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खिलाड़ियों के हाथ पर 'थूकने' वाले पाकिस्तान के सबसे बड़े बल्लेबाज़ की कहानी!

आज़ादी के बाद से पाकिस्तान के क्रिकेट में बहुत से बल्लेबाज़ आए. लेकिन 1975 से 1996 के बीच 21 सालों तक जो एक बल्लेबाज़ पाकिस्तान के लिए खेला. वैसा दूसरा उस मुल्क को नहीं मिला. उस खिलाड़ी का नाम है जावेद मियांदाद. 10, 20, 30 टेस्ट तक कोई बल्लेबाज़ 50 की औसत बरकरार रखे तो समझा जा सकता है, लेकिन मियांदाद ने 21 साल और 124 टेस्ट तक 50 के औसत को नीचे नहीं गिरने दिया.

1975, क्रिकेट का ये वो वक्त था जब वेस्टइंडीज़ और इंग्लैंड की बादशाहत बरकरार थी. जबकि एशियाई टीम अपना रुतबा बनाने की ओर बढ़ रही थी. जिस वक्त एशियाई खिलाड़ी खामोशी से विरोधी टीम की स्लेजिंग या नोंकझोंक का सामना करते थे. तब मियांदाद शायद पहले ऐसे खिलाड़ी हुए जिन्होंने उन्हें उनके ही अंदाज़ में जवाब देना शुरू किया.

मियांदाद थे तो एक बल्लेबाज़, लेकिन उनका टेम्परामेंट एक तेज़ गेंदबाज़ जैसा था. वो मैदान पर किसी भी खिलाड़ी से उलझने में माहिर थे. शायद उनका अपने खेल के स्टैंडर्ड को उठाने का तरीका यही था. मियांदाद पाकिस्तान क्रिकेट में सिर्फ एक सफल बल्लेबाज़ ही नहीं बल्कि उन्होंने एक कप्तान और कोच की भूमिका भी अदा की. अकसर भारत में मियांदाद का नाम लिया जाता है तो किरन मोरे या चेतन शर्मा की आखिरी गेंद का ज़िक्र आता है. लेकिन मियांदाद के कई और ऐसे दिलचस्प किस्से हैं. जिन्हें सुनकर पता चलता है कि वो सिर्फ क्रिकेट ही जीते थे.

1. 1988 में वेस्टइंडीज़ दौरे पर बाउंसर पे बाउंसर झेलकर पसली लाल करवा ली:

साल 1975 में जब जावेद ने टेस्ट डेब्यू किया तो वो महज़ 17 साल के थे. लेकिन देखते ही देखते वो पाकिस्तान के सबसे धाकड़ बल्लेबाज़ बन गए. वैसे तो मियांदाद का करियर ही एक कहानी है. लेकिन साल 1988 का पाकिस्तान क्रिकेट का सबसे कामयाब दौरा. यानी वेस्टइंडीज़ टूर हमेशा याद किया जाता है.

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इमरान खान और जावेद मियांदाद. फोटो: Javed Miandad FB

ये वो वक्त था जब एक ओवर में छह बाउंसर मारने पर भी कोई पाबंदी नहीं थी. वो भी ऐसे वक्त में जब वेस्टइंडीज़ और विदेशी पिचें ऐसी होती थीं, जहां पर एक गेंद कब बाउंस हो जाए और दूसरी कब बिल्कुल बल्ले के नीचे आ जाए, कुछ पता नहीं होता था. ऊपर से ऐसे वक्त में जब वेस्टइंडीज़ दुनिया की नंबर एक टीम थी और उसके पास कर्टनी वॉल्श और एम्ब्रॉस जैसे बड़े-बड़े गेंदबाज़ मौजूद थे.

ये वो वक्त भी था जब वेस्टइंडीज़ के खिलाफ खेलने वाले मैच मुश्किल से पांच दिन जाते थे. अकसर उस वक्त मुकाबले तीन या चार दिन में ही खत्म हो जाते थे. लेकिन उस दौरे के पहले मैच में ही इमरान खान की गेंदबाज़ी और फिर जावेद मियांदाद की 405 मिनट की बल्लेबाज़ी ने पहला मुकाबला पाकिस्तान के नाम कर दिया. उस पारी में मियांदाद ने कर्टली एम्ब्रोस, कर्टनी वॉल्श, पैटरसन और बैंजमिन जैसे घातक गेंदबाज़ों की 235 गेंदों का सामना किया और 114 रन बनाए.

उस पारी को खेलने के बाद जब मियांदाद वापस ड्रेसिंग रूम में लौटे और अपनी शर्ट उतारी तो उनकी पसलियों और पेट के पास के पूरे हिस्से पर लाल निशान थे. इन सभी गेंदबाज़ों ने लगातार मियांदाद के पसलियों पर गेंदें मारी. लेकिन उनकी पारी की मदद से पाकिस्तान ने तीन मैचों की टेस्ट सीरीज़ के पहले मुकाबले को जॉर्ज टाउन में 9 विकेट से जीत लिया.

2. जब अपने 100वें टेस्ट में क्रीज़ पर गज़ल गुनगुनाने लगे मियांदाद:

4 मार्च 1992. बेंसन एंड हेजेज वर्ल्ड कप में इंडिया-पाकिस्तान मैच. इस मैच का ज़िक्र आते ही एक ही तस्वीर याद आती है. पिच पर मुंह पर हाथ रखे किरन मोरे के सामने ऊंची-ऊंची छलांग लगाते जावेद मियांदाद. लेकिन मोरे और मियांदाद का एक और किस्सा भी है.

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जावेद मियांदाद फाइल.

खुद किरन मोरे ने बताया कि मियांदाद की आदत थी कि वो अकसर क्रीज़ पर होते थे कुछ ना कुछ ज़रूर बोलते थे. ऐसे में साल 1989 में भी एक बार ऐसा ही हुआ. जब भारतीय टीम पाकिस्तान गई. ये वही सीरीज़ थी जब सचिन तेंडुलकर पहली बार सीरीज़ खेलने पाकिस्तान गए. इस सीरीज़ में ही पहली बार नॉन-न्यूट्रल अंपायर भी ड्यूटी पर आए. मियांदाद उस वक्त बेमिसाल फॉर्म में थे. न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली आखिरी सीरीज़ में उन्होंने दो दोहरे शतक और एक शतक जमाया था.

भारत के खिलाफ सीरीज़ में वो खेले. कराची और फैसलाबाद के मुकाबले के बाद लाहौर में टेस्ट खेला जाना था. ये टेस्ट पाकिस्तान के लिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि पाकिस्तान के लिए पहली बार कोई खिलाड़ी अपना 100वां टेस्ट खेलने उतर रहा था. इस मुकाबले में भारत ने पहले खेलते हुए मांजरेकर के दोहरे शतक की मदद से 509 रन बना दिए. भारतीय टीम को अंडरडॉग मानने वाले पाकिस्तानी खिलाड़ी टेंशन में थे.

किरन मोरे ने इससे आगे के मैच के बारे में बताया कि,

”पाकिस्तान खेलने उतरा और खासकर मियांदाद खेलने उतरे तो संजय मांजरेकर फॉरवर्ड शॉट लेग पर खड़े थे. मैं विकेटों के पीछे था. जावेद मियांदाद क्रीज़ पर खड़े होकर कुछ गज़ल गुनगुना रहे थे. इसके बाद हमने जावेद से कहा, ‘जावेद भाई हो जाए एक और शेर’.”

मोरे ने बताया कि उनकी कोशिश थी कि वो उस मैच में जावेद का ध्यान भंग करना चाहते थे.

लेकिन ये कोशिश पूरी तरह से कामयाब नहीं हुई. मियांदाद ने अपने करियर के उस 100वें मुकाबले में 145 रनों की पारी खेली और पाकिस्तान के लिए वो मैच ड्रॉ करवाया.

3. टीम मेंबर्स के हाथ पर पीक थूकना और गर्म चाय की चम्मच खिलाड़ियों को लगा देनी:

जावेद मियांदाद सिर्फ खेल के मामले में ही आगे नहीं थे. वो अकसर टीम मेंबर्स से हंसी मज़ाक में भी माहिर थे. अकसर वो अपनी टीम के जूनियर खिलाड़ियों के साथ मज़ाकिया अंदाज़ में पेश आते थे.

अपने वक्त में जब मैच के बीच में टी ब्रेक या लंच ब्रेक होता था तो उनकी शरारत शुरू हो जाती थी. ऐसा ही एक किस्सा एक टेस्ट मैच के बीच का है. जब उन्होंने वेटर से एक गर्मागर्म चाय मंगाई. इसके बाद मियांदाद ने चाय की उस केतली में एक छोटा चम्मच डुबो दिया. जब वो चम्मच ज़ोर से गरम हुआ तो उसे निकालकर उन्होंने टीम के किसी खिलाड़ी की गर्दन पर लगा दिया. वहीं किसी की बाह पर चिपका दिया. खिलाड़ी दो घंटे का सेशन खेलने के बाद आराम करने चाहते थे. लेकिन मियांदाद कभी भी किसी को आराम करने नहीं देते थे.

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पाकिस्तान टीम के साथ मियांदाद. फोटो: Javed Miandad FB

इसी तरह से एक प्रैक्टिस सेशन के बाद जब टीम वापस होटल में जा रही होती थी. तो टीम बस में वो अपने करीबी खिलाड़ियों के पास जाकर कहते थे मैं तेरा हाथ देखता हूं और फिर हाथ देखने की बजाए वो उस हाथ पर पान की पीक थूक दिया करते थे.

4. संन्यास के बाद न्यूज़ीलैंड में 2003-04 टेस्ट सीरीज़ में खेलने की ज़िद:

वैसे तो जावेद मियांदाद को लेकर कहा जाता है कि 42 साल की उम्र में 1999 विश्वकप में वो फिर से पाकिस्तान के लिए खेलना चाहते थे. लेकिन 2003-04 सीरीज़ में तो वो पूरी तरह से खेलने के लिए पैड बांधकर तैयार हो गए.

साल 2003-04 में इंज़माम उल हक की कप्तानी और जावेद मियांदाद की कोचिंग में पाकिस्तान की टीम न्यूज़ीलैंड दौरे पर गई. वहां पर पाकिस्तान को पहले दो टेस्ट मैच की सीरीज़ खेलनी थी. लेकिन प्रैक्टिस मैच और सीरीज़ के पहले हेमिल्टन टेस्ट में ही कई पाकिस्तानी खिलाड़ी चोटिल हो गए. इंज़माम के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई कि अब कैसे अगले टेस्ट के लिए टीम को तैयार किया जाए. क्योंकि पाकिस्तान से न्यूज़ीलैंड काफी दूर था तो तुरंत रिपलेसमेंट आना भी इतना आसान नहीं था.

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जावेद मियांदाद. (दाएं)

इंज़माम खेलकर आए और ड्रेसिंग रूम में अपने पैड उतारने जा रहे थे. तो मियांदाद इंज़माम के पास आए और बोले,

”इंज़माम एक बैट्समेन बिल्कुल तैयार है, अगर तेरे पास प्लेयर्स नहीं है तो वो खेलने के लिए बिल्कुल तैयार है.”

इंज़माम ने कहा,

”जावेद भाई कौन?”

जावेद मियांदाद ने तुरंत कहा,

”मैं”

इंज़माम ने मियांदाद से कहा कि आपने कंडीशन देखी है, आपको इतना अरसा हो गया खेले हुए. कैसे खेलोगे आप.

जावेद मियांदाद ने जवाब दिया,

”मैं तो खेल लूंगा तू मेरी चिंता मत कर.”

फिर इंज़माम ने हलके-फुलके अंदाज़ में उनसे कह दिया कि

”जावेद भाई अगर आपको खेलना है तो फिर आपको पहले नेट्स में खेलना होगा.”

ये बात सुनकर मियांदाद तुरंत इंजमाम के उतारे पैड बांधकर नेट्स के लिए तैयार हो गए.

5. पाकिस्तान का भारत दौरा, 1979/80:

जावेद मियांदाद का एक यादगार किस्सा खुद लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर ने बताया था. उन्होंने बताया था कि पाकिस्तान की टीम साल 1979/80 में दौरे के लिए भारत आई. सीरीज़ का पहला मुकाबला बेंगलुरु में खेला जाना था. मैच शुरू हुआ और पाकिस्तान की टीम पहले बैटिंग करने आई. उस सीरीज़ में टीम इंडिया के स्पिनर दिलीप दोषी वापसी कर रहे थे.

जावेद मियांदाद की जैसी आदत थी कि वो अकसर गेंदबाज़ को नर्वस करने की कोशिश करते थे. उन्होंने उस मुकाबले में भी वैसा ही किया. उस मैच में जावेद दिलीप की गेंद का सामना कर रहे थे और जब गेंद को वो सीधा खेलते और गेंद दिलीप के पास जाती तो वो अपनी तोतली ज़बान में पूछते.

‘ऐ तेला लूम नंबल क्या है.’ (ऐ तेरा रूम नंबर क्या है.)

एक बार नहीं कई बार उन्होंने दिलीप से ये सवाल पूछा. ये सब देखकर विकेट के पीछे खड़े सैयद किरमानी ने भी गावस्कर से कहा कि

‘ये हो क्या रहा है.’

गावस्कर ने किरमानी को जवाब दिया.

”इसे जावेद ने शुरू किया है, वो ही खत्म करेगा.”

इसके बाद जावेद फिर से दिलीप से ये पूछने लगे कि उनके रूम का नंबर क्या है. दिलीप दोषी बार-बार ये सवाल सुनकर तंग आ गए. उन्होंने गेंद को हाथ में पकड़कर कहा,

”क्यों रूम नंबर क्यों चाहिए.”

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जावेद मियांदाद.

दोषी के मुंह से ये सुनते ही जावेद ने कहा,

”क्योंकि मेरे को तेरे रूम में सिक्स मारना है.”

इसके बाद दिलीप उन्हें लगातार गेंदबाज़ी करते रहे लेकिन वो जावेद का विकेट नहीं ले पा रहे थे. फिर दिलीप ने सोचा कि राउंड द विकेट से कोई फायदा नहीं हो रहा है. तो क्यों ना उन्हें ओवर द विकेट गेंदबाज़ी की जाए.

इसके बाद जावेद को दिलीप को खेलने में दिक्कत हो रही थी. वो स्वीप मारने की काफी कोशिश कर रहे थे लेकिन वो लगा नहीं. फिर वो हर गेंद को पैड से खेलने लगे.

एक के बाद एक कई गेंद पैड पर खेलने के बाद वो दोषी को देखकर ‘भौं-भौं’ करने लगे.

और इसके बाद दो बार और जब जावेद ‘भौं-भौं’ किया तो

अंपायर ने कहा,

”ये क्या हो रहा है.”

फिर जावेद ने जवाब दिया कि

”कुत्ते जैसी मेरी टांग पकड़ा है. मैं इसे इधर बोलिंग करने को बोल रहा हूं.”

इसके बाद उसी मैच में दिलीप दोषी ने जावेद मियांदाद को 76 के स्कोर पर एलबीडबल्यू आउट भी किया.

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जावेद मियांदाद.

जावेद मियांदाद के भारतीय टीम के साथ बहुत से किस्से हैं. जैसे चेतन शर्मा की आखिरी गेंद पर छक्का मारना. या फिर किरन मोरे के साथ उलझना. लेकिन ये किस्सा बहुत कम लोग जानते हैं.

जावेद मियांदाद ने पाकिस्तान क्रिकेट को ज़िंदगी के कुल 21 साल दिए. वो पाकिस्तान क्रिकेट टीम के मौजूदा समय में भी दूसरे सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज़ हैं. उन्होंने सिर्फ बल्लेबाज़ी और कप्तानी से ही नहीं बल्कि अपनी कोचिंग से भी पाकिस्तान क्रिकेट में जमकर योगदान दिया है.


ये हैं इंडियन क्रिकेट टीम के प्लेयर जिन्होंने इंजीनियरिंग भी कर रखी है

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