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'सरदार ऊधम' का तो टीज़र ही रोमांचित करने के लिए पर्याप्त है

27 सितम्बर 1907 को शहीद भगत सिंह का जन्म हुआ था. एकदम सही तारीख चुनी फ़िल्म ‘सरदार ऊधम’ की टीम ने मूवी का फर्स्ट लुक जारी करने के लिए. सोमवार 27 सितम्बर को विक्की कौशल ने इन्स्टाग्राम पर अपनी फ़िल्म का फर्स्ट लुक जारी करते हुए लिखा,

शहीद भगत सिंह के जन्मदिन के मौके पर मुझे गर्व है कि मैं आप लोगों के सामने उन्हीं के साथी सरदार ऊधम सिंह की कहानी पेश कर रहा हूं. एक व्यक्ति, बहुत से दल. एक मिशन. पेश है ‘सरदार ऊधम’ का टीज़र.


टीज़र में दिखता है ऊधम सिंह बहुत से दस्तावेजों को नष्ट कर रहे हैं. उसके बाद एक के ऊपर एक रखे पासपोर्ट्स के बंडल स्क्रीन पर आते हैं. हर पासपोर्ट पर अलग नाम है. पहला नाम है उदे सिंह. दूसरा नाम है फ्रैंक ब्राज़ील. तीसरा है शेर सिंह. और अंतिम है ऊधम सिंह. बाकी तीन की फ़ोटो नहीं दिखती. लेकिन ऊधम सिंह की पासपोर्ट पर लगी फ़ोटो स्क्रीन पर साफ़ आती है. कहना पड़ेगा मात्र तीस सेकंड का ये टीज़र ही काफी है फ़िल्म की ओर आपका ध्यान खींचने के लिए. ‘सरदार ऊधम’ को शूजीत सरकार ने डायरेक्ट किया है. विक्की के साथ अमोल पराशर फ़िल्म में भगत सिंह की भूमिका में नज़र आएंगे. ‘सरदार ऊधम’ 16 अक्टूबर को अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ होगी. फ़िल्म रिलीज़ में अभी वक़्त है. लेकिन उससे पहले आपका जानना बहुत ज़रूरी है कि…..

# कौन थे ऊधम सिंह?

10 अप्रैल 1919. सत्यपाल और सैफुद्दीन समेत कई कांग्रेस के नेताओं को रॉलेट एक्ट के तहत का गिरफ्तार कर लिया गया था. 13 अप्रैल 1919. बैसाखी का दिन था. 20 हजार से ऊपर हिंदू और सिख परिवार बैसाखी का पर्व मनाने और शांति के साथ गिरफ्तारी के खिलाफ़ प्रोटेस्ट करने के लिए जलियांवाला बाग़ में इकट्ठा हुए थे. जहां कर्नल डायर ने वहां मौजूद बच्चों, बूढों, औरतों की परवाह ना करते हुए अंधाधुंध गोलियां चलाने का हुक्म दे दिया था. त्राहिमाम मच गया. कई हज़ार लोग मारे गए. लाशों से कुएं भर गए.

जिस वक़्त जलियांवाला बाग में ये विध्वंस मचा, ऊधम सिंह नाम का एक 20 साल का लड़का अपने अनाथालय सेंट्रल खालसा पुतलीघर के कुछ दोस्तों के साथ मिलकर लोगों को पानी पिला रहा था. इस खूनी संघर्ष में ऊधम बच तो गया लेकिन उसकी आंखों के आगे मारे गए हज़ारों लोगों की लाशें और कानों में मासूम लोगों की चीखें मानो गुद सी गई थीं. भगत सिंह से प्रेरित होते हुए ऊधम सिंह भी रेवोलुशन पॉलिटिक्स में एक्टिव हो गए.  1924 में ऊधम सिंह ने ‘गदर पार्टी’ जॉइन कर ली और विदेश में रह रहे हिंदुस्तानियों को अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ़ इकट्ठा करने लगे.

सरदार उधम सिंह.
सरदार ऊधम सिंह.

1927 में ऊधम सिंह भगत सिंह के कहने पर भारत आ गए. बहादुर क्रांतिकारी अंग्रेज़ सरकार की आंख में चुभते थे. लिहाज़ा कुछ ही वक़्त बाद ऊधम सिंह पर बिना लाइसेंस हथियार रखने जैसे कई आरोपों को थोप कर गिरफ्तार कर लिया गया. पूरे पांच साल की सज़ा हुई. 1931 में ऊधम सिंह रिहा हुए. लेकिन अब पुलिस उन पर विशेष नज़र रखती थी. मगर फ़िर भी ऊधम सिंह सबको चकमा देते हुए जर्मनी रवाना हो गए. कुछ साल जर्मनी में बिता 1934 में ऊधम सिंह लंदन शिफ्ट हो गए. यहां वो बतौर इंजिनियर नौकरी करने लगे. सिर्फ़ दिखाने के लिए. 15 साल बाद भी उनके ज़हन में जालियांवाला बाग में डायर की बर्बरता को लेकर क्रोध कम नहीं हुआ था. वो अंदर हीं अंदर डायर को मारने की प्लानिंग लगातार करते रहते थे.

13 मार्च 1940. लंदन के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसाइटी की जॉइंट मीटिंग होनी थी. माइकल ओ ड्वायर यहां भाषण देने आने वाले थे. ऊधम सिंह बरसों से इसी पल की तलाश में थे. उन्होंने पब में एक फ़ौजी से बंदूक खरीदी. किताब के पन्नों को सफाई से काटकर बंदूक किताब में छुपा ली और हॉल में पहुंचकर मंच के सामने कुर्सी पर बैठ गए. मीटिंग शुरू हुई. मीटिंग समाप्त होते ही जैसे ओ ड्वायर भाषण देने को माइक के पास आने को हुआ, वैसे ही ऊधम सिंह ने दो गोलियां उस पर चला दीं. जिसमें से एक गोली सीधे दिल और गुर्दे को चीरती हुई निकल गई. उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया. इंतकाम लेने के बाद ऊधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश भी नहीं की. बल्कि खुद अपने आप को पुलिस को सौंप दिया.

ऊधम सिंह जब गिरफ्त में थे, तब उनसे किसी अंग्रेज़ अधिकारी ने नाम पूछा. ऊधम सिंह ने देश की एकता और जज़्बे को समेटते हुए अपना नाम बताया,

राम मोहम्मद सिंह आज़ाद

4 जून 1940 को जज पैनल के सामने ऊधम सिंह ने बयान दिया था,

“मैंने ऐसा किया क्यूंकि मैं उससे नफ़रत करता था. वो इसी का हकदार था. वो गुनहगार था. वो मेरे लोगों के जज़्बे को मारना चाहता था. इसलिए मैंने उसे मार दिया. पूरे 21 साल से मैं बदला लेने की कोशिश कर रहा था. मुझे बहुत ख़ुशी है कि मैंने अपना काम पूरा कर लिया है. मुझे मौत से डर नहीं लगता. मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं. मैंने अपने लोगों को ब्रिटिश राज में भूख से तडपते हुए देखा है. मैंने इसका विरोध किया है. ये मेरा फ़र्ज़ था. इससे ज्यादा मेरे लिए सम्मान की बात क्या होगी कि मैं अपने देश के लिए प्राण त्याग रहा हूं.”

कोर्ट में पेशी के दौरान खींची गई सरदार उधम सिंह की तस्वीर.
कोर्ट में पेशी के दौरान खींची गई सरदार ऊधम सिंह की तस्वीर.

31 जुलाई 1940 को सरदार ऊधम सिंह को फांसी दी गई थी.

# पहले भी आ चुकी है फ़िल्म

ये पहली बार नहीं है, जब शहीद ऊधम सिंह की वीरता पर्दे पर उतारी जा रही है. साल 1999 में भी ‘शहीद ऊधम सिंह’ नाम से फ़िल्म रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म में राज बब्बर ने ऊधम सिंह की और गुरदास मान ने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी.

राज बब्बर एज़ उधम सिंह.
राज बब्बर एज़ ऊधम सिंह.

इस फ़िल्म में जनरल डायर की भूमिका मरहूम टॉम आल्टर ने निभाई थी. इस फ़िल्म को चित्रार्थ ने डायरेक्ट किया था. फ़िल्म के डायलॉग अतुल तिवारी ने लिखे थे. बब्बर और मान के अलावा फ़िल्म में अमरीश पुरी, जूही चावला और रंजीत भी अहम भूमिकाओं में थे.


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