाल उठाते. गांधी की हत्या के बाद गोलवलकर मध्यप्रदेश की सिवनी जेल में बंद थे. तो द्वारका प्रसाद मिश्र विधानसभा की कार्यवाही में संघ और गोलवलकर को घसीटने का कोई मौका नहीं छोड़ते. वो धमकी देते कि गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल और गोलवलकर के बीच हुई सारी चिट्ठी-पत्री सदन के पटल पर रख देंगे. तब सखलेचा ही आवाज़ बुलंद करते,

‘अध्यक्ष महोदय, जो व्यक्ति सदन में उपस्थित नहीं, उसका प्रसंग कैसे उठाया जा सकता है?’

विधानसभा में बहस वो पहली जगह थी, जहां सखलेचा ने संघ और जनसंघ के शीर्ष नेतृत्व को सरेआम खुश किया.

अंक दो – कुशाभाऊ का दाहिना हाथ कांग्रेस के साथ?

शायद ये सारी बातें थीं, जो वीरेंद्र सखलेचा को एक कंप्लीट पैकेज बनाती थीं. 1967 में विजयाराजे सिंधिया ने गोविंदनारायण सिंह के साथ मिलकर डीपी मिश्र की सरकार गिरा दी. इनके साथ आकर मिला जनसंघ. गोविंदनारायण सीएम बने. और जनसंघ कोटे से उपमुख्यमंत्री बना. कौन? तब ये सवाल किसी के दिमाग में आया ही नहीं. वीरेंद्रकुमार स्वाभाविक पसंद थे. ये सरकार बस 20 महीने ही चली. और कुछ हो न हो, इतना जरूर हुआ कि वीरेंद्र सखलेचा को शासन चलाने का नजदीकी अनुभव हो गया.

जब जनसंघ के समर्थन से गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने, उस वक्त वीरेंद्र कुमार सखलेचा को डिप्टी सीएम बनाया गया.
जब जनसंघ के समर्थन से गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने, उस वक्त वीरेंद्र कुमार सखलेचा को डिप्टी सीएम बनाया गया.

1972 के चुनाव में सखलेचा कांग्रेस प्रत्याशी से विधायकी का चुनाव हार गए. जनसंघ ने तुरंत उनका पुनर्वास किया. राज्यसभा भेजा. सखलेचा के दिल्ली रहते हुए ही इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी. मीसा लगा और जेल गए. लेकिन ये बात और है कि उन्हें जेल में ज़्यादा रहना नहीं पड़ा. वो अधिकतर परोल पर बाहर रहते. लोग कहते, शायद नेताजी कांग्रेस जाएंगे. तभी श्यामाचरण शुक्ल की कृपा बरस रही है. लेकिन सखलेचा जनसंघ में ही रहे.

अंक तीन – डिप्टी चीफ मिनिस्टर सखलेचा गए, चीफ मिनिस्टर सखलेचा आए

इमरजेंसी के बाद केंद्र में जनता पार्टी की सरकार आई. मोरारजी देसाई ने कई ऐसे राज्यों में भी चुनाव करवाए, जहां कांग्रेस सत्ता में थी. मध्यप्रदेश में चुनाव हुआ तो सखलेचा भी जीते और जनता पार्टी भी. जनता पार्टी सरकार का मुख्यमंत्री जनसंघ कोटे से होना था, क्योंकि वही सबसे बड़ा घटक दल था. एक बार फिर कुशाभाऊ ठाकरे ने अपने ब्लू आईड बॉय का नाम आगे किया. लेकिन समाजवादियों ने सखलेचा के नाम पर वीटो लगा दिया. तब कैलाश जोशी को मुख्यमंभी बनया गया. वीरेंद्र सखलेचा सरकार में नंबर दो बने.

जब कैलाश जोशी जनसंघ के पहले मुख्यमंत्री बने तो उस सरकार में सखलेचा नंबर दो बने.
जब कैलाश जोशी जनसंघ के पहले मुख्यमंत्री बने तो उस सरकार में सखलेचा नंबर दो बने.

वीरेंद्र सखलेचा मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे. बातें चलीं कि सखलेचा ने जोशी के खिलाफ शीत युद्ध छेड़ रखा है. और इस युद्ध को जीतने के लिए सखलेचा को ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. बस 6 महीने 25 दिन. कैलाश जोशी के पास समाजवादियों का साथ था लेकिन सेहत का नहीं. बीमार रहने लगे. इतने बीमार कि मोरारजी देसाई मध्यप्रदेश पहुंचे तो कैलाश जोशी उन्हें लेने एयरपोर्ट नहीं पहुंचे. दौरे पर सरकार की तरफ से देसाई के साथ रहे डिप्टी सीएम सखलेचा.

देसाई दिल्ली लौटे. जनसंघ के लोग ज़ोर लगा ही रहे थे. आखिर जनता पार्टी संसदीय बोर्ड की मीटिंग बुलाई गई और मध्यप्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन का ऐलान कर दिया गया. जनता पार्टी विधायक दल की मीटिंग में कैलाश सोनकर ने उम्मीदवारी ठोंकी. एक और दावेदारी थी, जो मन में रही, सामने नहीं आई. सुंदरलाल पटवा की. पटवा ने भांप लिया था कि कुशाभाऊ का वज़न सखलेचा की तरफ है. तो महत्वाकांक्षा को दिल में रखा और पाला. नतीजा ये हुआ कि सखलेचा ने सोनकर को आसानी से हरा दिया. 18 जनवरी, 1978 को सखलेचा सीएम बन गए.

अंक – 4 अटल कहिन, समाजवादियों को होशियारी से निपटाओ

अटल बिहारी वाजपेयी ने सखलेचा को सलाह दी थी कि वो समाजवादियों को होशियारी से निपटाएं. सखलेचा ने कोशिश भी की, लेकिन वो लंबे वक्त तक ऐसा नहीं कर पाए.
अटल बिहारी वाजपेयी ने सखलेचा को सलाह दी थी कि वो समाजवादियों को होशियारी से निपटाएं. सखलेचा ने कोशिश भी की, लेकिन वो लंबे वक्त तक ऐसा नहीं कर पाए.

सखलेचा सख्त प्रशासक थे. इसलिए सरकार की मशीनरी उनकी सदारत में चुस्त रहती थी. सखलेचा ने प्रदेश की 15000 पंचायतों में एक साथ पंचायत चुनाव करवाए. फिर पूरे सूबे में ग्रामीण सचिवालय खुलवाए. इसमें एक ही छत के नीचे पटवारी, ग्राम सेवक, सहकारी संस्था का समिति सेवक और पंचायत सचिव बैठते थे – यही वो लोग हैं, जिनसे एक किसान को काम पड़ता है. किसानों का भटकना कम हुआ.

लेकिन सखलेचा की एक बात जो जनता पार्टी के समाजवादियों को सबसे ज़्यादा चुभती थी, वो थी सखलेचा का खुलेआम संघ के एजेंडे पर चलना. जनसंघ से जुड़े लोगों को संगठन के लिए चप्पल घिसते हुए 3 दशक होने जा रहे थे. ऐसे में ये ज़रूरी था कि उन्हें मेहनत का सिला मिले. तो सखलेचा के कार्यकाल में संघ से जुड़े लोगों को सरकारी नियुक्तियों में तवज्जो दी जाने लगी. एक बार तो सखलेचा ने तकरीबन 100 लोगों को सब इंस्पेक्टर बनवाया. अखबारों ने लिखा कि इनमें से लगभग सभी का संघ से संबंध था. 12 साल के वनवास के बाद जब श्यामचरण शुक्ल की सरकार आई, तो उन्होंने इस मामले की जांच कराई. सखलेचा की लिस्ट में रहे कई लोगों की नियुक्ति खारिज हुई.

जब श्यामाचरण शुक्ला प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने वीरेंद्र सखलेचा की नियुक्तियों की जांच करवाई.
जब श्यामाचरण शुक्ला प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने वीरेंद्र सखलेचा की नियुक्तियों की जांच करवाई.कई नियुक्तियां रद हो गईं.

खैर, समाजवादियों ने जब दबाव बढ़ाया, तो अटल बिहार वाजपेयी को दखल देना पड़ा. पत्रकार दीपक तिवारी की किताब राजनीतिनामा बताती है कि अटल ने तब सखलेचा को सलाह दी कि समाजवादियों को होशियारी से निपटाओ. सखलेचा ने तब अपने पास ऐसे विभाग इकट्ठा कर लिए जिनका हिस्सा राज्य के बजट में 60 फीसदी तक जाता था. इससे उन्हें अपना काम करने में सहूलियत होने लगी.

अंक – 5 कुर्ते जो फट जाया करते थे

वीरेंद्र सखलेचा के शासन काल में प्रदर्शन के दौरान वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शंकर दयाल शर्मा का कुर्ता फट गया था. ये वही शंकर दयाल शर्मा थे, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने.
वीरेंद्र सखलेचा के शासन काल में प्रदर्शन के दौरान वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शंकर दयाल शर्मा का कुर्ता फट गया था. ये वही शंकर दयाल शर्मा थे, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने.

भोपाल के जिस सर्किट हाउस से सखलेचा का राजपाट चलता था, वो एक विशाल इमारत थी. लेकिन सखलेचा बैठते एक अंधेरी कोठरी में. पूरे कमरे में फाइलों का अंबार. और फाइलें कौनसी? सूबे के नेताओं पर पुलिस की इंटेलिजेंस शाखा के तैयार किए डॉज़ियर्स, जो वो खुद पुलिस मुख्यालय जाकर लाए थे. एक बार को देखने वालों के दिमाग में सिहरन पैदा होती. एक दिन विधानसभा के पास कांग्रेसियों का प्रदर्शन चल रहा था. पुलिस ने लाठी चलाई. कई कांग्रेसी नेता पिटे. प्रदर्शनकारियों में शंकर दयाल शर्मा भी शामिल थे, जो आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति बने. पुलिस की कार्रवाई में शंकर दयाल शर्मा के कपड़े फट गए. अगले दिन ये सब अखबारों में छपा. विपक्ष ने विधानसभा में भी खूब हंगामा किया. एक तरफ ये सब हो रहा था, दूसरी तरफ सखलेचा ने पुलिसवालों और होमगार्ड्स का वेतन बढ़ाने का ऐलान किया. कांग्रेस ने इसे शंकर दयाल शर्मा के कपड़े फाड़ने के इनाम की तरह लिया.

अंक 6 – जब सीएम साहब का ढिंढोरा पीट दिया गया

जनता पार्टी की सरकार का मुख्यमंत्री आसान काम नहीं हो सकता था. तो सखलेचा के लिए भी नहीं था. तिस पर काठमांडू में प्लेन उतारने वाली बात विपक्ष ने विधानसभा में भी उठा दी. इस मामले को लेकर सखलेचा की तरफ से ये सफाई दी गई कि सखलेचा सरकारी विमान लेकर सिक्किम में छुट्टियां मनाने निकले थे. वहां मौसम खराब था, तो प्लेन लेकर काठमांडू चले गए. जानते नहीं थे कि एक मुख्यमंत्री रहते हुए बिना केंद्र की इजाज़त देश से बाहर नहीं जा सकते. लेकिन कस्टम छूट की बात कहां से आई और वो सच थी या नहीं, इसपर हमेशा रहस्य रहा. काठमांडू वाली बात सखलेचा ने किसी तरह मैनेज कर ली. लेकिन इसके बाद सखलेचा के खिलाफ जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों का संदूक खुल गया.

ओमप्रकाश सखलेचा वीरेंद्र सखलेचा के बेटे हैं.
ओमप्रकाश सखलेचा वीरेंद्र सखलेचा के बेटे हैं. जब उन्होंने करोड़ों रुपये की जमीन के लिए बोली लगाई, उस वक्त उनकी उम्र महज 20 साल थी.

उनकी सबसे ज्यादा साख गिराई उनके बेटे ओमप्रकाश ने. 17 जनवरी, 1979 को ओमप्रकाश ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की एक ज़मीन के लिए 1.33 करोड़ की बोली लगाई. हालांकि बोली और आगे गई और ओमप्रकाश को जमीन नहीं मिली. मगर इतनी बड़ी बोली लगाकर वो लोगों की नजर में आ गए. चूंकि ओमप्रकाश की उम्र महज़ 20 साल थी, लोगों ने नज़र तिरछी करके देखा सखलेचा को. इसके ठीक बाद सखलेचा की पत्नी चेतन देवी ने भोपाल की प्रफेसर कॉलोनी में एक मकान खरीदा. लेकिन फॉर्म में पति की जगह लिखा पिता का नाम. इनकम टैक्स वालों ने इसपर कार्रवाई की. एक नियम के तहत कार्रवाई की मुनादी भी करवाई. फिर दूसरे बेटे राजकुमार ने एक लाख की ज़मीन 13 हजार रुपए में खरीद ली. राजकुमार खरीद के वक्त नाबालिग था, तो सखलेचा की पत्नी ने दस्तखत किए थे.

सखलेचा फंसे तो उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे की ओर देखा. लेकिन उस वक्त तक कुशाभाऊ ठाकरे के पास सुंदर लाल पटवा आ गए थे.
सखलेचा फंसे तो उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे की ओर देखा. लेकिन उस वक्त तक कुशाभाऊ ठाकरे के पास सुंदर लाल पटवा आ गए थे.

इतना सब होने के बाद सखलेचा को लेकर जनता पार्टी की खूब लानत मलानत होने लगी. विधानसभा में भी, और अखबारों में भी. सखलेचा ने सीएम रहते कांग्रेस के करीब माने जाने वाले अखबारों के विज्ञापन इस हद तक कम किए थे कि कुछ के संस्करण बंद कर देने पड़े. अब हिसाब चुकता करने की बारी थी. सखलेचा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की बड़े पैमाने पर रिपोर्टिंग होने लगी. कोर्ट के चक्कर काट-काट के सखलेचा थकने लगे. डूबने लगे. और डूबने लगे तो साथ वालों ने भी दूरी बना ली. उनकी अपनी ही पार्टी में विरोधी कम नहीं थे. एक तरफ पिछली लड़ाई हारे कैलाश जोशी दूसरी तरफ सुंदरलाल पटवा, जिन्हें सखलेचा के चलते अब तक हाशिए पर रखा था. दोनों ने ही सखलेचा को गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. संघ का धीरज टूटने लगा. सखलेचा ने कुशाभाऊ ठाकरे की तरफ देखा. लेकिन अब वो सुंदरलाल पटवा के पीछे खड़े थे. 3 मई, 1979 को मध्यप्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर चर्चा हुई. उपसभापति पर जूता तक उछालने वालों के लिए बोलने वाले सखलेचा के बचाव में जनसंघ का कोई भी बड़ा खड़ा नहीं हुआ. सखलेचा पर इस्तीफा देने का दवाब बढ़ने लगा. उधर केंद्र में जनता पार्टी की सरकार भी आपस में झांव-झांव कर रही थी. जुलाई 1979 को देसाई की छुट्टी हो गई. चरण सिंह भी आए और गए. जनता पार्टी का विघटन हो गया. लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई. सखलेचा के सिर पर किसी का हाथ नहीं रहा. 19 जनवरी, 1980 को सखलेचा से इस्तीफा ले लिया गया.

अंक 7 – संघ से उठे सखलेचा को जनसंघ वालों ने बाहर किया

जनसंघ ने सखलेचा को हटाकर सुंदर लाल पटवा को मुख्यमंत्री बना दिया.
जनसंघ ने सखलेचा को हटाकर सुंदर लाल पटवा को मुख्यमंत्री बना दिया.

सखलेचा के इस्तीफा देने के अगले ही दिन उनके धुर विरोधी सुंदरलाल पटवा को मुख्यमंत्री बना दिया गया. 29 दिन बाद केंद्र में वापस लौटीं इंदिरा गांधी ने मध्यप्रदेश में पटवा सरकार को बर्खास्त कर दिया. चुनाव हुए और कांग्रेस के अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने. नेता प्रतिपक्ष बने पटवा. सखलेचा ने खुलेआम उनको निशाना बनाना शुरू किया. कहते थे, पटवा कांग्रेस के साथ काफी नर्म हैं. पटवा और सखलेचा की लड़ाई नई नहीं थी. दोनों ही कुशाभाऊ ठाकरे की खोज थे. दोनों ही मंदसौर से आते थे. दोनों ही जैन परिवारों से ताल्लुक रखते थे. सखलेचा की ही तरह पटवा भी बहुत कम उम्र से ही संघ में आ गए थे. वो भी संघ के प्रचारक रहे थे. जब तक सखलेचा सीएम रहे, पटवा अंदर ही अंदर सखलेचा की
जड़ें काटने में लगे रहे. ये पुरानी दुश्मनी ही थी कि सखलेचा खुलेआम पटवा के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे. इस सबके चक्कर में भाजपा (ये जनसंघ का नया स्वरूप था) की बड़ी किरकिरी हो रही थी. आजिज़ आकर अगस्त 1984 में सखलेचा को भाजपा से निकाल दिया गया.

सखलेचा ने सुंदर लाल पटवा के खिलाफ इतना दुष्प्रचार किया कि पार्टी ने उन्हें बाहर निकाल दिया.
सखलेचा ने सुंदर लाल पटवा के खिलाफ इतना दुष्प्रचार किया कि पार्टी ने उन्हें बाहर निकाल दिया.

बीजेपी से निकलकर सखलेचा ने अपनी अलग पार्टी बनाई. जनता पार्टी का इतना मोह कि अपनी पार्टी का भी नाम रखा- मध्यप्रदेश जनता पार्टी. 1985 का चुनाव अपनी पार्टी के अकेले कैंडिडेट के तौर पर लड़े और हारे. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए इस चुनाव में सहानुभूति की लहर में सखलेचा तो उड़े ही, बीजेपी भी उखड़ गई. बस दो सीटें जीत पाई. इसके बाद काफी वक्त तक सखलेचा गुमनाम रहे. कोर्ट केस लड़ते रहे. 1990 में बीजेपी ने उन्हें वापस पार्टी में ले लिया. मगर शर्त रखी कि उनको कोई पद नहीं दिया जाएगा. सखलेचा शायद बेटे के भविष्य की सोचकर शर्त मान गए थे. मगर बेटे को भी जब चुनाव में टिकट नहीं मिला, तो उनका धैर्य टूट गया. मध्य प्रदेश बीजेपी में पार्टी अध्यक्ष चुना जाना था. बीजेपी लखीराम अग्रवाल को पार्टी चीफ बनाना चाहती थी. मगर बेटे की अनदेखी से नाराज सखलेचा लखीराम के खिलाफ खड़े हो गए. वोटिंग हुई. सखलेचा को मिले 68 वोट. लखीराम को मिले 123 वोट.

सखलेचा आखिरी बार तब चर्चा में आए थे, जब उन्होंने अर्जुन सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा था. नुकसान ये हुआ कि न सखलेचा जीते और न ही अर्जुन सिंह.
सखलेचा आखिरी बार तब चर्चा में आए थे, जब उन्होंने अर्जुन सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा था. नुकसान ये हुआ कि न सखलेचा जीते और न ही अर्जुन सिंह.

जून 1996 में सखलेचा ने आखिरी बार सुर्खी बनाई. सतना से अर्जुन सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा. लेकिन न सखलेचा जीते, न अर्जुन. बसपा का एक उम्मीदवार सीट उड़ा ले गया. 1999 में जब उनकी मौत की खबर आई, उसके पहले महीनों तक उनका चर्चा लोगों ने नहीं सुना था. मुख्यमंत्री के अगले एपिसोड में आपको बताएंगे मध्यप्रदेश के उस मुख्यमंत्री के किस्से जो रिस्क लेने से पहले दो बार नहीं सोचता था.


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