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ये देश तो इतना बेरोजगारी भत्ता देते हैं कि सुनकर दिमाग चकरा जाएगा

बच्चू बाबू एम.ए. करके सात साल झख मारे
खेत बेचकर पढ़े पढ़ाई, उल्लू बने बिचारे

कितनी अर्ज़ी दिए न जाने, कितना फूंके तापे
कितनी धूल न जाने फांके, कितना रस्ता नापे (कैलाश गौतम)

ये पंक्तियां कवि ने व्यंग्य में लिखी थीं लेकिन फिलहाल बेरोजगारी के जो हालात हैं, उनमें यह व्यंग्य से ज्यादा करुण रस की कविता बन गई है. बेरोजगारी पर गुरुवार को ट्विटर ट्रेंड नई ऊंचाइयों पर पहुंचता दिखा लेकिन फिलहाल आगे का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है. बेरोजगारी पर ट्विटर ट्रेंड और आंदोलन की बातों के बीच यह जानना भी जरूरी है कि आखिर बेरोजगार कहते किसको हैं. आइए जानते हैं

आखिर कौन है बेरोजगार?

आपको लगता होगा कि अगर किसी को काम न मिले तो समझो वह बेरोजगार हुआ. लेकिन ऐसा नहीं है. बेरोजगारी की भी अपनी एक परिभाषा है.

‘बेरोजगार उस व्यक्ति को कहा जाता है, जो बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर काम तो करना चाहता है लेकिन उसे काम नही मिल पा रहा है.’

मसलन कोई शख्स बीए पास है और वह बीए पास के लिए निर्धारित नौकरी करना भी चाहता है लेकिन उसके लिए उस स्तर का काम मौजूद ही नहीं है. कुल मिलाकर बेरोजगारों की गिनती करते वक्त केवल उन्हीं लोगों को गिना जाता है जो-

# काम करने के योग्य हैं- इसमें 15 से 59 साल के लोग आते हैं.

# काम करने के इच्छुक हैं- वे लोग जो अपने मन की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, बाकायदा काम की ट्रेनिंग ली है. कोई बिजनेस नहीं खोला है और नौकरी खोज रहे हैं.

# जो वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार हो

उन व्यक्तियों को, जो काम करने के योग्य नहीं हैं जैसे- बीमार, बूढ़े, बच्चे, स्टूडेंट्स आदि को बेरोजगारों में शामिल नहीं किया जाता. इसी तरह जो लोग काम करना ही पसन्द नहीं करते, उनकी गणना भी बेरोजगारों में नहीं की जाती है. मतलब वैसे लोग बिजनेस या अपना कुछ करने में ज्यादा इच्छुक हैं. यह परिभाषा बेरोजगारी की ‘श्रम शक्ति धारणा’ कहलाती है. इस परिभाषा के हिसाब से काम करने वाले को एक यूनिट माना गया है और काम को घण्टों के हिसाब से नापा जाता है.

परिभाषा को लेकर दुनिया भर के विद्वानों में अलग-अलग राय रही है. ऐसे में जान लीजिए कि दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों ने इसे कैसे बताया है-

एक इंसान को उस समय ही बेरोजगार कहा जाएगा, जब उसके पास कोई रोजगार का साधन नहीं है परन्तु वह रोजगार प्राप्त करना चाहता है. (प्रो. आर्थर सिसिल पीगू, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के नामी इकॉनमिस्ट)

एक बेरोजगार वह व्यक्ति है, जो वर्तमान समय में काम नहीं कर रहा, जो सक्रिय ढंग से कार्य की तलाश में है, जो वर्तमान मजदूरी पर काम करने के लिये उपलब्ध है. (राफिन तथा ग्रेगोरी, अर्थशास्त्र पर कई किताबों के लेखक)

इस वक्त देश में बेरोजगारों का गुस्सा सरकार पर फूट रहा है.( सांकेतिक तस्वीर)
इस वक्त देश में बेरोजगारों का गुस्सा सरकार पर फूट रहा है.( सांकेतिक तस्वीर)

ये बेरोजगारी दर का गणितक्या है?

आप लोग लगातार यह भी सुनते होंगे कि बेरोजगारी दर ऐतिहासिक हो गई. पहले इतनी कभी नहीं थी…  टाइप की बातें. इसको जानने का भी एक फॉर्मूला है. (अर्थशास्त्रियों का यही काम होता है कि हर चीज का फॉर्मूला बना दें)

बेरोजगारी की दर = बेरोजगारों की संख्या / श्रम शक्ति

मतलब जितने लोग काम करने के लिए उपलब्ध हैं, उन्हें मौजूदा काम की संख्या से भाग दे दिया जाए तो जो नंबर मिलता है, उसे 100 गुणा करने पर बेरोजगारी दर मिलती है. मिसाल के तौर पर अगर 20,000 बेरोजगार हैं और 1 लाख की श्रम शक्ति है या 1 लाख लोग काम करने लायक हैं तो दर हुई –
20000/100000 = 0.2, अब इसे 100 से गुणा करेंगे तो आएगा 20. मतलब बेरोजगारी की दर 20 फीसदी है.

रोजगार कार्यालयों का क्या काम है? 

राज्य सरकारों की ओर से लगभग हर जिले में रोजगार कार्यालय बनाए गए हैं. कहीं इन्हें सेवायोजन कार्यालय तो कहीं रोजगार एक्सचेंज भी कहा जाता है. नौकरी खोज रहे लोग इन कार्यालयों में जाकर अपना रजिस्ट्रेशन कराते हैं. वहां उनकी योग्यता, स्किल और पढ़ाई-लिखाई के बारे में सारी जानकारी ली जाती है. जिन नियोक्ताओं, कंपनियों को लोगों की आवश्यकता होती है वो रोजगार कार्यालय से संपर्क करते हैं. रोजगार कार्यालय में योग्यता के हिसाब से लिस्ट बनाई जाती है और नियोक्ता कंपनी को सौंप दी जाती है. रोजगार कार्यालय के अलावा नौकरी खोज रहे कैंडिडेट्स रोजगार पोर्टल पर भी रजिस्ट्रेशन करते हैं. कंपनियां भी अपने जरूरत के हिसाब से वैकेंसी पोर्टल पर डाल देती हैं. जिन कैंडिडेट्स का क्वालिफिकेशन वैकेंसी से मैच कर जाता है उन्हें ईमेल और SMS के जरिए बता दिया जाता है. जिसके बाद कैंडिडेट वैकेंसी के लिए अप्लाई कर देता है.

क्या होता है बेरोजगारी भत्ता?

आपने बेरोजगारी का सिस्टम तो जान लिया, अब बेरोजगारी भत्ते का सिस्टम जानिए. कोई कहेगा, अरे भाई काहे का भत्ता. सरकार क्यों दे भत्ता. सरकार ने पढ़ा-लिखा दिया, जो नौकरी नहीं पा रहे, वो अपना खुद समझें. ऐसा नहीं है. देश में हर नागरिक टैक्स (डायरेक्ट नहीं तो इनडायरेक्ट) भरता है. लोकतंत्र का हिस्सा बनकर वोट देता है. इसके बदले में देश की सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह हर उस शख्स को रोजगार मुहैया कराए, जो इसके लायक है. सरकार रोजगार देकर अहसान नहीं बल्कि अपनी ड्यूटी पूरी करती है. अगर कोई सरकार रोजगार नहीं दे सकती तो उसके एवज में बेरोजगार को एक निश्चित रकम उसके खर्चे के लिए देने की जिम्मेदारी सरकार की होती है. यह सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में होता है. आपको लग सकता है कि भारत में किसी बेरोजगार को भत्ता मिलता दिखता तो है नहीं. इसलिए नहीं दिखता कि इसका एक सिस्टम होता है और उसके जरिए ही भत्ता दिया जाता है.

भारत में बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है. सांकेतिक तस्वीर. इंडिया टुडे.
भारत में बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन उनके लिए बेरोजगारी भत्ते का सिस्टम बहुत लचर है. सांकेतिक तस्वीर. इंडिया टुडे.

क्या है बेरोजगारी भत्ते का सिस्टम?

बेरोजगारी भत्ता पाने की पहली शर्त यह है कि एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में आपका नाम दर्ज होना चाहिए. इसके लिए कुछ मिनिमम जरूरतें भी हैं, मिसाल के तौर पर-

# कम से कम 10 क्लास तक पढ़ाई की हो

# जिस राज्य में रह रहा हो, उसका निवास प्रमाण पत्र हो

# चरित्र प्रमाण पत्र हो

# कई राज्यों में आधार और पासपोर्ट को भी अनिवार्य किया गया है.

# पुरुष की उम्र 30 साल और महिला की 35 साल से कम हो

एक बार रजिस्टर हो जाने से काम नहीं चलेगा. एक तय वक्त के बाद आपको अपना स्टेटस अपडेट करवाना होगा. हर राज्य में सिस्टम अलग है. सरकार यह मानकर चलती है कि जो बेरोजगार है, उसने एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में रजिस्ट्रेशन करा रखा है. वह उस हिसाब से ही बेरोजगारी भत्ता देती है. हर राज्य में बेरोजगारी भत्ते की रकम अलग-अलग है. लेकिन कोई भी राज्य 1000-1500 रुपए से ज्यादा का बेरोजगारी भत्ता नहीं देता. यूपी में फिलहाल 1000 रुपए बेरोजगारी भत्ते के तौर पर दिया जा रहा है.

सरकार भी उतरी ऑनलाइन

एंप्लॉमेंट एक्सचेंज अब नाम के ही बचे हैं, ये कोई छिपी बात नहीं है. लोग अब दफ्तरों के बजाय ऑनलाइन नौकरियां ढूंढना ज्यादा पसंद करते हैं. यह बात सरकार भी समझ चुकी है. मोदी सरकार ने 11 जुलाई को एक जॉब पोर्टल नैशनल करियर सर्विस लॉन्च किया, जिसमें सभी राज्यों में मौजूद प्राइवेट और सरकारी नौकरियों की जानकारी एकसाथ रखी गई है. कोई भी बेरोजगार इस पर लॉगइन करके नौकरी की तलाश कर सकता है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, बेरोजगारी का आलम यह है कि लॉन्च होने के 40 दिन बाद ही जहां पोर्टल पर नौकरी खोजने के लिए 69 लाख लोग आए, लेकिन नौकरी सिर्फ 691 लोगों को मिली. खबर लिखे जाने तक वेबसाइट पर एक्टिव नौकरियों की संख्या 1 लाख 94 हजार 177 और नौकरी तलाश करने वालों की संख्या 1 करोड़ 3 लाख 3 हजार 454 दिख रही है.

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सरकार के नौकरी का पोर्टल लॉन्च करते ही बेरोजगारों की बाढ़ आ गई.

नौकरी दिलवाने के लिए कई साइटें हैं. लेकिन ऑनलाइन सर्च करने से पहले यह भी जान लें कि बेरोजगारी और भत्ते के नाम पर फर्जीवाड़े का खेल भी खूब चलता है. हाल ही में एक विज्ञापन बहुत वायरल हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से 3500 रुपए का भत्ता देने की बात कही गई. बात में पीआईबी ने खुद ट्वीट करके जानकारी दी कि यह फर्जी वेबसाइट है. इस वक्त भी इंटरनेट पर ढेरों ऐसी वेबसाइट मौजूद हैं, जो भत्ता दिलवाने का फर्जी दावा करती हैं. जानकारों का कहना है कि अगर बेरोजगारी भत्ते के लिए एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में रजिस्टर करवाना हो तो बेहतर होगा कि ऑफिस जाकर ही रजिस्ट्रेशन कराएं.

विदेशों में कितना मिलता है बेरोजगारी भत्ता?

पूरी दुनिया में एक जैसा हाल नहीं है. दुनिया के विकसित देश अपने बेरोजगारों को इतना भत्ता देते हैं कि वह आराम से जिंदगी गुजर-बसर कर सकें. वहां पढ़ाई, परिवार में सदस्यों की संख्या, नौकरी बीच में छूटने पर या शुरू से ही बेरोजगार हैं, जैसी तमाम कैटगिरी में बेरोजगारी भत्ते दिए जाते हैं. मोटा-मोटी इन्हें ऐसे समझ सकते हैं.

जर्मनी – यहां अकेले रहने वाले बेरोजगार लोगों को 391 यूरो प्रति माह यानी करीब 34 हजार रुपए दिए जाते हैं। शादीशुदा बेरोजगारों को 353 यूरो (लगभग 30 हजार रुपए) मिलते हैं। जो स्वतंत्र रूप से नहीं रहते, उन्हें 313 यूरो (करीब 27 हजार रुपए) दिए जाते हैं। बेरोजगार पेरेंट्स को प्रत्येक बच्चा, जो 7 से 14 साल की उम्र के बीच है, उसके लिए 261 यूरो (लगभग 23 हजार रुपए) मिलते हैं.  7 से कम उम्र के बच्चे के लिए 229 यूरो या तकरीबन 20 हजार रुपए दिए जाते हैं।

फ्रांस – यहां बेरोजगारों को सबसे अधिक रकम दी जाती है। बेरोजगारों को 6,959 यूरो सालाना यानी करीब 6 लाख रुपये भत्ता दिया जाता है।

आयरलैंड – यहां हर बेरोजगार व्यक्ति को 188 यूरो प्रति सप्ताह मतलब करीब 16 हजार रुपए मिलते है। आयरलैंड में बेरोजगार विकलांग व्यक्ति को 350 यूरो प्रति सप्ताह (करीब 30 हजार रुपए) दिए जाते हैं।

इटली – बेरोजगारों को 1,180 यूरो प्रति माह (करीब 1 लाख रुपए) और विकलांग व्यक्ति, जिनकी उम्र 18 से 65 साल है, उन्हें करीब 279.75 यूरो या तकरीबन 25 हजार रुपए प्रति महीने दिया जाता है।

दुनिया भर में मिलने वाले बेरोजगारी भत्ते को देखकर आंखें न फटी हों तो जान लें कि अमेरिका में कोरोना काल में नौकरी जाने वालों को 3500 डॉलर यानी करीब ढाई लाख रुपये महीने का बेरोजगारी भत्ता दिया गया है. वह फिर चाहें सरकारी नौकरी से निकाले गए हों या प्राइवेट.


वीडियो – मोदी सरकार तीन महीने तक सैलरी का आधा बेरोजगारी भत्ता दे रही है, किसे मिलेगा जान लीजिए

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