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राम को हज से क्या दिक्कत हो सकती है?

पिछले कुछ सालों से भारत में चुनाव, कीचड़ में लोट लगाने का उत्सव से हो गए हैं. पोस्टर वॉर, बेतुके बयान, निजी टिप्पणियां, गाली-गलौच और न जाने क्या-क्या! हर बार लगता है कि यार ये ज़्यादा हो गया. अब इससे ज़्यादा कोई क्या ही गिरेगा! लेकिन साहेबान, आप हमारे पॉलिटिशियंस और उनके गुर्गों के टैलेंट को बहुत कम कर के आंक रहे हैं. उनकी अद्भुत प्रतिभा हर बार ज़लालत की एक नई हद कायम करती है. एक तरह से ये लोग ‘गिरने की ऊंचाइयां’ छूते हैं. अपने-अपने खेमों में बंटी जनता अपनी निष्ठाओं के चलते सब कबूल लेती है और बेशर्मी का नंगा नाच जारी रहता है.

ताज़ा उदाहरण गुजरात से जारी दो पोस्टर्स हैं. पहला देख लीजिए.

इसे देखकर अगर आप खुश होते हैं तो आपको भी इलाज ज़रूरत है.
इसे देखकर अगर आप खुश होते हैं तो आपको भी इलाज ज़रूरत है.

इसमें 6 चेहरे हैं. गुजरात चुनावों में पहले तीन चेहरे, दूसरे तीन चेहरों के मुक़ाबिल हैं. यहां तक ठीक है. इनका कम्पैरीज़न करने का किसी को शौक़ चढ़ा है, तो वो भी शौक़ से करे. लेकिन उसका आधार जो किसी आलादिमाग ने चुना है वो घृणित है. इस पोस्टर को बनाने वाले का विकृत दिमाग, सिंपल भाषा में यही कह रहा है कि श्रीराम हज के विरोधी खेमे में हैं. इस सोच की जड़ तक जाएं तो ये कि हिंदू और मुस्लिम हमेशा एक-दूसरे के दुश्मन ही रहेंगे. किसी एक का ही चुनाव मुमकिन है. सहअस्तित्व जैसे शब्द से इस पोस्टर के निर्माता का कभी कोई वास्ता पड़ा नहीं मालूम होता.

रूपानी, अमित शाह, मोदी को RAM बना दिया गया है. हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी से HAJ बन गया है. दोनों का टी-ट्वेंटी करा दिया भाई ने. अब आप उस 18 साल के नौजवान पर होने वाले असर के बारे में सोचकर कलपते रहिए, जिसने अपने Whatsapp पर ये कूड़ा रिसीव किया है. अपनी ज़िंदगी के सबसे अहम दौर में वो ये सीख रहा है कि राम और हज, दोनों विपरीत ध्रुव हैं. एक सेक्युलर मुल्क का नया वोटर अनचाहे ही सांप्रदायिक कीचड़ में घसीटा गया है.

इस पोस्टर के ऊपर गुजराती में लिखा है ‘पसंदगी तमारी’, यानी पसंद आपकी. मतलब अगर आप राम को पसंद करते हैं, तो हज को नापसंद करना लाज़मी है. हज वालों को तभी चुना जा सकता है, जब राम को त्याग दो. कुल मिलाकर ये पोस्टर कह रहा है कि मुस्लिम होना हिंदू होने का विलोम है. जैसे मुस्लिम होना कोई गलिच्छ चीज़ हो. इस धर्मनिरपेक्ष मुल्क की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के प्रति ऐसा घृणित भाव विचलित भी करता है और व्यथित भी. ऐसे लोगों को तो सज़ा होनी चाहिए.

अगली पार्टी का जवाब भी आ गया है. हालांकि उनकी प्रतिभा कम रह गई और वो इसका साम्प्रदायिकरण करने में नाकाम रहे हैं. उसकी जगह वो ‘हिंदुस्तान’ ले आए हैं. तीन की जगह पांच लोग चुने गए हैं और उन्हें रावण करार दिया गया है.

ये जवाब भी सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं.
ये जवाब भी सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं.

रावण बनने के सम्मान के अधिकारी बने हैं: रुपानी, अमित, वाघानी, आनंदी, नितिन. सारे भाजपा के नेता हैं. इन पांचों से बना RAVAN. दूसरी तरफ भारत से प्यार(!) करने वाले अल्पेश, जिग्नेश और हार्दिक. AJH. यानी अमारी (हमारी) जान हिंदुस्तान. इन्होने भाजपा का चुनाव चिन्ह, कमल का फूल उल्टा भी लटका दिया है. बिल्कुल अपने दिमाग की तरह. पिछले कुछ अरसे से ‘सोल्जर’ बोलकर भारत में सब जस्टिफाई करने का चलन चला है. उसी तर्ज पर इस खेमे वालों को लगता होगा कि ‘हिंदुस्तान’ बोलकर किसी को रावण कहने की बदज़ुबानी जस्टिफाई हो जाएगी. भई मूर्खता हर हाल में मूर्खता ही रहती है. फिर भले ही उसमें देश घुसा दो या राम.

बड़ा ही बुरा हाल है. ये इस दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत हो गई है कि हम अपने प्रतिनिधियों का चुनाव अपने विवेक के आधार पर करें, न कि नफ़रत का ज़हर बांटते बेशर्म, गैर-ज़िम्मेदार लोगों की घृणित सोच से प्रभावित होकर. बाकी तो जो है सो है ही.


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