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फिल्म रिव्यू: मणिकर्णिका

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एक फिल्म बनाने में बहुत मेहनत लगती है. हिस्ट्री पर फिल्म बनाने में तो और भी ज़्यादा मेहनत लगती है. इसीलिए ऐसी फिल्मों पर ज़्यादा हार्श होना भारी गुज़रता है दिल पर. थोड़े बहुत लूपहोल्स हो भी तो आप नज़रअंदाज़ करने को तैयार रहते हैं. पर क्या हो जब सैकड़ों लोगों की मेहनत और बेतहाशा पैसा बर्बाद होता नज़र आए. कंगना रानौत की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के साथ यही हुआ है. फिल्म में इतने झोल हैं कि आप चाहकर भी मेकर्स से सहानुभूति नहीं रख पाते. तीखी टिप्पणियां आपके अंदर से निकलती हैं.

मैं इस माइंडसेट के साथ गया था कि ओवर क्रिटिकल नहीं होऊंगा, जो कुछ भी पॉजिटिव होगा नोट करूंगा, फिर भी मेरे हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा. जबकि फिल्म की शुरुआत के पांच मिनट बहुत उम्दा थे. एक बढ़िया पेस सेट हुआ था. उसके बाद फिल्म अपने ट्रैक से ऐसा भटकी कि फिर लौटी ही नहीं.

कहानी तो पता है लेकिन एग्ज़िक्यूशन कहां है?

जैसा कि सब जानते हैं ‘मणिकर्णिका’ झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर बनी फिल्म है. इसलिए कहानी बताने का तो कोई मतलब है नहीं. हम सबको वो बचपन से याद है. हम तो उस अप्रतिम इतिहास को परदे पर ज़िंदा होता देखने गए थे. पर हाथ लगता है कंगना का हर फ्रेम में खुद मौजूद रहने का आग्रह और उससे फिल्म की हुई दुर्गति. ढाई घंटे से ज़्यादा की इस फिल्म में कोई इक्का-दुक्का ही सीन होगा जिसमें कंगना नहीं है. फिल्म शुरू होने के डेढ़ मिनट के अंदर वो स्क्रीन पर होती है और फिल्म ख़त्म उन्हीं के सीन से होती है. ये फिल्म रानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथा कम कंगना का ऐड कैम्पेन ज़्यादा लगती है. अंत में आप चीटेड महसूस करते हुए लौट आते हैं. ये सोचते हुए कि इससे अच्छा तो ‘झांसी की रानी’ सीरियल था.

बड़े-बड़े एक्टर वेस्ट हुए

कोई भी फिल्म उसके सहायक किरदारों को एस्टैब्लिश करके ही बड़ी होती है. इसमें ऐसा कुछ नहीं है. एक अंकिता लोखंडे को छोड़ दिया जाए तो किसी के हिस्से कुछ ख़ास नहीं आया है. वो भी ज़्यादा शायद इसलिए दिख जाती हैं क्योंकि उनके ज़्यादातर सीन कंगना के साथ हैं. उनके अलावा अतुल कुलकर्णी, डैनी, मुहम्मद ज़ीशान अय्यूब, सुरेश ओबेरॉय, कुलभूषण खरबंदा जैसे तगड़े कलाकार निरे वेस्ट हुए हैं. जबकि इनके हिस्से तगड़े रोल थे. संभावनाओं से भरे. तात्या टोपे, पेशवा जैसे. ज़ीशान का रोल पहले सोनू सूद कर रहे थे, बाद में छोड़ दिया था. अब लगता है ठीक ही किया था.

और भी हैं झोल

जब कोई फिल्म इतने बड़े लेवल पर बनती है तो हम उम्मीद करते हैं इतना सारा पैसा, इतना एक्सपीरियंस डिटेलिंग पर ज़रूर ध्यान देगा. ऐसा बिलकुल भी नहीं होता. जैसे कि 14 साल की मनु भी कंगना ही बनी है. या तो उस सीन को किसी बच्ची से कराते. या फिर मेकअप से कम से कम कंगना को कम उम्र ही दिखा देते. यार अब तो बॉलीवुड में भी बढ़िया मेकअप आर्टिस्ट्स होने लगे हैं. रांझणा में धनुष, फैन में शाहरुख तो याद ही होंगे. लेकिन ‘मणिकर्णिका’, कंगना को हर फ्रेम में दिखाने का मोह यहां भी नहीं छोड़ पाती.

इसी तरह ग्वालियर वाला पूरा सीक्वेंस ही बचकाना है. किसी रियासत के राजा के यहां अकेले घुसके कोई कहे कि ‘निकल जाओ यहां से’ और वो निकल भी जाए ये गले नहीं उतरता. अंकिता और कंगना जिस डंकिला गाने पर डांस पर करती हैं वो न सिर्फ वियर्ड है, बल्कि ग़लत समय पर भी आता है. ऐसे वक़्त आपको शिद्दत से लगता है कि यार ये तो झांसी की रानी का अपमान हो रहा है. अंग्रेज़ अफसर को काली माता का सपना आने वाला सीन चाहे जिस मकसद से रखा गया हो, इतना बचकाना है कि पूरा सिनेमा हॉल हंसने लगा था.

‘रंग दे बसंती’ वाले प्रसून जोशी कहां हैं?

प्रसून जोशी के लिखे डायलॉग्स में एक फकीरी तो है. लेकिन वो वाली नहीं जो संन्यास के तेज से आती है, बल्कि वो वाली जिसमें झोली खाली होती है. आप हैरान होते हैं कि वो वाले प्रसून कहां खो गए जिनकी लेखनी का जादू ‘रंग दे बसंती’ या ‘तारे ज़मीन पर’ जैसी फिल्मों में नज़र आया था. शांति से क्रांति की तुक मिलाते साधारण डायलॉग्स बहुत निराश करते हैं. स्क्रीन प्ले ‘बाहुबली’ वाले के वी विजयेंद्र प्रसाद ने लिखा है और ‘बाहुबली’ के आसपास भी नहीं है.

कुछ अच्छा भी है या नहीं?

अच्छाई की बात की जाए तो कंगना टुकड़ों में अच्छी लगती हैं. उन्होंने इस रोल के लिए खूब मेहनत की है, ये दिखता है. ख़ास तौर से तलवार चलाने वाले सीन्स में. तलवारबाज़ी का शुरुआती सीन तो बेहद उम्दा बन पड़ा है. युद्ध के कुछ सीन्स भी उम्दा निभाए उन्होंने. हालांकि जिस डायलॉग का सबको बेसब्री से इंतज़ार रहता है, उसे वो पूरे इम्पैक्ट के साथ डिलीवर नहीं कर पाई हैं. ‘उनके ‘मेरी झांसी नहीं दूंगी’ कहने से कोई जोशोजुनून पैदा होता नहीं दिखाई देता. झलकारी बाई के रोल में अंकिता लोखंडे ज़रूर प्रभावित करती हैं. अपना टीवी का तजुर्बा उन्होंने कामयाबी से इस्तेमाल किया है. ‘मेरा भारत रहना चाहिए’ गाना भी सही लगता है. इसके अलावा म्यूज़िक के फ्रंट पर कुछ नामलेवा है नहीं.

एक बात और, फिल्म में 1857 के संग्राम का महज़ ज़िक्र भर है. जब लक्ष्मीबाई झांसी में बगावत का झंडा बुलंद किए हुए थी, तब दिल्ली, मेरठ, लखनऊ में क्या हो रहा था ये देखने मिलता तो रानी का संघर्ष और एस्टैब्लिश होता. फिल्म में जान भी आती. न जाने क्यों इसे इग्नोर किया गया है.

जिन कहानियों से हमें प्रेम होता है उन पर अगर बुरी फ़िल्म बने तो दुःख होता है. हमारे इमोशंस को कोई भुना भी ले तो कोई बात नहीं लेकिन कम से कम प्रॉडक्ट तो ढंग का दे. फिल्म ख़त्म होने से ज़रा पहले कंगना एक डायलॉग बोलती है,

“वो यकीन नहीं कर पाएंगे ये वार हमने किया है.”

आम दर्शक चीखकर कहना चाहता है,

“एग्ज़ैक्टली बहन, एग्ज़ैक्टली!”

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