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कमाल का किस्सा उस मैच का, जब दोनों कप्तानों ने टॉस 'जीत' लिया

टॉस. स्पोर्ट्स फैंस और कप्तान दोनों ही सिक्के को अपनी ओर गिरता देखना चाहते हैं. टॉस के चलते मैच हारने के तमाम किस्से हैं. दी लल्लनटॉप समय-समय पर आपको ऐसे किस्से सुनाता रहता है. लेकिन आज बात टॉस हारने की नहीं, जीतने की है. बात उस मैच की है जब दो कप्तानों ने एकसाथ टॉस जीत लिया. जी हां, एक ही मैच में दोनों कप्तानों ने टॉस जीता.

साल था 1971 और टीम इंडिया थी वेस्ट इंडीज़ के टूर पर. सीरीज के दूसरे टेस्ट में सुनील गावस्कर डेब्यू कर चुके थे. क्रिकेट को उसका लिटिल मास्टर मिल गया था. टीम इंडिया वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ अपना पहला टेस्ट जीत चुकी थी. यह क्रिकेट पर राज कर रही वेस्ट इंडीज़ की भारत के खिलाफ पहली टेस्ट हार थी. पांच मैचों की सीरीज का पहला, तीसरा और चौथा टेस्ट ड्रॉ रहा.

# टॉस का बॉस कौन?

अप्रैल की 13 तारीख को शुरू हुए आखिरी टेस्ट में वेस्ट इंडीज़ किसी कीमत पर हारना नहीं चाहता था. टेस्ट तो दूर विंडीज़ के कप्तान गैरी सोबर्स को उस दिन टॉस हारना भी गवारा नहीं था. इधर वाडेकर भी यह टॉस हर हाल में जीतना चाहते थे. उन्होंने पिछले ही मैच में सोबर्स को 178 नॉटआउट मारते देखा था. उस मैच में रोहन कन्हाई ने भी अच्छी बैटिंग की थी. वाडेकर नहीं चाहते थे कि विंडीज़ पहले बैटिंग कर बड़ा स्कोर खड़ा कर दे. और चौथी पारी में भारत को गैरी सोबर्स, जैक नोरीगा और डेविड होलफोर्ड की बोलिंग का सामना करना पड़े. पोर्ट ऑफ स्पेन की पिच स्पिनर्स की मददगार थी और वहां पांचवे दिन बैटिंग करना आसान नहीं होता था.

Ajit Wadekar Team India 800
Nawab Pataudi की जगह Team India के कैप्टन बने थे Ajit Wadekar (फोटो, ट्विटर से साभार)

टॉस का वक्त आया. सिक्का उछला. पूरी सीरीज़ में हेड्स बोलते आए वाडेकर ने सिक्के के साथ पलटी मारी और टेल्स बोल दिया. इधर सोबर्स का पूरा ध्यान घूमते सिक्के पर था, उन्होंने वाडेकर की कॉल नहीं सुनी. इस पूरी सीरीज में सोबर्स ने वाडेकर से हेड्स ही सुना था. सिक्का गिरा और सामने दिखा- टेल्स. सोबर्स को लगा कि वह टॉस जीत गए. इधर वाडेकर अलग खुश कि आखिरकार सिक्का उनके फेवर में गिरा. अब भैया टॉस जीता तो बताना ही होगा कि- करना क्या है? तो दोनों कप्तानों ने एकसाथ कहा-

बैटिंग.

सब हैरान, एक साथ दो टीमें कैसे बैटिंग करेंगी. काफी देर तक दोनों कप्तान खड़े रहे. समझ नहीं आया कि क्या करें. अंत में सोबर्स ने वाडेकर की बात मान ली और इंडिया ने पहले बैटिंग की. सोबर्स ने वाडेकर की बात क्यों मानी इसके पीछे भी एक किस्सा है.

# जूतों की बात

दरअसल सोबर्स को वाडेकर अपना आइडल मानते थे. और सोबर्स के दिल में भी वाडेकर के लिए खास जगह थी. सोबर्स और वाडेकर के इस लगाव का किस्सा शुरू हुआ था 1966-67 में. वेस्ट इंडीज़ की टीम इंडिया टूर पर थी. मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में सीरीज का पहला मैच खेला जाना था. मैच से पहले की शाम नेट्स सेशन के दौरान सोबर्स ने एक युवा भारतीय लड़के को बैटिंग करते देखा.

सोबर्स काफी ध्यान से उसे देख रहे थे कि तभी उनकी नज़र उस लड़के के जूतों पर पड़ी. जूते बुरी तरह से फटे हुए थे. सोबर्स ने पूछा,

क्या तुम कल का टेस्ट खेल रहे हो?

जवाब मिला,

हां.

– तो तुमने ये फटे जूते क्यों पहने हैं?

– ये मेरे लकी जूते हैं.

सोबर्स कुछ नहीं बोले और वहां से चले गए. बाद में जब वाडेकर शिवाजी पार्क स्थित अपने घर पहुंचे तो वहां एक बॉक्स में नए जूते उनका इंतजार कर रहे थे.

Ajit Wadekar 800
कमाल के बैट्समैन थे Ajit Wadekar (फोटो, ट्विटर से साभार)

इस बारे में वाडेकर ने ESPNcricinfo से बातचीत के दौरान एक बार कहा था,

‘दिसंबर 1966 में मैं ब्रेबोर्न के नेट्स पर अपने टेस्ट डेब्यू की तैयारी कर रहा था. मैंने एक फटे जूतों की जोड़ी पहन रखी थी. ये जूते मेरे कॉलेज के दिनों से ही मेरे पास थे. मुझे लगता था कि यह मेरे लिए लकी हैं. मैं प्रैक्टिस कर रहा था कि एक आदमी मेरे पास आया और पूछा कि क्या मैं इस टेस्ट में खेल रहा हूं? फिर उसने मेरे जूतों का साइज भी पूछा.

बाद में मैं अपने घर पहुंचा तो मेरी मां ने कहा कि एक आदमी आया था जो मेरे लिए एक जोड़ी जूते छोड़ गया. उसने मां को अपना नाम भी बताया लेकिन इसके बाद भी मेरी मां उसे नहीं पहचान पाई. यह कोई और नहीं गैरी सोबर्स थे. वेस्ट इंडीज़ के कैप्टन. उन्होंने शिवाजी पार्क का मेरा घर खोजा और खुद जाकर मेरी मां को जूते दिए.’

ये अलग बात है कि वाडेकर के लिए इन जूतों में करियर की शुरुआत करना लकी नहीं रहा. वह अपने पहले टेस्ट में आठ और चार रन ही बना पाए.

इस किस्से की शुरुआत हमने जिस सीरीज़ से की, वह भारतीय क्रिकेट के लिए कई मायनों में खास थी. कुछ पॉइंट्स में जान लीजिए, सीरीज की हाईलाइट्स

  • पहला टेस्ट- ड्रॉ रहा. भारत की इकलौती इनिंग में दिलीप सरदेसाई ने 212 रन मारे. विंडीज़ के लिए रोहन कन्हाई ने 56 और 158 रन की पारियां खेलीं.
  • दूसरा टेस्ट- सुनील गावस्कर ने डेब्यू किया. भारत ने टेस्ट को सात विकेट से जीता. सरदेसाई ने पहली पारी में 112 रन बनाए. इसी पारी में विंडीज़ के लिए नोरीगा ने 95 रन देकर नौ विकेट लिए. दूसरी पारी में गावस्कर ने 67 रन बनाए.
  • तीसरा टेस्ट- ड्रॉ रहा. गावस्कर ने 116 और 64 रन की पारियां खेलीं.
  • चौथा टेस्ट- ड्रॉ रहा. विंडीज़ की पहली पारी में गैरी सोबर्स ने 178 रन मारे. भारत के लिए गावस्कर ने दूसरी पारी में 117 जबकि सरदेसाई ने पहली पारी में 150 रन बनाए.
  • पांचवां टेस्ट- ड्रॉ रहा. गावस्कर ने पहली पारी में 124 और दूसरी पारी में 220 रन मारे. विंडीज के लिए सोबर्स ने पहली पारी में 132 रन बनाए.
  • इस सीरीज के दूसरे मैच में मिली जीत वेस्टइंडीज़ के खिलाफ भारत की पहली टेस्ट जीत थी.
  • इस सीरीज में डेब्यू करने वाले सुनील गावस्कर ने चार टेस्ट मैचों में 774 रन मारे. गावस्कर ने सीरीज में चार सेंचुरी और एक डबल सेंचुरी बनाई.

कहानी महान भारतीय फील्डर एकनाथ सोल्कर की, जिन्हें ‘गरीबों का गैरी सोबर्स’ कहते थे

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