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23 मार्च 2003, जब पूरा देश अपनी मर्ज़ी से लॉकडाउन हो गया था!

5 मार्च, 2020. सिडनी में ज़ोरदार बारिश हो रही थी. दिन में ही अंधेरा छा गया था. लग रहा था कि आज बारिश किसी को भी घर से बाहर नहीं निकलने देने वाली. सिडनी पर उस दिन पूरी दुनिया की नज़र भी थी. वजह था वुमेन्स टी20 क्रिकेट विश्वकप सेमीफाइनल. सिडनी में इंडिया और इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका के बीच सेमीफाइनल होने थे. लेकिन बारिश की वजह से टीम इंडिया का मैच नहीं हुआ. मेरी याददाश्त में वो शायद पहला ऐसा मौका था, जब मौसम या किसी भी तरह की रुकावट वाले मैच में भारत का पलड़ा भारी था. ग्रुप स्टेज टॉप करके टीम फाइनल में पहुंच गई. फाइनल था इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच. विश्वकप फाइनल, वो भी इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच.

महेंद्र सिंह धोनी
महेंद्र सिंह धोनी

नाइंटीज़ में पैदा हुए ना जाने कितने बच्चों ने उस दिन पलक झपकाई और 2003 में पहुंच गए. क्यों? बताते हैं. 2011 की धोनी की छक्का मारती जो तस्वीर आप अक्सर टीवी पर देखते हैं, उस तस्वीर और 1983 में कपिल पाजी की ट्रॉफी उठाती तस्वीर के बीच एक तस्वीर और थी. जो आई साल 2003 में. जब सचिन ने पुल शॉट खेला, लेकिन गेंद छह रन के लिए नहीं गई. गेंद गई हवा में उछलते हुए ग्लेन मैक्ग्रा के हाथों में.

2003 में मेरी क्रिकेट की दीवानगी ऐसी थी कि बजरी-कंकड़ वाली सड़क पर भी डाइव मारकर गेंद को पार जाने से रोक लूं. 23 मार्च को फाइनल मैच था. टीम इंडिया टॉस जीती, तो ये भी नहीं देखा कि इंडिया पहले बोलिंग करेगा या बैटिंग. जल्दी से खाना खाया और मैच लगाकर बैठ गया. उम्मीद थी कि सचिन और वीरू आते ही होंगे. मैक्ग्रा और ली को दिखाने के लिए कि अब ये इंडिया किसी से नहीं डरेगा. लेकिन ये क्या हुआ. गिलक्रिस्ट और हेडन मैदान पर उतर रहे हैं. उधर दादा टीम को चियर करते हुए सबको लेकर आगे बढ़ रहे हैं.

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केन्या के खिलाफ मैन आफ दि मैच लेते दादा. फोटो: Getty Images.

मतलब पहले बोलिंग करेंगे. दिल इसे एक्सेप्ट ही नहीं कर रहा था. लेकिन दिमाग ने कहा कि नहीं शायद कुछ बढ़िया ही सोचा होगा. लेकिन उसके बाद जो हुआ, एक-एक बॉल के साथ उम्मीदें शांत होती जा रही थी. हालांकि मैं हमेशा वो वाला फैन था. जो उस दौर में भी आखिरी गेंद पर आठ रन चाहिए तो भी जीत की उम्मीद रखता था. क्योंकि मैं सोचता था अभी नो या वाइड बॉल हो सकती है.

ये उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि 23 मार्च 2003 को हुए मुकाबले से पहले भारत के उन 15 खिलाड़ियों का प्रदर्शन ऐसा था कि मानो दिल में एक ही बात थी. 1983 नहीं देखा, लेकिन 2003 देखा है. सचिन ने उस मैच से पहले टूर्नामेंट में धमाकेदार पारियां खेलते हुए 669 रन ठोक दिए थे. नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया, ज़िम्बाबवे, नामीबिया, इंग्लैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका या केन्या. कौन सा ऐसा देश था. जिसके खिलाफ सचिन 2003 विश्वकप में नहीं बरस रहे थे.

मानो सचिन इस बार ठान कर उतरे थे कि दुनिया को बता देना है. क्रिकेट विश्वकप का मतलब सचिन रमेश तेंडुलकर होता है. सचिन को लेकर विश्वकप फाइनल में जो विश्वास पैदा हुआ. इसकी खास वजह थी. पाकिस्तान के खिलाफ खेली उनकी 98 रनों की पारी. इस पारी में 150 की रफ्तार पर गेंदबाज़ी करने वाले शोएब अख्तर पर शुरुआत में ही सचिन ने ऐसा छक्का मारा कि मानो पाकिस्तानी फैंस के लिए मैच वहीं खत्म हो गया. और हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद हो गया.

सचिन के अलावा आशीष नेहरा ने इंग्लैंड के खिलाफ पैर में सूजन के बावजूद छह विकेट चटकाए थे. वही कप्तान सौरव गांगुली टूर्नामेंट में सचिन के बाद दूसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ थे. सहवाग ने भी कई बार सचिन का बखूबी साथ निभाया. द्रविड़ और युवराज ने लगातार कई मौकों पर शानदार प्रदर्शन करके टीम को मुश्किल हालात से निकाला था. कुल मिलाकर उम्मीदें बहुत ज्यादा थी.

मैच शुरू हुआ. लेकिन भारतीय गेंदबाज़ी के 50 ओवर में क्या हुआ था. ये बताकर मैं फिर से पोंटिंग को याद करना नहीं चाहूंगा. क्योंकि ये तो आप पिछले 17 सालों से सुनते आ रहे हैं. पारी खत्म हो गई थी. स्कोरबोर्ड पर उतने रन थे. जो कि उस ज़माने में जीत के स्कोर से भी लगभग 70-80 रन ज्यादा थे. लेकिन फिर भी दिल में उम्मीद थी. उम्मीद थी सचिन तेंडुलकर से. वो ही सचिन जिनका वो रिकॉर्ड 17 साल बाद भी नहीं टूटा है. वही सचिन जो अपने मन से गेंदबाज़ से गेंदबाज़ी करवाते थे.

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विश्वकप 2003 के दौरान सचिन तेंडुलकर और सौरव गांगुली की तस्वीर. फोटो: Getty Images

सबकी नज़रें सचिन पर थीं. क्योंकि खुद क्रिकेट के बड़े वाले प्रवक्ता हर्षा भोगले ने मैच से पहले ही ये भविष्यवाणी कर दी थी. कि ऑस्ट्रेलिया और ट्रॉफी के बीच सचिन रमेश तेंडुलकर खड़े हैं. 2003 विश्वकप में गोल्डन बैट से बल्लेबाज़ी करने वाले सचिन फाइनल की पांचवी गेंद पर मैक्ग्रा की गेंद पर कैच देकर आउट हो गए. जो 130 करोड़ लोग 23 मार्च, 2020 के दिन लॉकडाउन हैं, 17 साल पहले वो बिना किसी के कहे 23 मार्च के दिन ही लॉकडाउन हो गए थे. कुछ करोड़ कम होंगे बस. पूरा देश खामोश था. क्या हुआ था? सपना चकनाचूर हो गया था. सचिन और गांगुली के आउट होने के बाद पूरा देश जीत की दुआएं कर रहा था और ‘मैं’ लाइट की. सचिन क्या आउट हुए मानो बिजली विभाग ही रूठ गया था. बिजली चली गई. घर के पड़ोस में एक भइया थे, जिन्होंने बैट्री के जुगाड़ से टीवी लगाया और गली के सब लोग उनके घर के बाहर खड़े होकर मैच देखने लगे.

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विश्वकप फाइनल में विकेट गंवाने के बाद राहुल द्रविड़. फोटो: Getty Images

दादा के बाद कैफ भी आउट हो गए थे. दादा ने टूर्नामेंट में दूसरे सबसे ज्यादा रन बनाए थे. लेकिन क्या फायदा फाइनल में तो वो रन काम नहीं आ सके. फिर द्रविड़ ने सहवाग के साथ मिलकर स्कोर 147 रन तक पहुंचाया लेकिन इस दौरान वह जब तक विकेट पर थे तो ये नहीं लग रहा था कि जीत पक्की है. सहवाग तेज़ खेल रहे थे लेकिन स्कोर, वो तो ऐसा था कि मानो रातभर में हनुमान जी को लंका से ऋषिमुख पर्वत पर जाकर संजीवनी लानी हो. पर वो हनुमान जी थे, कर गए. इधर सुपरपावर्स तो वैसे भी ऑस्ट्रेलिया की तरफ ही दिख रही थी.

24वें ओवर में वीरू के आउट होते ही अब क्रिकेट को करीब से देखने वाले समझ गए थे कि अब बस हो गया. लेकिन मैं अब भी ये सोच रहा था कि पिछले साल ही तो नेटवेस्ट में इंग्लैंड को हराया है. अभी तो युवी भी है. वो करेगा, वो भी द्रविड़ के साथ मिलकर. लेकिन धीरे-धीरे सब वापस लौटते चले. और फिर वो सपना टूट गया जो दादा की टीम ने पूरे देश को दिखाया था.

2003 विश्वकप वो ही तस्वीर बनकर रह गया. जिसे 1983 और 2011 के बीच के फ्रेम में होना था. लेकिन उस एक दिन की चूक ने इस सपनें को और ना जानें कितने दिलों को तोड़ दिया.


1983 वर्ल्ड कप फाइनल में मदन लाल और कपिल देव का ये किस्सा रोंगटे खड़े करने वाला है 

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