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यूपी पंचायत चुनाव: महिला आरक्षित सीट पर प्रधानी हासिल करने के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत तोड़ डाला

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव होने में 10 दिन बचे हैं. 15 अप्रैल को पहल चरण का मतदान होना है. ऐसे में नामांकन प्रक्रिया में तेजी देखने को मिल रही है. भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने कई जिलों के पंचायती पदों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. ये प्रत्याशी बड़ी संख्या में पर्चा दाखिल करने आ रहे हैं. इनमें निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या भी अच्छी खासी है. कई उम्मीदवार तो ऐसे हैं जो न सिर्फ अपने इलाके के बड़े नेता हैं, बल्कि पहले सांसदी और विधायकी का चुनाव लड़ चुके हैं. लेकिन अब पंचायत स्तर पर किस्मत आजमा रहे हैं. वहीं, कुछ उम्मीदवार अलग-अलग वजहों के चलते चर्चा में हैं. कोई अपना करियर अचानक छोड़ चुनावी राजनीति में कूद पड़ा है तो किसी के सिर पर बस चुनाव लड़ने का भूत सवार है. किसी ने तो प्रधानी के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत ही तोड़ डाला है. जानते हैं ऐसे कुछ अनोखे उम्मीदवारों के बारे में.

मिस इंडिया रनरअप चुनावी मैदान में

वैसे तो किसी भी स्तर का चुनाव लड़ने में कोई अनोखी बात नहीं है. लेकिन यूपी पंचायत चुनावों में दीक्षा सिंह की अचानक हुई एंट्री और उनका करियर बैकग्राउंड उन्हें इस चुनाव के अनोखे उम्मीदवारों में से एक बनाते हैं. दीक्षा साल 2015 में फेमिना मिस इंडिया की रनरअप रह चुकी हैं. वो जब गोवा में अपनी ग्रेजुएशन कर रही थीं, तभी उन्हें मॉडलिंग के ऑफर आने लगे थे. बाद में उन्होंने बतौर मॉडल काम भी किया. वे कुछ म्यूजिक वीडियो में भी नजर आ चुकी हैं. लेकिन 24 वर्षीय दीक्षा ने अचानक चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया, जिसने सबका ध्यान खींचा है.

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फोटो साभार- दीक्षा का इंस्टाग्राम

दीक्षा सिंह जौनपुर जिले के बक्सा विकासखंड के वार्ड नंबर 26 से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ेंगी. इस सीट पर पहले उनके पिता जितेंद्र सिंह चुनाव लड़ने वाले थे. लेकिन राज्य सरकार ने ये सीट महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी. चूंकि जितेंद्र सिंह कई दिनों से इस चुनाव की तैयारी कर रहे थे, इसलिए वे अपनी मेहनत जाया नहीं होने देना चाहते थे. इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को चुनाव में उतार दिया.

81 साल की दादी लड़ रहीं इलेक्शन

जौनपुर में 24 साल की दीक्षा चुनाव लड़ेंगी तो कानपुर में 80 साल से ज्यादा उम्र की बुजुर्ग महिला ने नामांकन पर्चा भर कर सबको हैरान कर दिया है. आजतक के रिपोर्टर रंजय सिंह के मुताबिक, कानपुर के चौबेपुर ब्लॉक से पंचायती चुनाव लड़ने जा रहीं रानी अम्मा 81 साल की हो गई हैं. कहती हैं कि उनके इलाके का विकास नहीं हुआ. गांव की सड़क और नाली टूटी पड़ी हैं. गंदे पानी से बीमारी फैल रही है.

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रानी अम्मा. (तस्वीर- रंजय सिंह, आजतक)

रानी अम्मा के मुताबिक, गांव के लोगों ने स्थानीय नेता और प्रशासन से इस बारे में कुछ करने की अपील भी की, लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. ऐसे में इलाके की हालत में बदलाव लाने के लिए उन्होंने खुद जिम्मेदारी ली और चुनाव लड़ने का फैसला किया. रिपोर्ट के मुताबिक, दादी अम्मा चुनाव जीतें या हारें, लेकिन उनकी उम्मीदवारी ने स्थानीय लोगों में जोश और दूसरे चुनावी प्रतिद्वंद्वियों में डर भर दिया है. इससे उत्साहित दादी अम्मा इस उम्र में गांव में घूम-घूमकर प्रचार कर रही हैं और अपने लिए वोट मांग रही हैं.

बैंडिट क्वीन भी आजमा रही किस्मत

यूपी के पंचायत चुनावों के दिलचस्प उम्मीदवारों में एक और महिला शामिल है. नाम है सुरेखा. इनामी डकैत रहे सलीम गुर्जर की पत्नी हैं. 1999 में सलीम गुर्जर ने सुरेखा को अगवा कर लिया था. बाद में उसने सुरेखा से शादी कर ली. डाकुओं के साथ रहते हुए सुरेखा की जिंदगी के 5 साल बीहड़ों में बूंदकों के साथ बीत गए. फिर 2004 में पुलिस से हुई मुठभेड़ में सुरेखा पकड़ी गई थीं. वो उस समय गर्भवती थीं. भाग नहीं सकीं.

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सुरेखा. (तस्वीर- कौशलेंद्र बिक्रम सिंह)

कई मामले दर्ज होने के चलते सुरेखा ने 14 साल जेल में बिताए. बाद में अदालत ने पूर्व दस्यु सुंदरी को सभी मुकदमों में बरी कर दिया. वो अब बदनपुरा गांव में बेटे के साथ अपने भाई-भाभी के घर रह रही हैं. आजतक के कौशलेंद्र बिक्रम सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, बदनपुरा गांव में गुर्जर समाज के लोगों की संख्या ज्यादा है और सुरेखा धोबी समाज से आती हैं. लेकिन गांव में उन्हें और उनके परिवार को काफी सम्मान दिया जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, यही कारण है कि सुरेखा प्रधान बन कर गांव के लिए कुछ करना चाहती हैं.

92 बार हारने के बाद भी नहीं टूटी हिम्मत

यूपी पंचायत चुनाव के एक और अनोखे कैंडिडेट हैं हसनू राम अंबेडकरी. 75 साल के हैं. पिछले 35-36 सालों में 90 से ज्यादा चुनाव लड़ चुके हैं. जीते एक भी नहीं. लेकिन खुद से हार मानने को तैयार नहीं हैं. चुनाव आते ही हसनू राम कमर कस लेते हैं. कहते हैं कि चुनाव जीतने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है. उनके पास उतना सब करने की क्षमता नहीं है. लेकिन चुनाव लड़ना है तो लड़ना है. इस बार हसनू राम खेरागढ़ के वार्ड 23 से पंचायती इलेक्शन लड़ने जा रहे हैं. कहते हैं 2022 का विधानसभा चुनाव भी लड़ेंगे.

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हसनू राम अंबेडकरी. (तस्वीर- अरविंद शर्मा, आजतक)

हसनू राम ने जीवन का पहला चुनाव आगरा की खेरागढ़ विधानसभा सीट से लड़ा था. 1984 में. तब से अब तक हसनू राम 92 चुनाव लड़ चुके हैं. इनमें पंचायती, विधायकी, सांसदी और अन्य प्रकार के चुनाव शामिल हैं. यहां तक कि एक बार हसनू राम राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी ट्राई मार चुके हैं. लेकिन उनका नामांकन खारिज कर दिया गया था. 1984 में हसनू राम BSP के कार्यकर्ता थे. तब पार्टी के एक पदाधिकारी ने ये कहकर उनका मजाक उड़ा दिया था कि तुम्हें तो घरवाले भी वोट नहीं देंगे. तब से हसनू पर चुनाव लड़ने की धुन सवार है.

सोने में लरझर पति के साथ आई उम्मीदवार

यूपी पंचायत चुनाव में कहीं कैंडिडेट दिलचस्प निकल रहा है तो कहीं उससे जुड़े लोग उसकी उम्मीदवारी को दिलचस्प बना दे रहे हैं. यूपी के हरदोई में ऐसा देखा गया. यहां जिला पंचायत सदस्य के पद के लिए चुनाव लड़ने जा रही हैं रेखा मिश्रा. भाजपा के टिकट पर. वो जब नामांकन भरने अपने पति राजेश मिश्रा के साथ पहुंचीं तो कार्यालय में मौजूदा अधिकारी और अन्य लोग उन्हें देखकर हैरान रह गए.

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राजेश मिश्रा. (तस्वीर- आजतक)

आजतक से जुड़े ब्रजेश कुमार मधुकर की रिपोर्ट के मुताबिक, राजेश ने उस समय आधा किलो सोना पहन रखा था. बातचीत में राजेश ने बताया कि वे 2005 से लगातार सोना पहन रहे हैं. राजेश ने कहा कि वो हरपालपुर से पूर्व जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं. अब अपनी पत्नी को भी चुनाव लड़वा रहे हैं.

पिछड़े वर्ग के परिवार में करा दी बेटे की शादी

उत्तर प्रदेश का पंचायत चुनाव कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा देवरिया के एक मामले से लगाया जा सकता है. यहां के एक नेता सरफराज अहमद तरकुलवा ब्लॉक के नारायनपुर गांव का प्रधान बनने के लिए सालों से चुनावी तैयारी कर रहे थे. लेकिन राज्य सरकार ने ये सीट पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित कर दी. तब सरफराज से ऐसा कदम उठाया कि कई हैरान रह गए.

Uttar Pradesh
पिता सरफराज अहमद (बाएं) ने बेटे की शादी पिछड़ी जाति में की ताकि बहू को चुनाव लड़वा सकें. (फोटो-आजतक)

2015 के चुनाव में सरफराज महज 28 वोटों से हार गए थे. जाहिर है उन्हें इस बार जीतने की काफी उम्मीद थी. लेकिन सरकार ने उनके इलाके की सीट ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित कर दी. सरफराज अहमद के लिए ये बड़ा झटका था. क्योंकि वे सरफराज सामान्य वर्ग से आते हैं. ऐसे में प्रधानी हासिल करने के लिए सरफराज ने करीबी लोगों की सलाह पर एक काम किया. उन्होंने अपने बेटे सिराज अहमद की शादी पिछड़े वर्ग से आने वाली एक लड़की सलमा खातून से करा डाली. अब सरफराज अपनी बहू को प्रधानी का चुनाव लड़वाएंगे.

ब्रह्मचर्य का व्रत ही तोड़ डाला

आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग के सरफराज को ओबीसी वर्ग की लड़की को बहू बनाना पड़ा तो बलिया के हाथी सिंह ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत ही तोड़ डाला. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हाथी सिंह मुरली छपरा ब्लॉग से प्रधानी का चुनाव लड़ना चाहते थे. वे पिछले चुनाव में केवल 57 वोटों से हार गए थे. इस बार उन्हें जीत की पूरी उम्मीद थी. लेकिन सरकार ने ये सीट महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी. इस इलाके में लंबे समय सामाजिक कार्य कर रहे हाथी सिंह के लिए ये झटका था. ऐसे में उन्हें समाजसेवा की प्रतिज्ञा के आगे ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा त्यागनी पड़ी. प्रधानी हासिल करने के लिए उन्होंने आजीवन शादी नहीं करने की कसम तोड़ दी. यानी शादी कर डाली. वो भी बिना मुहूर्त के. अब हाथी अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाएंगे.

चुनाव चिह्न भी कम दिलचस्प नहीं

यूपी पंचायत चुनाव के कुछ दिलचस्प कैंडिडेट्स के बारे में आपने जान लिया. अब जरा उन चुनाव चिह्नों के बारे में भी जान लेते हैं, जो उम्मीदवारों को राज्य निर्वाचन आयोग की तरफ से दिए गए हैं. आजतक के नाहिद अंसारी की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राम प्रधान के लिए 57 चुनाव चिह्न दिए गए हैं. इनमें चूड़ियां और पंखे से लेकर त्रिशूल और तोप तक शामिल हैं. किसी को चुनाव चिह्न के रूप में गदा दी गई है तो किसी को धनुष पकड़ा दिया गया है. आइसक्रीम, टमाटर, ऊन का गोला तक चुनाव चिह्न बनाकर प्रधान पद के प्रत्याशियों को दिए गए हैं. वहीं, जिला पंचायत सदस्य के पदों के उम्मीदवारों को गिटार, घुड़सवार, थरमस, लट्टू, रोड रोलर, सिर पर कलश लिए महिला, कटहल, सीमेंट की बोरी और हैंगर जैसे चुनाव चिह्न दिए गए हैं. इसके अलावा, क्षेत्र पंचायत चुनाव के सदस्यों को ईंट, गुल्ली डंडा और लड़का-लड़की चुनाव चिह्न दिए गए हैं.


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