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इन तमाम यादों के लिए शुक्रिया, भारतीय क्रिकेट के 'लालबहादुर शास्त्री'

बहुत साल पहले की बात है. मैं शायद कक्षा-9 में था. उस वक्त मेरे दिमाग में दो चीजें सबसे ज्यादा आती थीं- क्रिकेट टीम की कप्तानी कैसे मिले और ये मैथ में पासिंग मार्क का जुगाड़ कहां से किया जाए. कप्तानी तो ख़ैर किसी तरह मिल जाती थी लेकिन मैथ के नंबर मिलने मुश्किल होते थे. ऐसे में पिताजी ने ट्यूशन लगाई. सुबह-शाम में जाना होता था. लगभग 3-4 किलोमीटर साइकिल से जाते थे, मैथ समझने की एक्टिंग करते थे और लौट आते थे.

ऐसे ही एक दिन शाम में कोचिंग की ओर निकले. वहां पहुंचे तो देखा कोई साइकिल नहीं खड़ी. हमें लगा कि कोचिंग वाले भैया कहीं गए होंगे. हमने सोचा कि अब आ गए हैं तो थोड़ी देर छिप लेते हैं, घर जाकर तो वैसे ही फिर किताब उठानी होगी. ऐसा समझ हमने साइकिल लगाई और क्लासरूम में घुस गए. वहां घुसे तो देखे कि भैया कान में रेडियो लगाए बैठे हैं. हमने कहा- अरे भैया! आज किस बात की छुट्टी करके आप यहां बैठे हैं?

# एक था सुरेश

भैया बोले- चुप रहो यार, इंडिया का बुरा हाल है. बस एक कोई सुरेश है, वही मार रहा है. हम तुरंत बोले- कौन सुरेश? रैना? भैया बोले हां, यही नाम है. तुम कैसे जानते हो? हम कहे कि भैया अखबार से जानते हैं हम. पढ़ते रहते हैं. बोले बहुत अच्छी बात है. कहां का है ये? हम बोले, यूपी का, दिल्ली के पास जो गाज़ियाबाद है, वहीं का.

इस तरह मैंने पहली बार रैना के बारे में किसी को बताया. बड़ी खुशी हुई थी उस दिन, कि कुछ तो है जिसके बारे में हम भैया से ज्यादा जानते हैं. फरीदाबाद के उस वनडे में रैना ने 81 रन की नॉटआउट पारी खेली थी. भारत ने उस मैच में इंग्लैंड को हराया था. रैना सालों तक भारत के लोवर मिडल ऑर्डर की जान रहे.

छठे नंबर पर आकर उन्होंने कई मैच अपनी बैटिंग से फिनिश किए. कमाल की साझेदारियां की. चीते की तरह मैदान में उछलते-कूदते अपनी फील्डिंग से जाने कितनी बार भारत को बचाया. शॉर्ट बॉल्स ना खेल पाने के लिए अक्सर रैना को कोसा जाता था. शॉर्ट बॉल्स के सामने रैना बुरी तरह एक्सपोज हो जाते थे और इसी के चलते उनका टेस्ट करियर लंबा नहीं चला. अपने डेब्यू टेस्ट में ही सेंचुरी मारने वाले रैना सिर्फ 18 टेस्ट ही खेल पाए.

हालांकि लिमिटेड ओवर्स में वह सालों तक भारतीय टीम के अहम प्लेयर रहे. खासकर बड़े मैचों में रैना का खेल कमाल ही हो जाता था. वह 2011 वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम के अहम सदस्य थे. इस वर्ल्ड कप के क्वॉर्टर-फाइनल और सेमी-फाइनल में वो रैना ही थे जिनकी बदौलत भारत को जीत मिली थी.

# कमाल के फिनिशर

रैना ने भारत के लिए 2015 का वर्ल्ड कप भी खेला. वर्ल्ड कप में उनके आंकड़े शानदार हैं. दो वर्ल्ड कप में कुल 9 पारियां खेलने वाले रैना कुल तीन बार नॉटआउट लौटे हैं. इन पारियों में उनके नाम 107.51 की स्ट्राइक रेट और 59.67 के ऐवरेज के साथ 358 रन हैं. रैना ने इस दौरान दो विकेट और नौ कैच भी लिए हैं. सुरेश रैना टीम इंडिया के उन सिपाहियों में से एक थे जिन्हें उनका ड्यू कभी नहीं मिला.

ना जाने कितने मैच फिनिश करने वाले इस प्लेयर को बेस्ट फिनिशर्स की लिस्ट में भी नहीं लिया गया. तमाम मैचों के उदाहरण हैं जब मैच रैना ने बनाया लेकिन बेस्ट फिनिशर नहीं कहे गए. रैना ने अपने करियर की ज्यादातर यादगार पारियां धोनी के साथ खेलीं. इन दोनों के क्रीज़ पर रहते हुए कभी किसी को संदेह नहीं हुआ कि मैच भारत नहीं जीतेगा.

फील्ड के बाहर भी रैना और धोनी के ब्रोमांस पर काफी कुछ लिखा जा सकता है. ब्रोमांस की बात होती है तो मुझे ज़्लाटन इब्राहिमोविच और मैक्सवेल याद आते हैं. नीदरलैंड्स से शुरू हुई उनकी दोस्ती, इटली, स्पेन, फ्रांस के कई फुटबॉल क्लबों तक चली और चलती ही जा रही है. साल 2001 से दोनों बेस्ट फ्रेंड्स हैं. धोनी और रैना की दोस्ती भी इस कैटेगरी में रखी जा सकती है. साल 2005 से लेकर अब तक इन दोनों की दोस्ती चली आ रही है.

दोनों सालों तक एकसाथ भारत और चेन्नई सुपरकिंग्स के लिए खेले हैं. कई लोगों का मानना है कि रैना की कई दिलकश पारियां धोनी के चलते चर्चित नहीं हो पाईं. रैना अक्सर धोनी की छाया तले ही रहे लेकिन रैना को इससे फर्क नहीं पड़ता. माही भाई उनके दिल में हमेशा से स्पेशल थे, तभी तो रैना ने माही के साथ ही क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

रैना के पूरे करियर और रिटायरमेंट की किसी से तुलना की जाए तो वह पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री हो सकते हैं. शास्त्री को नेहरू-गांधी के युग में कभी उनका पूरा क्रेडिट नहीं मिला. यहां तक कि शास्त्री के जन्मदिन, 2 अक्टूबर पर भी उनसे ज्यादा गांधीजी याद किए जाते हैं. ठीक यही रैना के साथ भी हुआ. उनकी मैच फिनिशिंग एबिलिटी और रिटायरमेंट भी दूसरे प्लेयर्स की चमक में खो गए. जैसा कि मशहूर लेखक सत्या व्यास ने कहा भी था- सुरेश रैना 2 अक्टूबर के लाल बहादुर शास्त्री हो गए हैं.


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