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फिल्म रिव्यू: धमाका

कुछ अरसा पहले एक फिल्म रिलीज़ हुई थी. परिणीती चोपड़ा की ‘दी गर्ल ऑन दी ट्रेन’. वो एक इंग्लिश नॉवेल पर बेस्ड थी. उसी नॉवेल पर बेस्ड एक सेम नाम की फिल्म 2016 में इंग्लिश में भी आई थी. परिणीती की फिल्म देखने से पहले मैंने वो फिल्म देख ली. नतीजा ये हुआ कि मुझे परिणीती वाली फिल्म में नुक्स ही नुक्स नज़र आए. हालांकि बाकी जनता को भी आए लेकिन मुझे लगा कि हो सकता है मैंने परिणिती वाली फिल्म थोड़े पूर्वाग्रह के साथ देखी हो. इस बार मैंने ये ग़लती नहीं दोहराई. मैंने कार्तिक आर्यन की ‘धमाका’ देखने से पहले, वो जिस पर बेस्ड है, वो कोरियन फिल्म ‘दी टेरर लाइव’ नहीं देखी. ताकि ‘धमाका’ को बिना किसी पूर्वाग्रह के साथ देख सकूं और देखने के बाद क्या पाया? आइए बात करते हैं.

‘धमाका’ कहानी है न्यूज़ एंकर कम रेडियो जॉकी अर्जुन पाठक की. एक सुहाने दिन उसकी लाइफ में कुछ सुहाना नहीं रहता. वो ऑन एयर होता है और एक कॉल आती है. कॉल करने वाला बताता है कि वो मुंबई के सी-लिंक पर बॉम्ब ब्लास्ट करने वाला है. अर्जुन उसकी बात हवा में उड़ा देता है. जवाब में कॉलर पहला विस्फोट पेश करता है. ज़ाहिर है एंकर साहब उसे तुरंत सीरियसली लेने लगते हैं. कॉलर की एक ही मांग है. छोटी सी. वो चाहता है कि मंत्री जयदेव पाटिल टीवी पर आकर माफ़ी मांगे. वरना वो और विस्फोट करेगा. क्यों करना चाहता है वो ये? क्या उसकी मांग पूरी होती है? इतना बड़ा स्टेप लेने के पीछे क्या वजह है? और क्या इन सब बातों से अर्जुन पाठक के अतीत का भी कोई कनेक्शन है? ये सब आपको फिल्म देखकर पता चलेगा.

कार्तिक आर्यन के लिए ये बहुत बड़ा मौक़ा था.

पहले फिल्म की अच्छी बातें कर लेते हैं. ‘धमाका’ फास्ट पेस्ड है. घटनाएं तेज़ी से घटती रहती हैं. इन फैक्ट फिल्म भूमिका बांधने में बिल्कुल समय ज़ाया नहीं करती. सीधे मुद्दे पर आती है. फिल्म शुरू होने के कुछ ही मिनटों के अंदर धमकी वाली कॉल आ भी जाती है. साथ ही फिल्म जिस नोट पर शुरू होती है वो सेटअप इंटरेस्टिंग लगता है. एक एंकर है, जिसकी पर्सनल लाइफ में दिक्कतें चल रही हैं, लेकिन उसे कैमरे के सामने नॉर्मल लगना है. मीडिया में काम करने वाले लोग इस कशमकश से परिचित होंगे. इस पॉइंट पर लगता है कि फिल्म सही दिशा में बढ़ रही है. उसके बाद धमकी वाली कॉल आती है और चैनल के दिग्गज न्यूज़ रिपोर्ट करने की जगह न्यूज़ बेचने के जुगाड़ में लग जाते हैं. यहां कुछेक रियलस्टिक चीज़ें भी दिखती हैं. जैसे अर्जुन की बॉस अंकिता उससे खबर का एंगल पूछती है. फिर ‘मज़ा नहीं आया’, ‘और इमोशन डालो’ जैसे जुमले बोलती है, तो सच में ही किसी खबरिया टीवी चैनल के न्यूज़ रूम का फील आने लगता है. यहां तक भी सब ठीक था. गड़बड़ आगे है और टू बी ऑनेस्ट बहुत सारी गड़बड़ है.

अच्छी बातों में फिल्म के संवादों को भी शामिल करना पड़ेगा. कुछेक संवाद बहुत उम्दा हैं. जैसे,

‘एंकर बना दिए जाते हैं, रिपोर्टर्स अपनी मर्ज़ी से बनते हैं’

‘न्यूज़ के लिए वक्त लगता है और ऑडियंस के पास वक्त नहीं है’.

वो सीन भी अच्छा है जब अमृता सुभाष चैनल का मोटो साफ़ शब्दों में अर्जुन को बताती है, ‘पहले चैनल, फिर जर्नलिज्म’. इसके अलावा फिल्म के अंत में आने वाला ‘खोया-पाया’ गाना भी बेहद अच्छा है. पुनीत शर्मा ने बेहद सरल शब्दों काफी गहरी बातें की हैं. पुनीत ने ही डायरेक्टर राम माधवानी के साथ मिलकर फिल्म का स्क्रीन प्ले लिखा है. इस फ्रंट पर फिल्म में उम्दा काम हुआ है. गड़बड़ कहीं और है.

Newsroom

गड़बड़ है एक अच्छी कहानी के एग्ज़िक्युशन में और एक्टर्स की परफॉरमेंस में. कुछ भी कन्विंसिंग नहीं लगता. बिना किसी शुगर कोटिंग के कहना हो, तो कार्तिक आर्यन अक्सर ओवर कर जाते हैं. न तो वो शॉक सही से डिलीवर कर पाते हैं, ना ही डर. उनके अभिनय से आप कनेक्ट कर ही नहीं पाते. उनका किरदार भी बेहद कन्फ्यूज्ड लगता है. फिल्म के मुताबिक़ वो एक मतलबी, महत्वाकांक्षी और क्रूर शख्स है. झूठा है, बेईमान है, करप्ट जर्नलिस्ट है. फिर फिल्म ये भी बताना चाहती है कि वो दिल का अच्छा है. दोनों ही चीज़ें ठीक से उभरकर सामने नहीं आती. सब कुछ आर्टिफिशियल लगता है.

ऐसा ही कुछ-कुछ मृणाल ठाकुर के लिए भी कहा जा सकता है. हालांकि उनको स्क्रीन स्पेस बेहद कम मिला है. लेकिन जो भी मिला उसमें वो कोई चमत्कार नहीं कर पाई हैं. एक सीन है, जिसमें वो एक बच्ची को बचाती हैं. उस सीन में वो इतनी कैजुअल दिखाई देती हैं कि हालात की टेंशन उस सीन से रिफ्लेक्ट ही नहीं होती. फिल्म में अगर कोई बिलिवेबल लगता है, तो वो हैं अमृता सुभाष. एक रुथलेस न्यूज़ चैनल हेड का किरदार उन्होंने बेहद कंविंसिंगली किया है.

Amruta Subhash1

 

सिस्टम से तंग आकर क़ानून हाथ में लेने की कहानी सिनेमा के परदे के लिए नई नहीं है. इस कहानी में बॉम्ब ब्लास्ट का तड़का भी नई चीज़ नहीं है. ‘दी वेडनेसडे’ जैसी फिल्मों में हम ये सब देख चुके हैं. और इससे बेहतर ढंग से देख चुके हैं. ‘धमाका’ इससे ज़्यादा तो क्या, इतना भी ऑफर नहीं करती. डायरेक्टर राम माधवानी जो ‘नीरजा’ में कर गए थे, वो ‘धमाका’ में नहीं दोहरा पाए हैं. एक अच्छी कहानी और स्क्रीन प्ले को यूं ज़ाया होते देखना दुखदाई है. लेकिन यही जीवन है.


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