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अमिताभ की वो फिल्म, जिसकी हालत इंडिया के सबसे बड़े ठग ने खराब कर दी थी

1977-78 में प्रोड्यूसर बंधु टोनी और टिटो ‘राम बलराम’ नाम की फिल्म बनाने जा रहे थे. इस फिल्म में ‘चुपके चुपके’ और ‘शोले’ के बाद एक बार फिर धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन साथ आने वाले थे. लेकिन धर्मेंद्र ने जो डेट्स टोनी बंधु को दिए थे, वो किसी और प्रोड्यूसर के साथ क्लैश हो रहे थे. इसलिए फिल्म ‘राम-बलराम’ दो-तीन महीने के लिए रुक गई थी. टोनी के दिमाग में आया कि इस खाली वक्त को ज़ाया करने से बेहतर कोई फिल्म बना लेते हैं. तय हुआ कि ‘नटवरलाल’ नाम की फिल्म बनेगी. इस फिल्म को डायरेक्ट करने के लिए राकेश कुमार को चुना गया. राकेश फिल्म ‘जंजीर’ में प्रकाश मेहरा के असिस्टेंट थे. बतौर डायरेक्टर अमिताभ बच्चन को लेकर ‘खून पसीना’ (1977) नाम की सक्सेसफुल फिल्म बना चुके थे. राकेश कुमार को डायरेक्टर के तौर पर चुनने की एक वजह ये भी थी कि उनकी अमिताभ से बनती थी. और टोनी ब्रदर्स ‘नटवरलाल’ में अमिताभ को ही लेना चाहते थे. ये बात 1978- मार्च की है. कास्टिंग फाइनल हो चुकी है. अमिताभ, रेखा और अमजद खान. ये भी डन हो गया कि फिल्म को मई में कश्मीर जाकर शूट किया जाएगा. लेकिन स्क्रिप्ट या स्क्रीनप्ले कुछ भी नहीं है.

फिल्म 'मिस्टर नटवरलाल' का पोस्टर.
फिल्म ‘मिस्टर नटवरलाल’ का पोस्टर.

# गाने मांगे, तो आनंद बख्शी ने घर से निकल जाने को कहा

‘नटवरलाल’ के मेकर्स के पास स्क्रिप्ट तो थी नहीं, तो सोचा गया कि कश्मीर पहुंचकर पहले गाने शूट कर लेंगे. क्योंकि कुछ एक फनी सीन्स और गानों की सिचुएशंस पता थी. फिल्म में छह गाने रखे गए. बतौर म्यूज़िक डायरेक्टर राजेश रौशन ऑन-बोर्ड आए. अब बात यहां अटकी थी कि इतने कम समय छह गानों की लिरिक्स भी चाहिए थी और क्वॉलिटी से समझौता भी नहीं करना था. बहुत सोचने-विचारने के बाद राजेश, टोनी और राकेश कुमार गीतकार आनंद बख्शी के यहां पहुंचे. इन्होंने बख्शी जी से कहा कि तीन हफ्ते में छह गाने चाहिए. बख्शी जी ने पान चबाते हुए कहा- ”मेरे घर से बाहर निकल जाओ. मैंने दूसरे प्रोड्यूसर्स को भी वादा किया हुआ है. इसलिए मैं उनसे पहले तुम लोगों को गाने नहीं दे सकता.”

शब्दों के जादूगर आनंद बख्शी.
शब्दों के जादूगर आनंद बख्शी.

आनंद बख्शी को समझाया गया कि इन्हें सभी छह गाने एक साथ नहीं चाहिए. जैसे-जैसे गाने तैयार होते जाएं, वो उन्हें देते जाएं. उन दिनों रिकॉर्डिंग स्टूडियो रातों-रात बुक नहीं होते थे. हफ्तों पहले बुक करना पड़ता था. किसी को कुछ पता नहीं था कि बख्शी साहब कब गाने देंगे, इसलिए राजेश रौशन ने जैसे-तैसे स्टूडियो बुक कर लिया. ताकि जैसे लिरिक्स आए, फटाक से गाने की रिकॉर्डिंग हो जाए. हमेशा की तरह बख्शी साहब शाम 6 बजे अपनी 1964 मॉडल फिएट से राजेश रौशन के घर पहुंचे. मुंह में पान और हाथ में अपनी 555 सिगरेट की डिब्बी लिए हुए. वो अपनी जगह पर बैठे सिगरेट जलाई और कुछ गुनगुनाने लगे. वो गुनगुनाते हुए कुछ बोल भी रहे थे. जब राजेश और टोनी ने ध्यान से सुना, तो ‘परदेशिया ये सच है पिया, सब कहते हैं तूने मेरा दिल ले लिया’ गा रहे थे’. सिर्फ लिरिक्स ही नहीं जिस धुन में वो गुनगुना रहे थे, वो भी बड़ी शानदार थी. ये सुनने की देरी थी कि राजेश रौशन एक्साइटेड हो गए. आनंद बख्शी ने अगले 15 मिनट में वो पूरा गाना लिखा. और अगले 15 मिनट में राजेश ने उन लिरिक्स को धुन में पिरो दिया. इस तरह फिल्म का सबसे हिट गाना ‘परदेसिया’ टोटल आधे घंटे में बनकर तैयार हो गया. यहां देखिए वो गाना:

# पहली फिल्म जिसमें अमिताभ बच्चन ने गाना गाया

पहला गाना बन जाने के बाद फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से एक गाना बच्चन और बच्चों के साथ होना था. उसी बैठक में आनंद बख्शी ने एक आइडिया दिया. उन्होंने कहा अगर कोई शख्स बच्चों के साथ बैठकर गाना गा रहा है, तो वो गाना प्लेबैक सिंगर से गवाने में मज़ा नहीं आएगा. उस गाने का असली भाव तब आएगा, तब परदे पर दिख रहा एक्टर अपनी आवाज़ में उसे गाए. बख्शी साहब ने कहा- ”हमें एक गाना बच्चों के साथ बनाना चाहिए और उसे अमित जी से गवाना चाहिए.” सारी बहस यहीं ठहर गई. आनंद बख्शी ने एक ही सिटिंग में दूसरा गाना ‘मेरे पास आओ’ भी लिख डाला. उस गाने को महबूब स्टूडियो में अमिताभ बच्चन के साथ रिकॉर्ड किया जाना था. अमिताभ ने इससे पहले फिल्म ‘कभी कभी’ (1976) में साहिर लुधियानवी की लिखी कुछ पंक्तियां कविता की तरह पढ़ी थीं लेकिन गाना उन्होंने कभी नहीं गाया था. वो सकुचा रहे थे. फाइनली उन्होंने वो गाना रिकॉर्ड किया. साउंड रिकॉर्डिस्ट घोष बाबू ने बच्चन को वहां से छूटते ही कॉम्पलीमेंट दिया कि उन्हें और गाना चाहिए. इंट्रेस्टिंग बात ये कि गाने तो लिखवा लिए लेकिन बजट टाइट होने की वजह से प्रोड्यूसर्स के पास आनंद बख्शी को देने के लिए पैसे नहीं थे. बख्शी साहब ने कभी उनसे पैसे मांगे भी नहीं. फिल्म रिलीज़ हुई और दोनों गाने सुपरहिट हो गए. बाद में टोनी और टिटू ने बख्शी साहब को किस्तों में उनकी फीस दी. फिल्म का ‘मेरे पास आओ’ गाना आप नीचे क्लिक कर देख-सुन सकते हैं:

# ठग नटवरलाल ने धमकी देकर फिल्म का नाम बदलवा दिया

फिल्म का नाम बदले जाने को लेकर दो थ्योरीज़ मार्केट में घूमती हैं. पहली है ठग नटवरलाल की धमकी का किस्सा. जब नटवरलाल को पता चला कि उनके नाम पर अमिताभ की फिल्म का नाम रखा गया, तो वो इससे ऑफेंड हो गए. उन्होंने अपने वकील की मदद फिल्म के मेकर्स को लीगल नोटिस भेजा. साथ ही फिल्म का नाम बदलने को भी कहा. किसी तरह के कानूनी पचड़े से बचने के लिए फिल्म की रिलीज़ से कुछ ही दिन पहले उसका नाम बदलकर ‘मिस्टर नटवरलाल’ कर दिया गया.

फिल्म 'मिस्टर नटवरलाल' के दो अलग-अलग पोस्टर्स.
फिल्म ‘मिस्टर नटवरलाल’ के दो अलग-अलग पोस्टर्स.

दूसरी थ्योरी ये कहती है कि फिल्म के नाम बदलने के पीछे नटवरलाल नहीं, एक फिल्ममेकर का हाथ था. जब फिल्म की शूटिंग पूरी हो गई, तब इसके मेकर्स को पता चला कि ‘नटवरलाल’ टाइटल तो किसी और फिल्ममेकर ने रजिस्टर करवा रखा है. इसके बाद फिल्म में ‘मिस्टर’ जोड़ दिया गया. लेकिन दूसरे प्रोड्यूसर ने कहा कि किसी के नाम के आगे मिस्टर लगा देने से नाम नहीं बदल जाता. अब ‘नटवरलाल’ के प्रोड्यूसर्स को समझ न आए कि करें, तो क्या करें. फाइनली उन्हें आइडिया आया कि क्यों न फिल्म के नाम में अमिताभ बच्चन का भी नाम जोड़ दिया जाए. फिर फिल्म का नाम रखा गया ‘अमिताभ बच्चन इन एंड ऐज़ मिस्टर नटवरलाल’. सेंसर सर्टीफिकेट पर फिल्म का यही नाम लिखा हुआ है.

जेल में बंद इंडिया का सबसे पॉपुलर कॉन मैन नटवरलाल.
जेल में बंद इंडिया का सबसे पॉपुलर कॉन मैन नटवरलाल.

1987 में जब वाराणसी पुलिस ने ठग नटवरलाल को गिरफ्तार किया, तब उसके कुछ इंटरव्यूज़ हुए. इंडिया टुडे के एक रिपोर्टर ने उससे पूछा-

”क्या आपने अपनी कहानी पर बनी फिल्म ‘मिस्टर नटवरलाल’ देखी है?”

तो नटवरलाल ने जवाब देते हुए कहा-

”नहीं, जब मैं खुद ही असली हीरो हूं तो नकली हीरो को क्यों देखूं? जब मुझे इस फिल्म के बारे में पता चला तो मैंने इसके निर्देशक और निर्माता पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया.”

जब पूछा जाता कि इतने सारे लोगों के पैसे क्यों लूटे और ठगे, तो नटवरलाल कहता-

natwar lal

‘मिस्टर नटवरलाल’ 8 जून, 1979 को सिनेमाघरों में लगी और सुपरहिट साबित हुई. फिल्म का म्यूज़िक कल्ट हो गया. ‘परदेसिया’ आज भी पूरे चाव से सुना जाता है. हालांकि बच्चन की पिछली फिल्मों की तरह ‘मिस्टर नटवरलाल’ लोगों की यादों में लंबे समय तक नहीं रह पाई. हम किसी चीज़ की पॉपुलैरिटी को कैसे मापते हैं? कि पॉप कल्चर में उसका कितना ज़िक्र आता है. उस मामले ‘मिस्टर नटवरलाल’ थोड़ी शॉर्ट रह जाती है. जैसे-जैसे लोग ठग नटवरलाल को भूलते गए, ये फिल्म भी लोगों के ख्याल से गायब होती चली गई.


वीडियो देखें: बॉलीवुड किस्से: वो फिल्म जिसके हीरो भी अमिताभ थे और विलेन भी

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