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विक्रम के ऊपर लटके रहने वाले बेताल की कहानी, जिसने मधुबाला के साथ हिट फिल्म दी थी

टीवी पर इनके सीरियल ने 'रामायण' और 'महाभारत' से पहले ही धमाल मचा दिया था.

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15 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 15 जनवरी 2020, 02:49 PM IST)
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'विक्रम और बेताल' के वक्त सज्जन लाल पुरोहित 64 साल के थे.
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राजा विक्रमादित्य. सच के झंडाबरदार. लिखने वालों ने उनको लेकर ऐसा घालमेल किया कि अब पता ही नहीं चलता कि खुद उनके बारे में क्या-क्या सच है और क्या-क्या मिथक.
खैर, उनके ऊपर दो कथा ग्रंथ लिखे गए. खूब चर्चित हुए. सिंहासन द्वात्रिंशिका (सिंहासन बत्तीसी) और बेतालपञ्चविंशतिका (बेताल पचीसी). क्रमशः 32 और 25 कहानियों के संग्रह.
इनमें से बेताल पचीसी, जो आज से 2500 साल पहले लिखी गई थी, के ऊपर एक सीरियल दूरदर्शन में आया. ‘सुपरहिट’ की किसी भी परिभाषा में फिट बैठने वाले इस सीरियल का नाम ‘विक्रम और बेताल’ था. ये आज से 35 साल पहले की बात है. 1985 की. रामानंद सागर के ‘रामायण’ और बीआर चोपड़ा के ‘महाभारत’ से भी पहले की.
इसमें और ‘रामायण’ में समानता ये थी कि दोनों ही रामानंद सागर कृत थे. और दोनों के ही लीड एक्टर अरुण गोविल थे. यानी जो एक्टर ‘रामायण’ में राम बने थे, वो ‘विक्रम और बेताल’ में विक्रम बने थे.
ब्लैक एंड वाइट टीवी के दौर में चूंकि ‘कॉन्ट्रास्ट’ बहुत ज़रूरी हुआ करता था, इलसिए हर राम के लिए एक रावण और हर विक्रम के लिए एक बेताल होना ज़रूरी होता था. और जरूरी होता था एक ऐसा एक्टर जो इन रोल्स को निभा सके. तो आज बात ऐसे ही एक्टर की जो ‘विक्रम और बेताल’ में ‘बेताल’ बने थे. नाम था सज्जन लाल पुरोहित (15 जनवरी, 1921 – 17 मई, 2000)-
क्या सज्जन लाल पुरोहित की ये तस्वीर देखकर लगता है कि ये वही सज्जन हैं, जो अरुण गोविल के कंधों पर चढ़े हुए हैं. क्या सज्जन लाल पुरोहित की ये तस्वीर देखकर लगता है कि ये वही सज्जन हैं, जो अरुण गोविल के कंधों पर चढ़े हुए हैं.

#1)  राजस्थान की वर्तमान राजधानी जयपुर में जन्मे सज्जन लाल पुरोहित ने राजस्थान के ही दूसरे बड़े शहर जोधपुर से ग्रैजुएशन किया. ये सब कुछ आज़ादी से पहले की बात है. बैरिस्टरगिरी करना चाहते थे तो पहुंच गए कोलकाता. तब वो जगह कलकत्ता और वो दौर कलकत्ता का रेनेसां, यानी स्वर्णिम काल कहलाता था. वहां सज्जन को भारत की सबसे बदनाम कंपनियों में से एक ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ में काम मिल गया.
पहली बार कैमरे को फेस किया 1941 में. मूवी का नाम था ‘मासूम’. वो ‘लकड़ी की काठी’ वाली नहीं. वो तो काफी बाद में आई. ये हुसैन फ़ाज़िल की मूवी थी. सज्जन भी तब 20 साल के मासूम ही थे, जिन्होंने ‘पैशन फॉलो’ करने के चलते अपने लॉ के करियर को त्याग दिया. वो विश्व युद्ध का दौर था.
WWII के दौरान मैंने और सिल्वर स्क्रीन ने एक दूसरे को विनम्रता के साथ प्रणाम किया था.
आगे बढ़ने से पहले सुनिए उनकी मूवी का एक भूला-बिसरा पर प्यारा गीत. तलत महमूद की आवाज़ में. फिल्म 'बहाना' (1960) से- 

#2) ‘मासूम’ के लिए उन्हें कलकत्ता नहीं छोड़ना पड़ा था. यूं, पैशन के लिए नहीं, कलकत्ता छोड़ा 1942 में फ़ाज़िल ब्रदर्स की ही दूसरी मूवी ‘फैशन’ के वास्ते, जो शूट हुई थी मुंबई में. ‘फैशन’ में थे उस वक्त के स्टार एक्टर चंद्रमोहन. हालांकि ‘मासूम’ की तरह ही ‘फैशन’ में भी उनका रोल छोटा और भुला दिया जाने वाला था. बड़ा रोल मिला ‘गर्ल्स स्कूल’ में. जिसके बारे में सज्जन बताते हैं-
मुझे ‘गर्ल्स स्कूल’ याद है. दिवंगत अमिय चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित. क्योंकि ये पहली मूवी थी जिसमें मेरा मज़बूत रोल था. मैंने इस मूवी के हर हिस्से का आनंद लिया. खास तौर पर शशिकला के साथ वाले सीन और प्रदीप के लिखे बेहतरीन गीतों के फिल्मांकन को. काश मेरे पास उसी तरह के और रोल होते.
मुंबई में उन्होंने शुरुआत में प्रसिद्ध निर्देशक किदार शर्मा के सहायक के रूप में भी काम किया. गजानन जागीरदार और वकील साहिब के सहायक के रूप में काम करते हुए उन्हें हर महीने 35 रुपए मिला करते थे. इस सबके बाद उन्होंने 'धन्यवाद' में पहली बार लीड रोल निभाया था.
# 3) सज्जन ने कुछ फिल्मों के डायलॉग्स भी लिखे. जैसे 1944 में आई 'मीना' नाम की मूवी के लिए. कुछ में लिरिक्स भी लिखीं ('दूर चलें' और 'धन्यवाद' के लिए). केवल एक्टिंग की बात की जाए तो उन्होंने बताया-
अपने पिछले प्रोजेक्ट्स को याद करूं तो मुझे ऐसा रोल चुनने में मुश्किल होती है, जिसे उत्कृष्ट कहा जाए. ईमानदारी से कहूं तो, मैंने कभी भी ऐसा कलात्मक प्रदर्शन नहीं किया है जिसे 'सर्वोत्कृष्ट' की श्रेणी में रखा जा सके.
हालांकि उन्होंने ये बात 1964 में दिए एक लंबे इंटरव्यू के दौरान बताई थी.
 और उसके बाद उनकी काफी यादगार मूवीज़ आईं. उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग प्रोजेक्ट्स से बहुत फेम मिला. ऐसा फेम कि लोग अब भी उनके वो रोल्स याद करते हैं. जैसे 1958 की 'चलती का नाम गाड़ी' (किशोर कुमार, मधुबाला वाली) में उनके प्रकाशचंद नाम के किरदार को. जैसे 1962 में रिलीज़ हुई 'बीस साल बाद' में उनके डिटेक्टिव मोहन त्रिपाठी के किरदार को. जैसे 1964 में आई 'अप्रैल फूल' में उनके मोंटो के किरदार को.
सज्जन की कुछ फ़िल्में जो सुपर हिट हुईं, उनमें से 'बीस साल बाद' और 'आंखें' प्रमुख रहीं. सज्जन की कुछ फ़िल्में जो सुपर हिट हुईं, उनमें से 'बीस साल बाद' और 'आंखें' प्रमुख रहीं.

# 4) एक बार की बात है, वो दो फ़िल्में एक साथ शूट कर रहे थे. नाम था 'संग्राम' और 'मुकद्दर'. 'संग्राम' में वो नलिनी जयवंत के पिता का रोल कर रहे थे और 'मुकद्दर' में उसी एक्ट्रेस के प्रेमी का. नलिनी के साथ वो पास्ट में 'गर्ल्स हॉस्टल' कर चुके थे. सज्जन याद करते हुए बताते हैं-
मुझे एक दिन नलिनी के पिता का किरदार निभाना होता था, दूसरे दिन नलिनी के पति का. कभी-कभी तो एक ही दिन दोनों रोल करने पड़ते थे.
# 5) सज्जन कुमार ने रामानंद सागर की मल्टीस्टारर मूवी 'आंखें' (1968) में एक छोटा सा रोल किया था. वहीं से वो रामानंद सागर के करीब आ गए. इसका फायदा उन्हें तब मिला जब रामानंद सागर ने 'विक्रम और बेताल' में
उन्हें मेन विलेन 'बेताल' के रोल के लिए कास्ट किया. हालांकि जिन्होंने 'विक्रम और बेताल' देखा है, वो अच्छे से जानते हैं कि बेताल को ठीक-ठीक विलेन भी नहीं कहा जा सकता. इलेक्ट्रॉनिक ऐरा में ‘विक्रम और बेताल’ पहला शो था, जिसमें टीवी पर स्पेशल इफेक्ट्स नजर आए थे. और बेताल का डायलॉग तब बच्चे बच्चे की ज़बान पर चढ़ गया था. जिससे हम अपनी स्टोरी का भी क्लोज़र दे सकते हैं-
...तू बोला, तो ले मैं जा रहा हूं. मैं तो चला!



वीडियो देखें:

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