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फिल्म रिव्यू: प्रस्थानम

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संजय दत्त-मनीषा कोइराला स्टारर प्रस्थानम (Prassthanam) 20 तारीख को रिलीज़ हो गई है. इसमें मुख्य भूमिकाओं में हैं संजय दत्त जिन्होंने MLA बलदेव प्रताप सिंह का किरदार निभाया है. उनकी पत्नी बनी हैं मनीषा कोइराला, जिनके किरदार का नाम सरोज है. दो बेटे और एक बेटी है. बेटों के किरदार में हैं अली फज़ल जिन्होंने आयुष का किरदार निभाया है, और सत्यजीत दुबे हैं विवान के किरदार में. बेटी पलक के किरदार में हैं चाहत खन्ना. बाजवा खत्री के किरदार में चंकी पांडे ने निगेटिव रोल उठाया है इस बार, और जैकी श्रॉफ हैं बादशाह के किरदार में. जो बलदेव सिंह का भरोसेमंद ड्राइवर होता है. डायरेक्टर हैं देव कट्टा. इन्होने तेलुगु में प्रस्थानम लिखी और डायरेक्ट की थी. हिंदी में भी इन्होने ही इसे डायरेक्ट किया है.

कहानी क्या है?

कहानी वही है. पिता रसूख वाला पॉलिटिशियन. दो बेटे, लेकिन ऑब्वियसली एक बेटा दूसरे बेटे से ज्यादा लायक है. लोग चाचा के विधायक होने पर गरदा उड़ाने निकल पड़ते हैं, यहां तो पिताजी ही विधायक हैं. तो अब आप समझ लीजिए. कि लायकी और नालायकी दोनों का ही एक्सट्रीम एंड देखने को मिलेगा.

इसी कहानी में बदला भी है, लालच भी है, प्लॉट ट्विस्ट देने की कोशिश भी है. बलदेव प्रताप सिंह चार बार अमीनाबाद के विधायक रह चुके हैं. अब पांचवीं बार बनने की तैयारी में हैं.

जो सीट उनको मिली है, वो पहले किसी और लीडर की हुआ करती थी, जिसे राइवल गैंग ने मार दिया था. उसके बाद वो सीट इन्हें मिल गई, साथ ही साथ उस लीडर की पत्नी से उन्होंने शादी भी की.

इसी पत्नी का किरदार निभाया है मनीषा कोइराला ने. उसके दो बच्चे थे. बेटी पलक, बेटा आयुष. दोनों को अपने साथ रखा.

बाद में बलदेव सिंह और सरोज का अपना एक बच्चा भी होता है, जिसका नाम रखा जाता है विवान. और इस बच्चे ने ही आधे से अधिक फिल्म में सब उलट-पुलट के धर दिया है.

बैक टू कहानी, क्या बलदेव प्रताप सिंह पांचवीं बार विधायक बन पाएंगे. क्या उनको धोखा मिलेगा? मिलेगा तो किससे? कैसे? कब? यू नेवर नो. नहीं, सीरियसली, यू नेवर नो.

मनीषा कोइराला की एक्टिंग का पूरा फायदा नहीं उठा पाई है फिल्म.
मनीषा कोइराला की एक्टिंग का पूरा फायदा नहीं उठा पाई है फिल्म.

एक्टिंग कैसी है?

कहानी बता दी हमने आपको. एक्टिंग के मामले में संजय दत्त, अली फज़ल, और सत्यजीत दुबे के अलावा किसी और का स्कोप है नहीं फिल्म में. उसमें भी अली फज़ल संभले हुए दिखाई देते हैं.

संजय दत्त जब भी स्क्रीन पर आते हैं, वो बलदेव प्रताप सिंह नहीं बल्कि संजय दत्त होते हैं. किरदार कहीं दिखाई देता नहीं.

सत्यजीत दुबे बेहतर कर सकते हैं. इस फिल्म में कोशिश बहुत की उन्होंने, लेकिन उनका किरदार बहुत सारी चीजों को छू कर निकल गया. अगर शायद किसी एक चीज़ पर टिकता तो बेहतर होता. खैर वो तो डायरेक्टर की मर्ज़ी है उसका हम क्या ही कह सकते हैं.

फिल्म में क्या अच्छा है?

मनीषा कोइराला जहां भी दिखी हैं, अच्छी लगी हैं. अली फज़ल की एक्टिंग बेहतरीन है.

अमायरा दस्तूर इस फिल्म में सिर्फ इसलिए हैं ताकि गाना आ सके.
अमायरा दस्तूर इस फिल्म में सिर्फ इसलिए हैं ताकि गाना आ सके.

फिल्म में क्या खटकता है?

डायलॉग ऐसे हैं जैसे वॉट्सऐप पर चाणक्य के नाम से फॉरवर्ड होने वाली लाइनें एक साथ मिलाकर लिख दी गई हों. अपने बेटे को राजनीति में प्रोमोट करते हुए बलदेव सिंह डायलॉग मारते हैं, राजनीति की गद्दी विरासत से नहीं काबिलियत से मिलती है.

स्क्रिप्ट ऐसी है जो राजनीति से होते हुए सरकार, बाहुबली, गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की याद दिला देती है. याद इसलिए क्योंकि आप फिल्म देखते हुए सोचते हैं, इससे बेहतर तो यही देख लेते. समय में बहुत आगे-पीछे जाती है फिल्म, और आपको समझने का समय नहीं देती.

यहां फ़ास्ट पेस के चक्कर में गाड़ी ने सिग्नल नहीं तोड़ा, पटरी से ही उतर गई है. डीप बनाने की कोशिश की गई, ताकि लोगों को लगे कि आंखों के सामने कुछ तो सीरियस चल रहा है, लेकिन असल में ऐसा कुछ है नहीं.

आम तौर पर अगर कहानी बहुत इंगेजिंग होती हैं जिसमें आपको दिमाग लगाना पड़े, तो फिल्म में बाकी एलिमेंट आपका सपोर्ट करते नज़र आते हैं. ताकि आपको फोकस करने में मदद मिले. आपको कहानी समझ आए.

हां, इस फिल्म में वो नहीं है.

बाकी ये फिल्म छोटी स्क्रीन पर देखने का इंतज़ार किया जा सकता है. कोई लोड नहीं.


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