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रामभद्राचार्य को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को 'छोटी बहन' क्यों कहा?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में संस्कृत के विद्वान रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया. रामभद्राचार्य को गीतकार गुलजार के साथ साल 2023 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है.

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16 मई 2025 (अपडेटेड: 16 मई 2025, 09:10 PM IST)
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राष्ट्रपति ने रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ सम्मान दिया. (फोटो- X)
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तुलसी पीठ के संस्थापक और संस्कृत भाषा के विद्वान रामभद्राचार्य को साल 2023 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया है. शुक्रवार, 16 मई को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें ये सम्मान सौंपा. राष्ट्रपति के हाथों ज्ञानपीठ सम्मान पाकर रामभद्राचार्य ने इसे अपने शीश पर रख लिया. 

सबसे पहले वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा रामभद्राचार्य को दी गई. इसके बाद राष्ट्रपति मुर्मू ने ही रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ सम्मान का प्रशस्ति पत्र सौंपा. भारतीय ज्ञानपीठ के अध्यक्ष वीरेंद्र जैन ने उन्हें 11 लाख की सम्मान राशि का चेक भेंट किया. रामभद्राचार्य ने इसे भी अपने माथे से लगा लिया. इसके बाद उन्हें संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया. 

संस्कृत के श्लोकों के साथ संबोधन की शुरुआत कर रामभद्राचार्य ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी ‘छोटी बहन’ बताया. उन्होंने कहा,

ज्ञानपीठ समारोह में समुपस्थित भारत की यशस्विनी राष्ट्रपति महोदया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू भावजगत में मेरी छोटी बहन हैं. क्योंकि कृष्णावतार में द्रौपदी गिरिधर (श्रीकृष्ण) की बहन थीं. मेरा पहले का नाम गिरिधर है और ये मेरी बहन हैं.

रामभद्राचार्य के ऐसा कहते ही वहां ठहाका गूंज उठा. राष्ट्रपति भी इस पर हंस पड़ीं. इसके बाद महामहिम राष्ट्रपति ने कहा,

रामभद्राचार्य ने श्रेष्ठता के प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं. आप अनेक प्रतिभाओं से सम्पन्न हैं और आपके योगदान बहुआयामी हैं. आपने शारीरिक दृष्टि से बाधित होने के बावजूद अपनी अंतर्दृष्टि, बल्कि दिव्यदृष्टि से साहित्य और समाज की असाधारण सेवा की है.

कौन हैं रामभद्राचार्य?

मध्य प्रदेश के चित्रकूट में तुलसी पीठ के संस्थापक और प्रमुख रामभद्राचार्य शिक्षक और संस्कृत भाषा के विद्वान हैं. जन्म के कुछ महीने बाद ही उनके आंखों की रोशनी चली गई थी. लेकिन ये शारीरिक समस्या उनके धार्मिक ज्ञान बढ़ाने की कर्मठता को कभी प्रभावित नहीं कर पाई. रामभद्राचार्य ने 100 से ज्यादा किताबें लिखी हैं. वह 22 भाषाओं के जानकार बताए जाते हैं. भारत सरकार ने साल 2015 में इन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया था. रामभद्राचार्य की चर्चित रचनाओं में श्रीभार्गवराघवीयम्, अष्टावक्र, आजादचन्द्रशेखरचरितम्, लघुरघुवरम्, सरयूलहरी, भृंगदूतम् और कुब्जापत्रम् शामिल हैं.

ये भी पढ़ेंः ज्ञानपीठ को अंग्रेजी में 'जनानपीठ' यानी 'jnanpith' क्यों लिखते हैं?

ज्ञानपीठ सम्मान क्या है?

साहित्य का सर्वोच्च सम्मान माने जाने वाले ज्ञानपीठ पुरस्कार की शुरुआत 1961 में हुई थी. भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने के लिए इस पुरस्कार में 11 लाख रुपये की धनराशि, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी सरस्वती की कांस्य प्रतिमा दी जाती है. रामभद्राचार्य के साथ 2023 में फिल्म निर्देशक-गीतकार गुलजार को भी यह सम्मान दिया गया था.

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