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'शैम्पेन के घूंट' जैसे खेलने वाला वो भारतीय क्रिकेटर, जिसपर फिदा थे ऑस्ट्रेलिया के लोग

यूटिलिटी यानी उपयोगिता. न्यूज़रूम से लेकर क्रिकेट के मैदान तक, हर टीम में ऐसे खिलाड़ियों की बड़ी पूछ होती है जिन्हें कोई भी काम दे दो, वो रिजल्ट टॉप क्लास देते हैं. इन्हें कहते हैं यूटिलिटी प्लेयर्स. क्रिकेट के केस में कहें तो बैट, बॉल, फील्डिंग ग्लव्स कुछ भी थमा दो, सबमें कमाल कर देने वाले प्लेयर्स. भारतीय टीम शुरुआत से ही ऐसे प्लेयर्स के मामले में किस्मत वाली रही है. एकनाथ सोलकर के क़िस्से तो हमने आपको पहले ही सुनाए हैं. आज नंबर रुसी सूरती का. भारतीय क्रिकेट के शायद पहले यूटिलिटी प्लेयर.

रुसी को सोलकर से पहले ‘गरीबों का गैरी सोबर्स’ कहते थे. 25 मई, 1936 को सूरत में पैदा हुए रुसी के टेस्ट आंकड़े बहुत खास नहीं हैं. लेकिन उनकी उपयोगिता के क़िस्से सूरत से लेकर ऑस्ट्रेलिया के दूसरे सबसे बड़े शहर क्वींसलैंड तक फैले हैं. कहा तो ये भी जाता है कि अगर वो 20 साल बाद पैदा होते और वन डे के लेजेंड होते.

# The Great Rusi

ऑस्ट्रेलिया की शेफील्ड शील्ड में खेलने वाले इकलौते भारतीय क्रिकेटर रुसी के बारे में ऑस्ट्रेलियन पारसी केरसी मेहर होमजी का क़ोट बड़ा फेमस है. केरसी ने द गार्डियन से कहा था,

‘उसे खेलते देखना शैम्पेन के घूंट भरने जैसा है और वह फैंस को कभी ना खत्म होने वाला आनंद देता है.’

रुसी के इस ऑस्ट्रेलियन भौकाल की शुरुआत हुई 1967 में. भारतीय टीम अपने दूसरे ऑस्ट्रेलियन टूर पर थी. और मेजबानों ने यहीं पहली बार अपने जैसा विदेशी देखा. मेहर बताते हैं,

‘रुसी किसी की बकवास नहीं सुनते थे और इस बात से ऑस्ट्रेलियन खुद को अच्छे से रिलेट कर पाते थे.’

रुसी ने इस टूर के पहले दो मैचों में भारत के लिए बोलिंग की शुरुआत भी की थी. वह पेस और स्पिन दोनों ही फेंक सकते थे. वहीं, मिडल ऑर्डर में ताबड़तोड़ बैटिंग के साथ फील्डिंग में उनकी चीते जैसी तेजी तो थी ही. रुसी क्लोज फील्डिंग करते हुए जिस तरह से गेंद पर झपटते थे वैसा अंदाज दुनिया ने इनसे पहले कभी नहीं देखा था. 1967-68 के ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड टूर के बाद रुसी ब्रिसबेन के ही हो गए. उन्होंने क्वींसलैंड के लिए चार सीजन तक शेफील्ड शील्ड खेली. ऐसा करने वाले वह अभी तक इकलौते भारतीय हैं.

# Farokh के दोस्त Rusi

रुसी ने क्वींसलैंड के लिए पहली शेफील्ड शील्ड हैटट्रिक भी ली थी. दिग्गज विकेटकीपर फारुख इंजिनियर के क़रीबी दोस्त रहे रुसी ने फारुख के साथ दादर की पारसी कॉलोनी में खूब क्रिकेट खेली थी. हालांकि टीम इंडिया के लिए वह बहुत ज्यादा नहीं खेल पाए. ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड टूर पर कमाल करने के बाद वह सिर्फ तीन टेस्ट और खेले. 1969-70 सीजन में इन्हीं दो टीमों के खिलाफ खेलने के बाद उन्हें दोबारा भारतीय जर्सी नहीं मिली. विजय मर्चेंट की यूथ पॉलिसी के चलते रुसी का इंटरनेशनल करियर काफी जल्दी खत्म हो गया.

रुसी का इंटरनेशनल करियर भले ही जल्दी खत्म हो गया लेकिन उनमें एंटरटेनमेंट की कमी नहीं थी. क्रिकेट फील्ड पर उनके क़िस्से पूरी दुनिया में वर्ल्ड फेमस हैं. उनके क़रीबी मित्र रहे फारुख इंजिनियर ने ऐसा ही एक क़िस्सा क्रिकइंफो को बताया था,

‘रुसी को ‘उसका बाप का क्या गया’ बोलना बहुत पसंद था. साल 1967 के मुंबई टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के बिल लॉरी एक आसान फुलटॉस मिस कर गए. इधर सिली मिड-ऑन पर खड़े रुसी ने ऐसा होते देख लॉरी की ओर अपनी पीठ कर ली. इस हरकत से गुस्साए लॉरी कुछ बड़बड़ाए और रुसी ने जवाब में अपनी फेवरेट लाइन बोल दी. मैंने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, गुजराती में समझाया लेकिन वो कहां मानने वाला था.’

ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड टूर पर अपने करियर के चरम पर पहुंचने से पहले भी रुसी काफी नाम कमा चुके थे. साल 1959 में ही उन्हें इंग्लैंड की लेंकशर लीग का कॉन्ट्रैक्ट मिल चुका था. यहां तीन साल खेलने वाले रुसी ने 1843 रन बनाने के साथ 193 विकेट भी लिए. साल 1960 में डेब्यू करने वाले रुसी ने कुल 26 टेस्ट खेले. इन मैचों में उनके नाम 1263 रन और 42 विकेट हैं. लेकिन आंकड़े उनकी प्रतिभा के साथ कभी न्याय नहीं कर सकते. भारतीय टीम में उनके साथ रहे चंदू बोर्डे के शब्दों में कहें तो,

‘वह एक बेहतरीन ऑलराउंडर था और अगर उसने वनडे खेला होता तो काफी कामयाब रहता. दुर्भाग्य से उसके पास निरंतरता नहीं थी और इसी से उसका नुकसान हुआ. लेकिन वह एक जिगरबाज़ क्रिकेटर था. वह हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहता था.’

इस जिगरबाज़ क्रिकेटर ने 13 जनवरी, 2013 को मुंबई में अपनी अंतिम सांस ली. रुसी ने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में आठ हजार से ज्यादा रन बनाने के साथ 284 विकेट भी लिए थे.


कहानी महान भारतीय फील्डर एकनाथ सोल्कर की, जिन्हें ‘गरीबों का गैरी सोबर्स’ कहते थे

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