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तबलीगी जमात ने जब पाकिस्तान में घुसना चाहा तो किन खिलाड़ियों को टारगेट किया?

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सत्य व्यास

सत्य व्यास लल्लनटॉप के पुराने साथी हैं, हाल के सालों में हिंदी के उदीयमान लेखक के रूप में उभरे हैं. बेस्टसेलर बिना कहे ही समझ लीजिए. सत्य व्यास ने ‘बनारस टॉकीज’ से नया पाठक वर्ग बनाना शुरू किया तो शहर बदल दिल्ली पहुंचे. ‘दिल्ली दरबार’ से कुछ बरस पीछे बोकारो लौटे और ‘चौरासी’ से होते हुए ‘बाग़ी बलिया’ लिखी-पढ़ाई. क्रिकेट के किस्सों में डूबे रहते हैं और कहानियां यूं सुनाते हैं कि जलन हो.

सत्य आजकल पाकिस्तानी क्रिकेटर्स और ज़मात के किस्से लिख रहे हैं. पढ़िए उन किस्सों की दूसरी किश्त


यह तो कोई छुपी हुई बात नहीं है कि पाकिस्तानी क्रिकेट मे तबलीग़ी जमात के पांव 2003 विश्व कप के बाद ही जमे, मगर तबलीग़ अपना काम बरसों से करती आ रही थी. वह जानती थी कि यदि क़ौम के नौजवानों को तबलीग की ओर आकर्षित करना है तो उसका रास्ता भारत में फिल्म और पाकिस्तान में क्रिकेट से होकर ही गुजरता है. यही कारण है कि भारतीय फिल्म अभिनेता आमिर खान के हज की खबर सुनकर जमात के मौलाना तारिक जमील साहब फौरन हज को रवाना हुए थे और एक मुलाक़ात कर आमिर से इस बाबत दरख़्वास्त भी की थी.

पाकिस्तान में यह काम बरास्ते क्रिकेट ही होना था. और इसके लिए दो जरूरतें थीं. पहला, ऐसा इंसान ढूंढना जो क्रिकेट टीम तक दखल रखता हो. दूसरा, टीम में वह इंसान ढूंढना जो नरम दाना हो और जिसे आसानी से अपनी बात मनवाई जा सके.

# किसने दी दखल?

क्रिकेट में दखल रखने का काम पूर्व कप्तान और अपने वक्त के सबसे फैशनेबल क्रिकेटर सईद अहमद को दिया गया. ध्यान रहे कि यह सईद अनवर नहीं, सईद अहमद थे. 1958-72 तक पाकिस्तानी बल्लेबाज रहे सईद नाइट क्लब के रसिया थे. इनका एक किस्सा यूं मशहूर है कि 1972 के ऑस्ट्रेलिया टूर के आखिरी मुक़ाबले में कप्तान इंतिख़ाब आलम इन्हें नंबर तीन पर उतारना चाहते थे

सईद अहमद ने सिरे से नकारते हुए छठे नंबर पर उतरने की बात रखी. इंतिख़ाब नहीं माने. मैच शुरू होने से दो घंटे पहले सईद अहमद सिडनी की उस पिच का मुआयना करने गए. और पिच पर हरी घास देखकर लौट आए. लौटते ही उन्होने खुद के अनफ़िट होने की घोषणा कर दी. उन्होंने कहा कि उनकी पीठ मे दर्द है और उन्हें प्लेइंग XI में न चुना जाये.

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Mohammad Hanif के साथ Saeed Ahmad, सईद तबलीग़ी जमात में काफी आगे तक गए (फोटो क्रिकेट थ्रिल्स से साभार)

बाद में मालूम हुआ कि टीम जब मैदान में जूझ रही थी तब सईद अहमद, क्लब में मस्त होकर नाच रहे थे. उनकी इस अनुशासनहीनता के कारण उन्हे टीम से निकाल दिया गया. यह उनका आखिरी टेस्ट रहा. हालांकि वह और खेलना चाहते थे. मगर बोर्ड के इस फैसले से उनका करियर खत्म हो गया और वह अवसाद में चले गए. वक्त ने करवट ली और उस डैशिंग खिलाड़ी को अवसाद से निकलने का एक ही उपाय सूझा- तबलीग़ी जमात. उन्होंने जमात मे प्रवेश लिया और पक्के बयान-गो बने.

# फुटबॉलर इंज़माम

हां, तो यहां जिक्र 2003 के बाद के जमाती असर का होना था. जमात पाकिस्तानी क्रिकेट में सेंधमारी के लिए मौका ढूंढ रही थी. उनकी नज़र में जो खिलाड़ी सबसे आगे था उसे लोग साहिबजादा मोहम्मद शाहिद खान आफ़रीदी के नाम से जानते हैं. लेकिन आफ़रीदी उन दिनों हवाई घोड़े पर सवार थे. सो उन पर फौरी असर जमाना उस वक्त थोड़ा मुश्किल था. इस बीच जमात को पहला मौका खुद पाकिस्तान के नब्बे के दशक के पहले पोस्टर बॉय ने दिया. पहला पोस्टर बॉय यानी- इंज़माम उल हक़.

मौके वाला यह किस्सा भी बड़ा मजेदार है. सो इसी किस्से से आज की यह पोस्ट खत्म करूंगा-

हुआ यह कि पाकिस्तानी टीम जिम्बाब्वे से लीग मैच खेलने के लिए बुलावायो में थी. एक दिन प्रैक्टिस के दौरान पाकिस्तानी टीम के कोच रिचर्ड पायबस ने टीम को दो भागों मे बांटा. और फुटबॉल मैच खेलने को कहा. इंज़माम की आदत थी कि वह प्रैक्टिस में भी बॉल अपने पास रखना चाहते थे. जिन प्लेयर्स को इस बात से कोई गुरेज न था, वह उनसे बॉल छीनने की कोशिश ही नहीं करते थे.

लेकिन यूनिस खान ऐसे नहीं थे. वह बहुत तेजी से टीम में इंजमाम का रुतबा अपनी तरफ खींच रहे थे. सो वह खेल मे टैकल करते हुए फुटबॉल लेने इंज़माम के आगे आये. इंज़माम ने बॉल तो दी नहीं, हां, एक घूंसा जरूर रसीद कर दिया. मामला गर्म हुआ तो छुड़ाने सईद अनवर दौड़े. उन्हें इंज़माम ने धकेल कर जमीन पर गिरा दिया. पायबस ने इस बवाल का निपटारा मैदान मे कराने के बजाय ड्रेसिंग रूम मे करना उचित समझा और खेल रद्द कर ड्रेसिंग रूम की ओर बढ़ गए.

मामले को तूल पकड़ता देख जब अंग्रेजी मीडिया ने सवाल किए तो कप्तान वकार यूनिस ने और भी मजेदार जवाब दिया. उन्होंने कहा कि यह कोई नयी बात नहीं है. हम जब भी फुटबॉल खेलते हैं तो ऐसा होता रहता है. ब्रिटिश मीडिया ने इस पर चुटकी लेते हुए लिखा – फिर यह टीम फुटबॉल खेलती क्यों है? क्रिकेट वह फिर भी ठीकठाक खेल लेती है.

(इंजमाम और सईद अहमद का किस्सा फिर किसी रोज)


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