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दिल में छेद लिए पैदा हुई एक्ट्रेस के तीन किस्से, जिनका जन्मदिन वैलेंटाइन डे को ही संभव था

प्रेम. ये एक बहुत भारी शब्द है. बहुत अजब सा एहसास है. जिसे लेकर मेरी समझ उतनी ही है जितनी डॉनाल्ड ट्रंप की पॉलिटिक्स को लेकर. लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि अगर प्रेम का कोई चेहरा होता, अगर इसका परसोनिफिकेशन, यानी मानवीयकरण किया जाता, तो जो चेहरा बनता वो यकीनन मधुबाला का चेहरा होता. और इसलिए इस एक्ट्रेस का जन्मदिन वैलेंटाइन डे को ही संभव था.

मधुबाला. जिससे इश्क नहीं हो सकता. क्यूंकि वो खुद इश्क है. गोया कोई रोशनी, जो दिखती नहीं, दिखाती है. सबकुछ. हर शै.

वो इश्क है इसलिए पूरे कॉन्फिडेंट से कहती है, ‘शौक से लीजिए जी, इश्क के इम्तहां.’ लेकिन क्या इश्क से भी इश्क के इम्तहां लिए जा सकते हैं? वो क्या कहा था राजेंद्र प्रसाद के लिए- परीक्षार्थी, परीक्षक से बेहतर है.

वो इश्क, वो मधुबाला जब चिढ़ाती है तो, ’पांच रुपय्या बारह आना’ हो जाती है, जब चिढ़ती है तो, ‘एक लड़की भीगी-भागी सी हो जाती है.’ वो ‘इश्क’ जब नारा लगाता है तो, अकबर का दीवाने ख़ास, शाहीन बाग़ हो जाता है. ‘छुप न सकेगा इश्क हमारा, चारों तरफ है उनका नज़ारा.’

वो मधुबाला जब रूठती है तो, ज़िंदगी रूठ जाती है. वो मधुबाला जब मनाती है तो, मन करता है ता-उम्र रूठे रहें, ’अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ न…’

मधुबाला. जिसके चलते अफसोस होता है कि आधी सदी देर से पैदा हुए हम. मधुबाला. जिसके चलते ख़ुशी है कि लाखों प्लैनेट्स और असंख्य पैरलल वर्ल्ड्स में से हम वहां जन्मे, जहां वो जन्मीं. मुझे यकीन है कि जब दुनिया नष्ट हो रही होगी तो कोई मिस्टर नोबडी अपने स्पेसक्राफ्ट में मधुबाला की कोई सीडी ज़रूर रख लेगा. स्पेस के सन्नाटे में अचानक चारों ओर गूंजने लगेगा- मोहे पनघट पे नंदलाल.

हॉलीवुड की साई फाई मूवी 'मिस्टर नोबडी' का एक सीन जिसमें स्पेसशिप में एक तरफ इंसान यात्रा के दौरान लंबी नींद में सोए हैं, दूसरी तरफ एक मूवी का सीन चल रहा है. मूवी का नाम 'मुग़ल ए आज़म'. गीत,'मोहे पनघट पे'.
हॉलीवुड की साई फाई मूवी ‘मिस्टर नोबडी’ का एक सीन जिसमें स्पेसशिप में एक तरफ इंसान यात्रा के दौरान लंबी नींद में सोए हैं, दूसरी तरफ एक मूवी का सीन चल रहा है. मूवी का नाम ‘मुग़ल ए आज़म’. गीत,’मोहे पनघट पे’.

अगर मधुबाला की बायोपिक बनी तो उसमें तीन पुरुष ज़रूर होंगे. उनके पिता, अताउल्ला खां. जिन्होंने मधुबाला को ग्रूम किया. दिलीप कुमार. जिन्होंने उनसे प्रेम किया. किशोर कुमार. जिन्होंने उनसे शादी की.

ये 10 अगस्त, 2017 को कहा गया था. नई दिल्ली के मैडम तुसाड संग्रहालय में. मधुबाला की मोम की मूर्ती के अनावरण के वक्त. और ये कहना था मधु की छोटी बहन मधुर भूषण का. अपनी दीदी के बारे में मधुर भूषण की बातें खत्म नहीं होतीं. उन्होंने आगे बताया-

प्लीज़ मेरे पिता को बदनाम न करें. दिलीप साब के साथ आपा के ब्रेक-अप के लिए अब्बा जिम्मेदार नहीं थे और न ही उन्होंने किशोर भैया के साथ कुछ ग़लत किया. यदि आप मिर्च-मसाला जोड़कर बातें कहना चाहते हैं, तो मैं आपके साथ नहीं हूं.

मधुबाला की मौम की मूर्ती के साथ उनकी छोटी बहन
मधुबाला की मौम की मूर्ती के साथ उनकी छोटी बहन.

नफ़रत. एक बहुत स्ट्रॉन्ग शब्द है. तो नहीं नफ़रत नहीं, दिक्कत. दिक्कत है हर उस बाप से जो अपनी बेटी को उसकी मर्ज़ी से शादी नहीं करने देता. जैसे मुमताज़ जेहन बेगम देहलवी के पिता ने उसे न करने दी. मुहम्मद युनुस खान से.

मुमताज़ जेहन बेगम देहलवी. यानी मधुबाला. एक खुशमिजाज़ दुःख. मुहम्मद युनुस खान. यानी दिलीप कुमार. एक तुनकमिजाज प्रेमी. जिन्होंने कह दिया था मधुबाला से, ‘अगर आज आप न मानीं तो मैं कभी लौटकर वापस न आऊंगा.’

प्रेम दूसरा मौका नहीं देता, लेकिन प्रेम को दूसरा मौका दिया जाना चाहिए था. यूं दिक्कत हर उस प्रेमी से भी है, जो अपनी ईगो, अपने प्रेम से बड़ा कर लेता है.

# जब मधुबाला और उनके परिवार की ज़िंदगी फिल्मों ने बचाई-

पुलिसवाला: तुम बुरका पहन के कैसे गाड़ी चला रही हो? ऐसे तो तुम्हारा एक्सीडेंट हो जाएगा.

लड़की: आप कौन होते हैं बोलने वाले?

पुलिसवाला गुस्से में आ जाता है. गाड़ी का नंबर नोट करता है और लड़की को लगभग आदेश देते हुए बुरका ऊपर करने को कहता है.

लड़की: चौंक जाओगे अगर मैं आपकी रिक्वेस्ट मान लूंगी. आप कहेंगे, ‘जाइए जी जाइए.’

पुलिसवाला ज़िद में अड़ा रहता है. लड़की धीरे-धीरे अपना पर्दा उठाती है….

रविश कुमार को न्यूज़ चैनल देखना पसंद नहीं है. हलवाई अपनी मिठाई नहीं खाता. लेकिन मधुबाला को फ़िल्में देखना बहुत पसंद था. वो शूट से वापस आतीं, अपना मेकअप उतारतीं. पहचान लिए जाने के डर से बुरका पहनतीं और अपने भाई-बहनों को लेकर नज़दीकी सिनेमाघर की ओर निकल पड़तीं.

2008 में रिलीज़ हुआ एक रसीदी टिकट.
2008 में रिलीज़ हुआ एक रसीदी टिकट.

एक बार ड्राइव करते हुए मधुबाला को एक पुलिसवाले ने रोक लिया. मधुबाला ने अपना बुरका नीचे किया और अपने भाई-बहनों से बोलीं, ’अब देखो मज़ा.’

…तो लड़की धीरे-धीरे अपना पर्दा उठाती है. पुलिस वाला बुत बन जाता है. बार-बार बुदबुदाता है- मधुबाला. मधुबाला. मधुबाला….

मधुबाला की कार तेज़ी से निकल जाती है. कार के अंदर ठहाके गूंज रहे हैं.

इस दिन से पहले की बात है, कई साल पहले की. 14 अप्रैल, 1944 की. जब मधुबाला सुपर स्टार नहीं बनी थीं. ‘महल’ रिलीज़ होने में अभी 5 साल बाकी थे. मुंबई के लिए ये काली तारीख थी. इस दिन मुंबई के विक्टोरिया डॉक पर एक धमका हुआ. ये तब हुआ जब एसएस फ़ोर्ट स्टाइकाइन जहाज़ में आग लग गई. इस जहाज़ में कच्ची रूई, सोना, और हथियार था. और था डेढ़ हज़ार टन के लगभग का विस्फोटक. जब आग लगी तो दो धमाके हुए. धमाके से जहाज़ के परखच्चे उड़ गए. आसपास के जहाज़ डूब गए. साथ की बस्तियों में आग फैल गई जिसमें जलकर 800 से 1,300 लोगों की मौत हो गई.

लेकिन इस जगह में पड़ने वाली बस्ती ‘गोदी’ का एक परिवार मूवी देखने गया था. वो मधुबाला का परिवार था. ‘गोदी’ बर्बाद हो गया. लेकिन दस साल की मधुबाला की इच्छा, मधुबाला की फिल्म देखने की ज़िद के चलते, मधुबाला का परिवार बच गया था. मकान तबाह हो गया. घर रह गया था.

मुंबई एयरपोर्ट में Iifa बार एंड रेस्टोरेंट की तस्वीर.
मुंबई एयरपोर्ट में IIFA बार एंड रेस्टोरेंट की तस्वीर.

# ‘नया दौर’ जिसने मधुबाला का दिल तोड़ दिया था-

दिलीप कुमार मधुबाला को इतना पसंद करते थे कि पूना से मुंबई सिर्फ उनके लिए अप-डाउन किया करते थे.

– ये लिखा है शम्मी कपूर ने, अपनी एक किताब में.

सबसे बेहतरीन प्रेम कहानियों की एंडिंग सबसे दुखद होती है. दुःख हमें हॉन्ट करते हैं. ‘दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’ वाली कहानियां झूठी लगती हैं. वो दिल तक पहुंचने से इनकार कर देती हैं. तो चलिए एक सैड एंडिंग वाली लव स्टोरी सुनाते हैं जिसका नायक ‘ट्रैजेडी किंग’ था और नायिका ‘ब्यूटी ऑफ़ ट्रैजेडी’ थी.

मधुबाला की मूवी ‘महल’ ने धमाल मचा दिया था. वो ‘वीनस ऑफ़ दी स्क्रीन’ कहलाने लगीं. सुपर स्टार बन गईं. सुरैया ने ‘महल’ को साइन न करके लता और मधुबाला को जो दे दिया था, वो सालों तक उनके साथ रहने वाला था- आएगा आनेवाला.

और आनेवाले को, होनी को टाला नहीं जा सका. अगले 5 सालों तक मधुबाला एक अदद हिट के लिए तरसती रहीं. फिर आया 1958 का साल. ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘हावड़ा ब्रिज’, ‘काला पानी’… एक ही साल में चार-पांच सुपरहिट्स. एक ही बार में मधुबाला फिर टॉप पर थीं. लेकिन गोया उनके करियर का उनकी पर्सनल लाइफ से- एक को मनाओ तो दूजा, रूठ जाता है – वाला रिश्ता था.

1951 में एक मूवी आई थी. तराना. इसकी शूटिंग के दौरान दिलीप-मधुबाला के प्रेम की शुरुआत हुई थी. मधुबाला तब सिर्फ 17-18 साल की रही होंगी. चार पांच साल तक ये प्रेम अपने सबसे अच्छे फेज़ में था. इस बीच 1956 में एक कॉमेडी मूवी फिल्म रिलीज़ हुई, ‘ढाका की मलमल’. इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान दिलीप, मधुबाला से बोले-

घर पर क़ाज़ी इंतज़ार कर रहे हैं. चलो शादी कर लेते हैं. अगर आज आप न मानीं तो मैं कभी लौटकर वापस न आऊंगा.

मधुबाला कैसे हां कहतीं. उनके मैनेजर उनके पिता थे. जिनको ये रिश्ता, या मधुबाला का कोई भी रिश्ता पसंद न था. ये रिश्ता लगभग टूट गया. रही सही कसर ‘नया दौर’ ने पूरी कर दी.

बी आर चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ की शूटिंग शुरू होने वाली थीं. मधुबाला और दिलीप दोनों फिल्म का हिस्सा थे. सारे कॉन्ट्रैक्ट साइन हो चुके थे. फिल्म की शूटिंग शुरू होने ही वाली थी. इस बीच अताउल्ला खां ने एक अड़ंगा लगा दिया. उन्होंने कहा- मेरी बेटी, मधुबाला, आउटडोर शूटिंग नहीं कर सकती. बी आर चोपड़ा ने बाप-बेटी को कोर्ट में घसीट लिया.

उधर दिलीप भी इस कॉन्ट्रैक्ट से बंधे थे. उनको बीआर का साथ देना था, सो दिया. मधुबाला केस हारीं और साथ में दिलीप कुमार को भी.

ये दूरियां इतनी बढ़ गईं कि उधर के आसिफ़ को टेंशन हो गई. वो अपनी ज़िंदगी की सारी कमाई लगाकर इन दोनों एक्टर्स को लेकर अपना ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा करने की जुगत में थे. ‘मुग़ल ए आज़म’ को अब तक बनते-बनते सालों हो गए थे.

मुग़ले आज़म को बनने में 7 साल और ढेर सारा पैसा लगा. एफर्ट्स और आंसूं लगे. मधुबाला और बीमार रहने लगीं.
मुग़ले आज़म को बनने में 7 साल और ढेर सारा पैसा लगा. एफर्ट्स और आंसूं लगे. मधुबाला और बीमार रहने लगीं.

लेकिन मधुबाला ने पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को अलग रखा. अगर नहीं रखतीं तो शायद और ज़्यादा दिन जीतीं. क्यूंकि जब वो बीमार, बहुत बीमार थीं तब भी वो इस मूवी को पूरा करने में लगी रहीं. जब मूवी के एक गीत में उन्हें टनों वजनी बेड़ियां पहननी थीं तब वो बुखार से तप रहीं थीं. मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए…

और जब ये मूवी ‘मुग़ल ए आज़म’ आई तो उसने के आसिफ़ से लेकर मधुबाला और दिलीप कुमार से लेकर पृथ्वीराज कपूर तक को उन बुलंदियों पर पहुंचा दिया था, जहां पर अब किसी और का पहुंचना नामुमकिन था.

दिलीप कुमार ने अब सायरा बानो से शादी कर ली थी. इधर मधुबाला की बीमारी बढ़ती गई. अपने आखिरी कई सालों तक वो बिस्तर पर ही पड़ी रहीं.

बीमारी में दिलीप भी उनसे मिलने आए. मधुबाला की आंखों में आंसू थे. कभी ‘वीनस ऑफ़ दी स्क्रीन’ कहलाने वालीं मधुबाला अब ‘ब्यूटी ऑफ़ ट्रैजेडी’ नाम से जानी जाने लगी थीं. दिलीप से बोलीं-

मैं खुश हूं. मेरे शहज़ादे को शहज़ादी मिल गई.

# ‘वीनस ऑफ़ दी स्क्रीन’ कहलाने वालीं मधुबाला ‘ब्यूटी ऑफ़ ट्रेजेडी’ बन गई थीं-

जिस मधुबाला के बारे में कहा जाता था कि उनको हंसी के दौरे पड़ते थे. उस मधुबाला की आंख में आंसू देखकर दिलीप कुमार को कैसा लगा होगा? कई बार तो सैड सीन्स में भी वो अपनी हंसी नहीं रोक पाती थीं. दूसरे एक्टर को लगता था कि मधुबाला उनका मज़ाक उड़ा रही हैं. उनकी बहन ने एक बार बताया था-

मैं उनका नाम तो नहीं लूंगी, लेकिन वो एक बहुत सीनियर एक्टर थे. मधुबाला को उनके साथ एक लव सीन करना था. इस इंटेंस सीन के कई टेक हुए. हर बार जब एक्टर अपने चेहरे पर पूरे एक्सप्रेशन लाकर उनको अपने बाहों में भरने की कोशिश करता, तो मधुबाला पागलों की हंसने लगतीं और एक्टर से दूर हो जातीं. इसके बाद डायरेक्टर ने, जो चेहरों का क्लोज़-अप सीन लेना चाहते थे, सीन को बदल दिया. फिर भी आप फिल्म में देखेंगे कि जब नायक मधुबाला को गले लगा रहा है, तो रोमांटिक संवादों के बीच उनकी पीठ हिल रही है. उस शूट के दौरान वो हंसते-हंसते पागल हो गई थीं.

मर्लिन मुनरो की वो तस्वीर जिसमें उनका फ्रॉक उड़ रहा है, सदी की सबसे रोमांटिक तस्वीर कही जाती है. मुझे भी यही लगता, अगर मैंने 1951 में खींची गई जेम्स बर्क की वो 26 तस्वीरें नहीं देखी होतीं जो लाइफ मैगज़ीन में छपी थीं.

लेकिन 90 के दशक में आर्चीज़ का वो पोस्टर जेम्स बर्क की इन तस्वीरों से पहले देख लिया था. 50 रुपए का ग्लेज़्ड पोस्टर. ब्लैक एंड वाइट. जिसमें सिर्फ बिंदी का रंग लाल था. एक लाल नज़रबट्टू. ठीक वैसा, जैसा कायनात बनाने वाले ने मधुबाला के दिल में बनाया था. एक नज़रबट्टू. एक उदास कविता. मानो पैदा होने से तीन साल पहले ही एसके बटालवी ने मधुबाला के लिए भी लिख दिया हो-

असां ते जोबन रुत्ते मरना
जोबन रुत्ते जो वी मरदा
फुल्ल बने जां तारा
जोबन रुत्ते आशिक मरदे
जां कोयी करमां वाला….

(हमें तो जवानी में मरना है
जवानी में जो भी मरता है
वो फूल बनता है या तारा
जवानी में आशिक मरते हैं
या कोई अच्छे कर्मों वाला.)

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