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ज्ञानपीठ को अंग्रेजी में 'जनानपीठ' यानी 'jnanpith' क्यों लिखते हैं?

यज्ञ को भी 'यजना' कहते हैं. मगर क्यों?

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14 जून 2019 (अपडेटेड: 14 जून 2019, 12:45 PM IST)
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कृष्णा सोबती को बीते साल ज्ञानपीठ सम्मान मिला था. अमिताव घोष को इस साल मिला है, अंग्रेजी में लेखन के लिए. बीच में गिरीश कर्नाड हैं, जिनका हाल ही में निधन हुआ है. इन्हें 1998 में ये सम्मान मिला था.
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मेरे बचपन के कुछ बड़े सवाल थे.
1. बच्चे कहां से आते हैं? 2. शराब कड़वी होती है फिर भी क्यों पीते हैं? 3. टीवी के अंदर इंसान कैसे घुसते हैं? 4. पुती हुई दीवारों पर जिस 'शीघ्रपतन' का जिक्र होता है, वो क्या होता है? 5. यज्ञ को अंग्रेजी में 'yajna' क्यों लिखते हैं?
उम्र के साथ सभी सवालों के जवाब मिल गए. आखिरी वाले का छोड़कर. आखिर 'यज्ञ' अंग्रेजी में 'यजना' और 'ज्ञान' अंग्रेजी में 'जनान' (jnan)क्यों हैं?
घोष को 54वां ज्ञानपीठ मिला है. ये पहली दफ़े है कि ये सम्मान अंग्रेजी में लेखन के लिए दिया गया हो.
घोष को 54वां ज्ञानपीठ मिला है. ये पहली दफ़े है कि ये सम्मान अंग्रेजी में लेखन के लिए दिया गया हो.

मगर आज इसका जवाब मिलेगा. क्योंकि मौका भी है, दस्तूर भी है. क्योंकि नामी अंग्रेजी लेखक अमिताव घोष को ज्ञानपीठ सम्मान दिया गया है. जिसे अंग्रेजी में कहते हैं Jnanpith.
क्या है Jnanpith यानी ज्ञानपीठ
1. ज्ञानपीठ एक संस्थान है. जिसका मालिक है साहू जैन परिवार. अब ये कौन हुए. ये हुए देश के सबसे पुराने इंडस्ट्रियलिस्ट में से एक.
2. बड़ी सी इस जॉइंट फैमिली ने आजादी के बाद देश में कई सारे संस्थान शुरू किए. इसी परिवार के साहू शांति प्रसाद जैन ने शुरू किया 'भारतीय ज्ञानपीठ'. जो भारतीय साहित्य और उससे जुड़े रिसर्च को प्रमोट करने के लिए बनाया गया.
3. साहू जैन परिवार ही 'बेनेट एंड कोलमन कंपनी लिमिटेड' (जिसे आप अखबार वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के नाम से जानते हैं) के मालिक भी हैं.
4. ज्ञानपीठ सम्मान ही साहू जैन ग्रुप का इकलौता पुरस्कार नहीं है. इंडिया में फिल्मफेयर अवॉर्ड यही देते हैं, 'मिस इंडिया' कॉन्टेस्ट भी यही करवाते हैं.
फिल्मफेयर अवॉर्ड 1954 में सबसे पहले दिए गए थे.
फिल्मफेयर अवॉर्ड 1954 में सबसे पहले दिए गए थे.

5. इनकी बिजनेस लिगेसी सौ-डेढ़ सौ नहीं, कम से कम एक हजार साल पुरानी है. कहा जाता है, इनके पूर्वज नट्टल साहू देश के सबसे पुराने व्यवसाइयों में से एक थे. नट्टल के जीवन का समय 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच बताया जाता है.
6. भारतीय ज्ञानपीठ को शुरू करने का सबसे बड़ा मकसद ही था जैन साहित्य को बचाना. जैन साहित्य मूल रूप से संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और मगधी में लिखा गया है. समय के साथ भारतीय ज्ञानपीठ ने मॉडर्न इंडियन लैंग्वेजेस, यानी भारत देश में बोली-लिखी जाने वाली तमाम भाषाओं में इन्वेस्ट किया. और इन भाषाओं में लेखन होता रहे, इसके लिए चालू किया 'ज्ञानपीठ सम्मान'. 2015 में इस सम्मान में 11 लाख रूपये की राशि तय की गई थी.
7. साहू शांति प्रसाद जैन की कहानी भी मस्त है. ये थे रामकिशन डालमिया के दामाद. रामकिशन डालमिया देश की सबसे बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट थे. गन्ना और सीमेंट इनकी सबसे बड़ी इंडस्ट्री थी. जब इंडिया का विभाजन हुआ, मोहम्मद अली जिन्ना डालमिया को अपना घर बेच गए थे.
रामकिशन डालमिया ने दो अंग्रेज पत्रकारों यानी बेनेट और कोलमन से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप अक्वायर किया था. इनपर आरोप था कि इन्होंने ये कंपनी वैसे ही ली थी, जैसे बाज़ीगर में मदन चोपड़ा ने शाहरुख़ के पापा की कंपनी हथियाई थी. गबन करके. और 10 साल बाद फ़िरोज़ गांधी ने इनपर इन्क्वायरी बैठाई थी. मगर ये कहानी फिर कभी.
ऐसा दिखता है ज्ञानपीठ सम्मान.
ऐसा दिखता है ज्ञानपीठ सम्मान.

ज्ञानपीठ पर लौटते हैं
1. ये अवॉर्ड 1961 में शुरू हुआ. इंडिया भाषाओं को प्रमोट करने के लिए.
2. अभी तक 54 बार ये सम्मान दिया गया है. कुल 58 लेखकों को मिल चुका है. 4 बार इसे दो लोगों को दिया गया है. इसलिए.
3. इसके पहले ये अवॉर्ड कृष्णा सोबती, भालचंद्र नेमाड़े, कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा, केदारनाथ सिंह जैसे कई बड़े नामों को मिला है.
4. टेक्निकली अंग्रेजी, इंडियन भाषा नहीं है. संविधान की 22 'भारतीय' भाषाओं में अंग्रेजी को नहीं रखा गया है. मगर इस साल पहली बार ये सम्मान अंग्रेजी में लिखने वाले को मिला है. यानी अमिताव घोष.
कृष्णा सोबती, जिन्हें 2017 में ये सम्मान मिला था. 25 जनवरी 2019 को इनका निधन हो गया.
कृष्णा सोबती, जिन्हें 2017 में ये सम्मान मिला था. लंबे क्रांतिकारी लेखन के बाद 25 जनवरी 2019 को इनका निधन हो गया.

अमिताव घोष कौन हैं
- 62 साल उम्र, कलकत्ता में जन्म, दून स्कूल और फिर दिल्ली के स्टीफेंस कॉलेज से पढ़ाई. उसके बाद काफ़ी पढ़ाई.
- नौकरी तो पत्रकारिता से शुरू हुई. इंडियन एक्सप्रेस अखबार में. फिर प्रोफेसरी की. क्वीन्स और हार्वर्ड जैसे बड़ी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाते रहे.
- 1986 में पहला उपन्यास आया था, 'द सर्कल ऑफ़ रीजन'. अब तक कुल 9 उपन्यास आ चुके.
- फिलहाल न्यू यॉर्क में रहते हैं.
आप इनका लिखा हुआ क्या पढ़ें
अपनी 'आइबिस' ट्रिलजी के लिए अमिताव घोष साहित्यिक दुनिया में खासे जाने जाते हैं. 'आइबिस' पानी के जहाज का काल्पनिक नाम है. और ट्रिलजी का मतलब, तीन पार्ट्स में आई किताबें. ये तीन किताबें हैं:
1. सी ऑफ़ पॉपीज (2008)
2. रिवर ऑफ़ स्मोक (2011)
3. फ्लड ऑफ़ फायर (2015)
"attachment_186444" align="alignnone" width="600"'हिंदुस्तानी' फिल्म 1996 में आई थी. कमल हासन ने हिंदुस्तानी का किरदार किया था. ये विजिलान्टे सीरियल किलर था. यानी कानून अपने हाथ में लेकर करप्ट लोगों की हत्या करता था. इस सीन में पुलिस वाले उसकी लिखावट देखते हुए बात कर रहे हैं कि ये व्यक्ति जरूर वृद्ध होगा, क्योंकि 'अ' और 'झ' पुराने तरीके से लिखा गया है. ये बदलती लिपि का उदाहरण है.
'हिंदुस्तानी' फिल्म 1996 में आई थी. कमल हासन ने हिंदुस्तानी का किरदार किया था. ये विजिलान्टे सीरियल किलर था. यानी कानून अपने हाथ में लेकर करप्ट लोगों की हत्या करता था. इस सीन में पुलिस वाले उसकी लिखावट देखते हुए बात कर रहे हैं कि ये व्यक्ति जरूर वृद्ध होगा, क्योंकि 'अ' और 'झ' पुराने तरीके से लिखा गया है. ये बदलती लिपि का उदाहरण है.

3. अब हिंदी ने संस्कृत का अक्षर 'ज्ञ' रख लिया है. पर उसका उच्चारण 'ज्यं' से बदलकर 'ग्यं' कर दिया है. पर शुद्धतावादी अब भी इसे 'ज्यं' ही पढ़ते हैं. और अंग्रेजी में 'jn' ही लिखते हैं.
4. इसी अक्षर 'ज्ञ' को मराठी ने भी रखा हुआ है. मगर उसका उच्चारण मराठी में है 'द्यं'.
मतलब लिखा हुआ शब्द 'ज्ञान' 3 तरीकों से पढ़ा जा सकता है:

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5. ऐसी कई शुद्ध ध्वनियां हैं जिनके उच्चारण में हम भेद नहीं कर पाते. जैसे 'श' और 'ष'. 'रि' का उच्चारण 'ऋ' से कितना अलग है, इसका आम उच्चारण में ध्यान नहीं रखा जाता. कई पत्रकारीय संस्थान 'ऋतिक' (एक्टर का नाम) से 'रितिक' की ओर बढ़ चुके हैं, उच्चारण की सहजता के चलते.
इसलिए किसी का नाम अगर 'प्रज्ञा' हो. तो उसको अंग्रेजी में Pragya लिखते हैं हम. मगर असल बात तो ये है कि 'ज्ञ' को 'gy' लिखने से 'ञ' की साउंड का लोप हो जाता है. और 'प्रज्ञा' का उच्चारण 'प्रग्या' हो जाता है. चमका?
और जाते-जाते
अमिताव घोष को गूगल करिएगा. अगर लिखने-पढ़ने में रुचि हो तो उनकी किताबें मंगाकर जरूर पढ़िएगा. और ज्ञानपीठ को जनानपीठ न कहिएगा.


 

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