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शेन वॉर्न की बॉल ऑफ़ द सेंचुरी के अलावा 5 गेंदें जो भुलाई नहीं जा सकतीं

साल 1993. शेन वॉर्न पहली दफ़ा इंग्लैंड आए थे. ऐशेज़ सीरीज़. ये वो समय था जब शेन को क्रिकेट खेलते हुए मात्र साल भर हुआ था. सामने माइक गैटिंग खड़े थे और शेन ने धीमे क़दमों से अपना रनअप शुरू किया. कमेंट्री कर रहे रिची बेनॉड ने सभी को बताया कि शेन वॉर्न इंग्लैंड में अपनी पहली गेंद फेंकने जा रहे थे.

अगले 2 सेकंड में जो हुआ उसका रीप्ले इस दुनिया ने बार-बार दीदे फाड़ के देखा है. स्लो-mo में देखा है, रोक-रोक के देखा है. नेशनल ज्योग्राफिक में उसके ऊपर डॉक्यूमेंट्री बनी. इस गेंद को नाम दिया गया – सदी की गेंद. अर्थात बॉल ऑफ़ द सेंचुरी. माइक गैटिंग यानी वो बल्लेबाज जो स्पिन गेंदबाज़ी को ऐसे खेलता था जैसे ये काम उसके लिए ब्रेड पर मक्खन लगाने जैसा आसान हो. लेकिन उस दिन उसका किला ढहा दिया गया था.

गैटिंग को न ही गेंद की लेग साइड में जाती हुई ड्रिफ्ट समझ में आई और न ही ये समझ में आया कि इंसान के हाथों से फेंकी गई एक गेंद में कितने भी रोटेशन भर दिए जाएं, बिना किसी क्रैक पर पड़े वो इस कदर कैसे घूम सकती है. खैर, उस बात को आज 27 साल हो गए हैं. इस बीच कुछ और भी ऐतिहासिक गेंदें फेंकी गई हैं. वो गेंदें जिनके बारे में एक-एक डीटेल वैसा का वैसा याद है. ऐसी गेंदें जिन्होंने अपने होने से मैच का रुख बदल दिया, सभी को चौंका दिया और ये पूछने पर मजबूर कर दिया, “ये कैसे हुआ?” ऐसी कुछ गेंदें:

1. सचिन तेंदुलकर वर्सेज़ मोईन खान (2004)

साल 1992 के हीरो कप सेमी-फाइनल मैच में सचिन ने बता दिया था कि गेंद हाथ में लेकर वो क्या कारनामे कर सकते हैं. लेकिन जीनियस का टैग लगा पाकिस्तान की ज़मीन पर. सचिन का डेब्यू सीरीज़ के बाद पाकिस्तान का पहला टूर. पहले टेस्ट में सहवाग ने 300 रन बना दिए थे. और साथ ही एक ऐसा डिक्लेयरेशन हुआ था कि सचिन को 194 रन पर नाबाद रहना पड़ा था. पारी की घोषणा के बाद सचिन फ़ील्डिंग करने के लिए नहीं उतरे थे. ऐसा समझा जा रहा था कि द्रविड़ (कप्तान) और सचिन के बीच भयानक वाली दरार पड़ गई है. लेकिन बाद में मालूम पड़ा कि ऐसा कुछ भी नहीं था. दोनों समझदारों ने बैठकर बात कर ली थी.

खैर, मैच तीसरे दिन के अंत की ओर चल पड़ा था. चल क्या पड़ा था, अंत आ ही गया था. गेंद सचिन तेंदुलकर के हाथ में थी. पाकिस्तान की टीम 350 रनों का आंकड़ा पार कर चुकी थी. इंडिया ने पौने 700 पर पारी डिक्लेयर की थी. फॉलो ऑन बहुत दूर था. ज़रूरी था कि विकेट बचे रहें. मोईन खान और अब्दुल रज्ज़ाक का आख़िरी बैटिंग पेयर क्रीज़ पर था.

पहली गेंद मोईन ने खेली जिसपर 1 रन आया. ये नो बॉल थी. इसके बाद अगली गेंद पर एक बार फिर 1 रन आया जिससे मोईन दोबारा स्ट्राइक पर आ गए. इसके बाद आख़िरी गेंद आने तक, एक भी रन नहीं बना. मोईन सचिन को खेलते/झेलते चले. कमेंट्री पर संजय मांजरेकर थे. 90 के शुरुआती वक़्त में सचिन के साथ खेले थे. उन्होंने अभी-अभी बताया था कि मोईन खान सचिन के सामने कुछ नर्वस लग रहे थे.

मोईन ने टूर से पहले कहा था कि शोएब के सामने सचिन नर्वस लगते हैं. सचिन गेंद लेकर चल पड़े थे. राइट-आर्म ओवर. अम्पायर साइमन टॉफ़ेल के बेहद करीब से फेंकी गई गेंद. हाथ के ऊपर से फेंकी गई गेंद जो कि एक आम लेग स्पिन कतई नहीं थी. मोईन खान गेंद पर रिऐक्ट करने में देरी कर गए. वो मिडल स्टंप की लाइन में पड़ी गेंद को लेग-स्पिन की माफ़िक खेलने गए. असल में वो उस गेंद को छोड़ना चाह रहे थे. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था. आख़िरी गेंद होने और विकेट बचाकर रखने के प्रेशर ने उन्हें काफ़ी कन्फ्यूज़ कर दिया था. और अचानक गेंद बाहर जाने की बजाय अंदर आ गई. दूर कहीं खड़े चक दे इंडिया के कबीर खान ने खुद से कहा, “या अल्लाह ये तो गुगली है.” मोईन खान के पैरों के बीच से होती हुई गेंद उनके पीछे लगे लकड़ी के फट्टों में जा लगी.

पाकिस्तान ने दिन की आख़िरी गेंद और 364 रनों पर अपना सातवां विकेट खोया. सचिन को क्रिकेट के मैदान पर इस कदर ख़ुश शायद ही पहले कभी देखा गया था. वो कूद रहे थे. सभी प्लेयर्स ने उन्हें घेरा हुआ था. साल 1999 में चेन्नई टेस्ट में 136 रन बनाने के बाद आउट हुए सचिन मैच के बाद मैन-ऑफ़-मैच लेने के लिए नहीं आए थे. दिन का खेल ख़त्म होने के बाद वो पूरी शाम रोते रहे. 5 साल बाद उन्होंने खुद ही सब कुछ बदल दिया था.


2. शेन वॉर्न वर्सेज़ एंड्र्यू स्ट्रॉस (2005)

एक बार फिर से ऐशेज़ सीरीज़. एजबैस्टन टेस्ट. शेन वॉर्न फिर से अपने पहले ओवर में. इस बार दूसरी गेंद. पहला मैच लॉर्ड्स में था और उसे ऑस्ट्रेलिया जीत कर आया था. बॉल ऑफ़ द सेंचुरी फ़ेंकते वक़्त शेन वॉर्न ने साल भर पहले ही अपने करियर की शुरुआत की थी. इस सीरीज़ के एक साल बाद ही वॉर्न रिटायर होने वाले थे. ये वो सीरीज़ थी जिसमें केविन पीटरसन ने टेस्ट क्रिकेट के मैदान में कदम रखा था. पीटरसन और वॉर्न के बीच हमेशा एक अलग ही लेवल का कम्पटीशन चला. लम्बे छक्कों से लेकर फॉलो थ्रू में वॉर्न के गिलक्रिस्ट को खतरनाक रिटर्न तक. सब कुछ एक अलग ही लेवल पर चल रहा था.

दूसरे टेस्ट में 100 रनों की लीड लेने के बाद इंग्लैंड की टीम एक बार फिर से बैटिंग करने के लिए आई हुई थी. सातवें ओवर में ही शेन वॉर्न को गेंद पकड़ा दी गई. नई, चिकनी, स्किड करती गेंदों को भी वॉर्न की उंगलियां बड़े आराम से घुमा देती थीं. बाएं हत्थे के बल्लेबाज स्ट्रॉस के लिए शेन वॉर्न निकल पड़े. राइट-आर्म राउंड द विकेट. इंग्लैंड ने 25 रन ही जोड़े थे. वॉर्न गेंद को फ़ेंकते वक़्त अपने पूरे शरीर के मोमेंटम को गेंद में भर देते थे. इसके लिए वो अपनी देह को भरपूर घुमाते थे. गेंद को अच्छी ड्रिफ्ट भी मिलती थी.

स्ट्रॉस की आंखों के सामने वो गेंद पड़ी. ऑफ स्टंप के बहुत बाहर. अगर गेंद के टप्पे की जगह से एक सीधी लाइन खींची जाती तो स्लिप में खड़े मैथ्यू हेडेन के पैर के पास पहुंचती. स्ट्रॉस को मालूम था उन्हें क्या करना था. उन्हें गेंद को निष्क्रिय कर देना था. शॉट के लहज़े से गेंद कुछ ज़्यादा ही बाहर थी इसलिए शरीर से दूर वो खेलना नहीं चाहते थे. उनका नसीब था कि वो अनुशासित थे. उस गेंद पर स्ट्रॉस ने पैड लगाना ही ठीक समझा.

उन्होंने अपना पूरा शरीर गेंद की लाइन में ला खड़ा कर दिया. लेकिन चूंकि गेंद वॉर्न ने फेंकी थी इसलिए आगे क्या होना था, ये किसी को भी नहीं मालूम था. सेकंड के सौंवे हिस्से भर में गेंद टप्पा खाने के बाद जाकर स्ट्रॉस के पीछे स्टंप्स में जाकर घुस गई. पीछे खड़े गिलक्रिस्ट बल्लियों उछल गए. एंड्रू स्ट्रॉस मुस्कुराते हुए चल पड़े. उन्हें उस सीरीज़ में नासिर हुसैन की दी हुई नसीहत याद रखनी चाहिए थी. नासिर लगातार ये बात कहते जा रहे थे कि जब भी शेन को पैड किया जाए, ये पक्का रखा जाए कि गेंद बल्लेबाज के शरीर के नज़दीक है. दूर-दूर से पैड लगाएंगे तो क्या होगा, कोई नहीं कह सकता. और स्ट्रॉस के साथ यही हुआ.

शेन वॉर्न ने इस विकेट के साथ इंग्लैंड में अपने 100 विकेट पूरे कर लिए थे.


3. हरभजन सिंह वर्सेज़ माइक हसी (2008)

बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी. इससे पिछली बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में इस दुनिया ने एक बहुत बड़ी कंट्रोवर्शियल सीरीज़ देखी. मंकी-गेट से लेकर सिडनी टेस्ट में हुई निहायत घटिया अम्पायरिंग तक. भारतीय टीम देश वापस आने को तैयार थी. बीच सीरीज़ में अम्पायरों को बदला गया. अब बारी थी ऑस्ट्रेलिया की भारतीय ज़मीन पर क्रिकेट खेलने की. ये काम कभी भी आसान नहीं होता. तिस पर भयानक प्रेशर. ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीता और पहले बैटिंग करनी शुरू की. बड़े स्टेज और बड़े मैच पर रिकी पोंटिंग हमेशा खूंटा गाड़ देता था. इस मैच में भी यही हुआ. पहली इनिंग्स में ऑस्ट्रेलिया ने 430 रन बनाए जिसमें पोंटिंग और माइक हसी ने सेंचुरी मारीं. हालांकि इंडिया ने सीरीज़ की शुरुआत बेहतरीन ढंग से की थी. पहले ही ओवर में बिना रन बनाए ऑस्ट्रेलिया ने मैथ्यू का विकेट खो दिया था.

इंडिया ने बैटिंग की और 360 रन ही बना सकी. बैटिंग ऑर्डर में बहुत नीचे ज़हीर खान और हरभजन ने 50-50 रन बनाए. ऑस्ट्रेलिया 70 रन की लीड लेकर बैटिंग करने लगी. 115 रन पर 4 विकेट गिर गए. 50 ओवर हुए तो गेंद हरभजन सिंह ने अपने हाथ में पाई. दिन के 20 ओवर बचे थे. ऑस्ट्रेलिया 200 की लीड के पास पहुंच रही थी. पहली तीन गेंदों पर एक भी रन नहीं बना. चौथी गेंद पर वॉटसन ने सिंगल लिया.

हरभजन की पांचवीं गेंद. राइट आर्म-राउंड द विकेट. गेंद ऑफ़ स्टंप के बाहर गिरी. काफ़ी बाहर. लेंथ बॉल जिसे माइक हसी ने हसी ने छोड़ने का फ़ैसला लिया. मगर गेंद अंदर आ गई. इसे दूसरा कहते हैं. माइक हसी आउट हो चुके थे. ऑफ़ स्टंप के ठीक ऊपर जाकर गेंद लगी. ऑस्ट्रेलिया अपना पांचवां विकेट खो चुका था. 100 रन में अगले 5 विकेट गिरे. मैच ड्रॉ रहा. इंडिया ने 4 मैचों की सीरीज़ 2-0 से जीती.


4. केमार रोच वर्सेज़ शेन वॉटसन (2009)

आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफी. साउथ अफ़्रीका में खेला जा रहा टूर्नामेंट. जोहान्सबर्ग में खेला जा रहा मैच. मैच शुरू हुआ और पहली गेंद फेंकने के लिए वेस्ट इंडीज़ के केमार रोच तैयार खड़े थे. वो दौड़ने लगे लेकिन बॉलिंग स्ट्राइड पर आते-आते रुक गए. इसके बाद उन्होंने एक बार फिर से अपने बॉलिंग मार्क से दौड़ लगानी शुरू की. इस बार वो रुके नहीं. फ़ुल लेंथ गेंद फ़ेंकी और अगले ही पल एक खटाक की आवाज़ आई. शेन वॉटसन मुंह बाए खड़े थे.

वॉटसन ने सही समय पर बल्ला नीचे लाने की कोशिश की थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका. गेंद अंदर आती गई और वो पूरी तरह से लाइन मिस कर गए. ऑस्ट्रेलिया ने पहली ही गेंद पर अपना पहला विकेट खो दिया था. इस गेंद पर शेन वॉटसन का रीऐक्शन देखने वाला था. वो ऐसे हतप्रभ थे जैसे उनके सामने हनुमान ने विकराल रूप धारण कर लिया हो. वो अम्पायर की ओर इसे देख रहे थे जैसे अभी गेंद ट्राई बॉल डिक्लेयर कर दी जाएगी और वॉटसन को दोबारा बैटिंग मिल जाएगी.


5. एंड्रू फ़्लिंटॉफ़ वर्सेज़ जैक्स कालिस (2008)

सीरीज़ का तीसरा टेस्ट मैच. पहला मैच ड्रॉ रहा था और दूसरे में साउथ अफ़्रीका को जीत मिली थी. तीसरा मैच बर्मिंघम में था. इंग्लैंड की शुरुआत एक बार फिर खराब हुई. मात्र 231 रन बने. आंद्रे नेल और जैक्स कालिस ने 3-3 विकेट लिए. साउथ अफ़्रीका 314 रन बना ले गई. जैक्स कालिस ने 64 रन बनाए. 50 रन के पार खेल रहे कालिस इंग्लैंड की टीम के निशाने पर आ चुके थे. मैच के दूसरे दिन के खात्मे की ओर एंड्रू फ़्लिंटॉफ़ को जोश चढ़ा. डेविड ‘बम्बल’ लॉयड खुद कहते हैं कि उन्होंने फ़्लिंटॉफ़ को इस कदर अग्रेसिव मोड में नहीं देखा.

ये बॉल एक अच्छी इनस्विन्गिंग यॉर्कर थी. लेकिन अपने सेट-अप की वजह से ये और भी ख़ास हो जाती है. सेट-अप लगभग 3 ओवर पहले शुरू हुआ था. फ़्लिंटॉफ़ ने एक लंबी गेंद फेंकी जो कि कालिस को ठीक से दिखाई नहीं दी. वो बड़ी मुश्किल से बचे. गेंद स्टंप्स से डेढ़ बित्ते की दूरी पर ही गिरी. गेंद के बाद कालिस मुंह बाये फ़्लिंटॉफ़ की ओर हंस रहे थे. साउथ अफ़्रीका को अभी इंग्लैंड के बराबर पहुंचने के लिए 15 रन बनाने थे.

यहां से फ़्लिंटॉफ़ ने छोटी गेंदों और ऑफ़ स्टंप के बाहर फेंकी गई गेंदों से कालिस को परेशान करना शुरू किया. कालिस को गेंद दिखाई ही नहीं दे रही थी. लगातार फेंकी गई छोटी गेंदों के बाद फिर एक यॉर्कर. इस बार गेंद कालिस के जूतों पर जाकर लगी. भयानक कॉन्फिडेंट अपील. लेकिन अम्पायर अलीम दार ने नॉट आउट करार दे दिया. वो शायद दुनिया के एकमात्र इंसान होंगे जिसे उस वक़्त कालिस नॉट आउट मालूम दे रहे थे. अगली 10-12 गेंदों तक कालिस परेशान रहे. वो ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी’ की कहावत को चरितार्थ कर रहे थे.

69वां ओवर. गेंद फिर से फ़्लिंटॉफ़ के हाथ में. चौथी गेंद. ऑफ स्टंप की लाइन में फेंकी गई एक फ़ुल लेंथ गेंद. इससे पहले सभी गेंदें गुड लेंथ या उसके आस-पास पड़ रही थी. साथ ही वो ऑफ स्टंप से बाहर भी थीं. मगर ये गेंद नहीं. ओवर की चौथी गेंद अंदर आती हुई कालिस के सामने पड़ी और हल्का बाहर की ओर निकल गई. कालिस गेंद की लाइन में खड़े थे लेकिन तब तक उनका ऑफ़ स्टंप उड़ चुका था. सिर्फ उड़ा नहीं था बल्कि कुछ मीटर पीछे जाकर गिरा था.

मैच साउथ अफ़्रीका ने ही जीता. पहली इनिंग्स में फ़्लिंटॉफ़ ने 4 विकेट लिए और दूसरी में 2. अगली इनिंग्स में भी कालिस को फ़्लिंटॉफ़ ने ही एलबीडब्लू आउट किया.


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