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पश्चिम बंगाल: कांटे की टक्कर में इंच भर से सीट गंवाने वाली पहली CM नहीं हैं ममता

पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों (West Bengal Election Result) का दिन उतार-चढ़ाव से भरा रहा. सबसे ज्यादा ड्रामा नंदीग्राम सीट पर हुआ. यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को कभी उनके करीबी रहे और अब बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने 1953 वोटों से हरा दिया है. वो भी उसके बाद, जब एक समाचार एजेंसी ने ममता को विजेता घोषित कर दिया था.

पश्चिम बंगाल में पहले भी ऐसा हुआ है जब सिटिंग मुख्यमंत्री चुनाव हारे हैं. लेकिन तब साथ-साथ उनकी पार्टी भी हारी थी. जबकि ममता के केस में मामला उल्टा है.

बहरहाल, हम बंगाल के उन मुख्यमंत्रियों की बात करेंगे जो कुर्सी पर रहते हुए अपनी विधान सभा सीट हारे. इस तरह के दो वाक़ये पहले भी हो चुके हैं और अब ममता बनर्जी तीसरी मुख्यमंत्री हैं जो मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहते चुनाव हारी हैं. चलिए इन दोनों अवसरों की चर्चा करते हैं.

1.प्रफुल्ल चंद्र सेन (आरामबाग विधानसभा सीट 1967) 

वाकया 1967 का है. अकाल, हिंसा, ट्रेड यूनियन और स्टूडेंट्स की रोज-बरोज की हड़ताल ने तब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन को बेहद अलोकप्रिय बना दिया था. उनके खिलाफ पूरे पश्चिम बंगाल में विपक्षी गठबंधन को लीड कर रहे थे बांग्ला कांग्रेस के नेता अजाॅय मुखर्जी. विधानसभा चुनाव आ गया था. मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन की प्रतिष्ठा अपने परंपरागत गढ़ आरामबाग में दांव पर लगी थी. दांव पर लगने का कारण भी था क्योंकि तब विपक्षी गठबंधन के नेता अजाॅय मुखर्जी ने आरामबाग सीट पर ही सेन के खिलाफ ताल ठोक दी थी.

हालांकि प्रफुल्ल चंद्र सेन को अपनी जीत का भरोसा था. वे आरामबाग इलाके में बेहद लोकप्रिय थे. इतने लोकप्रिय की उन्हें ‘आरामबाग का गांधी’ कहा जाता था. लेकिन जब चुनावी नतीजा आया तब कांग्रेस के साथ-साथ प्रफुल्ल चंद्र सेन की लुटिया भी डूब गयी थी. अजाॅय मुखर्जी ने उन्हें बेहद कड़े मुकाबले में 881 वोटों से हरा दिया था. इस जीत के बाद अजाॅय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने थे.

प्रफुल्ल चंद्र सेन को ममता बनर्जी अपना पाॅलिटिकल मेंटर मानती रही हैं.

प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए विधानसभा चुनाव हारने वाले पश्चिम बंगाल के पहले राजनेता हैं.
प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए विधानसभा चुनाव हारने वाले पश्चिम बंगाल के पहले राजनेता हैं.

2. बुद्धदेव भट्टाचार्य – जादवपुर 2011 :

बुद्धदेव भट्टाचार्य 11 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे. उन्होंने ज्योति बसु जैसे दिग्गज नेता की विरासत संभाली थी. लेकिन 2011 का विधानसभा चुनाव आते-आते नंदीग्राम आंदोलन उनपर भारी पड़ गया. वही नंदीग्राम जहां इस बार ममता बनर्जी की लुटिया डूबी है. इसी नंदीग्राम में केमिकल हब के लिए जमीन अधिग्रहण का मुद्दा इतना बड़ा हो गया कि पश्चिम बंगाल से लाल सलाम की सियासत का अंत हो गया. 2011 की इस लेफ्ट विरोधी लहर ने मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को भी नहीं बख्शा. वे 16,684 वोट से अपनी जादवपुर सीट हार गए थे. हारे भी किससे? कभी अपने चीफ सेक्रेटरी रहे तृणमूल कांग्रेस कैंडिडेट मनीष गुप्ता से. उनकी इस हार ने उनकी सियासी पारी को लगभग खत्म ही कर दिया.

बुद्धदेव भट्टाचार्य भी 2011 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए चुनाव हारे थे. (फ़ोटो क्रेडिट : PTI)
बुद्धदेव भट्टाचार्य भी 2011 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए चुनाव हारे थे. (फ़ोटो क्रेडिट : PTI)

3. ममता बनर्जी

अब इस लिस्ट में तीसरा नाम ममता बनर्जी का है. हालांकि उनकी हार राजनीतिक पंडितों के लिए काफ़ी चौंकाने वाली रही है. लेकिन उनके लिए सुकून की बात यह है कि उनकी पार्टी लगातार तीसरी बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर दो-तिहाई से भी ज्यादा बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई है. अब सबके लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री पद कौन संभालता है. संभव है कि कोई विधायक उनके लिए अपनी सीट खाली कर दे और वे उससे चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के 6 महीने की समय-सीमा के अंदर विधानसभा पहुंच सकें.


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