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जब बी आर चोपड़ा ने घोषणा की, 'मैं दूसरा मुहम्मद रफ़ी पैदा कर दूंगा'

कुछ लोग आते हैं. समाज और समय की धज को एक सिरे से बदलते हैं. कभी राम आए. कभी कृष्ण आए. कभी बुद्ध और कभी गांधी. ऐसे ही कुछ लोग आए जिन्होंने भारतीय सिनेमा की धज को बदला. उसके क्राफ्ट, संगीत और सब्जेक्ट में कुछ नया जोड़ा. गुरुदत्त, ऋषिकेश मुखर्जी, सत्यजीत रे, श्याम बेनेगल, मनमोहन देसाई, राम गोपाल वर्मा और भी ऐसे तमाम लोग. इन सबके इतर एक और डायरेक्टर-प्रोड्यूसर रहे,जिन्होंने हिंदी सिनेमा को साहस दिया. बॉलीवुड में नए विषयों पर फ़िल्म बनाने का दम भरा. आज पेश हैं उनके काम और उससे जुड़े कुछ किस्से. 

#फ़िल्म जर्नलिस्ट के फ़िल्म डायरेक्टर बनने की कहानी

बलराज चोपड़ा
बलराज चोपड़ा.

फर्स्ट वर्ल्ड वॉर शुरू होने वाला था. गांधी को साउथ अफ्रीका से लौटने में अभी एक साल बाकी था. ऐसे समय में ग़ुलाम भारत में एक पीडब्ल्यूडी एम्प्लॉई के यहां बलदेव राज का जन्म हुआ. जगह- राहों, पंजाब. तारीख़ 22 अप्रैल 1914. कुछ समय बाद परिवार लाहौर शिफ़्ट हो गया. वहां पंजाब यूनिवर्सिटी से इंग्लिश में एमए किया. 1944 में फ़िल्म जर्नलिस्ट के तौर पर सिने हेराल्ड जॉइन कर लिया. और फ़िल्म समीक्षाएं लिखनी शुरू कीं. कुछ समय बाद सिने हेराल्ड का पूरा काम उनके ज़िम्मे आ गया. काम बढ़िया चल रहा था. इसी दौरान 1947 में आई.एस.जौहर ने एक कहानी सुनाई. चोपड़ा को पसंद आई. अभी तक फ़िल्म पर लिखते ही थे, सोचा एक बना भी डाली जाए. हालांकि उन्हें फ़िल्म के क्राफ़्ट का कोई इल्म नहीं था. न कभी किसी को असिस्ट किया था. फिर भी नईम हाशमी और एरिका रुख़्शी को कास्ट किया और फ़िल्म शुरू की ‘चांदनी चौक’. नियति को कुछ और ही मंजूर था. देश का बंटवारा हो गया. लाहौर में दंगे भड़के. फ़िल्म रुक गई. उन्हें दिल्ली आना पड़ा.

#मजबूरी में फ़िल्म डायरेक्ट की और हिट हो गए चोपड़ा

बीआर चोपड़ा की पहली सफल फ़िल्म जिसमें अशोक कुमार ने डबल रोल किया
बीआर चोपड़ा की पहली सफल फ़िल्म जिसमें अशोक कुमार ने डबल रोल किया

बी आर चोपड़ा (B R Chopra) के मन में अब भी कहीं फ़िल्ममेकर बनने का ख़्वाब पनप रहा था. दिल्ली से बोरिया-बस्ता उठाकर बॉम्बे पहुंच गए. वहां लाहौर के कुछ दोस्त पहले से थे. एक नई फ़िल्म शुरू की ‘करवट’, सुपर फ्लॉप. अब क्या करते! अपनी कहानियां लेकर इधर-उधर घूमा करते. फ़िल्म में कोई पैसा लगाने को तैयार नहीं था. ऐसे में उनकी मुलाक़ात हुई प्रोड्यूसर शादीलाल हांडा से.

उन्होंने चोपड़ा से कहा : 

यार चोपड़ा तू क्या कर रहा है? 

चोपड़ा:

क्या करूं, बेकार आदमी हूं.  जो मेरे दोस्त हैं, उनके पास भी मैं नहीं जाता. मैं सोचता हूं, लाहौर से टूटकर आया हूं. रिफ़्यूजी क्या किसी का करेगा!  क्या किसी से मांगेगा!

हांडा:

मैं तुझसे कहता हूं चोपड़ा.  तू फ़िल्म बना. मैं पैसा लगाऊँगा. 

चोपड़ा:

सोचके लगाना, मेरे पास वापस करने को कुछ नहीं है.  

चोपड़ा ने स्टोरी सुनाई.  हांडा को बेहद पसंद आई. चोपड़ा पूछ बैठे:

लोग तो कहते हैं स्टोरी आज के मतलब की नहीं हैं. मैं ठहरा एक जर्नलिस्ट, मैं चाहता हूं कोई ऐसी फ़िल्म बनाऊं, जिसमें समाज का कुछ लेन-देन हो. पर लोग कहते हैं ये बेकार कहानी है. 

हांडा ने चोपड़ा को आश्वस्त किया. पर उनके सामने एक शर्त रखी. चोपड़ा चाहते थे कि इस फ़िल्म को कोई और डायरेक्ट करे. हांडा ने जिद पकड़ ली कि इसे अगर वो डायरेक्ट करेंगे, तभी फ़िल्म में पैसा लगाएंगे. चोपड़ा भी मजबूर थे. फ़िल्म न डायरेक्ट करते तो पैसे हाथ से जा रहे थे. उनके पास और कोई चारा नहीं था. उन्होंने फ़िल्म डायरेक्ट की ‘अफसाना’. फ़िल्म हिट. चोपड़ा सुपर हिट. वो कहते हैं:

इस फ़िल्म ने मुझे बलदेव से बी आर चोपड़ा बना दिया.  

#दादा मुनि जब चोपड़ा साहब से खफा हो गये 

दादामुनि और बीआर चोपड़ा की गहरी दोस्ती थी
दादा मुनि और बीआर चोपड़ा की गहरी दोस्ती थी

चोपड़ा साहब की पहली सफल फ़िल्म ‘अफसाना’ में दादा मुनि यानी अशोक कुमार ने डबल रोल किया था. इसी का एक सीन शूट होना था. चोपड़ा साहब ने अशोक कुमार से उनकी ऐक्टिंग को लेकर बात की. वो कुछ बदलाव चाहते थे. पर दादा मुनि ने इसे अपनी ईगो पर ले लिया. उन्हें लगा कि चोपड़ा पूरी यूनिट के सामने अपना रौब दिखाना चाहते हैं, वो नहीं माने. तब बी आर ने एक रास्ता निकाला. अशोक कुमार से कहा गया कि इस सीन के दो वर्जन शूट करते हैं. जो अच्छा लगेगा, फ़िल्म में डाला जाएगा. दोनों वर्जन शूट हुए. एक जैसा अशोक कुमार कर रहे थे और दूसरा जैसा चोपड़ा साहब चाहते थे. रील देखी गयी. खुद अशोक कुमार को चोपड़ा वाला वर्जन ज़्यादा अच्छा लगा. उन्होंने माफ़ी मांगते हुए कहा: चोपड़ा तुम अब जैसा कहोगे, आगे से वैसा ही होगा.  

#बी आर चोपड़ा ने बनाया आशा का करियर

नया दौर के कलर ऑडियो रिलीज के दौरान यश चोपड़ा, दिलीप कुमार, आशा भोंसले, बीआर चोपड़ा और रवि चोपड़ा (बायें से दायें)
नया दौर के कलर ऑडियो रिलीज के दौरान यश चोपड़ा, दिलीप कुमार, आशा भोंसले, बी आर चोपड़ा और रवि चोपड़ा (बायें से दायें)

1955 में चोपड़ा ने अपना प्रोडक्शन हाउस खोल दिया: बी आर फिल्म्स. इसके बैनर तले फ़िल्म बनायी, ‘नया दौर’. फ़िल्म में दिलीप कुमार और वैजयंती माला ने मुख्य भूमिकाएं निभाई. इस फ़िल्म ने बी आर चोपड़ा के करियर और बी आर फिल्म्स दोनों को आकाश की बुलंदियों पर पहुंचा दिया. उन्होंने कई प्रतिभाओं को भी आकाश की बुलंदियों पर पहुंचने का मौक़ा दिया. उन्हीं में से एक थीं आशा भोंसले. उनका करियर संवारने में चोपड़ा साहब की अहम भूमिका रही. पचास के दशक में जब आशा को केवल बी और सी ग्रेड फ़िल्मों में ही गाने का मौका मिला करता था, उस समय बी आर चोपड़ा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और ‘नया दौर’ में गाने का मौका दिया. यह फ़िल्म आशा भोंसले के करियर की पहली सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई. 

उड़े जब-जब जुल्फें तेरी, कंवारियों का दिल मचले…

इसके बाद तो एक सिलसिला चला, ‘वक़्त’ ‘गुमराह’, ‘हमराज’, ‘आदमी और इंसान’. आशा स्टार बन गईं.

#’मैं दूसरा मोहम्मद रफ़ी पैदा कर दूंगा’

बीआर चोपड़ा, नौशाद और मोहम्मद रफ़ी
बीआर चोपड़ा, नौशाद और मोहम्मद रफ़ी

शुरुआती दिनों में रफ़ी साहब बी आर चोपड़ा की फिल्मों में आवाज़  दिया करते थे. उदाहरण के लिए ‘नया दौर’ को ही लें ले. पर बाद के दिनों में कुछ ऐसा हुआ कि रफ़ी को यश चोपड़ा से अलग होना पड़ा. कहते हैं चोपड़ा ने एक बार रफ़ी साहब से कहा: अब आप सिर्फ़ बी आर फिल्म्स के लिए ही गाने गाएंगे. रफ़ी ने साफ़ इनकार कर दिया. उन्होंने कहा: आप मुझे बांध नहीं सकते. यह आवाज़ ऊपर वाले की देन है. जो बुलाएगा उसकी फ़िल्म में गाऊंगा. चोपड़ा ने ये बात दिल पर ले ली. ‘अब तुम्हें मेरी किसी फ़िल्म में गाने का मौक़ा नहीं मिलेगा’. साथ ही दूसरे प्रोड्यूसर्स से भी रफ़ी को काम देने से मना कर दिया. और बोले:

मैं दूसरा मोहम्मद रफ़ी पैदा कर दूंगा. 

उन्होंने कोशिश भी की. महेंद्र कपूर को उनके बरअक्स खड़ा करने का जतन किया. रफ़ी साहब को टक्कर देना तो मामूली बात नहीं. पर चोपड़ा और रफ़ी के झगड़े का महेंद्र कपूर को फायदा मिला. उन्होंने बी आर फिल्म्स के लिए खूब गाने गाए. उनका करियर जमकर चमका. संगीतकार रवि ने चोपड़ा साहब के साथ कई फिल्में कीं. वो रफ़ी साहब को बहुत पसंद करते थे. वो चाहते थे कि रफ़ी वापस लौटें. पर चोपड़ा अड़े रहते. कई सालों बाद यश चोपड़ा ने एक फ़िल्म बनायी ‘वक़्त’. उन्होंने अपने भाई को मनाया, बी आर चोपड़ा माने. और रफ़ी साहब ने उस फ़िल्म में गाना गाया:

वक़्त से दिन और रात, वक़्त से कल और आज 

वक़्त की हर शै गुलाम, वक़्त का हर शै पे राज

#जब मधुमाला के पिता ने बी आर चोपड़ा पर केस कर दिया 

पहले नया दौर में बीआर चोपड़ा ने मधुबाला को कास्ट किया था
पहले नया दौर में बीआर चोपड़ा ने मधुबाला को कास्ट किया था

बी आर चोपड़ा की ‘नया दौर’ से एक किस्सा बहुत मशहूर है. ‘नया दौर’ का इनडोर शूट शिड्यूल पूरा हो चुका था. अब बी आर चोपड़ा आउटडोर शूटिंग के लिए भोपाल से सटे ग्रामीण इलाके बुधनी में जाने की तैयारी कर रहे थे. मगर मधुबाला के पिता ने अपनी बेटी को वहां भेजने से मना कर दिया. चोपड़ा साहब ने मधुबाला के पिता को बहुत मनाया मगर वो नहीं माने. उनका मानना था कि आउटडोर शूट पर मधुबाला और दिलीप कुमार क़रीब आ जाएंगे. चोपड़ा साहब गुस्सा हो गए. उन्होंने मधुबाला की जगह वैजयंती माला को फिल्म में ले लिया. अब क्या! मधुबाला के पिता ने उनके खिलाफ केस कर दिया, जिस कारण उन्हें महीनों कोर्ट के चक्कर काटने पड़े. इस किस्से का एक वर्जन ये भी है कि बी आर चोपड़ा ने नाराज़ होकर मधुबाला पर केस कर दिया था, ना कि मधुबाला ने चोपड़ा साहब पर.

#जब चोपड़ा ने तीन दिनों तक खाना नहीं खाया 

यश चोपड़ा ने फ़िल्मी ककहरा अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा से ही सीखा. उनकी फ़िल्म नया दौर में वो असिस्टेंट डायरेक्टर थे.
यश चोपड़ा ने फ़िल्मी ककहरा अपने बड़े भाई बी आर चोपड़ा से ही सीखा. उनकी फ़िल्म नया दौर में वो असिस्टेंट डायरेक्टर थे.

बी आर अपने छोटे भाई यश चोपड़ा को बहुत मानते थे. 1951 में यश उन्हें असिस्ट करने बॉम्बे आ रहे थे. तो उनकी माँ ने एक चिट्ठी लिख भेजी, जिसमें बी आर चोपड़ा को संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा:

इसे अपने से भी बड़ा आदमी बनाना. 

चोपड़ा साहब के मन में कहीं न कहीं ये बात दबी थी. और उन्होंने ‘धूल का फूल’ से यश को इंडस्ट्री में लॉन्च किया. इस फ़िल्म के बारे में कहा जाता है कि इसकी थीम के चलते इससे वितरकों ने हाथ खींच लिए. फिर भी चोपड़ा जिद पर अड़े रहे. यह फ़िल्म उनकी भावनाओं से जुड़ी थी. इससे उनका छोटा भाई डायरेक्टोरियल डेब्यू करने जा रहा था. कुछ न कुछ जतन करके उन्होंने फ़िल्म बनाई और अपने भाई को बड़ा आदमी बनाने की तरफ़ पहला क़दम बढ़ाया. ‘धूल का फूल’ में एक रोल के लिए पहले राजकुमार को साइन किया गया था. राजकुमार ने शर्त रखी कि शूट के दौरान हमेशा बी आर चोपड़ा को सेट पर मौजूद रहना होगा. बी आर चोपड़ा को बात नहीं जमी. उन्होंने राजकुमार को बाहर का रास्ता दिखाया और अशोक कुमार को फ़िल्म में साइन कर लिया. ‘वक़्त’ और ‘दाग’ जैसी फिल्मों ने यश को बॉलीवुड में स्थापित कर दिया था. कहते हैं जब अपनी शादी के बाद यश हनीमून से लौटे, तो बी आर चोपड़ा से बिना बताए, 1970 में यशराज फिल्म्स की घोषणा कर दी. इस पर चोपड़ा टूट गये.  वो 6 महीने बिस्तर पर रहे. तीन दिनों तक उन्होंने खाना नहीं खाया. हालांकि बाद में यशराज फिल्म्स और बी आर फिल्म्स ने एक साथ कई फिल्में प्रोड्यूस कीं.

#विदेशी डायरेक्टर के चैलेंज पर बिना गानों की फ़िल्म बना डाली 

कानून फ़िल्म के शूट के दौरान बीआर चोपड़ा एक सीन समझाते हुए
कानून फ़िल्म के शूट के दौरान बीआर चोपड़ा एक सीन समझाते हुए

एक बार किसी विदेशी फ़िल्म निर्देशक ने बी आर चोपड़ा को ललकार दिया था. चोपड़ा साहब किसी फ़िल्म फेस्टिवल को अटेंड करने विदेश गये थे. उनसे वहां एक डायरेक्टर ने कहा: हिन्दुस्तानी सिनेमा सिर्फ़ नाच-गाने और ड्रामेबाजी है. बिना गानों के भारतीय सिनेमा का अस्तित्व ही नहीं है. बीआर चोपड़ा ये कैसे मान लेते! उन्होंने कहा: चैलेंज एक्सेप्टेड और एक प्रयोग किया. बना डाली एक बिना गानों की फ़िल्म ‘कानून’. जो उस समय एक अजूबा थी. क्योंकि वो बॉलीवुड का एक ऐसा दौर था, जिसमें  बिना गानों की फ़िल्म को स्वीकार नहीं किया जा सकता था. पर बी आर तो ‘चोपड़ा’ थे. उन्होंने फ़िल्म बनाई और फ़िल्म चली भी.

# किशोर कुमार ने रखी टेढ़ी शर्त

किशोर कुमार अपने अतरंगी मिजाज के लिए मशहूर थे. यह किस्सा उसी की बानगी है.
किशोर कुमार अपने अतरंगी मिजाज के लिए मशहूर थे. यह किस्सा उसी की बानगी है.

अशोक कुमार और बी आर चोपड़ा बहुत अच्छे दोस्त थे. चोपड़ा साहब उनके भाई किशोर कुमार को एक फ़िल्म में लेना चाहते थे. किशोर से बी आर मिलने पहुंचे. किशोर कुमार काम करने को राजी भी हो गए. पर चोपड़ा के सामने एक शर्त रख दी. चोपड़ा साहब, दौड़कर अशोक कुमार के पास गए. इस पर अशोक ने शर्त पूछने के तुरंत बाद किशोर को फोन लगाया और कहा:

तुझे चोपड़ा जी की फिल्म में काम नहीं करना है क्या!

इस पर किशोर का जवाब था:

मैंने मना नहीं किया, बस वो मेरी शर्त मान लें. 

किशोर कुमार की शर्त थी कि बी आर चोपड़ा को धोती और उस पर जूते-मोज़े पहनकर आना होगा. और सबसे बड़ी शर्त:

मुझे साइन करना है तो पान खाकर आइए. वो भी ऐसे कि लार टपकी हुई हो, जिससे आपका मुंह लाल-लाल नज़र आए.

जबकि वो जानते थे कि चोपड़ा न तो धोती पहनते हैं और न ही पान खाते हैं.  दरअसल एक बार जब किशोर कुमार उनके पास काम मांगने गये थे, तो चोपड़ा ने उनके सामने कुछ शर्तें रखीं थी. तब किशोर ने कहा था: आज मेरा बुरा वक़्त है तो आप शर्त रख रहे हैं, जब मेरा वक़्त आएगा तो मैं भी आपके सामने शर्त रखूंगा.

# सोशल इशू बेस्ड फिल्में बनाने का बीड़ा उठाया

बीआर चोपड़ा की फिल्में
बीआर चोपड़ा की फिल्में

जब बॉलीवुड फिल्में बनाने के लिए कुछ गिने चुने विषयों पर निर्भर था. या तो अमीर बाप की बेटी को गरीब लड़के से प्यार हो जाता था. या फिर एक ऐसा हीरो जो सब कुछ करने में समर्थ है, अजेय है. यह फॉर्मूला हिट भी था. ऐसे समय में चोपड़ा ने रिस्क लिया और बी आर फिल्म्स के बैनर तले कई सोशल इशू सेंट्रिक फिल्में बनाईं. डायरेक्ट कीं. उनकी मूवीज सामाजिक और मानवीय समस्याओं पर आधारित होती थीं. जैसे, ‘एक ही रास्ता’ विधवा विवाह पर, मैन और मशीन के कान्फ्लिक्ट पर ‘नया दौर’, नाजायज़ बच्चे की समस्या पर ‘धूल का फूल’, वेश्यावृत्ति पर ‘साधना’ और एक अपने समय से आगे की फ़िल्म ‘कानून’, जिसमें उन्होंने अबॉलिशन ऑफ कैपिटल पनिशमेंट का मुद्दा उठाया. वो कहते थे:

पत्रकार होने के नाते, मैं हमेशा सोचता हूं कि किसी फ़िल्म में किस तरह से कोई सोशल कंटेन्ट हो सकता है. यह फ़िल्म को एक थर्ड डाइमेंशन देने का काम करता है.

उन्होंने भारतीय दर्शकों की नब्ज़ को पहचाना और छोटे पर्दे का रुख किया. और फिर बना भारतीय टीवी इतिहास का सफलतम शो, ‘महाभारत’. जिसके लिए वो कहते हैं:

महाभारत वॉज़ दी क्रिएशन ऑफ गॉड.

बाद के दौर में जब वो बड़े पर्दे की ओर लौटे, तो ‘बागबान’ लिखी, जो भारतीय बेटों के लिए काल बन गई.

# बहुत बाद में मिला दादा साहब फाल्के पुरस्कार

तत्कालीन राष्ट्रपति ने अवार्ड ग्रहण करते बीआर चोपड़ा
तत्कालीन राष्ट्रपति ने अवार्ड ग्रहण करते बीआर चोपड़ा

चोपड़ा साहब को दादा साहब फाल्के बहुत बाद में मिला. जब वो क़रीब 85 साल के हो गये. वो कहते थे कि इससे पहले के सालों में उनसे कई बार वादा किया गया कि तुम्हें अवॉर्ड मिलेगा. पर हर बार बात झूठी साबित होती. एक बार तो अशोक कुमार ने, जो खुद ज्यूरी मेम्बर थे, फोन करके कहा:

चोपड़ा मैं ज्यूरी में था. तेरा नाम बहुमत से पास हुआ है.  

उसके बाद एक बार फ़िल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया से फोन आया कि उन्हें इस साल का दादा साहब मिलेगा. पर उस साल गौड़ा साहब ने अपने कर्नाटक के ऐक्टर राजकुमार को अवॉर्ड दे दिया. चोपड़ा साहब कहते थे:

मैंने उम्मीद छोड़ दी थी. अब मुझे क्या मिलेगा, जब इतने सालों में नहीं मिला. पर लंबे इंतज़ार के बाद 1998 में जब दादा साहब मिला तो मैं भावुक हो गया.

उन्हें काम की भूख थी. सेट पर उनके प्राण बसते थे. वो जीवन के अंतिम समय तक फिल्मों से किसी न किसी तरह जुड़े रहे. एक बार उनसे किसी ने पूछा कि इतने बड़े करियर में ऐसा क्या बचा, जो आप करना चाहते थे. उन्होंने जवाब दिया:

कुछ खास नहीं, बस मैं खाली नहीं बैठना चाहता.


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