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बलराज साहनी की 4 फेवरेट फिल्में : खुद उन्हीं के शब्दों में

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रावलपिंडी में 1 मई 1913 को जन्मे बलराज साहनी ‘दो बीघा ज़मीन’ और ‘गरम हवा’ जैसी सर्वकालिक महान फिल्मों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. उनकी अन्य लोकप्रिय फिल्मों में काबुलीवाला (1961), हकीकत (1964), दो रास्ते (1969) और वक्त (1965) शामिल हैं. उनके जैसी नेचुरल एक्टिंग हासिल कर  पाना आज की पीढ़ी के एक्टर्स के लिए भी सपना ही है. यही कारण है कि आज भी शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे बहुत से अभिनेता जब अपने पसंदीदा एक्टर्स का नाम लेते हैं तो सबसे ऊपर या प्रमुख में बलराज साहनी होते हैं.

जब वे 59 वर्ष के थे तब उनकी मृत्यु हो गई. परिवार में उनके बेटे परीक्षित साहनी हैं जो अभिनेता हैं. वे ‘मुन्नाभाई सीरीज’ समेत राजकुमार हीरानी की ज्यादातर फिल्मों में दिखते हैं. विभाजन को लेकर ‘तमस’ जैसी त्रासद रचना लिखने वाले भीष्म साहनी बलराज के छोटे भाई हैं. बलराज सहानी की फेवरेट फिल्मों की सूची बहुत लंबी है और उन में से चार का जिक्र यहां कर रहे हैं. इन फिल्मों ने उन पर इतना गहरा असर क्यों छोड़ा इसे उन्होंने अपनी आत्मकथा में बताया था. उनके ही शब्दों में जानेंः

# द सर्कस

1936, डायरेक्टर -ं ग्रिगोरी एलेकसांद्रोव

” अमेरिकी युवती मैरियन नस्लभेद को न मानने की वजह से अपने देश में गोरे नागरिकों की घृणा झेलती है. फिर वो ठोकरें खाते हुए एक सर्कस मंडली में पहुंच जाती है. जब ये मंडली रूस में परफॉर्म करने पहुंचती है तो वहां उसे और उसके अतीत को लोग जिस समानता और प्यार से स्वीकार करते हैं वो अविश्वसनीय होता है. “

द सर्कस का एक दृश्य.
द सर्कस का एक दृश्य.

ये वो रशियन फिल्म थी जिसे देखने के बाद फिल्मों में और जिंदगी में मेरा भरोसा फिर से जिंदा हो गया था. थियेटर से घर मेरे साथ ये फिल्म उस महानता और उदारता को भी ले आई जो दिखाने में मानवता सक्षम है. इतने बरसों बाद भी मैं इस यादगार फिल्म की हर चीज याद कर सकता हूं. इसमें एक अमेरिकी सर्कस ट्रूप मॉस्को आता है. इसका स्टार अट्रैक्शन एक वाइट अमेरिकी लड़की का दिलेर करतब है जिसमें वो एक तोप की नली में से हवा में फेंकी जाती है. वहां एक रूसी युवक होता है जो खुद एक सर्कस का कलाकार होता है. वो उस लड़की के प्यार में पड़ जाता है. उस लड़की को भी वो आकर्षक लगता है लेकिन उसे समझ नहीं आता कि वो उसके पास रहने से क्यों कतराती है. आखिर में जब वो खुद को और नहीं रोक पाता, वो उसके कमरे में घुस जाता है और क्या देखता है कि वो लड़की एक अश्वेत बच्चे को अपना दूध पिला रही है. युवक को अब असल बात पता चलती है.

दरअसल अमेरिका में अपने शहर में उस लड़की को एक नीग्रो लड़के से प्यार हो गया होता है जिसके साथ वो छुप-छुपकर मिला करती थी. बाद में उसको पता चलता है कि वो प्रेग्नेंट हो चुकी है. वो यह सोचकर डर जाती है कि अगर गोरे अमेरिकियों को उसकी प्रेग्नेंसी के बारे में पता चला तो वो सब उसके अश्वेत प्रेमी को मार डालेंगे. ऐसे में वो घर से भाग जाती है. लेकिन फिर वो एक दुष्ट आदमी के चंगुल में फंस जाती है जो उसे एक सर्कस मालिक को बेच देता है.

ये कहानी पता चलने के बाद उसका रूसी प्रेमी उसे भरोसा दिलाता है कि इस बच्चे के बावजूद यहां का प्रगतिशील सोवियत समाज उसे और उसके बच्चे को स्वीकार करके और बहुत सम्मान देगा क्योंकि ये किसी भी तरह के रंग-भेद की मानसिकता से मुक्त है. उसके बाद वो लड़की अमेरिकी सर्कस छोड़ देती है और दोनों शादी कर लेते हैं. उसके बाद वो दोनों पति-पत्नी एक टीम के रूप में एक रूसी सर्कस कंपनी में काम करने लगते हैं. फिल्म की हाइलाइट उसका आखिरी सीन है जिसमें दिखता है कि उसका अश्वेत बेटा न सिर्फ उसके रूसी सर्कस के साथियों बल्कि पूरे रूस की आंख का तारा बन गया है.

इस फिल्म का मेरे दिमाग पर बहुत ही भारी असर पड़ा. इतना कि जब मैं पिक्चर हॉल से बाहर आया तो मैं अपनी ही दुनिया में था. इतना कि पास ही में एक बम विस्फोट हुआ था और मेरे पास उड़ रहे कांच के टुकड़ों और पत्थरों की ओर मेरा ध्यान ही नहीं था. इस फिल्म को देखने के बाद मैं इस बात पर मनन करने से खुद को रोक नहीं पाया कि रूसी और अमेरिकी फिल्मों में कितना बड़ा अंतर था. अमेरिकी फिल्मों में हमेशा इंसान को परिस्थितियों का ग़ुलाम बताया जाता है. आदमी की अंदरूनी ताकत के बजाय उसकी कमज़ोरियों से अमेरिकी फिल्मों की थीम बनती है. कुछ दिनों के बाद मुझमें इच्छा जागी कि मैं उस फिल्म को फिर से देखूं. मैंने जब ऑडिटोरियम में प्रवेश किया तो फिल्म शुरू हो चुकी थी और मुझे नहीं दिखा कि मेरी पंक्ति में कौन बैठे हैं. जब शो खत्म हुआ और लाइट्स चालू की गईं तो मैंने देखा कि पूरा हॉल अमेरिकी नीग्रो सैनिकों से भरा हुआ था. उनके चेहरों के भाव देखते हुए मुझे उनसे एक किस्म के बंधुत्व का भाव महसूस हुआ. हम दोनों ही ‘ब्लैक’ आदमी थे और अपने-अपने मुल्कों में हम एक जैसे ही थे. (पूरी फिल्म यहां देखें.)

# मानूस

1939, डायरेक्टर – वी. शांताराम

मानूस के एक दृश्य में दोनों किरदार.
मानूस के एक दृश्य में दोनों किरदार.

” गणपत नाम का एक पुलिसवाला है. एक रात ड्यूटी के दौरान मैना से टकरा जाता है. वो वेश्या है. शुरुआती घृणा के बाद वो उसके प्रति सहानुभूति पालता है. आगे मुलाकातें बढ़ती हैं और उससे प्यार करने लगता है. वो मैना से शादी करके उसे एक सामान्य जीवन देना चाहता है. अपनी मां के पास भी ले जाता है. लेकिन समाज इसे नहीं मानता.”

मैं बता भी नहीं सकता कि इस फिल्म ने मेरे दिमाग पर कितना भारी असर छोड़ा था. मैंने वी. शांताराम की ‘आदमी’ भी देखी थी और इसका मराठी वर्जन ‘मानूस’ भी. ये कहानी जिस तरह के परिवेश में स्थित थी उसे इतने ईमानदार ढंग से तो न्यू थियेटर्स वालों की फिल्म भी नहीं दिखा पाई थी. जब मैं हॉल में बैठा उस फिल्म को देख रहा था मुझे लगा जैसे मैं खुद पूना की गलियों और रास्तों मैं चल रहा हूं. यहां तक कि फिल्म में जो बाथरूम और किचन दिखाया गया वो एकदम असल लगते थे. मैं बेसब्र हो रहा था कि कब घर जाऊं और डायरेक्टर वी. शांताराम को तारीफ भरा पत्र लिखूं. बाद में मैं हैरान हुआ जब उनका जवाब भी तुरंत ही आ गया. उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया था. (पूरी फिल्म यहां देखेँ.)

# मज़दूर

1945, डायरेक्टर – नितिन बोस

” ये कहानी एक मिल में काम करने वाले श्रमिकों के बारे में है. जो ताकतवर मालिकों के शोषण के प्रति आवाज उठाते हैं. इसमें मिल मैनेजर का भी एक प्रमुख किरदार है जिसे नासिर खान ने किया था जो दिलीप कुमार के छोटे भाई हैं. ये फिल्म अब ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती. “

नासिर खान डेब्यू फिल्म मज़दूर में.
नासिर खान डेब्यू फिल्म मज़दूर में.

जिन्होंने भी ये फिल्म देखी है वो मेरी इस बात पर सहमत होंगे कि हिंदुस्तान में जितनी भी फिल्में बनी हैं उनमें ‘मज़दूर’ है जो रियलिस्टिक फिल्म के तौर पर एक गौरवाशाली स्थान रखती है. मैंने अब तक ऐसी कोई और फिल्म नहीं देखी जिसमें वर्ग संघर्ष को इतने रियलिज़्म, चतुराई और परफेक्ट ढंग से बताया गया हो. क्लास स्ट्रगल के सब पहलू इसमें हैं – चाहे वो पूंजीवादियों की कामगारों के बीच फूट डालने की निरंतर कोशिशें हों या वो सब चालबाज़ियां जो पूंजीपतियों की मदद के लिए वो करते हैं, ताकि इस क्लास के लोग अपनी आत्मा बेच दे और वर्कर्स का ख़ून बहाकर मार डालने में अपने पूंजीपति संरक्षकों की मदद करें.

चाहे इसके लिए धर्म का सहारा लेना हो या श्रमिक नेताओं के मर्डर करवाने की कोशिशें हों इस फिल्म में इतने बोल्ड तरीके से दिखाया गया है कि जब ये रिलीज हुई तो प्रोड्यूसर्स तक डर गए थे. कई शहरों में इसी वजह से फिल्म उतार ली गई थी जबकि वो बहुत भीड़ जुटा रही थी. मेरे एक दोस्त ने बताया कि कानपुर के अंग्रेज डिप्टी पुलिस कमिश्नर ने अपने लखपति भारतीय दरबारियों के कहने पर रिलीज के चौथे दिन एक स्थानीय सिनेमाघर से फिल्म को उतरवा दिया जिसके कारण सिनेमाघर मालिक को बहुत नुकसान हुआ.

बंगाल में बिमल रॉय ‘हमराही’ नाम की फिल्म बना रहे थे जो पूंजीवादी व्यवस्था का मजाक उड़ाती थी. हालांकि वे भी अपनी फिल्म को ‘मज़दूर’ जितना सच्चा नहीं बना पाए थे. फिल्म के आखिरी फेड आउट सीन में दिखता है कि हीरो और हीरोइन हाथ में हाथ थामे क्षितिज की ओर बढ़ जाते हैं. निर्माण कंपनी न्यू थियेटर्स के लिहाज से ये कहानी का बड़ा ही टिपिकल अंत था जो दिखाता था कि उन्होंने अपनी सारी मुश्किलों को ‘किस्मत’ के हाथ छोड़ दिया था. हालांकि ‘मज़दूर’ ने इस पलायनवादी मोड़ पर फिल्म को खत्म करने से इनकार कर दिया था.

बल्कि इसके हीरो ने लखपति की बेटी से शादी नहीं की. इस फिल्म ने ये नहीं कहा कि श्रमिक लोग अपनी दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार हैं बल्कि इसमें एकदम स्पष्ट होकर ये कहने की हिम्मत थी कि सिर्फ एकता और समन्वयता से ही कामगार लोग पूंजीवादी व्यवस्था को तोड़ सकते हैं और अपने लोगों को समाजवाद के रास्ते पर ले जा सकते हैं.

# धरती के लाल

1946, डायरेक्टर – ख्वाजा अहमद अब्बास

” बंगाल में 1943 में पड़े नरसंहारक अकाल में एक परिवार को अपना घर छोड़कर कलकत्ता की ओर कूच करने पर मजबूर होना पड़ता है. इसी दौरान विश्व युद्ध भी चल रहा है. इन हालातों में ये परिवार दर्दनाक परिस्थितियों का सामना करता है. “

फिल्म धरती के लाल में बलराज साहनी.
फिल्म धरती के लाल में बलराज साहनी.

एक कमर्शियल फिल्म के रूप में फ्लॉप होने के बावजूद ‘धरती के लाल’ निस्संदेह बहुत ऊंचे दर्जे की आर्टिस्टिक फिल्म थी. जिसने भी इसे देखा उसने सिर्फ तारीफ ही की. और असल में तो इसने भारत से ज्यादा विदेश में तारीफें बटोरीं. मशहूर अंग्रेजी पब्लिशिंग हाउस पेंगुइन्स की एक पत्रिका में तो इसे फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में मील का पत्थर कहा गया. इसे पूरे सोवियत संघ और दूसरे कई मुल्कों में दिखाया गया और वहां की लाइब्रेरियों में इसे शामिल किया गया.

ठीक बात है कि ‘धरती के लाल’ में बहुत सारी कमियां हैं लेकिन इसमें तारीफ के काबिल ऐसी चीजें भी हैं जो बहुत सी दूसरी फिल्मों से गायब हैं. जैसे कि कोई सबसे रईस प्रोड्यूसर भी इतनी बड़ी संख्या में कामगारों और किसानों से मुफ्त में काम नहीं करवा सकता था जितना इस फिल्म में रहे हैं. इसके अलावा फिल्म का हर सीन मानवीय और उदारवादी भावों से भरा था. इस फिल्म को देखने के बाद एक प्रोड्यूसर ने मुझे कहा, “तुम लोगों ने तो रियलिज़्म के मामले में रूसियों को भी पीछे छोड़ दिया है.”

ये ‘धरती के लाल’ जैसी फिल्म ही थी जिसने अपने बाद में रियलिस्टिक जॉनर की फिल्मों के लिए रास्ता तैयार किया. जैसे बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’ और सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’. जब तक हम कामगारों ने निस्वार्थ और विनम्र श्रमिकों की तरह साथ में मिलकर काम किया हमारी फिल्में सहयोग का एक मॉडल बनी रहीं. अगर हम लोग इसी तरह आगे भी काम कर पाते तो ‘धरती के लाल’ कुछ परमानेंट करके जाती. हम ऐसी फिल्म सोसायटी का निर्माण कर सकते थे जो देशभक्ति भरी और सामाजिक रूप से प्रगतिशील फिल्में बनाती. लेकिन हमारी किस्मत ऐसी नहीं हो पाई. (पूरी फिल्म यहां देखें.)

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