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ऋषि कपूर के ये 13 गीत सुनकर समझ आता है, ये लवर बॉय पर्दे पर कैसे मेच्योर हुआ

ऋषि कपूर को गुज़रे एक साल हो गए.

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लेफ़्ट में 'बॉबी'. बीच में 'क़र्ज़' और राइट में 'दीवाना' फ़िल्म का सीन.
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30 अप्रैल 2021 (अपडेटेड: 29 अप्रैल 2021, 05:20 AM IST)
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ऋषि कपूर. लवर बॉय. हमारी या हमारे बाद वाली जेनरेशन शायद उनके इस टाइटल से रिलेट न कर पाए. मगर हमसे कुछ पहले वालों के लिए वो एक झंडाबरदार हैं. प्रेम के. क्रांति के. आज हमारे ‘पीडीए’ यानी पब्लिक डिस्प्ले ऑफ़ एफेक्शन का ऋषि सालों पहले ऐलान कर चुके थे ‘खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे’. कॉलेज, म्यूज़िक बैंड, फ़ैशन, क़व्वाली, प्रेम… वो जिसके हज़ारों दीवाने और जो ख़ुद बन गया दीवाना. तो सोचिए, सही मायनों में ऋषि कपूर के अलावा ‘लवर बॉय’ का ख़िताब और कौन पा सकता था?

और इस ख़िताब को पाने में, जो पहचान बनी वो पहचान बनाने में, ऋषि कपूर के ऊपर फ़िल्माए गए गीतों का सबसे बड़ा हाथ है. यानी ऋषि कपूर को, उनके करियर को, उनकी सफलताओं को समझना है तो उन पर फ़िल्माए गए गीतों को सुने और देखे बिना ये संभव नहीं. और अगर इन गीतों को रिलीज़ वर्ष के बढ़ते हुए क्रम में रख दें तो आप देखेंगे एक कर्व. एक एक्टर का कर्व, कैसे वो ग्रो करता है. कैसे उसे मिलने वाले रोल मेच्योर होते हैं. सुनिए और देखिए उनपर फ़िल्माए गए कुछ बेहतरीन गीत, जो ऋषि कपूर को, ऋषि कपूर बनाते हैं. अमर बनाते हैं- # 1. फ़िल्म- बॉबी (1973) # गीत- 'हम तुम एक कमरे में बंद हों', 'ना चाहूं सोना चांदी', 'झूठ बोले कौवा काटे', 'मैं शायर तो नहीं', 'मुझे कुछ कहना है', 'अंखियो को रहने दे अंखियों के आस पास'… बॉबी के सभी गीत सुपरहिट रहे थे, इसलिए आप देखिए और सुनिए पूरा म्यूज़िक एल्बम. उससे पहले इस मूवी के गीत, ‘मैं शायर तो नहीं’ के कुछ बेहतरीन बोल-
सोचता हूं अगर मैं दुआ मांगता, हाथ अपने उठाकर मैं क्या मांगता? जबसे तुझसे मोहब्बत मैं करने लगा, तबसे जैसे इबादत मैं करने लगा. मैं काफ़िर तो नहीं, मगर ऐ हसीं, जबसे देखा मैंने तुझको, मुझको को बंदगी आ गई.
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# 2. फ़िल्म- ज़हरीला इंसान (1974) # गीत- 'ओ हंसिनी'. आरडी का म्यूज़िक, मजरूह सुल्तानपुरी के संस्कृतनिष्ठ बोल. कमाल की मेलोडी. गीत और फ़िल्म अपने आप में कई मायनों में यूनीक. फ़िल्म में ऋषि कपूर का, उन दिनों के ऋषि कपूर से बिलकुल अलग किरदार. ग्रे शेड. ग़ुस्सैल. कन्नड़ फ़िल्म और 3 कन्नड़ नॉवल्स पर बेस्ड ये फ़िल्म चली नहीं उतनी. न 'ओ हंसिनी' के अलावा और कोई और गीत, लेकिन ये एक गीत टाइमलेस हो गया.
देर से लहरों में कंवल संभाले हुए मन का, जीवन ताल में भटक रहा रे तेरा हंसा. ओ हंसिनी, मेरी हंसिनी, कहां उड़ चली, मेरे अरमानों के पंख लगाके, कहां उड़ चली.
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# 3. फ़िल्म- खेल खेल में (1975) # गीत- ऋषि और नीतू के बीच की लव केमिस्ट्री समझने के लिए उनके रियल प्रेम का ये रील वर्जन देखना ज़रूरी है. ‘खेल खेल में’. इस मूवी के भी एक से ज़्यादा गीत बेहतरीन हैं. ‘हमने तुमको देखा’, ‘एक मैं और एक तू’. लेकिन जैसा स्टोरी के शुरू में बताया था, ‘खुल्लम-खुल्ला’ उन दिनों लव कपल्स का एंथम बन गया था. एक क्रांति करने के लिए प्रेरित करता.
प्यार हम करते हैं, चोरी नहीं, मिल गए दिल ज़ोरा-ज़ोरी नहीं. हम वो करेंगे दिल जो कहे, हमको जमाने से क्या? खुल्लम-खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों, इस दुनिया से नहीं डरेंगे हम दोनों.
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# 4. फ़िल्म- अमर अकबर एंथनी (1977) # गीत- ‘अमर अकबर एंथनी’ सही मायनों एक मल्टीस्टारर मूवी थी. पर्दे पर विनोद खन्ना - शबाना आज़मी, अमिताभ बच्चन - परवीन बॉबी और ऋषि कपूर-नीतू सिंह की तीन जोड़ियां. इस मूवी का एक गीत ‘बोलो तो जिएं’ भी सही मायनों में मल्टीस्टारर गीत था. मुकेश, रफ़ी, किशोर और लता मंगेशकर एक ही गीत में एक साथ. बाक़ी गीत भी अच्छे थे इस मूवी में. ‘शिर्डी वाले साईं बाबा’ आज भी कइयों की कॉलर ट्यून और रिंग टोन सुनाई देगी. ‘माय नेम इज़ एंथनी गोंज़ालविस’, ‘एक जगह जब खड़े हो तीनों’. लेकिन ऋषि कपूर के ऊपर फ़िल्माए गए दो गीत शायद इस मूवी के सबसे सुपरहिट गीत रहे थे. एक तो ‘तैय्यब अली’ और दूसरा क़व्वाली, ‘पर्दा है पर्दा’. इससे ठीक 3 महीने बाद आई ‘हम किसी से कम नहीं’ की क़व्वाली, ‘है अगर दुश्मन’ के बाद ऋषि कपूर और क़व्वाली एक दूसरे के पर्यायवाची बन गए थे.
किसी की जान जाती है, किसी को शर्म आती है, कोई आंसू बहाता है, तो कोई मुस्कुराता है. सताकर इस तरह अक्सर, मज़ा लेते हैं ये दिलबर, यही दस्तूर है इनका, सितम मशहूर है इनका. ख़फा होके चेहरा छुपा ले, मगर याद रख हुस्नवाले, जो है आग तेरी जवानी, मेरा प्यार है सर्द पानी.
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# 5. फ़िल्म- हम किसी से कम नहीं (1977) # गीत- इस फ़िल्म की क़व्वाली ‘है अगर दुश्मन’ की बात तो हम कर ही चुके हैं. इस मूवी में एक मेडली भी थी. मेडली बोले तो, एक से अधिक गीतों का संगम. अपने आप में आरडी बर्मन का एक अभिनव प्रयोग. जब चार गीत लगातार आते हैं- ‘चांद मेरा दिल’, ‘आ दिल क्या महफ़िल’, ‘तुम क्या जानो’ और ‘मिल गया हमको साथी मिल गया’. धूम मचा दी थी इस मेडली ने. ऋषि कपूर ने. मूवी ने और इसके म्यूज़िक ने. शुरू का आइकोनिक म्यूज़िक मिस मत कीजिएगा. वकाऊ…
तेरे लिए, ज़माना तेरे लिए, और तू मेरे लिए.
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# 6. फ़िल्म- सरगम (1979) # गीत- 'डफ़ली वाले डफ़ली बजा'. सेंसेशन बन गया था ये गीत. कितना? इतना कि जब ये मूवी रिलीज़ हुई थी, तब मैं पैदा भी नहीं हुआ था. लेकिन जब होश संभले यानी इस गीत के रिलीज़ के लगभग एक दशक बाद तक भी, हर महिला संगीत में, हर दूसरी चाची, हर दूसरी मामी को इसी गीत पर डांस करते हुए देखा था.
तेरे बिन मैं क्या, मेरे बिन तू क्या इक दूजे बिन हम अकेले. दोनों के मन से, मन के मिलन से लगते हैं सरगम के मेले. तू तोड़े के जोड़े, तू रखे के छोड़े. ये दिल किया तेरे हवाले.
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# 7. फ़िल्म- क़र्ज़ (1980) # गीत- ‘क़र्ज़’, एक और ऐसी मूवी, जो म्यूज़िकल हिट रही. मतलब हर गीत एक से बढ़कर एक. 'पैसा ये पैसा', 'ॐ शांति ॐ', 'दर्दे दिल', 'तू कितने बरस की'… लेकिन जो गीत आज भी हर युवा महफ़िल की जान है वो है- 'इक हसीना थी'. इसे गिटार में बजाने का भारतीय युवाओं के बीच आज भी इतना क्रेज़ है, जितना शायद पश्चिमी देशों में पिंक फ़्लॉयड, बीटल्स को बजाने का.
बात कुछ और थी, वो नज़र चोर थी उसके दिल में छुपी, चाह दौलत की थी. प्यार का, वो फ़कत, इक बहाना था एक हसीना थी, एक दीवाना था.
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साथ में सुनिए ऋषि कपूर को, 'ॐ शांति ॐ' का ट्रिविया बताते हुए-
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# 8. फ़िल्म- ज़माने को दिखाना है (1981) # गीत- शाहरुख़ के 'छैयां-छैयां' से पहले, बहुत पहले, ट्रेन की छत में डांस किया जा चुका था. ऋषि कपूर द्वारा. 'होगा तुमसे प्यारा कौन' गीत में. हालांकि सर्वविदित है कि ऋषि की ट्रेन और ट्रेन की छत स्पेशल इफ़ेक्ट्स और बॉडी डबल की बदौलत थी. जो भी हो, पीछे ट्रेन की छुक-छुक वाला म्यूज़िक, आरडी बर्मन को ओ पी नैयर के क़रीब ला रहा है. और शैलेंद्र की रॉ आवाज़ इसे हल्की सी आंचलिकता दे रही है.
कहते हो कि जाओ, लेकिन बतलाओ जाएं भी तो जाएं हम कहां? ऐसा दिल का मारा कौन, हमको तो तुमसे है प्यार.
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# 9. फ़िल्म- प्रेम रोग (1982) # गीत- प्रेम रोग एक कमर्शियल मूवी होते हुए भी, एक सशक्त सामाजिक संदेश देने में भी सफल रही थी. जैसी ‘आरके बैनर’ की ज़्यादातर मूवीज़ रहती हैं. इसका एक गीत, ‘ये गलियां ये चौबारा’ काफ़ी हिट रहा था. जैसे आजकल ‘कोका कोला तू’ और ‘वे तू लोंग मैं लाचीं’ में लोग खूब नाचते हैं, वैसे ही तब इसमें नाचते थे. लेकिन इस मूवी का एक गीत जो, पूरी फ़िल्म को और फ़िल्म में ऋषि के किरदार को समराइज़ करता है, वो है, 'भंवरे ने खिलाया' फूल. जो आज भी गाहे-बगाहे भी कैब में, एफएम में या यू ट्यूब पर ऑटो प्ले में सुनने को मिल जाता है. आज सायास सुनिए. जो गीत कम और एक मेटाफ़ोरिकल कविता ज़्यादा लगती है.
होनी थी या वो अनहोनी, जाने इसे विधाता, छूटे सब सिंगार, गिरा गल-हार, टूटा हर नाता. शीश-फूल मिल गया धूल में, क्या-क्या दुःख न सहे, वो दिन अब ना रहे. भंवरे तू कहना न भूल, फूल डाली से गया उतर, भंवरे ने खिलाया फूल,फूल को ले गया राज-कुंवर.
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# 10. फ़िल्म- सागर (1985) # गीत- ‘बॉबी’, ‘क़र्ज़’, ‘हम किसी से कम नहीं’ और ‘सागर’ में क्या समानता थी? ये कि, ऋषि कपूर की इन सभी फ़िल्मों के सारे ही गीत सुपरहिट रहे थे. लेकिन एक अंतर था. ‘सागर’ मूवी क्रिटिकली बेशक सराही गई हो लेकिन हिट नहीं हो पाई. लगातार फ़्लॉप फ़िल्म दे रहे जीनियस आरडी बर्मन के करियर के लिए भी घातक साबित हुआ इसका म्यूज़िक. लोग कहते थे सालों बाद समझ में आएगा ये म्यूज़िक. सालों बीत गए हैं. देखिए और सुनिए, समझ में आता है क्या? सुनी-सुनी लगती है क्या ‘चेहरा है या चांद खिला’ गीत की वो टोन- ननना… नना… ननना… नना… (नीचे एंबेड गीत में 03:12 पर).
ये अरमान है, शोर नहीं हो, खामोशी के मेले हों इस दुनिया में कोई नहीं हो हम दोनों ही अकेले हों तेरे सपने देख रहा हूं, और मेरा अब काम है क्या? सागर जैसी आंखों वाली, ये तो बता तेरा नाम है क्या?
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# 11. फ़िल्म- चांदनी (1989) # गीत- हालांकि इस मूवी में भी सभी गीत बेहतरीन थे, जैसे टाइटल सॉन्ग, ‘तू मुझे सुना’, ‘चांदनी ओ मेरी चांदनी’, ‘मेरे हाथों में’. अभी सुनिए इसका सबसे रोमांटिक गीत ‘मितवा’. और देखिए कैसे पिछले दशक का लवर बॉय 90 का दशक आते-आते अपनी स्वेटर्स के लिए फ़ेमस हो गया था.
अंखियो में तू बस जा, अखियां मैं बंद कर लूं पहले इन अंखियो से,बातें मैं चंद कर लूं. तेरी इन्हीं बातों ने,लिया मुझे जीत मितवा, आगे-आगे चलें हम, पीछे-पीछे प्रीत मितवा.
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# 12. फ़िल्म- हिना (1991) # गीत- 'हिना' को राजकपूर डायरेक्ट कर रहे थे, पर उनकी मृत्यु के बाद रणधीर कपूर ने किया. एक खूबसूरत फ़िल्म, जो शायद लटकी रहने के कारण फ़्लॉप हो गई. लेकिन गीतों के मामले में अब तक कल्ट बनी हुई है. ‘चिट्ठिये’ लता के कुछ बेहतरीन गीतों में से माना जाता है. ‘आजा वे माही’, ‘अनार दाना’, ‘मैं हूं, ख़ुशरंग हिना’, ‘ओ जानेवाले’, ‘बेदर्दी तेरे प्यार ने’… सारे एक से बढ़कर एक. लेकिन एक गीत है जो आज भी लोग ग़ालिब की शायरी की तरह, बात-बात में यूज़ कर लेते हैं, ‘मैं देर करता नहीं’. जिसको सुनते हुए भी, ऋषि कपूर की तस्वीर आंखों में तैरने लगती है.
चाहा जब भी मैंने वादा निभाना वक्त ने वक्त पे धोखा दिया है देर करने की आदत, चाहत की कश्ती डुबो जाती है मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है
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# 13. फ़िल्म- दीवाना (1992) # गीत- 'सोचेंगे तुम्हें प्यार'. टिपिकल 90s. टिपिकल कुमार शानू, नदीम-श्रवण, समीर. लेकिन कहीं से भी टिपिकल ऋषि कपूर गीत नहीं. गोया रॉक एंड रोल का बादशाह एल्विस प्रेसली, बैठकर ‘अनचैन्ड मेलोडी’ गा रहा हो. लवर बॉय का किरदार निभाने वाल अब शादीशुदा के किरदार में था. इस मूवी ने बताया कि लीड रोल में ऋषि कपूर का दौर ख़त्म हुआ. और ये बताया भी बड़े सम्मानजनक ढंग से. हालांकि इसके बाद भी उनकी कई हिट फ़िल्में, लीड रोल में आईं, जैसे कुछ ही महीनों बाद ‘बोल राधा बोल’. लेकिन ‘दीवाना’ को शाहरुख़-ऋषि के लिए वही माना जा सकता है जो ‘आनंद’ को अमिताभ-राजेश के लिए.
जिस दिन तुमको देखेगी नज़र, जाने दिल पे होगा क्या असर. रखेंगे तुमको निगाहों में, भर लेंगे तुम्हें बाहों में. ज़ुल्फ़ों को हम सुलझाएंगे, इश्क़ में दुनिया भुलाएंगे. ये बेक़रारी अब तो, होगी ना कम, होगी ना कम.
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