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लड़कियों से ज़्यादा लड़के क्यों पैदा होते हैं?

24 जनवरी को नेशनल गर्ल चाइल्ड डे होता है. राष्ट्रीय बालिका दिवस. इसकी शुरुआत 2008 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने की थी. ताकि लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर जागरुकता फैले.

ये भेदभाव लड़कियों के पैदा होने से पहले ही जन्म ले लेता है. और कई बार लड़कियों के जन्म से पहले ही उनकी जान ले लेता है. इन भ्रूणहत्याओं और भेदभाव का नतीजा हमें आंकड़ों में नज़र आता है. आंकड़ें जैसे कि सेक्स रेशियो.

सेक्स रेशियो मतलब लिंग अनुपात. यूनाइटेड नेशन्स इसे ऐसे आंकता है कि 100 लड़कियों पर कितने लड़के हैं.

ज़्यादातर देशों में ये नंबर 100 से ज़्यादा ही है. जैसे कि इंडिया में ये नंबर 107:100 है. मतलब हर 100 लड़कियों पर 107 लड़के.

भारत के अलग-अलग इलाकों का सेक्स रेशो. उत्तर भारत में हालत ज़्यादा खराब है. जहां रंग नहीं है. वहां का डेटा उपलब्ध नहीं है. (सोर्स - विकिमीडिया)
भारत के अलग-अलग इलाकों का सेक्स रेशियो. उत्तर भारत में हालत ज़्यादा खराब है. जहां रंग नहीं है. वहां का डेटा उपलब्ध नहीं है. (सोर्स – विकिमीडिया)

हमें ऐसा लग सकता है कि जेंडर डिस्क्रिमिनेशन के बिना ये नंबर 100:100 होगा. लेकिन ऐसा नहीं है. नैचुरल या नॉर्मल सेक्स रेशियो 105:100 है. मतलब अगर कोई भेदभाव का फैक्टर न हो, तो 100 लड़कियों पर 105 लड़के पैदा होंगे. ऐसा क्यों? प्रकृति ज़्यादा लड़के और कम लड़कियां क्यों पैदा करती है?

पहले जान लीजिए कि जन्म के वक्त लड़का या लड़की ये डिसाइड कैसे होता है? ये सेक्स क्रोमोज़ोम से डिसाइड होता है.

जूतों की जोड़ी – क्रोमोज़ोम्स 

ऐसा समझिए कि सेक्स क्रोमोज़ोम जूतों की जोड़ी है. ये जूते दो टाइप के होते हैं X और Y. अगर आप लड़की हैं तो आपके दोनों जूते X होंगे. अगर आप लड़के हैं तो एक जूता X और दूसरा जूता Y होगा.

लड़की के जूते – XX
लड़के के जूते – XY

आपके ये जूते गर्भधारण के दौरान ही फिक्स हो जाते हैं. जूतों की इस जोड़ी का एक जूता मम्मी की तरफ से आता है. और दूसरा पापा की तरफ से आता है.

क्रोमोज़ोम के कुल 23 जो़ड़ियां होती हैं. 23वे नंबर की जोड़ी लिंग तय करती है. (सोर्स - विकिमीडिया)
क्रोमोज़ोम के कुल 23 जो़ड़ियां होती हैं. 23वे नंबर की जोड़ी लिंग तय करती है. (सोर्स – विकिमीडिया)

मम्मी के पास तो दोनों जूते X ही होते हैं. इसलिए आपका लिंग पापा की तरफ से आने वाला जूता तय करता है. अगर पापा की तरफ से X आया तो लड़की. और Y आया तो लड़का.

अगर नेचर में 105:100 का अनुपात है, इसका मतलब ये हुआ कि पापा की तरफ से Y वाला जूता आने के चांस थोड़े से ज़्यादा हैं. सवाल फिर वहीं अटकता है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

इसका पक्का-पक्की जवाब हमें पता नहीं है. लेकिन एक छोटी सी थ्योरी ये है, वो हम आपको बताएंगे.

प्रकृति का संतुलन

डार्विन ने हमें इवॉल्यूलशन यानी क्रमिक विकास का सिद्धांत बताया. क्या है ये इवॉल्यूलशन? किसी भी जीव में पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे बदलाव होते हैं कि वो अपने माहौल में आसानी से ज़िंदा रह सके.

इवॉल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट ऐसा मानते हैं कि ये 105:100 का अनुपात प्रकृति का संतुलन बनाने का तरीका है. लेकिन संतुलन तो 100:100 में बनेगा?

ऐसा है कि पहले इंसान जंगलों में रहता था. और जंगल में पुरुषों के मरने के ज़्यादा चांस होते हैं. चाहे शिकार हो या लड़ाई झगड़ा, पुरुषों के मरने का रिस्क ज़्यादा होता था. इस हिसाब से बच्चे पैदा करने की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते कम लड़के ज़िंदा बचते थे. तो बचपन का ये गड़बड़ अनुपात माने 105:100 का अनुपात वयस्क होते-होते संतुलित हो जाता था.

अभी भी कुछ प्रजातियां बची हैं जो शिकार से अपना जीवनयापन करती हैं. (सोर्स - विकिमीडिया)
अभी भी कुछ जनजातियां बची हैं जो शिकार से अपना जीवनयापन करती हैं. (सोर्स – विकिमीडिया)

अब इवॉल्यूशन को क्या पता था कि आगे चलकर एक जेंडर ज़्यादा हावी हो जाएगा. और दूसरे को इस हद तक दबाएगा कि उनके जन्म लेने पर क्वेश्चन मार्क लग जाएगा.

वैसे प्रकृति अपना संतुलन हमेशा बना ही लेती है. समझदारी प्रकृति से पहले अपना संतुलन बनाने में है.


वीडियो – ‘बेटी को बेटे की तरह मानने की बजाय बेटी ही क्यों नहीं मानते हैं लोग?’

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